Hindi Stories: ‘‘मीतू, तू केक थोड़ा कम ही खाना, बेटा.’’ 15 वर्ष की मीतू को चाची का सब के सामने इस तरह मुसकरा कर टोकना बहुत अखर गया. उस की चचेरी बहन रिंकी का जन्मदिन था और न केवल कई रिश्तेदार, बल्कि उन के बहुत सारे दोस्त भी दावत में आए हुए थे.

मीतू का चेहरा एकदम से लाल हो गया. उस ने केक का टुकड़ा थोड़ा जोर से वापस प्लेट में रख दिया. मीतू की मां को अपनी देवरानी विनीता पर बहुत खी झ हुई. क्या जरूरत थी सब के सामने बच्ची को टोकने की. अब कई दिनों तक मीतू का मूड खराब रहेगा.

इस बीच, मीतू की मां ने देखा कि मीतू चुपचाप कोने में दूसरी लड़कियों के साथ बैठी जरूर थी लेकिन न कुछ बात कर रही थी, न उन की बातों पर ध्यान दे रही थी. बस, अपने मोबाइल फोन के साथ व्यस्त थी. इस का मोबाइल ले लूंगी वापस, दिनभर चिपकी रहती है इस के साथ. न दूसरों से बातचीत, न बाहर जाना. बस, कमरे में लेटेलेटे बटन दबाते रहना. मीतू और रिंकी चचेरी बहनें तो थीं हीं, हमउम्र होने के कारण सहेलियां भी थीं. उन के घर भी ऊपरनीचे के थे. कुछ महीनों से मीतू कुछ अलगथलग रहने लग गई थी. शाम को कालोनी के पार्क में, दोस्तों के साथ घूमने जाना भी न के बराबर कर दिया था.

बरामदे में बैठ कर शालिनी इस सब सोच में डूबी ही हुई थी कि अचानक स्कूल बस से उतर कर घर वापस आते ही मीतू दौड़ कर अपने कमरे में गई और दरवाजा जोर से बंद कर लिया. शालिनी दरवाजे के बाहर तक आ रही मीतू की सिसकियों की आवाज सुन कर व्यथित हो गई. हर 2-3 दिन में ऐसा कुछ हो जाता है आजकल.

कभी गिरीश यानी मीतू के पापा मजाक में कुछ कह देते हैं, कभी स्कूल में कोई लड़की कुछ कह देती है. पिछले हफ्ते बाजार में मीतू के लिए कपड़े लेने गए थे. जो ड्रैस उसे चाहिए थी, वह उस के साइज की मिली ही नहीं. अकसर ऐसी छोटी सी लगने वाली बात काफी हो जाती मीतू को रोंआसा करने के लिए.

शालिनी को सम झ ही नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. हमेशा घर का बना कम घीतेल का खाना ही देती थी सब को. कोशिश तो यही करती थी. टिफिन में भी आजकल हलकाफुलका नाश्ता ही भेजती थी. रोज पीछे पड़ कर मीतू को बाहर बच्चों के साथ खेलने भेजने की कोशिश करती थी. लेकिन या तो मीतू न जाने का कोई बहाना बना लेती या फिर शायद वहां बैठ कर बातें ही करती रहती थी. कोने की दुकान से कुछ खा भी लेती थी. फिर घर आ कर खाना न खाती थी. शालिनी की चिंता और चिड़चिड़ापन भी बढ़ता जा रहा था, जिस से स्थिति सुधरने के बजाय और खराब ही होती जा रही थी.

शालिनी ने तो मीतू के पिछले महीने सारे टैस्ट भी करवा लिए लेकिन रिपोर्ट भी सब ठीक थीं. वैसे देखा जाए तो उस की उम्र में शालिनी भी वैसे ही थी. पर वह जमाना अलग था. कोई टोकता नहीं था. घर में जो भी बनता था, शौक से सब साथ बैठ कर खाते थे. आजकल तो सब अलगअलग समय टीवी के सामने बैठ कर खाने लग गए हैं. कई बार शालिनी ने प्रयास किया कि सब साथ में दिन में एक बार तो खाएं पर बहुत ही कम ऐसा हो पाता था.

अब जैसेजैसे मीतू बड़ी हो रही है, अपने कमरे में ही बंद रहना पसंद करती है. यह भी कोई उम्र है कमरे में बंद गुमसुम बैठने की? पढ़ेलिखे, घूमे, खेले दूसरी लड़कियों की तरह. शालिनी कभी  झुं झलाहट तो कभी चिंता से बहुत परेशान रहने लग गई थी.

‘‘मीतू बेटा, प्लीज दरवाजा खोलो. कुछ खा लो. तुम ने वहां भी कुछ नहीं खाया,’’ शालिनी ने दरवाजे के पास खड़े हो कर गुहार लगाई.

‘‘मम्मी, तुम अपना काम करो, प्लीज. मु झे परेशान मत करो,’’ अंदर से जवाब आया.

‘‘ठीक है पापा को आने दो, मैं बताती हूं उन को. यह दरवाजा बंद रखने की आदत बदलनी पड़ेगी तुम को. मम्मी के बारे में सोचो, बेटा. चिंता होती है,’’ शालिनी थोड़ा तीखे स्वर में बोली.

‘‘मेरे बारे में भी सोच लिया करो कभी, मम्मी. जबरदस्ती यहांवहां अब मैं नहीं जाऊंगी. चाची के यहां तो बिलकुल नहीं,’’ मीतू का भी उतना ही तीखा जवाब अंदर से आया.

इस बात को बीते 2 महीने हो गए. अब मीतू का जन्मदिन आने वाला था. शालिनी ने बड़े उत्साह से मीतू से पूछा, ‘‘बेटा, यह जन्मदिन तो बड़ा स्पैशल है. 16 साल की हो जाएगी मेरी बिट्टू. क्या चाहिए बोल, कैसी पार्टी करें?’’

‘‘कुछ नहीं करना है मु झे. क्या फर्क पड़ता है, एक साल और बढ़ गया. हूं तो वैसी की वैसी ही न. आप प्लीज कुछ मत करना और सब को बता देना कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मैं तो उस दिन स्कूल भी नहीं जाऊंगी.’’

‘‘क्या कह रही, ऐसा मत कर. अच्छा, कहीं बढि़या जगह खाना खाने जाएंगे और तेरे लिए अच्छा सा फोन भी लेंगे. तू थोड़े गेम और खेल लेना, ठीक है?’’

‘‘देखा, तुम्हें सम झ ही नहीं आता कि क्या कह रही हो. न मु झे कहीं जाना है और न मु झे कुछ चाहिए.’’ ऐसा बोल कर मीतू कमरे में चली गई और दरवाजा हमेशा की तरह बंद कर लिया. शालिनी की तो जैसे नींद ही उड़ गई थी. उसे कुछ सम झ ही नहीं आ रहा था कि क्या करे. कुछ न कुछ रोज वह ऐसा बोल देती थी कि मीतू को बुरा लग जाता था- कभी जंकफूड पर, तो कभी मोबाइल फोन पर, कभी अंदर बंद रहने पर, कभी वजन कम करने पर- किसी न किसी बात पर मनमुटाव तो रोज की बात हो चली थी.

फिर एक दिन जब मीतू स्कूल गई थी, शालिनी ने हिचकिचाते हुए उस की अलमारी खोल कर थोड़ा व्यवस्थित करने का प्रयास किया. जैसे ही थोड़े से कपड़े उस ने हटाए, कपड़ों के नीचे से प्लास्टिक के डब्बे, जिन में न जाने कब की बासी बिरयानी और पनीर की सब्जी बची थी, रखे थे. मीतू ने छिप कर यह सब मंगाया होगा और फिर ये सब डब्बे यहां छिपा दिए होंगे.

‘कमरा बंद कर के यही सब खाती है, मैडम. आने दो आज, अब प्यार बहुत हो गया, डांटना ही पड़ेगा. हद हो गई, यहां मैं हैल्दी रैसिपी ढूंढ़ढूंढ़ कर परेशान हो रही हूं और यह सब चल रहा है.’ शालिनी ने भुनभुनाते हुए सारे डब्बे मीतू की टेबल पर एकदम सामने रख दिए.

स्कूल के बाद कोचिंग क्लास कर के शाम को जैसे ही मीतू ने दरवाजे के अंदर कदम रखा, शालिनी उस पर बरस पड़ी. ‘‘इतना खर्चा कर रहे हैं तेरी पढ़ाई पर और तू कमरे में बैठ कर बिरयानी खा रही है. खुद तो परेशान होती ही है और हमें भी कर रखा है. न कहीं जाती है, न हम से ठीक से बात करती है. परेशान कर दिया है तू ने हमें,’’ शालिनी बोले जा रही थी.

मीतू ने कुछ नहीं कहा और अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया और चिटकनी भी लगा ली.

‘‘अरे, दरवाजा खोल. मैं कुछ बोल रही हूं, दरवाजा बंद क्यों किया?’’ शालिनी जोरजोर से दरवाजे को खटखटाने लगी.

‘‘मु झे थोड़ी देर के लिए अकेला छोड़ दो प्लीज, मम्मी, प्लीज.’’ अंदर से रोंआसी आवाज आई.

बेचैन मन से शालिनी दरवाजे से हट गई और बाहर हौल में बैठ कर गिरीश का इंतजार करने लग गई.

9 बज गए. गिरीश अभी तक आया नहीं. शालिनी का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था. घर के बारे में कोई होश नहीं है, सारे समय बस कामकाम. उधर मीतू का दरवाजा खुल ही नहीं रहा था, कितनी मनुहार कर ली थी शालिनी ने. माफी भी मांग ली अलमारी खोल कर चैक करने के लिए. लेकिन मीतू तो बस ‘मु झे तुम से बात नहीं करनी’ की ही रट लगाए हुए थी.

रात में जब गिरीश आया तो शालिनी ने उस को सब बताया. गिरीश उठ कर मीतू के दरवाजे के पास जा कर बोले, ‘‘पापा के लिए नहीं खोलोगी दरवाजा? आ जाओ,  साथ में मैच देख कर खाना खाएंगे. पता है, आज लोकल ट्रेन में कितनी बड़ी मजेदार बात हुई,’’ ऐसा कह कर वे फिर हौल में बैठ कर टीवी देखने लगा.

शालिनी का ब्लडप्रैशर बढ़ता जा रहा था. ‘‘अरे, बोलो न उस को खाना खाने के लिए.’’

‘‘रहने दो, शालिनी, आ जाएगी. वह बच्ची नहीं है अब.’’

‘‘यही तो फिक्र है मु झे. ऐसा छिपछिप कर खाना मंगाना, बंद कमरे में बैठे रहना, न कहीं जाना, यह कोई अच्छी बात नहीं है. रिंकी को देखो, कितनी मस्त रहती है.’’

और भी कुछ बोलने वाली थी शालिनी कि मीतू का दरवाजा खुला और वह धीरे से पापा के पास आ कर बैठ गई.

‘‘हैलो बेटू, कैसा था तुम्हारा दिन आज?’’ गिरीश ने प्यार से मीतू से पूछा. मीतू ने बिना कुछ जवाब दिए अपना सिर अपने पापा के कंधे पर टिका दिया. गिरीश धीरेधीरे उस के सिर पर हाथ फेरता रहा.

शालिनी थोड़ी देर तो चुप बैठी रही, फिर बोल पड़ी, ‘‘पूछो न, क्यों कमरे में बंद कर के बाहर का खाना खा रही है यह? पैसे भी बरबाद और हैल्थ भी. घर का खाना फ्रिज में रखरख कर मैं परेशान हो गई हूं.’’

‘‘शालिनी, मैं बात कर रहा हूं न, तुम कमरे में जाओ. मैं और बेटू अभी मैच देख रहे हैं,’’ गिरीश ने आंखों से तेज इशारा करा. शालिनी को खी झते हुए वहां से जाना पड़ा.

थोड़ी देर तक पापा के साथ चुपचाप मैच देखने के बाद मीतू धीरे से उठ कर रसोईघर में गई और एक प्लेट में थोड़ा पुलाव ले कर पापा के पास बैठ कर खाने लगी. गिरीश ने थोड़ी देर तक कुछ नहीं बोला, फिर प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, स्कूल में सब ठीक चल रहा है न? तेरे अगले टैस्ट कब से हैं? और कोचिंग क्लास के?’’

‘‘पापा, अभी ये बातें मत करो. मैच देखो,’’ मीतू बस चम्मच से धीरेधीरे खाने की कोशिश कर रही थी. 15-20 मिनट में परोसे हुए पुलाव का बस एकतिहाई हिस्सा ही खाया और किचन में जा कर प्लेट रख दी. ‘‘अब मैं कमरे में जाऊं, पापा?’’ ऐसा कह कर वह चली गई और कमरे के दरवाजे फिर बंद कर लिए.

गिरीश का अब टीवी में मन नहीं लगा, उठ कर उस ने देखा कि मीतू के कमरे की लाइट बंद थी.

‘‘मीतू बेटा, सो गई क्या? पढ़ोगी नहीं क्या? चिंतित स्वर में उस ने पूछा. अंदर से कोई जवाब नहीं आया. गिरीश ने फिर थोड़ा जोर से खटखटाया.

मीतू की बाथरूम से आवाज आई, ‘‘क्या है पापा, बाथरूम में हूं. सारा खाना बाहर निकल गया है.’’

‘‘दरवाजा खोलो बेटा और कुछ दवा खा लो.’’

‘‘कोई फायदा नहीं है, पापा. रोज ही खाना ऐसे ही निकल जाता है,’’ मीतू ने दरवाजा खोल कर रोंआसे स्वर में बताया. तभी शालिनी अपने कमरे से आवाजें सुन कर बाहर आई. ‘‘तू ही बता, ऐसे कैसे चलेगा?  अभी तो बोर्ड एग्जाम के लिए इतनी पढ़ाई करनी है.’’

गिरीश ने चिंतित हो कर शालिनी से कहा, ‘‘तुम इस को सम झाओ, कलपरसों ही किसी अच्छे डाक्टर के पास चलेंगे हम. मैं अपौइंटमैंट लेता हूं कल.’’

‘‘डाक्टर क्यों? बीमार थोड़े ही है मीतू. थोड़ी आलसी हो गई है और अकेलेअकेले रहना चाहती है, पक्का, कुछ हुआ होगा स्कूल में,’’ शालिनी परेशान हो कर कहने लगी.

‘‘ऐसा नहीं है, शालू. आजकल बच्चों पर बहुत प्रैशर है- पढ़ाई का, दोस्तों की तरफ से और भी न जाने क्याक्या. पता नहीं मीतू के मन में क्या चल रहा है. तुम्हें नहीं लगता क्या कि जैसा वह कर रही है, नौर्मल नहीं है. डाक्टर की राय लेने में कोई बुराई नहीं है. चलो, कल देखेंगे. अभी परेशान होने से कोई फायदा नहीं है. सो जाओ.’’

‘‘आप की बच्ची से बात कर के मु झे ऐसा लग रहा है कि उस को अपनी बौडी इमेज से तकलीफ है,’’ डाक्टर अलका ने चिंतित से बैठे गिरीश और शालिनी से कहा. एक हफ्ते के इंतजार के बाद वे डाक्टर अलका, जोकि काफी अच्छी मनोचिकित्सक मानी जाती हैं, के क्लिनिक में बैठे थे. इस के पहले उन्होंने मीतू से काफी देर अकेले में बातचीत की थी.

‘‘इस का मतलब? वह तो अभी 16 साल की भी नहीं हुई है.’’

‘‘देखिए शालिनीजी, आजकल बच्चे सोशल मीडिया से बहुत प्रभावित हैं और दिखावे की बाहरी सुपरफिशियल ऊपरी चमकदमक उन के मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती जा रही है. ऊपर से हम भी  यानी मांबाप, रिश्तेदार जानेअनजाने में कमैंट कर के बच्चे की साइकोलौजी को न चाहते हुए भी बिगाड़ देते हैं. इस उम्र में ये बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं, छोटीछोटी बातें भी उन को परेशान कर देती हैं और फिर वे अपनी कच्ची सम झ से हल निकालते रहते हैं जैसा कि मीतू कर रही थी. खाना न खाना, फिर मन खराब होने पर कुछ भी और कितना भी खा लेना, मिलनाजुलना बंद कर देना, मोबाइल का और इस्तेमाल करते जाना,’’ डाक्टर अलका ने शालिनी और गिरीश से कहा.

‘‘पर हम तो कभी उसे कुछ नहीं कहते,’’ शालिनी रोंआसी सी हो गई.

‘‘देखिए, अकसर जानेअनजाने में हम बच्चों तक बिना मुंह खोले ही अपने मन की बात पहुंचा देते हैं. आप का होंठ भींचना, चेहरा तन जाना और सब से ज्यादा आप की टोन- ये सब बहुत असर कर देती हैं. बेटी वैसे ही स्कूल में कुछ देखसुन कर परेशान है, फिर आप उस को घर पहुंचते ही जरा सा भी कुछ कह देती हैं, या न भी कहती हैं तो उस के हाथ में चिप्स का पैकेट देख कर मुंह बना लेती हैं.

‘‘बच्चे यह सब नोट करते हैं और मन में बिठा लेते हैं. आप मीतू की जगह अपनेआप को रख कर एक बार आराम से सोचिए. आप खुद ही सम झ जाएंगी. कई बार हम भला चाहते व सोचते हुए भी गड़बड़ कर देते हैं. उस को सम झने की कोशिश करिए. सब से अच्छी बात यह है कि आप को समय पर एहसास हो गया कि मीतू परेशान है.’’

डाक्टर अलका के क्लीनिक से लौटते समय कार में एकदम सन्नाटा था. मीतू थोड़ी सकपकाई सी, थोड़ी उत्सुक सी मम्मी की ओर देख रही थी, गिरीश चुपचाप कार चलाने पर ध्यान दे रहा था या ऐसा दिखा रहा था. और शालिनी तो एकदम बुत सी हो कर बैठी थी. रास्तेभर वह खुद को मन ही मन कभी फटकारती, कभी सम झाती जा रही थी.

‘मैं तो मीतू पर जान देती हूं. मु झे तो बस अपनी बच्ची खुश चाहिए, फिर उस को ऐसा क्यों लगा कि वह मु झे निराश कर रही है.’ रात देर तक शालिनी सोचती रही कि उसे क्याक्या बदलाव लाने पड़ेंगे- अपनेआप में और बाकी दिनचर्या में. मीतू से बढ़ कर और कोई नहीं है उस की दुनिया में.

‘‘मीतू, चलो फटाफट नाश्ता कर लो. देखो, तुम्हारी पसंद का गोभी का परांठा बनाया है, साथ में बथुए का रायता है. जल्दी आओ, फिर स्कूल जाना है,’’ शालिनी ने सुबह आवाज लगाई.

मीतू धीरे से आ कर टेबल पर बैठी. ‘‘मां, पूरा नहीं खा पाऊंगी.’’

‘‘कोई बात नहीं बेटू, जितना खाना है, खाओ. और सुनो, शाम को कोचिंग के बाद थोड़ी देर खेलने चले जाना रिंकी के साथ.’’

मीतू बड़ी चकित हुई. यह मां को क्या हो गया- पढ़ाईपढ़ाईपढ़ाई की रट लगाने वाली आज खेलने के लिए कह रही है.

शाम हुई. मीतू ने पार्क में रिंकी के साथ घूमते हुए अपने घर की खिड़कियों की ओर देखा. आश्चर्य, मां वहां नहीं खड़ी थी. नहीं तो हमेशा वहां से उस पर नजर रखे रहती थी. घर में घुसते ही मीतू ने मां से कह दिया, ‘‘मां, आज खाने का मन नहीं है, मैं थोड़ा पढ़ कर सो जाऊंगी.’’

‘‘ठीक है बेटा, मैं ने पनीर के टिक्के बनाए थे और थोड़े से छोले. कोई बात नहीं. फ्रिज में रख देती हूं, पापा खा लेंगे. तू जा पढ़.’’

मीतू कमरे में गई तो देखा कि मां ने कमरा साफ कर के ठीक कर दिया था. टेबल पर किताबें भी ठीक से जमा दी थीं. मीतू ने डरते हुए टेबल की दराज खोली. खाली थी. वहां उस ने चिप्स के खाली पैकेट छिपा कर रखे थे. आश्चर्य, मां ने सफाई की और कुछ ताना भी नहीं कसा. मुंह धो कर मीतू पढ़ने लगी. थोड़ी देर बाद उस को छोले की खुशबू आने लगी. लगता है मां पापा के लिए गरम कर रही हैं. थोड़ी भूख का एहसास होने लगा पर मां से तो मना कर दिया था.

‘‘मीतू बेटा, हाउ वाज योर डे?’’ इतने में पापा की आवाज आई जो उस के कमरे के बाहर ही खड़े थे. कुछ क्षण तो मीतू ने सुनाअनसुना कर दिया, पापा ने कुछ नहीं कहा और चले गए. तब कुछ सोच कर मीतू पापा के पास गई. मां पापा को गरमगरम टिक्के शिमला मिर्च के साथ सजा कर दे रही थी. छोलों की गजब खुशबू भी आ रही थी. पापा ने उस के लिए कुरसी खींची. ‘‘आजा बेटा, पापा के साथ थोड़ा चख ले.’’

मां भी आज टेबल पर बैठी थी. टीवी बंद था. मीतू चुपचाप मांपापा की बातें सुनती रही. कितने दिनों के बाद खाते समय टीवी नहीं चल रहा था. खाने के बाद, मांपापा को गुड नाइट कह कर मीतू कमरे में आई तो थोड़ा सा बेहतर महसूस कर रही थी.

अपने कमरे में जा कर उस ने सब से पहले मोबाइल से कई ऐप डिलीट कर दीं, फिर अलमारी में रखे लिटिल हार्ट्स बिस्कुट के 3 पैकेट रसोई में जा कर रख दिए. उस के बाद पापा के पास खाने की टेबल पर ही कौपी ला कर अपनी पढ़ाई करने लगी.

शालिनी ने गिरीश की और देखा और इशारों से थैंक यू कहा.

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