Peddi Movie Review: बुच्ची बाबू सना की ‘पेड्डी’ देखते हुए उस रसोइए का खयाल आता है जो एक ही कढ़ाही में कोरमा, नूडल्स, सांभर और लिट्टीचोखा एकसाथ पकाने की जिद पर अड़ा हुआ है. अब भूख और नीयत दोनों ठीक हैं, लेकिन जो परोसी थाली सामने आती है वह स्वाद का कबाड़ा कर देती है. निर्देशक के पास एक बेहद जरूरी और सैंसिटिव मुद्दा था. एक ऐसा आदिवासी गांव जो सरकारी दस्तावेजों में कहीं दर्ज ही नहीं है, जहां बुनियादी सड़कें तक नहीं हैं और लोग सिर्फ इसलिए इलाज के बिना मर जाते हैं क्योंकि वहां लोकल ट्रेन के रुकने के लिए कोई हौल्ट नहीं है.

गांव वालों या आदिवासियों के लिए पहचान की यह छटपटाहट अपनेआप में एक मजबूत और झाक?ार देने वाला विषय था. लेकिन लेखक/डायरैक्टर ने इस में सोशल ड्रामा, बेसिरपैर का लव एंगल, गली क्रिकेट, अखाड़े की कुश्ती और ट्रैकरिंग का ऐसा रायता फैलाया कि यह 3 घंटे की फिल्म अपने ही बोझ के नीचे दब कर रह जाती है.

फिल्म 2016 से शुरू होती है. भारतीय ओलिंपिक संघ का एक सीनियर औफिसर (बोमन ईरानी) इलाके में चर्चित खिलाड़ी पेड्डी से मिलने उस के गांव निकलता है. गांव दूर है तो उसी इलाके का गाइड रास्ते में चलते हुए उसे पेड्डी की महानता की कहानी सुनाना शुरू करता है. फिर फिल्म की कहानी 1990 के दशक के नौर्थ आंध्र प्रदेश, खासकर विशाखापटनम और विजयनग्राम के ग्रामीण अंचलों में पहुंच जाती है. पेड्डी (राम चरण) एक मजदूर है जो गुड़ बनाने की भट्टी पर काम करता है. इस के साथ वह पैसों के बदले क्रिकेट खेलने वाला शानदार खिलाड़ी भी है. जब वह मैदान पर लंबे छक्के मारता है तो लोगों में जोश भर जाता है.

डायरैक्टर ने यहां खेल को शोषकों के खिलाफ आत्मसम्मान और वजूद का जरिया बनाया है. पेड्डी भी इसी वजूद और पहचान के लिए संघर्ष करता है. उसे सरकारी कागजों में अछूत बनी अपनी जनजाति व गांव को भारत में पहचान दिलानी है. इस पहचान के लिए वह क्रिकेट छोड़ कर सीधे कुश्ती के मैदान में पहुंचता है.

यहां नैशनल लैवल पर वह पांव टूट जाने के चलते फाइनल नहीं खेल पाता. मगर वह फिर भी हार नहीं मानता और पैरालिंपिक दौड़ में हिस्सा लेता है. वह इस दौड़ में जीत जाता है और विश्वविजेता बन जाता है. यहां वह मैडल लेने से मना करता है और अपने स्पीच में सिस्टम पर सवाल उठाता है कि वह भारतीय है ही नहीं तो मैडल पाने का हकदार भी नहीं, क्योंकि उस का न कोई गांव सरकारी दस्तावेजों में है न उस की जनजाति. इस के बाद सरकार को अपनी गलती का एहसास होता है और उस के गांव के लिए स्टेशन बनाया जाता है.

हालांकि आर रथनावेलु की सिनेमेटोग्राफी फिल्म का सब से मजबूत तकनीकी पहलू है खासकर दिल्ली वाले सीक्वेंस, जिन्हें पुरानी बनावट देने के लिए असली फिल्म नैगेटिव पर शूट किया गया है. दिल्ली की बस, पार्लियामैंट, लालकिला, आंध्र भवन देख कर लगता है कि वाकई 90 के दशक में कहीं हों. मगर उलट इस के, वीएफएक्स कमजोर दिखाई देते हैं. फिल्म में इमोशनल सीन्स भी खूब हैं जिन्हें संगीतकार ए आर रहमान के बैकग्राउंड स्कोर से बेस दिया गया है जो अपना काम करते हैं.

फिल्म सिर्फ और सिर्फ रामचरण के कंधों पर है. रामचरण ने शरीर पर काफी मेहनत भी की है. ऐक्ंिटग के लिहाज से भी वे अपना काम कर जाते हैं. कुछ सीन भावुक भी करते हैं. कन्नड़ ऐक्टर शिव राजकुमार ने पेड्डी के कुश्ती गुरु गौरानायडू के रूप में फिल्म को रफ्तार देने का काम किया है. दूसरी तरफ, जगपति बाबू ने गांव के आदर्शवादी बुजुर्ग अप्पला सूरी के रूप में एक बेहद शांत, गरिमामयी और ठहराव भरा अभिनय किया है.

अचियम्मा की भूमिका में जाह्नवी कपूर को इस फिल्म में सिर्फ कमर व नाभि दिखाने के लिए रखा गया. अचियम्मा का किरदार क्यों था, यह सम?ा से परे है. मौडर्न सिनेमा को इन चीजों से तोबा कर लेनी चाहिए.

रवि किशन, राव रमेश, अजय घोष और सृतिकांत अय्यंगर जैसे मं?ो हुए कलाकारों को सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया है. पेड्डी अच्छे विषय को ले कर बनाई गई थी मगर कमर्शियल मसाला फिल्मों के घिसेपिटे फार्मूलों, बेवजह गानों और हीरोवर्शिप के चक्कर ?में यह एक बो?िल फिल्म बन कर रह गई. Peddi Movie Review

 

 

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