USA Reality: क्योंकि वहां का शासन अब चर्च और गन रखने वाले मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के नारे की तरह आरएसएस जैसा अनरजिस्टर्ड कट्टर लोगों का समूह)का राज चल रहा है जिनकी पहुंच व्यापारों, उद्योगों, विधान सभाओं, सुप्रीम कोर्ट, पोपुलर मीडिया तक जम कर है.

यह वही महाशक्ति है जहां हर रात लाखों लोग खुले आसमान के नीचे सोते हैं. एक आंकड़े के अनुसार अमेरिका में कोई छह लाख लोग सड़कों पर रात बिताते हैं. करोड़ों नागरिक इतनी आर्थिक असुरक्षा में जीते हैं कि मामूली आपातकाल भी उन्हें कर्ज के दलदल में धकेल देता है. दुनिया भर में अरबों डौलर के हथियार बांटने वाला देश अपने नागरिकों को सस्ती इंसुलिन तक उपलब्ध नहीं करा पाता है.

जिस देश की सरकार दूसरों को मानवाधिकारों का प्रमाणपत्र बांटती है, वहीं खुद के अस्पतालों में अपने ही नागरिकों के इलाज से पहले उनके पास बीमा कार्ड होने के बारे में पूछती है, न हो तो आम आदमी का इलाज ही मुश्किल हो जाता है. मेडिकल बिल लाखों परिवारों को दिवालिया बना देते हैं और गर्भपात कानूनों के डर से डॉक्टर कई बार महिलाओं का समय पर इलाज करने से भी हिचकते हैं, वे मिसकैरिज का इलाज भी नहीं करते और अनेक गर्भवती औरतें अस्पतालों की पार्किंग में दम तोड़ देती हैं.

कानून का राज ऐसा कि अमेरिकी जेलों में दुनिया की किसी भी जेल से ज्यादा लोग बंद हैं. लाखों लोग बिना दोष सिद्ध हुए सालों से केवल इसलिए सलाखों के पीछे हैं क्योंकि उनके पास जमानत भरने लायक पैसे नहीं हैं. कोई 20 लाख कैदियों में से एक चौथाई लोग ऐसे हैं जो गरीबी की वजह से अपनी जमानत नहीं करवा पाए.

अमेरिकी स्कूलों में बच्चों को गणित और विज्ञान से पहले गोलीबारी से बचने की ट्रेनिंग दी जाती है. क्योंकि वहां बच्चों के हाथों में भी आसानी से गन आ जाती है और वे आये दिन स्कूल में गोलीबारी करते रहते हैं. दूसरी ओर, भविष्य गढ़ने वाले शिक्षक सम्मानजनक वेतन के अभाव में दो-दो नौकरियां करने को मजबूर हैं. सवाल यह है कि जब शिक्षा व्यवस्था का प्रहरी ही आर्थिक असुरक्षा से जूझ रहा हो, तो दुनिया को आदर्श शिक्षा और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने का नैतिक अधिकार आखिर किस आधार पर तय होता है?

अमेरिका के अनेक पूर्व सैनिक, जिन्होंने कभी देश के लिए मोर्चे पर जान जोखिम में डाली, आज बेघर होकर पुलों के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं. दूसरी ओर संसद में राजनेता रक्षा बजट बढ़ाने पर तालियां पीटते हैं, मानो हथियारों पर खर्च ही राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है. यह अजब महाशक्ति है जहाँ युद्धों के लिए खरबों डौलर निकालना आसान है, लेकिन अपने सैनिकों को सम्मानजनक जीवन, नागरिकों को सस्ती चिकित्सा और बेघरों को सिर पर छत देने में सरकार की कोई रुचि नहीं है.

यह ऐसी महाशक्ति है जहाँ बंदूक खरीदना इलाज करवाने से आसान है और युद्ध छेड़ना अपने नागरिकों का जीवन सुधारने से अधिक सरल है? वैश्विक स्तर पर सैन्य शक्ति दिखाने में अरबों डॉलर खर्च करने वाला अमेरिका अपने ही नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में लड़खड़ा रहा है. यही नहीं अन्य देशों में जहां लोगों की औसत आयु बढ़ रही है, अमेरिका में लोगों की औसत उम्र घटनी शुरू हो गई है. अमेरिका में शिशु मृत्यु दर क्यूबा से भी खराब है.

विडंबना यह कि दुनिया को बचाने निकला अमेरिका अपने ही समाज को टूटने से नहीं बचा पा रहा है. बाहर लोकतंत्र का झंडा बुलंद है, भीतर असमानता, महंगी चिकित्सा, बेघर नागरिक और भय से भरा जीवन है. दुनिया को स्वर्ग बनाने की महत्वाकांक्षा जबकि अपने ही घर में नरक पनप रहा है. चर्च को भरपूर दान मिल रहा है और व्हाइट हाउस में डिपार्टमेंट ऑफ फेथ बन गया है जिसकी मुखिया पौला व्हाइट है. USA Reality

अमेरिका और भारत में कुछ समानताएं दिखतीं हैं क्या?

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