Cricket and Politics: आजकल टीवी और मोबाइल पर आईपीएल और वनडे मैचों की बाढ़ सी आ गई है. हर तरफ क्रिकेट, क्रिकेट और क्रिकेट. लोग रातदिन इस के चर्चे करते हैं, सब काम छोड़ कर मोबाइल स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहते हैं, दांव लगाते हैं, भाव खाते हैं. लेकिन, क्या यह महज खेल है या फिर यह सत्ता के हाथों जनता को बेवकूफ बनाने का पुराना तरीका है? यह बिलकुल रोमन साम्राज्य की ब्रेड एंड सर्कस यानी रोटी और तमाशा वाली नीति जैसी लगती है. वहां शासक जनता को कोलेजियम में ग्लैडिएटर लड़वा कर व्यस्त रखते थे ताकि वे सत्ता के खिलाफ आवाज न उठाएं. आज भारत में बीजेपी सरकार आईपीएल जैसे महंगे तमाशों को थोक भाव में आयोजित कर जनता को वही सर्कस परोस रही है.

दिनेश ने नीट की एक साल जम कर तैयारी की थी. एग्जाम देने के बाद वह काफी खुश था. अचानक पता चला कि पेपर लीक हो गया. दिनेश सदमे में पहुंच गया था. दिनेश का बड़ा भाई गुड़गांव की एक कंपनी में काम करता था. दिनेश 2 साल से अपने बड़े भाई के घर पर रह कर ही तैयारी कर रहा था. अब दिनेश का पढ़ाई से मन ऊब चुका था और वह कोई छोटीमोटी नौकरी करना चाहता था. दिनेश के बड़े भाई नितिन को दिनेश के फ्यूचर की कोई चिंता नहीं थी. नितिन तो क्रिकेट का दीवाना था. उसे आईपीएल की ऐसी लत लगी कि वह दिनभर मोबाइल स्क्रीन पर लगा रहता. इधर आईपीएल खत्म हुआ उधर नितिन की नौकरी छूट गई. अब दिनेश के लिए नौकरी जरूरी हो गई. आखिरकार, उसे जोमैटो में होम डिलीवरी का काम करना पड़ा.

यह कहानी दिनेश की नहीं है, ज्यादातर युवा आज ऐसे ही हालात में हैं जहां भविष्य संकट में है लेकिन भविष्य से कहीं बढ़ कर क्रिकेट हो गया है. वर्तमान के थोड़े से मनोरंजन के आगे भविष्य की परवा किसी को नहीं. समय बरबाद करने के लिए सोशल मीडिया, फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम हैं और अगर इन से जी भर जाए तो क्रिकेट का सर्कस तो है ही. बस, मनोरंजन और टाइमपास ही जिंदगी बन गई है. यह एक तरह का खतरनाक नशा है जिस की लत के आगे न वर्तमान नजर आता है, न ही भविष्य. यह बिलकुल रोमन साम्राज्य की ब्रेड और सर्कस वाली राजनीति है जिस में फंस कर आम आदमी अपने अधिकारों को भूल चुका है.

ब्रेड एंड सर्कस की नीति

प्राचीन रोमन साम्राज्य में एक मशहूर नीति थी- ‘ब्रेड एंड सर्कस’ जिस का मतलब था कि जनता के लिए सस्ती या मुफ्त रोटी के इंतजाम के साथ मनोरंजन का बंदोबस्त भी कर दो ताकि वह उलझी रहे और साम्राज्य की गलत नीतियों के खिलाफ न खड़ी हो. पहली सदी के रोमन व्यंग्यकार डेसिमस जूनियस जुवेनालिस ने अपनी किताब ‘द सटायर’ में लिखा है- “अब जनता केवल 2 चीजों की ही चिंता करती है, रोटी और तमाशे की.” उन्होंने आगे लिखा कि रोमन जनता ने राजनीतिक अधिकारों, नागरिक कर्तव्यों और शासन में भागीदारी की चिंता छोड़ दी है. वह केवल मुफ्त अनाज और सर्कस, रथदौड़, ग्लैडिएटरों के खेल जैसे मनोरंजन से संतुष्ट हो गई है. ‘ब्रेड एंड सर्कस’ जुवेनल द्वारा रोमन समाज और शासकों की राजनीति पर किया गया एक व्यंग्य था. यह रोमन नीति असल में वह चालाकी थी जिस में जनता का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटाने के लिए मुफ्त सुविधाओं और मनोरंजन का सहारा लिया जाता था.

रोमन शासक गरीब लोगों को मुफ्त अनाज बांटते थे. साथ ही, तरहतरह के खेल, रथदौड़ और ग्लैडिएटरों की खूनी लड़ाइयों का आयोजन करते थे. हजारों लोग इन तमाशों को देखने आते थे. ऐसे में सरकार के खिलाफ निराशा जयजयकार में बदल जाती. जब लोगों के पास मनोरंजन की भरमार हो और पेट भरने लायक व्यवस्था हो तो वे बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सत्ता की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर ध्यान नहीं देते. रोमन काल हो या आज की राजनीति, सत्ता यही चाहती है कि जनता सवाल पूछने के बजाय भावनाओं और मनोरंजन में व्यस्त रहे.

ब्रेड एंड सर्कस केवल रोमन साम्राज्य की कहानी नहीं बल्कि सत्ता चलाने का एक पुराना मनोवैज्ञानिक तरीका है. जब जनता को लगातार मनोरंजन, धार्मिक उत्सव, नारों या पहचान की राजनीति में उलझाया जाए तो वह सत्ता से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी सवाल नहीं पूछती. इस का मतलब यह नहीं कि हर खेल, त्योहार या मनोरंजन सत्ता की साजिश है. खेल समाज के लिए जरूरी होते हैं लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इन का इस्तेमाल जानबूझ कर असली समस्याओं से भटकाने के लिए किया जाने लगता है.

ब्रेड एंड सर्कस भले ही रोमन साम्राज्य का नारा नहीं था लेकिन उस की राजनीति का सार यही था. रोम के शासक जानते थे कि भूखी जनता विद्रोह कर सकती है और जागरूक जनता विद्रोह कर सकती है, इसलिए उन्होंने एक आसान रास्ता चुना. मुफ्त अनाज और ढेर सारा मनोरंजन. यह हर युग की सच्चाई है. सत्ता चाहती है कि जनता सोचने के बजाय केवल सुन्न पड़ी रहे. अगर लोग जागे तो शिक्षा, संविधान, रोजगार, स्वास्थ्य की बात करेंगे. अगर जनता धार्मिक कहानियों और दिनरात के तमाशों की राजनीति में उलझी रहेगी तो सत्ता मनमाने तरीकों से काम करती रहेगी.

सत्ता रोटी और मनोरंजन का इंतजाम करती है तो धर्म डर और आस्था पैदा करता है जिस से जनता पूरी तरह भ्रम में जीने की आदी हो जाती है. मनोरंजन जनता को रोजमर्रा के संघर्ष, पीड़ा और अपमान से राहत देता है तो धर्म लोगों को समस्याओं से दूर ले जा कर कर्मकांड, चमत्कार, धार्मिक उन्माद या स्वर्गनरक के डर में उलझा देता है.

आज ग्लैडिएटर नहीं हैं लेकिन उन की जगह कई नए तमाशे हैं. आईपीएल है, वनडे मैच है और इस के अलावा चौबीसों घंटे सोशल मीडिया की अंतहीन बहसें, सनसनीखेज टीवी डिबेट, सैलिब्रिटी विवाद, धार्मिक हंगामे और राजनीतिक प्रचार. इन सब के बीच बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और न्याय जैसे मुद्दे दम तोड़ जाते हैं.

सत्ता और मनोरंजन की राजनीति के स्मारक

इतिहासकारों के अनुसार, पूरे रोमन साम्राज्य में अब तक करीब 230 से 280 रोमन एम्फीथिएटर खोजे जा चुके है. इन में कुछ एम्फीथिएटर आज भी शानदार स्थिति में मौजूद हैं. वेरोना अरेना, अरेना औफ नाइम्स और पुला अरेना, जहां आज भी संगीत कार्यक्रम और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं. दूसरी ओर, कई स्थानों पर केवल टूटे हुए पत्थर बचे हैं. इन के अवशेष पूरे यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और मध्यपूर्व तक फैले हुए हैं.

दो हजार साल पहले इतने बड़े पैमाने पर रोमन साम्राज्य में बने यह कोलेजियम या एम्फीथिएटर यह साबित करते हैं कि उस दौर में लोगों को नियंत्रित करने के लिए मनोरंजन सत्ता का एक बड़ा हथियार था. इन विशाल अखाड़ों में ग्लैडिएटरों की खूनी लड़ाइयां, जंगली जानवरों से खूनी लड़ाइयां और इंसान की हत्याएं करा कर जनता का मनोरंजन किया जाता था.

रोमन शासक अच्छी तरह जानते थे कि अगर जनता को लगातार तमाशे और मनोरंजन मिलते रहें तो वह सत्ता के खिलाफ बगावत नहीं करेगी. रोमन सत्ता की इसी मानसिकता को रोमन कवि जुवेनल ने ‘ब्रेड एंड सर्कस’ की नीति कहा था, इसलिए रोम के ये एम्फीथिएटर केवल प्राचीन इतिहास के नमूने नहीं हैं बल्कि ये इस बात का सुबूत भी हैं कि इतिहास में सत्ता ने लोगों का ध्यान असली समस्याओं से हटाने के लिए बड़े पैमाने पर मनोरंजन का सहारा लिया गया. सो, किसी भी युग में सत्ता द्वारा परोसे जा रहे तमाशे के पीछे छिपे राजनीतिक उद्देश्य को समझना उतना ही जरूरी है जितना उस के आर्किटैक्चर की तारीफ करना.

बुरा हाल लेकिन जनता खुशहाल

पेपर लीक का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. पिछले 5 सालों में 40 से ज्यादा बड़े पेपर लीक हो चुके हैं, जो करोड़ों स्टूडैंट्स के भविष्य को बरबाद कर चुके हैं. नीट , यूपी पुलिस भरती, बीपीएससी जैसी परीक्षाओं में घोटाले आम हो गए. लाखों युवा सालों की मेहनत गंवा बैठते हैं लेकिन दोषियों पर सख्त कार्रवाई के बजाय मामला दबाने की कोशिश होती है. शिक्षा व्यापार बन गई है. अमीरों के बच्चे कोचिंग, पैसे और सिफारिश से आगे निकल जाते हैं जबकि गरीब और मिडिल क्लास के बच्चों को मिडडे मील के अलावा कुछ हासिल नहीं होता. सत्ता और धर्म का गठजोड़ कभी भी जनता के हित में नहीं होता. धर्म हमेशा से जनता को शिक्षित होने से रोकता है ताकि वे शोषण को चुनौती न दे सकें. बीजेपी राज में यही हो रहा है.

सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी 5 प्रतिशत के आसपास दिखाई जाती है जबकि असलियत यह है कि करोड़ों युवा बेकार बैठे हैं. मोदी सरकार ने 2014 में 2 करोड़ नौकरियां सालाना देने का वादा किया था लेकिन हकीकत इस के उलट है. कृषि से बाहर निकलने वाले नौजवान इंडस्ट्रीज में जगह नहीं बना पा रहे. पूंजीपति और बड़े कारोबारियों को टैक्स छूट और सब्सिडी दी जा रही है लेकिन छोटे उद्योग और आम लोग बरबाद हो रहे हैं. इसी वजह से आर्थिक असमानता ब्रिटिश राज से भी बदतर स्थिति में पहुंच चुकी है.
जब सत्ता पूंजीपतियों के इशारों पर काम करने लगे तो वैलफेयर स्टेट की अवधारणा मर जाती है और पूंजीवाद हावी हो जाता है. ऐसे में मुनाफा बढ़ाने के लिए मेहनत की कीमत घटाई जाती है और बेरोजगारी बढ़ाई जाती है. बीजेपी की मेक इन इंडिया और निजीकरण की नीतियां इसी का हिस्सा हैं.

रुपया डौलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है. वह 94-95 रुपए प्रति डौलर के आसपास पहुंच चुका है. महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है. शिक्षा और स्वास्थ्य निजी हाथों में सौंप दिए गए हैं जहां गरीब का दाखिला नामुमकिन है. बीजेपी सरकार पूंजीपति वर्ग की सेवा में लगी है जबकि आम जनता पीछे छूटती जा रही है.

बीजेपी ने अपनाई ब्रेड एंड सर्कस की नीति

क्रिकेट और आईपीएल जैसा मनोरंजन नई अफीम बन गया है. बीजेपी सरकार और पूंजीवादी मीडिया मिल कर इस नशे को बढ़ावा दे रहे हैं. कंपनियां, कौर्पोरेट घराने और सैलिब्रिटीज आईपीएल में विज्ञापन और सट्टेबाजी के जरिए अरबों रूपए कमा रहे हैं जबकि युवा स्क्रीन के सामने बैठ कर अपनी जिंदगी बरबाद कर रहे हैं. बोर्ड औफ़ क्रिकेट कंट्रोल औफ़ इंडिया, बीसीसीआई, गृह मंत्रालय की एक ब्रांच ही है. हाल ही में आईपीएल का आखिरी फाइनल मैच नरेंद्र मोदी स्टेडियम, अहमदाबाद में ही हुआ था.

रोमन साम्राज्य में शासक जानते थे कि अगर जनता सोचने लगी तो विद्रोह हो जाएगा, इसलिए पूरे रोम में आम आदमी के मनोरंजन के लिए छोटेबड़े कोलेजियम बनवाए गए जिन के जरिए जनता को भरमाए रखना आसान हो गया. आज भी यही हो रहा है. जब पेपर लीक, बेरोजगारी और महंगाई से परेशान जनता टीवी खोलती है तो वहां मैच शुरू हो जाता है. जनता टीम इंडिया के जश्न में व्यस्त हो जाती है. सरकार के गलत फैसलों से ध्यान भटकाए रखना यह राजनीति की गहरी चाल होती है जिस में आम जनता आसानी से फंस जाती है. धर्म में तो सर्कस होता ही है, ऊपर से क्रिकेट का सर्कस स्टेडियमों और फिर स्क्रीनों पर पहुंचा दिया गया है ताकि लोग हर समय व्यस्त रहें.

धर्म पुरानी अफीम जैसा है लेकिन आज क्रिकेट, बौलीवुड, सोशल मीडिया नई अफीम बन गए हैं. रोमन सम्राट धर्म के नाम पर उल्लू नहीं बनाते थे, वे मुफ्त अनाज और मनोरंजन के नशे में जनता को भरमाए रखते थे लेकिन आज की राजनीति का मकसद ब्रेड और सर्कस से कहीं आगे है. मुफ्त अनाज दो, धर्म के नाम पर बांटो और खेल के नाम पर भी व्यस्त रखो. आज के समय खेल केवल खेल नहीं रह गए हैं, वे एक बड़े उद्योग में बदल चुके हैं. आज साल के ज्यादातर महीनों में कहीं न कहीं आईपीएल, टी-20 लीग, वनडे सीरीज या आईसीसी टूर्नामैंट चलते रहते हैं और इसे देखने के लिए करोड़ों लोग घंटों टीवी और मोबाइल स्क्रीनों से चिपके रहते हैं.

हर समाज में सत्ता केवल पुलिस और कानून के सहारे नहीं चलती. वह मनोरंजन, मीडिया और कल्चर के जरिए भी लोगों की सोच को प्रभावित करती है. जिस देश में 80 प्रतिशत आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं से जूझ रही हो वहां दिनरात धर्म और क्रिकेट का ओवरडोज देने का क्या मतलब? असल में जनता का ध्यान तमाशों में लगाने से सत्ता उद्दंड हो कर मनमानी करने के लिए आजाद हो जाती है और जनता को थोड़ा भोजन और भरपूर मनोरंजन मिलता रहे, तो वह सत्ता से सवाल नहीं करती. आज का दौर रोमन समय से अलग है लेकिन सवाल वही है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब तलवारों की जगह क्रिकेट के बल्ले हैं और कोलेजियम की जगह विशाल स्टेडियम हैं.

धर्म और खेल दोनों ही तब समस्या बन जाते हैं जब वे भावनात्मक उन्माद पैदा करने लगते है. जिस तरह धार्मिक उन्माद लोगों को इंसानियत से दूर करता है, उसी तरह खेलों का अंधा जनून भी जनता को कहीं का नहीं छोड़ता. हालांकि, यह सच है कि समाज को खेलों की जरूरत भी होती है.

मानव सभ्यता के विकास में खेलों का अहम रोल रहा है. खेल स्वास्थ्य, अनुशासन, मनोरंजन और राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खिलाड़ियों के लिए अवसर भी पैदा करते हैं लेकिन आज के समय मीडिया, सरकार और कौर्पोरेट हितों का गठजोड़ खेलों को जनता के बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने का हथियार बना रहा है.
लोकतंत्र में किसी भी सरकार की जवाबदेही बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और नागरिक अधिकारों पर तय होती है, इसलिए असली मुद्दा क्रिकेट नहीं है बल्कि यह तय करना है कि मनोरंजन नागरिक चेतना की जगह न ले. एक जागरूक समाज वही है जो मनोरंजन का आनंद भी ले और साथ ही, सरकार से रोजगार, अच्छी शिक्षा, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और पारदर्शी शासन का हिसाब भी मांगे.

आज खिलाडियों की शारीरिक क्षमता की जांच खेलों से नहीं होती. आज उन के मैच जीतने से होती है. आज खिलाडी खरीदेबेचे जा रहे हैं. खेलों का आयोजन अरबों रुपयों का खेल हो गया है जिन में मुनाफा कमाने वाली कंपनियां कूद पड़ी हैं. आईपीएल में सिर्फ कौन सी टीम जीतेगी, यह प्रतिस्पर्धा नहीं है, कौन सी टीम पर सट्टे का पैसा लगाया जाए, यह बड़ी बात है.

खिलाडियों को रिश्वतें दी जाती हैं कि वे कब आउट हों, कब चौका मारें, कब कैच छोड़ें. हर बात पर सट्टे का जुआ लगता है. रोमन युग में भी लगता था. हां, ओलिंपिक में नहीं लगता क्योंकि वहां लोग अपनी शारीरिक क्षमता दिखाने आते हैं. आईपीएल जैसी लीग्स पूरी दुनिया में हैं. लीगरूपी यह तमाशा लोगों को बहकाता है जबकि अमीरों और जालसाजों को फायदा देता है. सरकार के लिए यह तमाशा लाभदायक है क्योंकि इस से जनता का मन बहलता है, वह सवाल नहीं खड़े करती, कौकरोच जनता पार्टी के धरने में हिस्सा नहीं लेती.

आईपीएल स्टेडियम- आधुनिक दौर के रोमन एंफीथिएटर

भारत में आज सिर्फ आईपीएल के लिए 14 नए स्टेडियम हैं. इन सभी स्टेडियमों में कुल मिला कर करीब 6,94,708 दर्शकों के बैठने की क्षमता है.

नरेंद्र मोदी स्टेडियम में अहमदाबाद 1 लाख 32 हजार सीट.

ईडन गार्डंस, कोलकाता 68 हजार सीट

शहीद वीर नारायण सिंह अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, रायपुर 65 हजार सीट

राजीव गांधी अंतर्राराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, हैदराबाद 55 हजार सीट

भारतरत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम, लखनऊ 50 हजार सीट

बरसापारा क्रिकेट स्टेडियम, गुवाहाटी 46 हजार सीट

महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम, पुणे 42 हजार सीट

एम चिन्नास्वामी स्टेडियम, बेंगलुरु 40 हजार सीट

एम ए चिदंबरम स्टेडियम, चेन्नई 39 हजार सीट

महाराजा यादविंद्र सिंह अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, मुल्लांपुर 38 हजार सीट

अरुण जेटली स्टेडियम, नई दिल्ली 35 हजार सीट

वानखेड़े स्टेडियम, मुंबई 33 हजार सीट

डा. वाई एस राजशेखर रेड्डी एसीए-वीडीसीए क्रिकेट स्टेडियम, विशाखापट्टनम 27 हजार सीट

हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम, धर्मशाला 21 हजार सीट

आईपील के अलावा वनडे और टेस्ट मैच के तमाशे के लिए 30 से ज्यादा स्टेडियम हैं. आईपीएल के 14 स्टेडियमों में से 11 स्टेडियम ऐसे हैं जिन्हें टेस्ट क्रिकेट की मेजबानी का भी दर्जा प्राप्त है. इन के अलावा 19 स्टेडियम ऐसे भी हैं जहां कभी न कभी टेस्ट क्रिकेट खेला गया है.

आई एस बिंद्रा स्टेडियम, मोहाली में 15 टेस्ट मैच खेले जा चुके हैं. ब्रेबोर्न स्टेडियम, मुंबई में 18 टेस्ट मैच, ग्रीन पार्क स्टेडियम, कानपुर 23 टेस्ट मैच, विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम, नागपुर 7 टेस्ट मैच, जेएससीए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, रांची 2 टेस्ट मैच. निरंजन शाह स्टेडियम, राजकोट 2 टेस्ट मैच होलकर स्टेडियम, इंदौर 3 टेस्ट मैच बाराबती स्टेडियम, कटक 2 टेस्ट मैच सवाई मानसिंह स्टेडियम, जयपुर 1 टेस्ट मैच और राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, देहरादून में एक टेस्ट मैच खेले गए हैं.

ये तमाम स्टेडियम आज के आईपीएल जैसे तमाशे के लिए हैं तो दूसरी ओर रोमन साम्राज्य में 230 से 280 के बीच एम्फीथिएटर बनाए गए थे जहां लाखों लोग तमाशे देखने जुटते थे. पहली नजर में दोनों की तुलना अजीब लग सकती है. आखिर एक तरफ आधुनिक क्रिकेट ग्राउंड है और दूसरी तरफ प्राचीन रोम के खूनी स्टेडियम लेकिन यदि हम इन दोनों को सत्ता और समाज के नजरिए से देखें तो दिलचस्प समानता दिखाई देती है.

रोमन कवि ने लगभग दो हजार साल पहले रोटी और तमाशा का जिक्र किया था. अगर जनता को खाने के लिए रोटी और मनोरंजन के लिए लगातार तमाशे मिलते रहें तो वह सत्ता के खिलाफ नहीं जाएगी. रोमन शासकों ने इसी सोच के तहत पूरे साम्राज्य में सैकड़ों एम्फीथिएटर बनवाए. ये केवल खेल के मैदान नहीं थे बल्कि जनता का ध्यान बांधे रखने का राजनीतिक साधन भी थे. वहां लोगों की भावनाओं को बड़े आयोजनों के जरिए दिशा दी जाती थी.
आज भारत में आईपीएल, वनडे मैच जैसे तमाशों के लिए विशाल स्टेडियम बनाए गए हैं जहां जनता अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की परेशानियों को भूल कर आईपीएल जैसे मौडर्न तमाशे का मजा लेती है और इस नशे में जरूरी बुनियादी सवाल मैच, खिलाड़ी, नीलामी और रिकौर्ड के शोर में दब कर मर जाते हैं.

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लोकतंत्र के लिए सब से बड़ा खतरा क्या है

किसी भी लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा केवल कोई सनकी तानाशाह नहीं होता बल्कि वह नागरिक भी होता है जिस ने सवाल पूछना छोड़ दिया हो. जिस दिन जनता सत्ता से यह पूछना बंद कर दे कि स्कूल कितने बने, अस्पताल कैसे चल रहे हैं, रोजगार कहां हैं, वैज्ञानिक अनुसंधान कितना बढ़ा और संविधान के वादे कितने पूरे हुए उस दिन ब्रेड एंड सर्कस की नीति जीत जाती है. एक जागरूक समाज किसी भी नेता, धर्मगुरु, विचारधारा या मीडिया पर आंख बंद कर के भरोसा नहीं करता. वह हर दावे का प्रमाण मांगता है, भावनाओं से पहले तथ्यों को रखता है और किसी भी सरकार का मूल्यांकन उस के नारों, आयोजनों या तमाशों से नहीं बल्कि उस के कामों से करता है.

रोमन साम्राज्य हजारों साल पहले समाप्त हो गया लेकिन ब्रेड एंड सर्कस की राजनीति आज भी जीवित है. केवल तमाशे बदल गए हैं. एक लोकतंत्र की असली पहचान यह नहीं कि उस के स्टेडियम कितने बड़े हैं या उस के आयोजन कितने भव्य हैं. लोकतंत्र की असली पहचान यह है कि उस के नागरिक कितने शिक्षित, वैज्ञानिक सोच वाले, प्रश्न पूछने वाले और सत्ता से जवाब मांगने वाले हैं. Cricket and Politics

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