Backward Class Education: नेताजी सुभाष चंद्र बोस महाविद्यालय लखनऊ का सब से अच्छा कालेज है. यहां पढ़ने आने वाली लड़कियों में बड़ी संख्या स्कूटी से आने वाली लड़कियों की है. करीब 1,200 लड़कियां यहां पढ़ने आती हैं जिन्हें देख कर अंदाजा लगाना आसान है कि लड़कियों में ओबीसी जातियों की संख्या अधिक है. ये सांवले रंग की साधारण सी दिखने वाली होती हैं.
1980 के दशक से तुलना करें तो ओबीसी लड़कियों की संख्या तेजी से बढ़ी है. पहले लड़कियां साइकिल से अधिक आती थीं या फिर उन के परिवार का कोई सदस्य कालेज छोड़ने आता था. ओबीसी की लड़कियां अधिक से अधिक कक्षा 10 या 12 तक पढ़ती थीं. इस के बाद उन की शादी कर दी जाती थी. अब स्कूल ही नहीं, कालेज में भी लड़कियों की संख्या बढ़ी है. ओबीसी लड़के भी अब पहले से अधिक पढ़ रहे हैं. पढ़नेलिखने के बाद भी नौकरियों में इन की संख्या उस अनुपात में नहीं दिखती. नौकरियों में ओबीसी उस अनुपात में नहीं पहुंच पा रहे हैं जिस तरह से उन की पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है.
1990 में जब मंडल कमीशन लागू हुआ तो ओबीसी को आगे बढ़ने का मौका मिला. मंडल कमीशन लागू होने से अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 फीसदी का आरक्षण मिला. इस से उन की सामाजिक व आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ. इस ने पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना जगाई और उन्हें मंडल राजनीति के तहत सत्ता में मुख्यधारा का भागीदार बनाया, जिस से बिहार और यूपी जैसे राज्यों में राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया.
पिछड़ी जातियों के वोटबैंक के रूप में उभरने से लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को आगे बढ़ने का मौका मिला. उच्च शिक्षा और केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण से ओबीसी युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर मिले. मंडल की राजनीति के जवाब में कमंडल की धार्मिक राजनीति का दौर राम मंदिर मुद्दे को उठा कर शुरू हुआ. खेद है कि इस ने मंडल से पैदा हुई चेतना को खत्म कर दिया.
पूजापाठी हो गया ओबीसी
मंडल कमीशन का लाभ ओबीसी में कुछ चुनिंदा दबंग कास्टों तक ही सीमित रह गया. यह वर्ग पूरी तरह से पूजापाठी हो गया है. उसे यह लगता है कि जब तक वह ब्राह्मणों की तरह से पूजापाठ नहीं करेगा तब तक उसे अगड़ों से बराबरी नहीं मिलेगी.
मंडल कमीशन के बाद रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि ओबीसी की लगभग 6,000 जातियों में से केवल 40 जातियों को ही 50 फीसदी से अधिक लाभ मिला. मंडल कमीशन का पूरा लाभ सभी पिछड़ी जातियों तक समान रूप से नहीं पहुंच सका और धर्मकर्म कभी कमंडल की राजनीति में ओबीसी 2 हिस्सों में बंट गया.
ओबीसी का एक बड़ा वर्ग पूजापाठी को गया. जिन के पास पैसा और ताकत आ गई वे कट्टरता से धर्म को मानने लगे हैं. इस वर्ग से मोरारी बापू जैसे बीसियों कथावाचक हो गए हैं जिन का व्यापार भी बड़ा है और जिन्हें ऊंची सवर्ण जातियों ने जम कर प्रोत्साहन दिया है.
उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों में यादव, कुर्मी, निषाद, लोध और मौर्य ओबीसी के लोग कथावाचक हो गए हैं. ये लोग गांव, कसबों और शहरों में जा कर भागवत कथा, रामायण और देवी भागवत करने लगे हैं. 22 जून को इटावा के दादरपुर गांव में यादव जाति के कथावाचक मुकुटमणि सिंह कथा कहने पहुंच गए. पर असल में यह गांव ब्राह्मणों का था. कथा सुनने वाला परिवार भी ब्राह्मण था. जब उन को यह पता चला कि कथा सुनाने के लिए व्यासगद्दी पर बैठने वाला यादव है तो उसे हटाया गया. उस से पैसे वापस लिए गए और उस के सिर के बाल कटवा कर अपमानित किया गया.
जब सोशल मीडिया पर यह बात फैली तो समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कथावाचकों को लखनऊ बुलाया. उन का समर्थन किया. 21-21 हजार रुपए 3 कथावाचकों को दिए. उन से कथा भी सुनी और इस के बाद भाजपा व उस की मानसिकता का विरोध भी किया.
मंडल कमीशन लागू होने के पहले समाजवादी विचारधारा में ब्राह्मणवाद का विरोध था. मंडल कमीशन लागू होने का सब से बड़ा लाभ यादवों को मिला. पैसा आने के बाद वे ब्राह्मण जैसे बन गए. अब अखिलेश यादव मंच पर समाजवाद की बात करते हैं, उन के घर में पूजापाठ होता है.
यादव जाति के कई लोग कथावाचक हो गए हैं. इन में मुकुटमणि यादव, संत सिंह यादव, ममता यादव, नीलम यादव और बृजेश यादव हैं. हजारों स्थानीय ओबीसी कथावाचक गांवगांव धर्म का प्रचार वैसे ही कर रहे जैसे ब्राह्मण कथावाचक करते हैं. जब धर्म आगे आ गया तो जाति और समाजवाद को पीछे जाना ही पड़ेगा. इन ओबीसी कथावाचकों को ओबीसी जाति को मानने वाले लोग ही अपनेअपने घरों में बुलाते हैं. सवर्ण लोग कथावाचन के लिए इन्हें कम ही बुलाते हैं और यह भेदभाव चल रहा है. फिर भी पिछड़े कथावाचक उसी तरह से सवर्ण देवीदेवताओं का गुणगान करते हैं जैसे सवर्ण कथावाचक करते हैं.
धर्म के प्रभाव में आया व्यक्ति, अनजाने ही सही, भाजपा का प्रचार करने लगता है. इस पूरे वर्ग को भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तरफ मिला कर ओबीसी राजनीति को खत्म कर दिया. बिहार में दलित रामविलास पासवान और कुर्मी नीतीश कुमार भाजपा के साथ हो गए. इन के सहारे भाजपा ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद को खत्म कर दिया. इस के ही सहारे भाजपा ने उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया है.
साबित करने की जरूरत
सपा केवल यादव और मुसलिमों के नाम तक सीमित रह गई है. उस की विचारधारा भाजपा जैसी ही है. मुलायम सिंह यादव के समय सपा में अति पिछड़े वर्ग की कई जातियां शामिल थीं. अब हालात बदल गए हैं. पिछड़ा वर्ग के पूजापाठी होने से वे मुसलिमों के प्रति अलग भाव रखने लगे हैं. ऐसे में वह पिछड़ों में ज्यादा पिछड़ा वर्ग सपा से बिदक रहा है. अब अखिलेश यादव के सामने दिक्कत है कि वे खुद को पूजापाठी कैसे साबित करें. अपने को पूजापाठी साबित करने के लिए अखिलेश यादव अपने गांव सैफई में शिवमंदिर बनवा रहे हैं. उन का समाजवाद अब गंगा के मैले पानी में बह गया है.
भाजपा की धर्म की राजनीति
ओबीसी के आगे बढ़ने के बाद उन का जो धार्मिक रु?ान बदल गया है उस से मंडल कमीशन की सोच खत्म हो गई है. रामचरित मानस की चौपाई ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी…’ को भूल ओबीसी का एक बड़ा तबका पूरी तरह से धार्मिक हो चुका है. इस चौपाई में जिस शूद्र का वर्णन है वह ही आज का ओबीसी है. यही भाजपा की सब से बड़ी ताकत है. अब लगभग हर जाति के लोगों के अलगअलग मंदिर हैं जहां वह अपनेअपने भगवानों की पूजा करते हैं और धर्म के नाम पर ये भाजपा के साथ खड़े हो जाते हैं.
समाजवादी पार्टी का मूल वोटबैंक यादव भी अब अखिलेश यादव के साथ पूरी तरह से नहीं है. वह सपा को पसंद करता है लेकिन जैसे ही मुद्दा हिंदूमुसलिम का होता है वह भाजपा के साथ खड़ा हो जाता है. भाजपा ने इस वर्ग को प्रभावित करने के लिए मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया है.
राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में कई ओबीसी नेता उपमुख्यमंत्री बनाए गए. पैसे वाला ओबीसी खुद को सवर्ण सम?ा कर वैसा व्यवहार कर रहा है और उसे लगता है कि पूजापाठ कर के वह सवर्ण बन जाएगा.
इंटरकास्ट मैरिज
ओबीसी जब इंटरकास्ट मैरिज करता है तो सवर्ण उस की पहली पसंद होते हैं. ओबीसी के लोग सवर्णों की लड़कियों से शादियां कर रहे हैं. सवर्ण परिवारों की ये लड़कियां ओबीसी घरों को अंदर से ही बदल रही हैं. इन के बच्चे पूरी तरह से सवर्णों वाला व्यवहार करते हैं. यही उन के स्वभाव में रचबस जाता है.
उत्तर प्रदेश में सब से बड़े यादव परिवार मुलायम सिंह यादव का घर इस का उदाहरण है. मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता थी. जिस से उन का एक बेटा प्रतीक यादव है. प्रतीक यादव ने ठाकुर जाति की अपर्णा बिष्ट से शादी की.
मुलायम सिंह यादव के बड़े बेटे अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव पहाड़ी जाति की ठाकुर हैं. उन के पिता का नाम आर एस रावत और मां का नाम चंपा रावत है. शादी के पहले डिंपल सिंह रावत थीं. अब डिंपल यादव हो गई हैं.
बिहार में लालू प्रसाद यादव के बेटे तेज प्रताप यादव की शादी भूमिहार ब्राह्मण जाति से आने वाले नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय की पौत्री ऐश्वर्या राय से हुई. ऐश्वर्या के पिता चंद्रिका राय भी बिहार में मंत्री रहे.
लालू प्रसाद यादव के दूसरे बेटे तेजस्वी यादव की पत्नी रैचल गोडिन्हो हरियाणा के रेवाड़ी में रहने वाले ईसाई परिवार की हैं. वे दिल्ली में पलीबढ़ीं. यहीं तेजस्वी यादव से उन की मुलाकात हुई और शादी के बाद उन का नाम राजश्री यादव हो गया. राजश्री यादव नाम इसलिए रखा गया ताकि बिहार के लोग आसानी से इस का उच्चारण कर सकें. इस नाम को रखने का सु?ाव लालू प्रसाद यादव ने ही दिया था.
ओबीसी जातियों ने खुद को सवर्णों की तरह बदला. वे अपना रहनसहन और व्यवहार सवर्णों जैसा ही करने लगी हैं. ओबीसी जाति वाले धार्मिक रूप से सवर्णों की तरह ही व्यवहार करने लगे हैं. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भले ही खुद को शूद्र कहें लेकिन उन का व्यवहार सवर्ण जैसा ही होता है.
वोट से अलग हट कर देखें तो वे धर्म को पूरी तरह से मानते हैं. उन्होंने अपने पिता की अस्थियों का विर्सजन पूरी आस्था और धार्मिक कर्मकांडों के साथ किया. वे गंगा में डुबकी लगाए और कुंभ में भी नहाए. ऐसे में एससी जातियों को ओबीसी और सवर्णों में फर्क नजर नहीं आता है.
यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कहा कि ‘हम शूद्र हैं.’ समाजवादी पार्टी कार्यालय पर इस का प्रचार करता होर्डिंग भी लगाया गया था. उत्तर प्रदेश में रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले नेता स्वामी प्रसाद मौर्य उस समय समाजवादी पार्टी में थे. इस को ले कर सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर सवाल उठ रहे थे. ये स्वामी प्रसाद मौर्य भी पूरी तरह गंगा में नहा कर भाजपा में शामिल हो गए.
उसी समय अखिलेश यादव मंदिरों में दर्शन करने गए तो हिंदू संगठनों ने उन को काले ?ांडे दिखाए और उन के खिलाफ नारेबाजी की थी. इसे ले कर अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार पर हमला बोलते कहा था कि, ‘मैं मुख्यमंत्रीजी से सदन में पूछूंगा कि मैं शूद्र हूं कि नहीं. भाजपा और आरएसएस के लोग दलितों और पिछड़ों को शूद्र सम?ाते हैं.’ यह वर्णव्यवस्था की देन थी.
अखिलेश यादव कितनी भी वर्णव्यवस्था की बात कर लें पर उन की पत्नी और सांसद डिंपल यादव नवरात्र में कन्यापूजन कर उन को खाना खिलाती हैं. ऐसे में समाजवादी अपनी विचारधारा छोड़ ओबीसी अब धार्मिक हो कर कमंडल की तरफ झुक गए हैं. इस से समाजवादी विचारधारा खत्म हो गई है. समाजवादी नेताओं की कथनी और करनी में अंतर होने से वोटर एकजुट नहीं हो पा रहा है. इसी का प्रभाव है कि आर्थिक क्षेत्र में पिछड़े पिछड़े ही रह रहे हैं. पढ़लिख जाने के बाद भी उन्हें दकियानूसी बनाया जा रहा है. नई चेतना, नई नैतिकता और नई तार्किकता का काम पिछड़े भी खो चुके हैं.
वैवाहिक विज्ञापनों में दिखती है वर्णव्यवस्था
लखनऊ से प्रकाशित समाचारपत्र में यह वैवाहिक विज्ञापन देखिए.
‘ब्राह्मण, 29 वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट बिजनैसमैन युवक के लिए सर्वगुण सुंदर, स्लिम, संस्कारी, गृहकार्य दक्ष, विश्वसनीय, ईमानदार व शाकाहारी वधू चाहिए.’ नौकरी केवल सरकारी टीचर और केवल ब्राह्मण परिवार ही स्वीकार्य. कुंडली मिलान और 36 गुणयोग, बायोडाटा फोटो सहित संपर्क करें.’
वैवाहिक विज्ञापनों में पूरी जातीय और वर्णव्यवस्था दिखती है. इन विज्ञापनों में हर जाति के लिए अलग कौलम बने हैं. जहां अंतरजातीय विवाह की बात होती है उस का अर्थ है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपस में विवाह कर सकते हैं. शूद्र के साथ ये लोग अंतरजातीय विवाह नहीं करते. ये विज्ञापन आज भी उतने ही रूढि़वादी और जातिवादी हैं जितने पहले थे.
हाल के 10-15 सालों में विज्ञापन और अधिक पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त हो गए हैं. इन विज्ञापनों में यह भी दिखता है कि कैसे हमारे सामाज में विवाह की मूल सोच को नकारते हुए इसे वैवाहिक सौदा बनाया गया है जिस में जाति, धर्म, गोत्र का ध्यान रखना सब से पहले आवश्यक है. कुछ विज्ञापनों में बिना दहेज और कोई जाति बाधा न होने जैसी बातें भले ही लिखी जा रही हैं लेकिन विज्ञापन देने वाले अपनी जाति का उल्लेख करना नहीं भूलते. वास्तविक रूप से अपनी जाति से इतर शादी करना कितना कठिन होता है, इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हमारे समाज में अपनी पसंद से शादी करने वाले जोड़े को जान तक गंवानी पड़ती है.
शादी के नाम पर पहले भी मातापिता की रजामंदी के आधार पर जातीय व धार्मिक व्यवस्था को लागू किया जाता रहा है.
मैट्रिमोनियल साइट्स इन बातों को ध्यान में रखते हुए जाति, धर्म, समुदाय, क्षेत्र और व्यव्साय जैसे वर्गों को अपनी साइट्स में बांटे हुए हैं. वैवाहिक विज्ञापन और साइट्स की भाषा समाज की उसी मानसिकता को दिखाते हैं जो ब्राह्मणवादी, पितृसत्ता की मानसिकता है.
वैवाहिक विज्ञापनों की शुरुआत के पहले कौलम में ‘ब्राह्मण’ वैसे ही लिखा होता है जैसे वर्णव्यवस्था में उस का नाम पहले आता है. वर चाहिए या वधू, इस के अलगअलग कौलम होते हैं. इस के बाद क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ, जाट, जाटव, मुसलिम, यादव, बंगाली, पंजाबी, सिख होते हैं. एक कौलम अन्य का होता है. इस में पासी, विश्वकर्मा, पाल, गड़रिया, प्रजापति जैसी जातियों के लिए वर या वधू का जिक्र होता है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के विज्ञापनों में सजातीय शब्द के वरवधू की चाहत अधिक होती है. बहुत कम में जातिबंधन नहीं लिखा मिलता. पासी, विश्वकर्मा, पाल, गड़रिया, प्रजापति, चमार और जाटव जैसी जातियों के वर्ग में जाति बंधन नहीं लिखा होता है.
वैवाहिक साइटों में तमाम गोपनीय जानकारियां
इंटरनैट मीडिया पर वैवाहिक साइटों की मैंबरशिप लेने से पहले वर या वधू का पूरी जानकारी बायोडाटा के रूप में ली जाती है. अब इस में लड़कालड़की और उन के मातापिता की जानकारी के अलावा भाई, बहन, चाचा और चाची की जानकारी भी ली जाती है. इस के साथ ही साथ, लड़की शाकाहारी और अल्कोहल का प्रयोग नहीं करती, यह भी लिखवाया जाता है. एक नया कौलम जुड़ गया है जिस में पूछा जाता है कि वह सोशल मीडिया पर रील तो नहीं बनाती. समाचारपत्रों के वैवाहिक विज्ञापनों में कम बातों का जिक्र किया जाता है.
वैवाहिक साइटों में तमाम गोपनीय जानकारियां भी ले ली जाती हैं जिन में आर्थिक हालत, लोन, ईएमआई जैसे सवाल होते हैं. हरेक का उद्देश्य यही होता है कि आर्थिक स्तर के साथसाथ पिछड़े हैं तो कौन से पिछड़े हैं, पता चल सके. कुछ बातें फौर्म में भरी नहीं जातीं, अपने परिचय में बताई जाती हैं. वैवाहिक साइटों को चलाने वालों का दावा है कि इन जानकारियों के जरिए ही वे परफैक्ट मैच तलाश करते हैं. इन के जरिए लोगों की गोपनीय जानकारियां कहीं की कहीं पहुंचने का खतरा रहता है. 1990 से पहले इंटरकास्ट मैरिज का जोर सुनाई देता है. अब समाजवादी विचारधारा की तरह यह भी डूब गया है.
पूजापाठी होने के नुकसान
पिछड़ों के पूजापाठी होने का परिणाम यह हुआ है कि उन्होंने वर्णव्यवस्था को हिंदू समाज का नासूर मानना बंद कर दिया है. पहले वे अपने पिछले जन्मों के कर्मों के फल की कहानियों को झूठा बतलाते थे और इस धर्म की आलोचना करते थे जो उन्हें जन्म से ही काल्पनिक पिछले जन्म के कर्मों का फल हाथ में पकड़ा देता था. ललई सिंह यादव जैसे विचारक, लेखकों ने रामायण की पोल पूरी तरह खोली थी पर आज वही शूद्र व पिछड़े रामायणरक्षक बन गए हैं और शंबूक वध को भूल गए है.
सवर्णों ने पिछड़ों को अपने बराबर नहीं माना है, बस, उन्हें सहज समाज का अंग मान लिया है. शिक्षा का उद्देश्य यह था कि वह भारत में रहने वाले लगभग एक रंग के, एक ही गठन के लोगों के भेदभाव को समाप्त करेगी. पढ़लिख कर पिछड़ा वर्ग उन्हीं धर्मग्रंथों के आगे सिर ?ाकाने लगा है जिन में हर पृष्ठ पर पिछड़ों, राक्षसों, दैत्यों, निषादों, शंबूकों को अपमानित या ग्रंथों के वर्णित समाज में दोषी माना गया है.
शिक्षा पा कर आज का पिछड़ा किसी भी तरह किसी सवर्ण से कम नहीं है पर अभी भी वह सामाजिक कुंठा में जी रहा है क्योंकि पूजापाठी होने के बावजूद उसे घर के बराबर बनाए गए आउटहाउस में ही जगह मिली है, घर में नहीं. बराबर की शिक्षित, बराबर की कर्मठ पर पिछड़ी पत्नी को सवर्णों के घरों में बराबर की जगह नहीं मिलती.
दफ्तरों में, राजनीति में, हाउसिंग सोसाइटियों में, स्कूलोंकाजेलों में यह भेदभाव चल रहा है. अगर समाज पूजापाठ से ऊपर उठ जाता, तो ही यह अवधारणा कि, कोई पिछले जन्मों के पुण्यों के कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य है और कोई पापों के कारण शूद्र या अछूत, समाप्त होती. द्य
दक्षिणपंथ से अलग थी समाजवादी विचारधारा
धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर रामदेव का कारोबार भले ही बढ़ गया हो पर इस से वर्णव्यवस्था पर कोई असर नहीं हुआ. ऐसे ओबीसी नेताओं की लिस्ट लंबी है जो ओबीसी के नाम पर आगे तो बढ़ गए लेकिन खुद को ब्राह्मण जैसा सम?ाने लगे. ओबीसी के जो नेता आगे बढ़े वे धर्म की आलोचना कर के ही आगे बढ़े थे. इन की विचारधारा दक्षिणपंथी पंडावाद की नहीं थी. ये समाजवादी विचारधारा के थे जिस में महिलाओं और रूढि़वादी विचारों को व्यापक जगह दी गई थी.
समाजवादी राजनीति उस पक्ष या विचारधारा को कहते हैं जो वर्ण व्यवस्था वाले समाज को बदल कर उस में अधिक आर्थिक और जातीय समानता लाना चाहती है. इस विचारधारा में समाज के उन लोगों के लिए सहानुभूति जताई जाती है जो किसी भी कारण से अन्य लोगों की तुलना में पिछड़ गए हों या कमजोर हों. समाजवादी विचारधारा सब को साथ ले कर चलने की बात करती है. यह वर्णव्यवस्था के ठीक विपरीत विचारों को ले कर चलती है.
ब्राह्मण नंबर वन
वर्णव्यवस्था में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था. एक ब्राह्मण महिला एक ब्राह्मण पुरुष से ही शादी कर सकती थी. इस के बाद दूसरे नंबर पर क्षत्रिय वर्ग आता था. इन का मुख्य कार्य युद्धभूमि में लड़ना था. एक क्षत्रिय को सभी वर्णों की स्त्री से विवाह करने की अनुमति थी. इस व्यवस्था में तीसरा नंबर वैश्य का था. इस वर्ण की महिलाएं पशुपालन, कृषि और व्यवसाय में अपने पति का साथ देती थीं. वैश्य महिलाओं को किसी भी वर्ण के पुरुष से शादी करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई थी. शूद्र पुरुष से शादी करने का प्रयास नहीं किया जाता था.
शूद्र वर्णव्यवस्था में सब से निचले स्थान पर थे. इन को किसी भी तरह के अनुष्ठान करने से रोक दिया गया था. कुछ शूद्रों को किसानों और व्यापारियों के रूप में काम करने की अनुमति थी. शूद्र महिलाएं किसी भी वर्ण के पुरुष से विवाह कर सकती थीं जबकि एक शूद्र पुरुष केवल शूद्र वर्ण की महिला से ही विवाह कर सकता था. बौध और जैन धर्म ने वर्णव्यवस्था में जातीय भेदभाव को खत्म करने की कोशिश की लेकिन यह खत्म नहीं हो सका.
आजादी के बाद भी इस का प्रभाव कायम है. संविधान से मिली आरक्षण की ताकत से शूद्र वर्ग के लोग राजनीतिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ गए. आर्थिक संपन्नता से ये खुद को ब्राह्मणों जैसे सम?ाने लगे. असल में ये अपने वर्ग में श्रेष्ठ हो सकते हैं लेकिन वर्णव्यवस्था में इन की जगह जहां थी वहीं है. इस का सब से बड़ा उदाहरण समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाले वैवाहिक विज्ञापनों में देखा जा सकता है. Backward Class Education





