समय रहते सचेत हों

Child Development: मार्च (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘डिजिटल युग में खत्म होता बचपन’ बेहद सटीक होने के साथसाथ तर्कपूर्ण महसूस हुआ. डिजिटल क्रांति का असर सब से ज्यादा बच्चों के दिलोदिमाग पर देखने को मिल रहा है.

बेइंतहा डिजिटल सामग्री का उपयोग दीमक की भांति धीरेधीरे बच्चों के बचपन को चट करता जा रहा है. जिस प्रकार एक प्राचीन पौराणिक कपोलकल्पित कहानी के अनुसार, एक राक्षस की जान एक तोते में थी ठीक उसी तरह आज के बच्चों की जान डिजिटल सामग्री में है. कहीं न कहीं बच्चों के डिजिटल सामग्री के प्रति आकर्षण के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार हैं. मातापिता खुद बच्चों की शोरशराबे वाली गतिविधि से बचने के लिए मोबाइल नामक  झुन झुना पकड़ा कर अपने दायित्वों से इतिश्री कर लेते हैं.

जब खुद पेरैंट्स अंधाधुंध डिजिटल सामग्री का उपयोग करेंगे तो लाजिमी है कि बच्चे भी वैसा ही करेंगे. बच्चों को डांटफटकार कर नहीं बल्कि बेहद स्नेहपूर्ण रवैए के साथ डिजिटल सामग्री के अत्यधिक प्रयोग से होने वाले दुष्प्रभाव के बारे में बताना चाहिए. कभीकभार या सप्ताह में एक दिन बच्चों के साथ अपनी सुविधानुसार किसी रमणीक स्थान पर जाने के साथसाथ उस स्थान के महत्त्व पर चर्चा भी करनी चाहिए. इस के अलावा महापुरुषों से जुड़े प्रेरक प्रसंग भी बच्चों को सुनाने चाहिए. समय रहते यदि इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया तो निश्चय ही परिणाम भयावह देखने को मिलेंगे.

लेखक – विमल वर्मा

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सोचोसमझो, फिर आगे बढ़ो

नौजवानों के बारे में बदलफ्जी क्या निकली न्यायालय के दरवाजे से, नौजवानों को कौकरोच कह डाला गया, कि कौकरोच जनता पार्टी खड़ी हो गई. यह गाली से निकली पार्टी है. मुद्दों के लिए लड़ने वालों के साथ देश के नौजवान कहां खड़े होंगे, इस देश की असली ताकत किन लोगों के पास है?

तुम्हारा पेट देश के कौन लोग भरते हैं, तुम्हारे तन को ढकने वाले कपड़े, जूते, दाढ़ीमूंछ को संवारने वाला सामान, तुम्हारी जरूरत की हर चीज कौन बनाता है, तुम्हारे घर की छत कौन बनाता है? आदि सवालों के जवाब खुद सोचसम झ कर दो.

आज कौकरोच बोला गया तो कौकरोच जनता पार्टी बना ली गई. कल तुम्हें डरपोक कहे या पागल बोले तो तुम डरपोक जनता पार्टी, पागल जनता पार्टी बना लोगे? शहीदे आजम भगत सिंह का नाम सुना होगा. उन को पढ़ा है, उन को पढ़ो. पूंजी और श्रम में कौन वास्तव में हमारे जीवन के लिए सर्वोपरि है? भूख लगी है तो रोटी खाओगे या नोट खाओगे. दुनियाभर की दौलत सोनेचांदी, हीरेमोती और भी दूसरी दौलतें, यहां तक कि दो दाने अनाज के पैदा नहीं कर सकते.

अनाज खेत में श्रमिक के श्रम से पैदा होते हैं. उन की मेहनत से पैदा हुए अन्न, सब्जियां, फल आदि से दुनिया जिंदा रहती है. तुम नौजवानों ने कभी उन के बारे सोचा है जो तुम्हारे लिए कलकारखानों में काम कर के तुम्हारे लिए सिर पर चलने वाली कंघी से ले कर तुम्हारे पूरे शरीर के लिए हर जरूरत की चीजें बनाते हैं. समाज के किसानों और मजदूरों के बारे कभी सोचा होता तो कौकरोच बोलने वाले पैदा ही न होते.

मेहनतकश समाज ने 1920  में देश में एक ट्रेड यूनियन की स्थापना की थी औल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस, जिस के गर्भ से 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ. आजादी मिलने के बाद इस पार्टी को तोड़ने के लिए कौनकौन से लोग थे, कौनकौन सी देशीविदेशी ताकतें थीं? सब को पढ़ो, विचार करो. तर्कवितर्क करना सीखो. संगठित होना सीखो. संसद भवन का रूपस्वरूप पहचानो. उस में बैठने वालों की नीतियों को जानो कि वे देश के सब से बलिदानी श्रमिकों के साथ क्याक्या जुर्म करती आ रही हैं.

इस धरती को क्या किसी पार्टी ने बनाया है. ये दुनिया अगर जिंदा है तो मेहनतकश जनता की कमाई दौलत से. सोचिए, विचारविमर्श कीजिए. किसी के बहकावे में मत आइए. आप नौजवान हैं, सम झ को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, तार्किक आधार पर परखिए और पाखंडवाद, धार्मिक उन्माद व अनर्गल बातों से प्रभावित हो कर बरबादी के रास्ते पर मत चलिए. हथियारों की जगह औजारों को चुनिए. मनुष्य हो तो हथियारों से नहीं, कलम और औजार को साथ ले कर प्रगति की राह पर चलिए. भगतसिंह जैसे लाखों शहीदों के सपनों की दुनिया का निर्माण कीजिए.

  एक पाठक

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बच्चों के मुख से

मेरा 3 वर्ष का बेटा बहुत बातें बनाता है. एक बार शाम के करीब 8 बजे मैं उसे छत पर खेलने के लिए ले गई. वह बैठ कर एक चित्र में रंग भर रहा था. उसे प्यास लगी तो मैं पानी लेने नीचे आई. इतने में लाइट चली गई और घुप्प अंधेरा हो गया. वह ऊपर से चिल्लाया, ‘‘मम्मी, मुझे अंधेरे से बहुत डर लग रहा है.’’

मैं ने आवाज लगाई, ‘‘वहीं बैठा रह, मैं मोमबत्ती जला कर ला रही हूं.’’

मैं माचिस और मोमबत्ती ढूंढ़ रही थी, इतने में वह तेजी से दौड़ता हुआ नीचे आ गया. मैं ने कहा, ‘‘अंधेरे से डरा नहीं.’’

वह बोला, ‘‘मैं ने कस कर आंखें बंद कर लीं, इसलिए अंधेरा मुझे दिखा ही नहीं और मुझे डर लगा ही नहीं.’’

लेखिका – डा. कल्पना चुग

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