Hindi Stories: ‘‘आनंद, तुम कहीं नहीं जाओगे. मुझे डर लगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो?’’ आनंद की पे्रयेसी सुमित्रा ने उसे आंदोलन में जाने से रोकते हुए कहा.
‘‘सुमित्रा, तुम बेवजह डरती हो. यदि मेरे जैसा पढ़ालिखा नवयुवक आगे नहीं बढ़ेगा तो फिर कौन नेतृत्व करेगा इस आंदोलन का? क्या पहाड़ के इन भले और कम पढ़ेलिखे लोगों को यों ही बरबाद और मरने के लिए छोड़ दिया जाए?’’
‘‘नहींनहीं, आनंद. मैं यह बिलकुल नहीं चाहती कि गढ़वाल की चौथान पट्टी के 72 गांव के लोग इस सदी में भी पिछड़े के पिछड़े ही रहें. फिर भी तुम्हारे वहां जाने से न जाने मु?ो क्यों डर लगता है?’’
‘‘सुमित्रा, तुम डरो नहीं. यदि बूंगीधार से देहघाट तक की 24 किलोमीटर की पक्की सड़क बन जाए तो चौथान पट्टी के कितने लोगों के लिए सुविधा हो जाएगी और फिर दूसरी सड़कों को बनाने के लिए भी रास्ता निकल आएगा. इसलिए इस आंदोलन की सफलता आवश्यक है.’’
‘‘आनंद, तुम्हारी बातें सुन कर मेरे अंदर भी हिम्मत का ज्वार उठने लगा है. इसलिए अब मैं तुम्हें रोकूंगी नहीं. जाओ मेरे क्रांतिवीर, जाओ और विजय पताका फहरा कर आओ,’’ सुमित्रा ने कुछ नाटकीय अंदाज जोड़ कर कहा.
सुमित्रा ने हमेशा आनंद का हौसला बढ़ाया था. वह सुमित्रा को याद कर अकसर पुराने दिनों में खो जाता था. जब सुमित्रा से उस की पहली मुलाकात कालेज कैंटीन में हुई थी. समोसा खाते हुए मिर्ची उस के मुंह में चली गई थी और वह पानीपानी चिल्लाया था. तब पास की मेज पर बैठी सुमित्रा उस के लिए पानी ले कर आई थी. उस के बाद तो दोनों का मिलनाजुलना लगभग रोज होने लगा था.
पहाड़ों में प्रेम को जैसे प्रकृति भी अपनी मूक सहमति ही न देती हो बल्कि उसे भड़काने का काम भी करती हो. सुंदर वादियां, ऊंचे हरेभरे पहाड़, नदियों और ?ारनों का संगीतमय प्रवाह सब के सब जैसे प्रेम की आग को भड़काने के लिए हों. आनंद और सुमित्रा जैसे प्रेम की इन वादियों में ही खो जाने के लिए ही बने हों. वे एकदूसरे को अपना तनमन दे चुके थे.
लेकिन इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. जब दोनों परिवारों को उन के प्रेमपुजारी होने का पता चला तो बवंडर उठ खड़ा हुआ. पहाड़ों में जातिवाद पहाड़ों जैसा ऊंचा ही था. ऊंचनीच का भेदभाव सच्चे प्रेम में रोड़ा बन कर खड़ा हो गया. तब एक दिन दोनों मौका देख कर कोटद्वार चले गए. दोनों ने गुजारा करने के लिए अनपढ़ बन कर मजदूरी की लेकिन जल्दी ही उन के वहां होने का पता चल गया. तब दोनों परिवार उन के सच्चे प्रेम के आगे झुक गए थे.
आंदोलन में भाग लेने के लिए मंगरों गांव के महेंद्र बिष्ट, थान गांव के रामधन नेगी, गड़ी गांव के देवेंद्र रमोला और मासों गांव के धनसिंह थापा भी आ चुके थे. इन सब ने दूसरे गांव के लोगों को भी इकट्ठा किया और सब ने मिल कर बूंगीधार की प्राथमिक पाठशाला में सभा की. सब बूंगीधार से देहघाट तक की सड़क बनाने के आंदोलन को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे.
आनंद गुसाई ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘भाइयो, जब से यह वन अधिनियम सरकार ने हम पहाडि़यों पर थोपा है, तब से हम अपने इन सीढ़ीदार खेतों में उगे एक पेड़ को भी बिना सरकारी अनुमति के काट नहीं सकते. नदी से एक तसला रेत नहीं ले सकते. अब देहघाट तक सड़क बनने की बारी आई है तो इसी अधिनियम के कारण वन विभाग पेड़ काटने की अनुमति नहीं दे रहा है. वन विभाग को पहाड़ के लोगों की पहाड़ सी परेशानियों से कोई सरोकार नहीं.’’
ढोंड गांव से चौथान पट्टी में आए देवीप्रसाद ढोंडियाल बोले, ‘‘बेटा आनंद, हमें देहघाट तक जाने के लिए रात के 1-2 बजे टौर्च ले कर पैदल निकलना पड़ता है जिस से हम रामनगर जाने के लिए बस पकड़ सकें. हम बीमारियों से सड़ जाएं या मर जाएं, किसी को इस बात से कोई मतलब नहीं. हमारी कितनी ही औरतें सही इलाज नहीं मिलने के कारण प्रसवकाल में ही दम तोड़ देती हैं. कितने ही नवजात शिशुओं को इलाज से बचाया जा सकता है लेकिन सरकार के कारिंदों को इस से कोई मतलब नहीं कि रात में चाहे हमें जंगली सूअर मार डाले या हमें बाघ खा जाए या हम पहाड़ी बीमारियों से मर जाएं.’’
तब आनंद ने कहा, ‘‘चाचाजी, इस का एक ही इलाज है कि हम सब चौथान पट्टी निवासी मिल कर रास्ते के पेड़ काटने और सड़क बनाने का बीड़ा उठाएं. हमें खुद ही पेड़ों पर कुल्हाड़ें चलाने होंगे और सड़क बनानी होगी. यह काम हमें अपने लिए करना ही होगा. दर्द, कष्ट और तकलीफ हमारी है, इन्हें दूर करने के उपाय हमें ही करने होंगे. हमें साहस दिखाना ही होगा, पेड़ों को काटना ही होगा.’’
‘‘यह कितने अचंभे की बात है कि पर्यटन स्थलों, तीर्थ स्थलों आदि पर होटलों और बाजारों के लिए पेड़ों का कटान सरकार खुद कराती है लेकिन जब आम जनता और वह भी पहाड़ी समस्याओं से त्रस्त जनता अपने लिए किसी सड़क की मांग करती है तो पेड़ कटान से ले कर हजारों समस्याएं खड़ी की जाती हैं,’’ एक नौजवान संजीव रौतेला ने कहा.
ग्वाल्थी गांव के मोहन रावत बोले, ‘‘लेकिन आनंद, हम खुद पेड़ काटें, इस में खतरा ही खतरा है. ऐसा करने पर सरकार हम पर जुल्म ढा सकती है. हमें गिरफ्तार कर सकती है. हम पर कितने ही मुकदमे ठोंक सकती है. हमें जेलों में सड़ा सकती है.’’
आनंद ने कहा, ‘‘मोहन भाई, वैसे भी तो हम मर ही रहे हैं. चौथान पट्टी में न तो कोई पर्यटन स्थल है और न ही कोई उद्योग. लेदे कर बिंदेश्वर महादेव का मंदिर है, वह भी इतनी ऊंचाई पर है कि वहां दर्शन के लिए बाहर का इक्कादुक्का व्यक्ति ही आता है. वहां जो आता है और चढ़ावा जो चढ़ाता है वह पंडित और उस के घर वाले जेब में रख लेते हैं. हमारी सारी खेती बारिश के भरोसे है. यहां पहाड़ों में मैदानों की तरह कोई नलकूप या नहर तो है नहीं. और तो और, हम पहाड़ी नदियों के पानी से सिंचाई भी नहीं कर सकते. नदी का पानी ऊपर सीढ़ीदार खेतों में नहीं ले जाया जा सकता. लेदे कर दूध के मवेशी बचते हैं, उन से कितनी कम कमाई होती है, हम सब जानते हैं. हमें कुछ पाना है तो कुछ खोना भी पड़ेगा.’’
‘‘तो आनंद, क्या तुम क्रांति का आगाज करोगे? तुम्हारे तेवर तो किसी क्रांतिकारी जैसे ही लग रहे हैं,’’ मोहन रावत ने पूछा.
‘‘देखो भाइयो, मैं सब से बता देना चाहता हूं कि क्रांतियां केवल रक्तपात करने के लिए नहीं होती हैं. हमारी क्रांति अपने क्षेत्र के विकास और अपने लोगों के लिए सुविधाएं हासिल करने के लिए होगी. हम पहाडि़यों के लिए सड़कें श्वास नली की तरह हैं. सड़कें होगीं तो हमारे क्षेत्र का विकास होगा वरना हम पिछड़े के पिछड़े ही रहेंगे. वैसे भी, पहाड़ी आदमी की आधी जिंदगी पहाड़ उतरने और चढ़ने में ही गुजर जाती है,’’ आनंद ने सम?ाया.
डडोली के कुलदीप थापा बोले, ‘‘आनंद, यदि हम पेड़ काट डालें तो फिर पर्यावरण संरक्षकों के ‘चिपको आंदोलन’ का क्या होगा. वे तो पेड़ों और जंगलों को बचाने की मुहिम चलाए हुए हैं.’’
आनंद ने इस पर कुछ देर विचार किया और फिर कहा, ‘‘देखो भाई, पर्यावरणविद और समाजसेवी अपना काम करें, हमारा उन से कोई विरोध नहीं. सरकार और दूसरी संस्थाओं से खूब पुरस्कार और सम्मान बटोरें, नाम कमाएं, अखबारों की सुर्खियों में छाए रहें, हमें इस पर भी कोई एतराज नहीं. लेकिन एक बात बताओ, सरकार और संस्थाओं से पुरस्कार और सम्मान बटोरने वाले क्या उन के जड़ गुलाम नहीं बन जाते? क्या वे किसी क्रांति के लायक रह जाते हैं?’’
‘‘वाह आनंद, वाह, बात तो तुम ने खरी और बड़े पते की कही,’’ कुलदीप थापा ने ताली बजाते हुए कहा.
‘‘एक बात और, हम भी इन पेड़ों, पहाड़ों और जंगलों से उतना ही प्यार करते हैं बल्कि ज्यादा करते हैं जितना दिल्ली जैसे महानगरों में बैठे, मुखौटे लगाए, मीडिया में छाए रहने के लिए बेताब पर्यावरणविद् करते हैं. खैर, हमारे पहाड़ों पर पेड़ों की कोई कमी नहीं. हम इन्हें कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाते, बाहरी लोगों से इन की सुरक्षा भी करते हैं. हम तो केवल अपने जीवन और विकास के लिए एक सड़क मांग रहे हैं. हम सरकार के वन अधिनियम का सीधेसीधे उल्लंघन भी नहीं कर रहे हैं. आखिर, एक दिन वन विभाग को भी इस की अनुमति देनी ही होगी. हम तो वन विभाग की लेटलतीफी के खिलाफ आंदोलनरत हैं.’’
एक बुजुर्ग अनुसूईया पंत बोले,
‘‘अरे साथियो, मैं आप सब को
एक बात याद दिला देना चाहता हूं कि यह वन अधिनियम राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा चिढ़ कर हमारे खिलाफ लाया गया था. उस का एक रिश्तेदार धड़ल्ले से जंगल के पेड़ काट रहा था और पहाड़ की नदियों में बड़े पैमाने पर खनन कर रहा था.
‘‘जब हम पहाडि़यों ने इस का विरोध किया तब उस ने हम पहाडि़यों से चिढ़ कर यह वन अधिनियम बना दिया कि उन का रिश्तेदार पेड़ नहीं काटेगा तो कोई पहाड़ी अपनी जरूरत में भी पेड़ नहीं काटेगा. वाह, गांव का आदमी अपने खेत में पेड़ लगाए और उस के काटने की अनुमति भी घूस दे कर सरकारी कारिंदों से ले जिन्होंने जिंदगी में कोई पेड़ भी न लगाया हो. बहुत से नियमकानून तो बनाए ही घूसखोरी के लिए गए हैं. आने वाले दिनों में कहीं फसल काटने की अनुमति कहीं सरकार से ही न लेनी पड़े.’’
यह सुन कर सब हंस पड़े.
‘‘अरे दादा, यह सब देखसुन कर तो यही लगता है कि सरकार तो हम पहाडि़यों से दुश्मनी निकाल रही है,’’ आनंद ने कहा.
‘‘बिलकुल आनंद बेटा, वन अधिनियम लाने का उस समय कोई और उद्देश्य ही नहीं था. वे पेड़ काटें तो कुछ नहीं, हम काटें तो अपराध,’’ उन बुजुर्ग ने कहा.
‘‘तो फिर अब क्या किया जाए, आनंद, तुम्हीं बताओ. तुम ही पढ़ेलिखे साहसी नौजवान हो,’’ हरीश नेगी ने पूछा.
‘‘मेरा तो भाइयो, यही कहना है कि समस्या हमारी है तो इस का हल भी हमीं को निकालना पड़ेगा. सरकार आंदोलन और क्रांति से ?ाकती है. हमें कुल्हाड़ी-कुल्हाड़े ले कर इन पेड़ों को खुद ही काटना होगा और जरूरत पड़ी तो सड़क भी खुद ही बनानी होगी. इस में पुरुषमहिला सब का सहयोग चाहिए. कोई पीछे न हटे,’’ आनंद ने जोश में कहा.
अब तो भीड़ में भी जोश आ गया था. सब हाथ उठाउठा कर कहने लगे, ‘‘हम इस क्रांति के लिए तैयार हैं. मैं भी, मैं भी…’’
तभी एक जनाना आवाज ने सब को चौंका दिया, ‘‘मैं भी.’’
सब ने देखा यहां औरत तो कोई है नहीं, फिर यह जनाना आवाज कहां से आई.
सब ने आवाज की तरफ मुड़ कर देखा.
‘‘अरे, यह तो सुमित्रा है, आनंद की…’’ किसी ने सुमित्रा को पहचानते हुए कहा.
फिर तो पेड़ों के पीछे छिपी 3-4 महिलाएं ‘मैं भी, मैं भी’ का नारा लगाते हुए सामने आ गईं. तब सुमित्रा ने कहा, ‘‘मैं अपनी इन सहेलियों के साथ आनंद के पीछेपीछे आ गई थी. हम चीड़ के पेड़ों के पीछे छिप कर आप लोगों की बात सुन रही थीं. अगर आप लोग क्रांति करने के लिए तैयार हैं तो हम महिलाएं भी किसी से कम नहीं. हम आप से आगे चल कर इस क्रांति को अंजाम देंगे. हम महिलाओं को आनंद और आप पुरुषों पर गर्व है
कि आप ने साहसिक फैसला लिया, कायरतापूर्ण नहीं.’’
सुमित्रा की बात सुन कर भीड़ में चारगुना उत्साह बढ़ गया. अब किसी को यह पूछने की जरूरत नहीं थी कि यह क्रांति कब शुरू होगी और पहल कौन करेगा. तभी किसी ने नारा लगा दिया, ‘‘कुल्हाड़ा क्रांति, जिंदाबाद, जिंदाबाद.’’
फिर तो पूरी चौथान घाटी इस नारे से गूंज उठी. चौथान पट्टी के 72 गांवों में से कोई घर ऐसा नहीं था जहां से कोई कुल्हाड़ा ले कर न निकला हो. पहाड़ पर कोई घर ऐसा नहीं होता जिस घर में कुल्हाड़ा न हो.
दनादन रास्ते के पेड़ काटे जाने लगे. सोया हुआ सरकारी महकमा सोते से जागा. बड़ेबड़े अधिकारी और भारी पुलिस बल वहां पहुंचा लेकिन पहाडि़यों के हाथों में तेज कुल्हाड़े और उन के उग्र तेवर देख कर अधिकारियों के हाथपांव फूल गए. पुलिस बल आदेश की प्रतीक्षा करता रहा. राजनेताओं तक बात पहुंची. सरकार कोई फैसला तुरंत न ले सकी. राजनेताओं को अगले चुनाव में इसी जनता से वोट पाने की चिंता थी. बल प्रयोग को तो बिलकुल मना ही कर दिया लेकिन कानूनी कार्यवाही तो दिखानी थी, इसलिए कुछ मुकदमे लगाए गए जिन्हें बाद में वोट पाने के चक्कर में वापस ले लिया गया.
कुछ ही दिनों में रास्ते के पेड़ काट डाले गए. जनक्रांति की जीत हुई. दूधातोली पहाड़ भी पहाडि़यों के संघर्ष पर मुसकरा उठा. बाद में सरकार ने इसी रास्ते पर पक्की सड़क का निर्माण शुरू कर दिया. आनंद गुसाईं क्रांतिकारी नेता बन कर उभरे. नेताओं को घबराहट हुई कि कहीं आनंद पहाडि़यों का नेता न बन जाए. उस की लोकप्रियता कितनों को ही खटकने लगी और फिर एक दिन 42 साल की उम्र में उन की रहस्यमयी मौत की खबर आई. एक उभरते नायक का अंत हो गया.
जनता में आक्रोश था. सरकार ने उस आक्रोश को दबाने के लिए बूंगीधार में उन का स्मारक बनवा दिया. उन की प्रतिमा के नीचे लिखा- क्रांतिकारी आनंद सिंह गुसाईं. मुख्यमंत्री ने अपने एक दौरे में उस पर फूलमाला चढ़ाई और अपनी पार्टी का कर्मठ शहीद घोषित कर दिया. सुमित्रा इन दिनों 500 रुपए महीने के भत्ते पर गुजरबसर कर रही है. Hindi Stories





