Ram Mandir Donation Scam: राममंदिर हो या अजमेर की दरगाह सभी धार्मिक अड्डों पर धर्म की आड़ में धन का खेल चलता है. यहाँ सैंकड़ो लूटने के लिए बैठे हैं और लाखों लुटने के लिए दूर दूर से आते हैं. लूटने वाले लुटेरे नहीं ईश्वर के ठेकेदार माने जाते हैं और लुटने वालों को भक्त कहा जाता है. जो जितना लुटता है वह उतना ही बड़ा भक्त घोषित किया जाता है. इन धार्मिक अड्डों पर बेतहाशा धन को लूटने की बंदर बांट चलती है. राम मंदिर चंदा चोरी का केस कोई नई बात नहीं है. यह सदियों पुराना पैटर्न है जो आज भी चल रहा है. कई मंदिरो मजारों और मस्जिदों के भ्रष्टाचार या चंदा चोरी के उदाहरण सामने हैं.

धर्म सिर्फ आस्था का नाम नहीं बल्कि लूटने का सबसे बड़ा और पुराना धंधा है. गरीब लोग अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा भगवान, पीर, फकीर या मंदिर-मस्जिद को चढ़ाते हैं. इस उम्मीद में कि कोई ऊपर वाला उनकी तकलीफ दूर करेगा लेकिन हकीकत यह है कि यह पैसा ठेकेदारों, पुजारियों, बोर्ड सदस्यों और राजनेताओं की जेब में चला जाता है. सदियों पुराना यह खेल आज भी पूरे जोरों पर है.

राम मंदिर में भक्तों के करोड़ों रुपये के चढ़ावे की चोरी का मामला ताजा है. शुरुआती जांच में पता चला कि 40 दिनों में करीब 70 बार चोरी हुई. 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया और उनसे 2 करोड़ रुपये तक बरामद हुए. ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और एक ट्रस्टी ने इस्तीफा दे दिया. सीसीटीवी फुटेज गायब हैं. नोटों के बंडल गायब हैं. यह सब लगातार चल रहा था.

राम मंदिर में भक्तों का चढ़ावा गायब

अयोध्या राम मंदिर के लिए देश में क्या राजनीती हुई और इसका खामियाजा किस तरह देश की डेमोक्रेसी को भुगतना पड़ रहा है यह एक अलग विषय है. 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या जमीन विवाद पर फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन राम मंदिर बनाने के लिए और मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ अलग जमीन मस्जिद के लिए देने का फैसला सुनाया. इस ऐतिहासिक फैसले के बाद 5 अगस्त 2020 को पीएम नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में भूमि पूजन किया और निर्माण का काम युद्धस्तर पर शुरू हो गया.

राम मंदिर के लिए देशभर से करोड़ों लोगों ने श्रद्धा के साथ चंदा दिया. बहुत से लोगों ने अपनी बचत से पैसा दिया तो कई गरीब लोगों ने भी अपनी क्षमता के अनुसार योगदान किया. लोगों का विश्वास था कि उनका पैसा मंदिर निर्माण और उससे जुड़े कामों में लगेगा लेकिन चंदा चोरी का खेल तो निर्माण के दौरान ही शुरू हो गया था. कुछ जगहों पर नकली रसीदें छापकर लोगों से पैसा लेने के आरोप लगे. कहीं चंदा जुटाने वाले लोगों पर रकम जमा न करने के आरोप लगे. कुछ जमीन सौदों को लेकर भी विवाद हुआ और आरोप लगे कि कुछ जमीनें बहुत कम समय में कई गुना ज्यादा कीमत पर खरीदी गईं. इन आरोपों को लेकर राजनीतिक विवाद हुआ हालांकि ट्रस्ट ने जमीन घोटाले के आरोपों को खारिज किया और कहा कि सभी खरीद-फरोख्त कानून के अनुसार हुई है.

22 जनवरी 2024 को राम की नई मूर्ति गर्भगृह में स्थापित की गई. पीएम मोदी ने पूजा की और इसी दिन से मंदिर आम जनता के लिए खुल गया. सिर्फ दो साल में ही अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान की हेराफेरी का मामला सामने आने के बाद पूरे देश की राजनीती में भूचाल आ गया. उत्तर प्रदेश सरकार को जांच के लिए एसआईटी बनानी पड़ गई. जांच एजेंसियों के अनुसार चोरी मंदिर के दानपात्र से नहीं बल्कि दान की गिनती और बैंक में जमा करने के दौरान हुई. श्रद्धालु दानपात्र में नकद दान डालते थे. तय समय पर दानपात्र खोला जाता था और कर्मचारियों की टीम नोटों की गिनती करती थी. गिनती के दौरान कुछ कर्मचारी नोटों की गड्डियों से कुछ नोट निकाल लेते थे. इसके बाद बैंक में दान की रकम जमा करने के दौरान भी घपला होता था. अब तक इस मामले में आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई है और जांच के दौरान चोरी की गई कुछ नकदी भी बरामद हुई है.

राम मंदिर के चंदा चोरी वाले मामले में कितनी राशि की हेराफेरी हुई, किन लोगों की क्या भूमिका थी और क्या किसी बड़े अधिकारी की जिम्मेदारी बनती है इन सभी सवालों की जांच अभी जारी है. आखिरी सच तो जांच पूरी होने के बाद और अदालत के फैसले के बाद ही नजर आएगा या शायद तब भी नहीं.

तिरुपति देवस्थान में हुई बड़ी चोरी

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है. सालाना चढ़ावा लगभग 1,880 करोड़ रुपये है और इसकी कुल संपत्ति 3 लाख करोड़ से ज्यादा है. यहां भी लगातार चोरियां होती रही. तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट दुनिया का सबसे अमीर मंदिर ट्रस्ट है. यहाँ रोज हुंडी में ही 4 से 6 करोड़ रूपये आते हैं. पिछले 2-3 साल में 3 बड़े घोटाले सामने आए. हुंडी के पैसे गिनने वाले विभाग में चोरी हुई. सीवी रवि कुमार, क्लर्क पकड़ा गया. इसका काम था रोज दान के पैसे गिनना. अप्रैल 2023 में सीसीटीवी में दिखा कि यह व्यक्ति करीब 80 हजार रूपये अंडरवियर में छिपाकर ले जा रहा था. पकड़े जाने पर रवि कुमार ने कुबूल किया कि वह 20 साल से चोरी कर रहा था.

चुराई गई रकम से उसने चेन्नई, तिरुपति, हैदराबाद में  तक़रीबन 100 करोड़ की प्रॉपर्टी बनाई. इस व्यक्ति कि सैलरी सिर्फ 40,000 रु महीना थी. केस हुआ लेकिन लोक अदालत में समझौता करके केस बंद कर दिया गया. आरोपी ने 7 प्रॉपर्टी मंदिर को वापस कर दी हालांकि 2025 में आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट ने ये सेटलमेंट रद्द करके सीआईडी से फिर जांच के आदेश दिए. यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस विभाग में सबसे ज्यादा पैसा आता है, वहां सीसीटीवी और ऑडिट 20 साल तक फेल रहा और पकड़े जाने के बाद भी जेल नहीं हुआ बल्कि समझौता कर लिया गया.

वी पेंचलैया जो तिरुपति में एक आउटसोर्स कर्मचारी था इस व्यक्ति ने 1 साल में 10 से 15 बार सोने के बिस्किट और जूलरी चुराई लेकिन 100 ग्राम का सोना बिस्किट ट्रॉली के पाइप में छिपाते हुए पकड़ा गया.

इन घोटालों के अलावा तिरुपति में रेशमी दुपट्टा घोटाला हुआ. 2015 से 2025 के दौरान भक्तों को प्रसाद में दिए जाने वाले शुद्ध सिल्क दुपट्टे असल में 100 प्रतिशत पॉलिएस्टर थे. एक ही फर्म ने 10 साल तक सप्लाई की. इस घोटाले की कुल रकम 54-55 करोड़ रूपये तक है. 350 रूपये का पॉलिएस्टर दुपट्टा, तिरुपति ट्रस्ट से 1389 रूपये में बिल किया गया. 2025 में बेंगलुरु और धर्मवरम लैब में जांच हुई. दोनों में पॉलिएस्टर निकला.

इसके अलावा 2019 से 2024 के बीच लड्डू घोटाला हुआ. इस घोटाले में 68 लाख किलो मिलावटी घी इस्तेमाल हुआ. यह घोटाला तकरीबन 250 करोड़ रूपये का था. यहाँ तक आरोप लगे की घी में मछली का तेल, बीफ टैलो, लार्ड की मिलावट की गई. तिरुपति में पिछले दस सालों में ही कम से कम तकरीबन 400 करोड़ के घोटाले सामने आ चुके हैं. 100 करोड़ हुंडी घोटाला, 55 करोड़ दुपट्टा घोटाला और 250 करोड़ घी घोटाला.

अब सवाल यह है कि तिरुपति में रोज 4 से 6 करोड़ गिनने वाले सेंटर में 20 साल तक चोरी चलती रही इस दौरान सीसीटीवी, ऑडिट, विजिलेंस सब कहां थे? 100 करोड़ की चोरी के बाद लोक अदालत में सेटलमेंट हो गया. क्या सिर्फ एक आदमी इतनी बड़ी चोरी कर सकता है? अगर इस घोटाले में ट्रस्ट की मिलीभगत नहीं थी तो आनन फानन में समझौता क्यों किया गया? आरोपी को जेल क्यों नहीं हुई? तिरुपति मंदिर में भक्तों द्वारा चढ़ाये गये कैश, प्रसाद, दुपट्टा, सोना हर चीज में मिलावट या चोरी हुई. 10 साल तक एक ही ठेकेदार को टेंडर दिया गया. क्या बिना अंदर के लोगों की मदद के यह संभव था? सच बात तो यह है कि जहां इतना पैसा और पावर हो, वहां चोरी होगी ही. फर्क सिर्फ इतना है कि छोटी चोरियाँ पकड़ी जाती है और बड़ी चोरियाँ कभी पकड़ी नहीं जाती.

केरल के सबरीमाला मंदिर में द्वारपालकों की मूर्तियों पर सोने की परत चढ़ाने में घोटाला हुआ. एसआईटी रिपोर्ट के मुताबिक असली सोना हटाकर सस्ती प्लेटिंग लगाई गई. करीब 4.5 किलो सोना गायब कर दिया गया. पुराने काम में भी वजन कम होने के मामले आये. इस मामले कि हाईकोर्ट में जांच चल रही है. पद्मनाभस्वामी मंदिर के खजाने में भी गड़बड़झाला हुआ. केरल का यह मंदिर अरबों-खरबों के खजाने के लिए मशहूर है. वॉल्ट खोलने पर अकूत दौलत मिली लेकिन मैनेजमेंट में गड़बड़ियां पाई गईं. चोरी के आरोप लगे. कुछ सोने के बर्तन गायब होने की खबरें भी आईं.

चंदा चोरी में मुस्लिम भी पीछे नहीं

देश के ज्यादातर पुराने मस्जिद, मजार, कब्रिस्तान, स्कूल जैसी मुस्लिम धर्म की संपत्तियों का रख रखाव मेंटिनेन्स और कंट्रोल वक्फ बोर्ड करता है. पूरे देश में 8.72 लाख से ज्यादा वक्फ प्रॉपर्टीज हैं जो 38 लाख एकड़ जमीन पर फैली हैं. इनकी मार्किट वैल्यू लाखों करोड़ रुपये है लेकिन यह जगजाहिर है की इनमें भी भारी भ्रष्टाचार होता है. गरीब मुसलमानों की दान की गई जमीन और चढ़ावे का पैसा लूट लिया जाता है.

कर्नाटक वक्फ बोर्ड स्कैम अब तक का सबसे बड़ा लैंड स्कैम था. 2012 में अनवर मणिप्पडी रिपोर्ट ने खुलासा किया कि 27,000 एकड़ वक्फ जमीन जिसकी वैल्यू 2 लाख करोड़ रुपये थी, गायब कर दी गई. इस घोटाले में बोर्ड सदस्य, राजनेता और रियल एस्टेट माफिया मिले हुए थे. दिल्ली में वक्फ बोर्ड की सैकड़ों प्रॉपर्टीज पर विवाद चल रहा है. 40 हजार से ज्यादा वक्फ से जुड़े केस पेंडिंग हैं जिनमें से ज्यादातर बोर्ड के भ्रष्टाचार की वजह से हैं. बोर्ड सदस्य फर्जी दस्तावेज बनाकर जमीन बेचते हैं. रिपोर्ट्स कहती हैं कि वक्फ बोर्ड “करप्ट लोगों” का डंपिंग ग्राउंड बन जाते हैं, जहां भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार आम बात होती है.

भ्रष्टाचार किसी एक धर्म की समस्या नहीं है. जहां भी आस्था के नाम पर करोड़ों रुपये का चंदा इकट्ठा होता है वहां लूट, गबन, चोरी और भ्रष्टाचार का होना लाजिमी है क्योंकि भ्रष्टाचार कोई अलग व्यवस्था नहीं है बल्कि यह धर्मों का मूल तत्व होता है. यही कारण है कि मंदिरों की तरह कई मुस्लिम दरगाहों, मस्जिदों और वक्फ़ में भी भ्रष्टाचार के मामले उजागर होते रहते हैं.

अजमेर शरीफ दरगाह में भी करोड़ों की चंदा चोरी

अजमेर शरीफ दरगाह में हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं और करोड़ों रुपये का चढ़ावा चढ़ाते हैं. साल 2017 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दरगाह पर आने वाले चढ़ावे के बड़े हिस्से का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था. दान का काफ़ी हिस्सा सीधे कुछ खादिमों की जेब में चला जाता था. लगभग 200 करोड़ रुपये के दान का घोटाला सामने आया था. 2017 में ही दरगाह के नाज़िम ने आरोप लगाया कि समिति के कुछ सदस्यों ने लगभग 38 लाख रुपये का गबन किया. यह मामला भी विवाद का विषय बना. हाल के वर्षों में सीएजी की रिपोर्टों में भी अजमेर दरगाह समिति से जुड़े भ्रष्टाचार के कई मामलों का जिक्र किया गया. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तकरीबन 6 करोड़ रुपये से ज्यादा की चोरी हुई.

अजमेर दरगाह में ‘देग’ ठेके में 20 लाख रुपये की हेराफेरी हुई. दरगाह के पूर्व सचिव और ठेकेदार पर मुकदमा चला और करोड़ों के चढ़ावे की चोरी के आरोप लगे. बहरीच की सैयद सालार मसूद गाजी दरगाह में भी राम मंदिर जैसा ही चढ़ावा चोरी का मामला उजागर हुआ. कश्मीर की दरगाह सीर हमदान में डोनेशन बॉक्स ही चोरी हो गया.

क्यों और कैसे चलता है चोरी का यह पुराना खेल?

ये तमाम मामले यह साबित करते हैं कि धर्म लूट का जरिया है. हिंदू मंदिरों में चढ़ावा चोरी होता है और मुस्लिम मस्जिदों, मजारों और वक्फ में जमीन हड़पने का खेल चलता है. इस मामले में चर्च, गुरूद्वारे भी पीछे नहीं है. हर जगह अंधभक्तों की आस्था को कैश किया जाता है. धर्म बिना कुछ दिए लूटता है. कंपनियां भी लूटती हैं लेकिन वे कुछ न कुछ उत्पाद तो करती हैं. धर्म बिना कोई उत्पादन किए, बिना मेहनत किए, बिना कुछ दिए सिर्फ डर, आशा और अंधविश्वास के सहारे लोगों को लूटता है. यह सदियों पुराना धंधा है.

कंपनियां कम से कम कुछ बनाती तो हैं. मोबाइल, कार, दवा, कपड़े खाना और टैक्स भी देती हैं लेकिन धर्म क्या करता है? शून्य उत्पादन और शत-प्रतिशत लूट. कार बनाने वाली कंपनी सिर्फ अमीरों को लूट सकती है और साईकिल बनाने वाली कंपनी सिर्फ गरीबों को लूट सकती है लेकिन धर्म सभी को उनकी औकात से ज्यादा लूटता है. अमीर हो या गरीब सबकी जेब कटी जाती है.

अमीर हिन्दू भक्त पुण्य के नाम पर बड़े-बड़े दान करते हैं और मंदिरों में करोड़ों का चढ़ावा देते हैं तो अमीर मुस्लिम भक्त पुण्य के नाम पर ही वक्फ प्रॉपर्टीज में जमीन-जायदाद दान करते हैं. इसी पुण्य के लालच में ही राम मंदिर, तिरुपति, सबरीमाला या अजमेर दरगाह पर हर साल करोड़ों रुपये का दान चढ़ावा के रूप में इकठ्ठा होता है. अमीरों के नाम से पीआर होता है लेकिन असल पैसा ट्रस्टों, बोर्डों और ठेकेदारों के पास चला जाता है. भक्तों को अपनी जेब खाली करने के बाद भी पुण्य मिले इसकी कोई गारंटी नहीं लेकिन यह तय है की इन अड्डों के ठेकेदारों की तिजोरियों तक यह पुण्य पहुंच जाता है.

वक्फ बोर्ड में अमीर मुसलमानों की दान की गई जमीनें मुतवल्लियों द्वारा हड़पी जाती हैं तो हिंदू अमीर मंदिरों में सोना-हीरा चढ़ाते हैं जो बाद में गायब हो जाता है. इन अमीरों को लगता है वे ऊंचे दर्जे का पुण्य कमा रहे हैं लेकिन असल में वे ऊँचे दर्जे के मूर्ख ही बनाये जाते हैं और यह सब धर्म के नाम पर होता है.

गरीब तो सबसे ज्यादा लुटता है. भूखा पेट, बीमारी, नौकरी की तंगी और बुरे हालात में थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद में गरीब मंदिर-मस्जिद-मजार जाता है. 10, 50 या 100 रुपये का चढ़ावा एक गरीब की रोज की कमाई का बड़ा हिस्सा होता है. तिरुपति में गरीब भक्त अपने बाल तक चढ़ाते हैं, पैसे भी देते हैं. मिडिल क्लास जो न तो बहुत अमीर है न बहुत गरीब, धर्म का सबसे बड़ा शिकार यही होता है. सैलरी से ईएमआई कटती है, बच्चों की पढ़ाई का बोझ और महंगाई की मार सबसे ज्यादा यही तबका झेलता है और भगवान की कृपा के चक्कर में चढ़ावा, उर्स, कथा और यज्ञ में सबसे आगे यही तबका होता है.

लूटने वाले तो लालची हैं लेकिन लुटने वाले खुद अपनी मूर्खता से लुटते हैं. अंधविश्वास में जीने वाली जनता बिना सोचे-समझे पैसा फेंकती है और यही लोग मनोकामना पूरी होने की उम्मीद में दान पेटियों को भरते चले जाते है. जब चोरी का मामला सामने आता है तो छाती पीटते है लेकिन अगले हफ्ते फिर चढ़ावा चढ़ाने चले जाते हैं. यह मूर्ख जनता ही है जो धर्म को ताकत देती है. सवाल नहीं पूछती, ऑडिट नहीं मांगती बस ब्लाइंड फेथ में जीती है. देखा जाये तो धर्म, कंपनियों से भी बदतर है. कंपनी प्रोडक्ट देती है, फेल हुई तो बंद हो जाती है. धर्म कभी फेल नहीं होता क्योंकि यह उत्पादन पर नहीं, सिर्फ आस्था पर टिका है इसलिए सदियों से बिना टैक्स, बिना जवाबदेही के लूट रहा है.

दान-चोरी से सबक

धर्मस्थलों में चोरी की घटनाओं का सबसे बड़ा सबक यह है कि ईमानदारी किसी धर्म या आस्था से नहीं आती. अगर ईश्वर के नाम पर करोड़ों रुपये का दान आता है तो इस धन की निगरानी ईश्वर क्यों नहीं करता? ईश्वर के घर में उसके नाम पर चढ़ने वाले धन को बचाने के लिए मजबूत ऑडिट, निगरानी, डिजिटल रिकॉर्ड, लगातार सीसीटीवी और जवाबदेही की व्यवस्था क्यों करनी पड़ती है? हां, यह सवाल भी करना चाहिए कि अगर चोरी नहीं होगा तो ईश्वर इस चंदे में मिले पैसे का करेगा क्या?

यह केवल किसी एक मंदिर या मजार में चोरी का मामला नहीं है बल्कि यह उस सोच का नतीजा है जिसमें लोगों को दिन रात यह समझाया जाता है कि भगवान के नाम पर दिये गये पैसे के बदले पुण्य मिलता है इसलिए उस पर सवाल नहीं उठाने चाहिए. यही सोच धर्म की सबसे बड़ी ताकत है और जनता की सबसे बड़ी मूर्खता. धर्म के नाम पर चंदा जुटाना और इस चंदे की बंदर बांट करना कोई नई बात नहीं है.

दुनिया के लगभग हर धर्म में चंदा चोरी की यह परंपरा सदियों से चलती आ रही है. अगर जांच में यह साबित भी हो जाये कि दान की रकम में बड़ी हेराफेरी हुई है तो सबसे बड़ा नुकसान किसका होगा? शायद किसी का नहीं क्योंकि यह धन भगवान का तो है नहीं, पुजारियों का भी नहीं है और जिन करोड़ों श्रद्धालुओं का था उन्होंने उन रुपयों को अपने बच्चों के भविष्य में लगाने की बजाय भ्रष्टाचार के अंधे कुंए में फेंक दिया. किसी गरीब ने सौ रुपये दिए होंगे, किसी किसान ने हजार रुपये, किसी बुजुर्ग ने अपनी पेंशन से दान दिया होगा.

ऐसे लोगों की आस्था पर ऐसी छोटी मोटी चोरियों से कोई फर्क नहीं पड़ता. सबसे बड़ा सच यह नहीं है कि मंदिर का धन लूटा गया बल्कि  यह है कि जनता आस्था के नाम पर और सदियों तक ऐसे ही लुटती रहेगी. चंदा देना ही लुट जाना है. Ram Mandir Donation Scam

 

 

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