Hindi Story: नवीन को शायद यह एहसास भी नहीं था कि परिवर्तन कभी शोर मचा कर नहीं आता, वह तो चुपचाप मनुष्यों की पहचान और स्थान बदल देता है. समय ने भी उस के भीतर ऐसा ही बदलाव रच दिया था. शाम के 4 बजे की बात है. डाइनिंग टेबल पर गंभीर विषय ‘जलवायु परिवर्तन और नीतिगत निर्णयों की भूमिका’ पर बहस चल रही थी.

पिताजी बोले, ‘‘सरकार बस भाषण देती है. कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते.’’

बड़े भाई ने समर्थन में सिर हिलाया, ‘‘बिलकुल, जो दिखता है वही बिकता है.’’

भाभी ने धीरे से कहा, ‘‘टीवी पर तो कुछ और बताया जा रहा था.’’

तभी सब से छोटे बेटे नवीन ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘लेकिन बात ऐसी नहीं है पापा. दरअसल, आईपीसीसी की 2024 रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारत ने कई महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय कदम उठाए हैं. जैसे ‘नैशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, इथेनौल ब्लेंडिंग, कार्बन क्रैडिट मार्केट और नैशनल इलैक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन और सब से अहम यह कि भारत ने 2070 तक नैट जीरो का लक्ष्य निर्धारित किया है.’’

भाई ने संदेह से देखा, ‘‘तू क्या अमेरिका और ट्रंप की नीतियां भी सम?ाता है अब?’’

नवीन ने संयम से कहा, ‘‘भैया, ट्रंप ने अपने पहले वाले 2016-2020 के शासन के दौरान पैरिस जलवायु सम?ाते से बाहर होने की घोषणा कर दी थी, जबकि वह दुनिया का सब से बड़ा कार्बन पैदा करने वाला है. उन्होंने फौसिल फ्यूल इंडस्ट्री को बढ़ावा दिया और ईपीए यानी अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी की शक्तियां सीमित कर दी थीं. इस से पूरी दुनिया में नकारात्मक संदेश गया और यही कारण था कि भारत जैसे देशों पर और ज्यादा जिम्मेदारी आ गई थी.

‘‘आप को पता है, इस साल भारत में मई में ही 48 डिग्री तापमान कई शहरों में रिकौर्ड किया गया? मौनसून का पैटर्न 15 दिन आगे खिसक गया है. यह सब हमारे जीवन पर सीधा असर डालता है.’’ वह और भी कुछ कहना चाहता था मगर बात बीच में ही काट दी गई. ‘‘तू चुप रह नवीन. यहां कोई स्कूल की क्लास नहीं चल रही. और ज्यादा मत उड़, अभी बच्चा ही है तू,’’ बड़े भाई ने ?िड़क दिया.

पिताजी मुसकराए, ‘‘तू अपनी किताबों में ही ठीक है. असली दुनिया तेरे जैसे पढ़ाकुओं से नहीं चलती.’’

भाभी ने इशारे से नवीन को वहां से उठ जाने के लिए कहा. सब के हाथों में मोबाइल थे और व्हाट्सऐप के सब गुलाम थे. नवीन को चाय की प्याली अब फीकी लग रही थी. वह धीरे से उठ गया और अपने कमरे में चला आया. उस की आंखों में नमी थी, हृदय में भारीपन.

यह तो रोज का ही किस्सा हो गया. मुझे हमेशा छोटा ही समझ जाता है, चाहे मैं कितना भी जानकार हो जाऊं. मेरे विचारों की कोई कीमत नहीं है इस घर में. वह बचपन से यही सुनते आया था, ‘तू नहीं समझेगा’, ‘तू तो अभी बच्चा है’, ‘तेरे बस की बात नहीं’.

अब वह 30 वर्ष का हो चुका था. पर्यावरण नीति में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुका था, राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लेख छप चुके थे. एक संस्था में क्लाइमेट रिसर्चर के तौर पर कार्यरत था. धीरेधीरे उस के भीतर एक द्वंद्व शुरू हो गया. कभी गुस्से में घरवालों को मन ही मन कोसता, कभी अपनेआप को ही दोष देता.

कहीं मैं ही तो गलत नहीं या फिर वाकई मेरे शब्दों का कोई वजन नहीं या मुझे अपनी बात कहनी ही नहीं आती? वह सोच में था.

नतीजा यह हुआ कि नवीन के मन में हीनभावना घर कर गई. अब वह ज्यादा से ज्यादा वक्त घर के बाहर अपने मित्रों के साथ बिताने लगा, खासकर अपनी एक मित्र, सांवली सी, शांत मगर अत्यंत बुद्धिमान ‘आद्या’ के साथ, जो जलवायु संचार की विशेषज्ञ थी. दोनों मिल कर ब्लौग, वैबिनार और फील्ड रिसर्च किया करते. लेकिन घर वालों को आद्या पसंद नहीं थी. भाभी अकसर ताने देतीं, ‘काली सी लड़की के साथ दिखता है आजकल.’

एक रात जब वह इंटरनैट पर इसी बेचैनी का समाधान ढूंढ़ रहा था, उस की नजर एक लेख पर पड़ी, फ्रोजेन इमेज सिंड्रोम जिस का लब्बोलुआब यह था कि जब परिवार या समाज किसी व्यक्ति को उस की पुरानी छवि में ही देखता है तो उस की प्रगति, अनुभव या बुद्धिमत्ता को नकारता है.

उस के भीतर जैसे कोई दीपक जल उठा. कहीं मेरे साथ भी ऐसा ही तो नहीं हो रहा? यह एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है. इस में शायद घरवालों की भी उतनी गलती नहीं है जितनी मैं समझ रहा हूं. उस ने उस आर्टिकल को कई बार पढ़ा और रातभर चिंतन किया. वह रात उस की चेतना की पुनर्रचना थी.

अब मैं अपनी छवि को तोड़ूंगा. अब मैं सब को दिखाऊंगा कि मैं सिर्फ घर का छोटा नहीं, एक समर्थ और सोचने वाला मनुष्य हूं.

अगले ही दिन से नवीन ने उस दिशा में अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. उस ने अपने समकक्ष पढ़ेलिखे मित्र बनाए, ब्लौग पर लेख लिखे, वैबिनार किए. तेजतर्रार ‘आद्या’ के साथ मिल कर उस ने एक प्रोजैक्ट शुरू किया, ‘क्लाइमेट सिंपलीफाइड, जिस में जटिल पर्यावरणीय विषयों को आम भाषा में समझाया जाता. आद्या की बातों में गहराई थी और नवीन को उस में सहज सहयोग मिला.

उन की एक चर्चित वैबिनार थी- क्लाइमेट चेंज : सिर्फ तापमान नहीं, जीवनशैली का परिवर्तन. उस में आद्या ने कहा, ‘‘बदलते मौसम का अर्थ सिर्फ गरमी या सर्दी का बढ़ना नहीं है. इस से फसलचक्र गड़बड़ा रहा है, जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है और बीमारियां भी बदल रही हैं. एक साधारण सी बात बताइए, क्या आप को याद है, पहले बरसात जून में होती थी, अब जुलाई के आखिर तक खिसक गई है? यह सब हमारे नीतिगत निर्णयों का असर है.’’

नवीन ने उस वैबिनार में ट्रंप और भारत की तुलना करते हुए कहा, ‘‘जब अमेरिका जैसे देश पीछे हटते हैं, तब भारत जैसे विकासशील देशों को आगे बढ़ कर जिम्मेदारी उठानी पड़ती है. हम ने अपने प्रयासों से दुनिया को दिखाया कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण साथसाथ चल सकते हैं.’’

उन के कार्यों को विश्वविद्यालयों और मीडिया ने सराहा.

एक दिन दोनों को एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल ने पैनल डिबेट में बुलाया. उसी दिन वह पहली बार परिवार के सामने टीवी पर बोलते हुए दिखा.

भाभी ने टीवी की आवाज बढ़ा दी.

पिताजी चुपचाप सुनते रहे.

भाई की आंखों में अनकही आशंका थी, ‘‘क्या यह वही नवीन है?’’

कुछ हफ्तों बाद नवीन और आद्या को एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने शोध पर बोलने का अवसर मिला.

उन का विषय था- इक्विटी इन क्लाइमेट पौलिसी फौर डैवलपिंग नैशंस.

उन्हें सुनने वाले लोगों में प्रोफैसर, नीतिनिर्माता और युवा छात्र थे. मंच पर दोनों की उपस्थिति आत्मविश्वासी और गरिमामयी थी.

उसी शाम घर लौटा तो पिता ने पहली बार पूछा, ‘‘वह क्या रिपोर्ट थी आईपीसीसी वाली? जरा हमें भी सम?ा दे.’’

भाई ने मुसकरा कर कहा, ‘‘तेरी बातें तो अब बड़ेबड़े लोग भी सुनते हैं. हमें भी सुना दे.’’

भाभी, जो पहले आद्या को पसंद नहीं करती थीं, बोलीं, ‘‘उस लड़की में समझदारी है. रंगवर्ण से क्या फर्क पड़ता है जब सोच इतनी साफ हो.’’

नवीन चौंका नहीं. वह जानता था कि बदलाव धीरेधीरे आता है और अब वह आ चुका है. अब घर में जब भी कोई गंभीर चर्चा होती, लोग नवीन की ओर मुड़ कर उस की राय पूछते. वह अब भी सब से छोटा था उम्र में, लेकिन उस के विचार बड़े माने जाते थे.

मां ने एक दिन उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘बेटा, हम तुझे हमेशा बच्चों की तरह ही देखते रहे. पर तू तो वाकई में बड़ा हो गया है, हमारे सोचने से

ज्यादा बड़ा.’’

नवीन की आंखों में उस दिन कोई आंसू नहीं था, बस, संतोष था. एक टूटी हुई छवि के पुनर्निर्माण का संतोष.

अब उसे किसी से शिकायत नहीं थी.

वह जान गया था कि रिश्ते कभी कटते नहीं. बस, उन में दृष्टिकोण की धुंध जम जाती है.

जब वह छंटती है तो सामने वही इंसान होता है मगर अब पूर्ण पहचान के साथ.

अपने भीतर के आत्मविश्वास और सम?ादार मित्रों की सहायता से वह न केवल परिवार की दृष्टि में बड़ा बन चुका था, बल्कि स्वयं की दृष्टि में भी. Hindi Story

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