Student Protest: लम्बे समय से चले आ रहे छात्र आंदोलन की मांगों को मानते हुए धर्मेन्द्र प्रधान ने 25 जुलाई को दोपहर में इस्तीफा दे दिया. राजनीति की दिलचस्प विडंबना यही है कि कई बार इतिहास अपने आप को अजीब ढंग से दोहराता है या दुरुस्त करता है. इस मामले में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर नजर आ रही है.
राजनीति समय के साथ कैसा अजीब मोड़ लेती है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण आज देश के सामने है. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. यह घटना केवल एक मंत्री के रिजाइन की खबर भर नहीं है बल्कि यह छात्र राजनीति से शुरू होकर देश के शिक्षा मंत्री तक के राजनीतिक सफर के अंत की पटकथा भी है. जिस शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर कभी युवा धर्मेंद्र प्रधान ने राजनीति का पहला पाठ सीखा था, आज उसी शिक्षा व्यवस्था की नाकामियों के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा.
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र नेता के रूप में की थी. ओडिशा की उत्कल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान पेपर लीक का मामला उठा था. धर्मेंद्र प्रधान पेपर लीक, परीक्षाओं में धांधली और शिक्षा व्यवस्था के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रोटेस्ट के लीडर बने. यहीं से उन्हें पहचान मिली और धीरे-धीरे वे भारतीय जनता पार्टी के संगठन में ऊँचे पदों तक पहुंचते हुए आखिरकार वे 2021 में शिक्षा मंत्री बने लेकिन कई बार इतिहास खुद को अजीब तरह से दोहराता है.
शिक्षा मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में NEET-UG और UGC-NET जैसी देश की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली आम बात हो गई. करोड़ों युवाओं का भविष्य दांव पर लग गया जिसके बाद पूरे देश में छात्र सड़कों पर उतर आए. जो मुद्दे कभी धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक सफर के आधार बने थे वही मुद्दे उनके राजनैतिक कैरियर का अंत भी साबित हुए.
छात्रों के बढ़ते दबाव और चौतरफा विरोध के बीच आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा सौंप दिया. यह घटना भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा संदेश है कि जब युवा शक्ति किसी व्यवस्था के खिलाफ एकजुट होती है तो सत्ता को भी जवाबदेह होना पड़ता है. छात्र आंदोलन से शुरू हुआ धर्मेंद्र प्रधान का यह सफर आज एक दूसरे छात्र आंदोलन के मुहाने पर आकर खत्म हो गया.
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