Indian Culture: अमीश त्रिपाठी की सब से बड़ी पहचान शिव ट्रायोलौजी है. जो कई किताबों की सीरीज है. इन में ‘द इम्मोर्टल्स औफ मेलुहा’, ‘द सीक्रेट औफ द नागाज’ और ‘द ओथ औफ द वायुपुत्राज’ शामिल हैं. ये किताबें शिव जैसे मिथकीय किरदार को इंसान के रूप में दिखाती हैं. अमीश त्रिपाठी की ये किताबें विज्ञान, दर्शन और ऐक्शन का मिश्रण है. यही कारण है कि अमीश त्रिपाठी की यह सीरीज भारत की पब्लिशिंग हिस्ट्री में सब से तेज बिकने वाली सीरीज बन चुकी है और इन किताबों की कई लाख कौपी बिक चुकी हैं.

शिव ट्रायोलौजी के बाद अमीश त्रिपाठी की रामचंद्र सीरीज ने भी तहलका मचाया. इस सीरीज में ‘स्कौयन औफ इक्ष्वाकु’, ‘वौरियर औफ मिथिला’ और ‘वौर औफ लंका’ जैसी किताबें हैं जिस में अमीश त्रिपाठी ने रामायण को नए नजरिए के साथ पेश किया और सीता को एक योद्धा व मजबूत नेता के रूप में दिखाया. उन की यह सीरीज भी 20 से ज्यादा भाषाओं में अनुवादित हुई और इन की करोड़ों प्रतियां बिकीं. यही कारण है कि बीबीसी ने उन्हें ‘भारत का टौल्किन’ कहा और कई बड़े मीडिया हाउस ने उन्हें ‘मौडर्न माइथोलौजी का जनक’ तक कह दिया.

अमीश त्रिपाठी आईआईएम कोलकाता से पढ़े हैं और बैंक में अच्छी जौब छोड़ कर लेखन के क्षेत्र में आए हैं. उन्होंने अपनी किताबों के जरिए भारतीय युवाओं को टारगेट किया और उन्हें पौराणिक कथाओं से जोड़ा. अमीश त्रिपाठी के पब्लिशर्स के अनुसार अमीश की किताबों में मनोरंजन के साथ फैमिनिज्म, लीडरशिप और नैतिकता की बातें कूटकूट कर भरी हैं.

अमीश त्रिपाठी महिलाओं के सशक्तीकरण के भी स्वयंभू समर्थक नजर आते हैं. वे अलगअलग इंटरव्यूज में बारबार कहते हैं कि फैमिनिज्म पश्चिमी विचार नहीं है बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति का मूल हिस्सा है. अमीश त्रिपाठी के मौडर्न भक्त कहते हैं कि उन की किताबों में महिलाएं बहुत मजबूत, स्वतंत्र और निर्णय लेने वाली दिखाई जाती हैं.

शिव ट्रायोलौजी में सती और काली जैसी पौराणिक पीडि़त, बेचारी, सताई गईं महिला पात्रों को पैसिव नहीं, बल्कि एमपावर्ड, वौरियर्स और डिग्निफाइड रूप में दिखाया गया है. अमीश त्रिपाठी ने रामचंद्र सीरीज में भी सीता को वौरियर्स, लीडर और पौलिटिकली ऐक्टिव दिखाया है. सीता सिर्फ राम की पत्नी नहीं बल्कि एक योद्धा के रूप में चित्रित हैं. कैकेयी, मंथरा, सुनैना और समीचि जैसी महिलाएं भी शक्तिशाली, बुद्धिमान और स्वतंत्र दिखाई गई हैं.

कैसा फैमिनिज्म

अमीश त्रिपाठी यह मनवाने की कोशिश करते हैं कि प्राचीन भारत में महिलाएं फिलौसफर, रूलर, वौरियर्स और डिसिजनमेकर हुआ करती थीं. मध्यकाल में पितृसत्ता मजबूत हुई जिस से भारतीय संस्कृति की महिलाएं कमजोर हुईं. भारत की प्राचीन परंपरा में जैंडर इक्वैलिटी थी. अमीश त्रिपाठी कहते हैं कि भारत की प्राचीन संस्कृति में फैमिनिज्म का मतलब सम्मान और बराबरी रहा है.

अब ये सारी बातें अमीश त्रिपाठी की किताबों की तरह ही कोरी नकली, झठी और फिक्शनल हैं जब तक कि वे अपनी बातों के लिए ठोस प्रणाम नहीं देते लेकिन प्रमाणों की जरूरत भी किसे है? सच तो यह है कि आज की नई पीढ़ी को धर्म के मामले में प्रमाणों की जरूरत ही नहीं पड़ती. सुबह उठते ही मोबाइल पर भजन, हनुमान आराधना या राम के गुणगान करने वाली नई पीढ़ी से तार्किक सोच की उम्मीद भी नहीं है. हालांकि धर्म के मामले में आज के युवा पिछली पीढ़ी जितने भक्त नहीं हैं और दुनियादारी के मामलों में भी आजकल के युवा पिछली पीढ़ी से ज्यादा स्मार्ट हैं.

यह नई जेनरेशन मंदिर बेशक कम जाती है लेकिन सोशल मीडिया पर स्क्रौल करतेकरते और नैटफ्लिक्स बिंज करतेकरते अचानक उन्हें ‘शिवा ट्रायोलौजी’ या ‘रामचंद्र सीरीज’ हाथ लग जाती है और फिर हो जाता है तार्किकता का सत्यानाश. सोशल मीडिया पर अमीश त्रिपाठी जैसे लेखक बैठे हैं जो पुरानी माइथोलौजी को थोड़ा सा ट्विस्ट दे कर, थोड़ा सा साइंस फिक्शन मिला कर इतना रोचक बना देते हैं कि युवा सोचने लगता है वाह, यह तो हमारा अपना ‘गेम औफ थ्रोन्स’ है. क्या ये सब सिर्फ मनोरंजन है? या इस के पीछे धर्म के नाम पर युवाओं को बरगलाने का एक छिपा हुआ एजेंडा है?

अमीश त्रिपाठी आधुनिक तुलसीदास बन गए हैं

एक तरह से यह रामचरितमानस है जिसे मुगलकाल में दुर्दशा की दृष्टि से ब्राह्मणों का पक्ष रखने के साथ बैठेठाले पैसे ऐंठने के लिए तुलसीदास ने रामकथा के रूप में प्रस्तुत किया था.

अमीश त्रिपाठी ‘माइथोलौजिकल मार्केटिंग मास्टर’ बन गए हैं. पहले वे बैंक में बैठ कर लोन बेचते थे, अब माइथोलौजी बेच रहे है. शिवा ट्रायोलौजी में शिवा को एक सामान्य इंसान बना कर दिखाते हैं जो कर्म से भगवान बनता है. वाह, क्या लौजिक है? जैसे कि युवाओं को कह रहे हों, ‘देखो, तुम भी शिवा बन सकते हो, बस, थोड़ा चिलम पियो, नाचोगाओ, और हां, हिंदू धर्म की जय बोलते रहो.’ असल में ये क्या कर रहे हैं, पुरानी कहानियों को मौडर्न पैकेजिंग में लपेट कर युवाओं के दिमाग में धर्म का बीज बो रहे हैं.

अपनी किताबों के जरिए अमीश त्रिपाठी बड़ी चालाकी से चतुर्वर्णीय कास्ट सिस्टम के रिलीजियस हिस्सों को बनाए रखते हैं. वे सिर्फ अनटचेबिलिटी जैसी चीजों को नकारते हैं बिलकुल महात्मा गांधी की तरह जो वर्ण व्यवस्था को हिंदू धर्म की आत्मा मानते थे लेकिन छुआछूत के खिलाफ थे. अमीश त्रिपाठी भी कास्ट को रिचुअलाइज कर के बनाए रखना चाहते हैं.

आज के युवा अमीश त्रिपाठी को पढ़ते हैं. उन्हें मजा आता है और वे सोचने लगते हैं कि हिंदू धर्म कितना कूल है. बस, यहीं से इस मौडर्न पोंगा पंडित का मकसद पूरा हो जाता है. माइथोलौजी को रोचक बताने का ड्रामा भी असल में युवाओं को धर्मभीरु बनाने के एजेंडे का हिस्सा ही है. अमीश त्रिपाठी कहते हैं कि वे महान इंडियन ट्रेडिशन में गुम हो चुके हिंदू माइथोलौजी को रीइंटरप्रेट कर रहे हैं. हालांकि, इसे रीइंटरप्रेट करना नहीं कहते बल्कि झूठ बोल कर बेवकूफ बनाना कहते हैं.

अमीश त्रिपाठी की किताबें सत्यनारायण कथा की तरह हैं जिन में कथा न सुनने से हानि और सुनने से लाभ तो कमाया जाता है लेकिन कथा सुनाई नहीं जाती क्योंकि वह लिखी गई ही नहीं है. अमीश के पात्र सत्यनारायण की तरह काल्पनिक हैं, उन का तो पौराणिक आधार भी नहीं है.

माइथोलौजी आखिर होती क्या है जिस का कोई ऐतिहासिक और पुरातात्विक सुबूत ढूंढ़ने से भी न मिले. पुराने लोगों की कथाएं जिन का कोई सिरपैर नहीं, कोई साक्ष्य नहीं. अब ऐसी कहानियों को मार्केट के हिसाब से रोचक बना कर मौडर्न रूप दिया जाए तो इस में कौन सी बड़ी बात है? यह सिर्फ धर्म का बिजनैस ही तो है. धर्म को बेचने का पुराना धंधा जो मुल्ला, पंडित, बाबा और धर्मगुरु हजारों सालों से कर रहे हैं.

अमीश त्रिपाठी अपने फायदे के लिए हिंदू माइथोलौजी को फिर से स्थापित कर युवाओं को धर्म की ताजी अफीम बेच रहे हैं. अमीश त्रिपाठी की किताबें असल में ऐक्शनपैक्ड स्टोरी होती हैं जिन में राम, रावण, शिवा सब सुपरहीरो हैं. इस का नतीजा यह होता है कि युवा सोचने लगते हैं, ‘धर्म तो बड़ा मजेदार है’ जबकि असल में ये सब एक चालाक तरीका है धर्म को मार्केट करने का. बीबीसी उन्हें ‘इंडिया का टौल्किन’ कहती है लेकिन क्या टौल्किन कभी अपनी फैंटसी से रिलीजन प्रमोट करता था? नहीं न. अमीश त्रिपाठी तो बस, अपनी किताबों को बैस्टसेलर बना कर युवाओं को एंटरटेनमैंट के बहाने धर्म की गोली चुपके से निगलवा रहे हैं.

नई पीढ़ी को बरबाद करने की साजिश

आजकल के युवा साइंस पढ़ते हैं, इसलिए कई मामलों में पहले की पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा तार्किक हैं. ये नई पीढ़ी ट्रैडिशनल धर्मगुरुओं के ?ांसे में नहीं आती. बाबाओं के सत्संग से दूरी बना कर रखती है. कथावाचकों की बातों का मजाक उड़ाती है. धर्म के ठेकेदारों को आज के युवाओं की इसी तार्किकता से खतरा है.

आज के युवा किसी बाबा के ?ांसे में नहीं फंसते लेकिन अमीश त्रिपाठी, सुधांशु द्विवेदी, सद्गुरु, रविशंकर और सोनू शर्मा जैसे मौडर्न बाबाओं के भ्रमजाल में आसानी से फंस जाते हैं क्योंकि इन मौडर्न बाबाओं की जमात सूडोसाइंस को साइंस बना कर पेश करती है. ये फर्जी लोग मेटा फिजिक्स को असली फिजिक्स बना देते हैं और युवा इस बौद्धिक हमले का शिकार हो जाते हैं.

अमीश त्रिपाठी अपनी किताबों के जरिए साइंस और मिथ को मिला कर युवाओं को ऐसी घुट्टी पिलाते हैं कि उन्हें लगने लगता है की माइथोलौजी ही ट्रू साइंस है. वे सोमरस को एंटीएजिंग ड्रिंक बना देते हैं, नागाओं को जेनेटिक म्यूटैंट्स साबित कर देते हैं और बस हो गया काम. युवा सोचने लगते हैं, ‘वाह, हमारे पुराण कितने एडवांस्ड थे.’

रैडिट पर लोग कहते हैं कि अमीश त्रिपाठी गौड्स को मौक करते हैं लेकिन असल में ये रिवर्स साइकोलौजी है. मौक कर के भी प्रमोट करो, ताकि युवा डिफैंड करने लगें और ज्यादा कनैक्ट फील करें. अमीश त्रिपाठी खुद कहते हैं कि माइथोलौजी से उन्हें रिलीजन में पीस/शांति मिलती है. मतलब यह कि वे युवाओं को ‘पीस’ बेच रहे हैं लेकिन किस कीमत पर? असल में अमीश त्रिपाठी युवा पीढ़ी की क्रिटिकल थिंकिंग का गला घोंट रहे हैं.

अमीश त्रिपाठी जैसे लेखक युवाओं को ‘माइथोलौजिकल एंटरटेनमैंट’ के नाम पर धर्म का इंजैक्शन दे रहे हैं. कुरान की आयतों को साइंस से जोड़ कर भारत के मुसलमानों को बरगलाने के लिए जाकिर नाइक जैसे लोगों ने भी यही पैतरा आजमाया था. पुरानी बोतल में नई शराब भर कर बेचो या पुरानी शराब को नई बोतल में पैक कर के बेचो बात एक ही है. बिजनैस है लेकिन बेहद खतरनाक.

आज के युवाओं को अगर यह क्यूरियोसिटी है कि उन का ‘धर्म कितना कूल है’ तो उन्हें डा. अंबेडकर, भगत सिंह या राहुल सांस्कृतयान को पढ़ना चाहिए. अमीश त्रिपाठी की किताबें सिर्फ मनोरंजन नहीं हैं, यह छिपा हुआ धार्मिक एजेंडा है. अमीश त्रिपाठी ने साबित किया कि धर्म के धंधे में मौडर्न बाबा बना जा सकता है और बैंकिंग से लेखन में स्विच कर के भी धर्म के धंधे से प्रौफिट कमाया जा सकता है.

फैमिनिज्म का धार्मिक चोला या छिपा हुआ एजेंडा

अमीश त्रिपाठी की ‘शिव ट्रायोलौजी’ और ‘रामचंद्र सीरीज’ लाखों की संख्या में बिकती हैं और वे खुद को एक प्रोग्रैसिव थिंकर बताते हैं लेकिन गहराई से देखें तो लगता है कि ये सब बस एक छिपा हुआ एजेंडा है. अमीश त्रिपाठी फैमिनिज्म की बात करते हैं और महिलाओं के सशक्तीकरण की दुहाई देते हैं लेकिन असल में अमीश त्रिपाठी की ये तमाम कोशिशें महिलाओं को धार्मिक बनाने की साजिश का हिस्सा हैं. फैमिनिज्म का मुखौटा लगा कर वे पढ़ीलिखी, कमाऊ, आजाद औरतों को फिर से पूजापाठ और देवीदेवताओं के चंगुल में धकेल रहे हैं.

अमीश त्रिपाठी की फेमस सीरीज शिव ट्रायोलौजी में सती जैसी महिला कैरेक्टर है जो योद्धा और स्वतंत्र है लेकिन क्या शिवपुराण की सती योद्धा और स्वतंत्र है?

‘वौरियर औफ मिथिला’ की सीता भी योद्धा और स्वतंत्र है लेकिन क्या वाल्मीकि रामायण की सीता योद्धा और स्वतंत्र है? वाल्मीकि की सीता और अमीश त्रिपाठी की नई सीता के व्यक्तित्व में जमीनआसमान का फर्क है. क्या अमीशजी बताएंगे कि सीता के इस नए व्यक्तित्व का स्रोत क्या है? अगर उन की कहानी पूरी तरह फिक्शनल है तो वे किस आधार पर प्राचीन भारत की महिलाओं के योद्धा और स्वतंत्र होने की बात करते हैं?

अमीश त्रिपाठी कल को किसी नई किताब में पौराणिक देवीदेवताओं के हाथों में कंप्यूटर और एंड्रौयड पकड़ा दें, उन्हें किसी स्पेसक्राफ्ट में बिठा कर मंगल ग्रह पर पहुंचा दें और फिर किसी इंटरव्यू में कहें कि हमारी प्राचीन संस्कृति इतनी महान थी कि हमारे पूर्वजों के हाथों में कंप्यूटर और एंड्रौयड था और वे दूसरे प्लैनेट्स पर शासन किया करते थे तो इस में कोई आश्चर्य नहीं.

अमीश त्रिपाठी एक इंटरव्यू में कहते हैं, ‘मेरी महिलाएं स्ट्रौंग हैं और वे एम्पावर्ड हैं.’ वाह, क्या बात है. जरा सोचिए, सती कौन है? शिव की पत्नी, जो खुद को अग्नि में ?ांक देती है. सती को फैमिनिस्ट आइकौन माना जाए या फिर धर्म के नाम पर बलिदान की मिसाल कहा जाए?

अमीश त्रिपाठी ने पौराणिक कहानियों की औरतों को मौडर्न बनाया है लेकिन संदेश वही पुराना है. महिलाएं देवी बनें, पूजा करें और घरपरिवार को संभालें. इस में फैमिनिज्म कहां है? ये बस धार्मिक षड्यंत्र का मौडर्न स्वरूप है जहां महिलाएं सशक्त तो हैं लेकिन सिर्फ मर्यादा, परंपरा, घर और मंदिर के अंदर. घर से बाहर निकल कर राइट्स मांगने की औकात इन में से किसी औरत में नहीं. बस, मजबूत ‘देवी’ बन कर घर में बैठो. यही अमीश त्रिपाठी का गौरवशाली फैमिनिज्म है.

अमीश त्रिपाठी ने ‘रामचंद्र सीरीज’ में सीता को वौरियर औफ मिथिला बनाया है. वाल्मीकि रामायण की सीता अपहरण ?ोलती है लेकिन अमीश त्रिपाठी की किताब में यही सीता योद्धा बन जाती है. अमीश त्रिपाठी कहते हैं कि उन की मिथकीय नारियों के सशक्त दिखने से आज की महिलाओं को राजनीतिक और सामाजिक तौर पर ताकत मिलती है लेकिन वौरियर औफ मिथिला में तो औरतों के लिए धार्मिक मूल्य कूटकूट कर भरे हैं और इस किताब के अंत में सीता राम के साथ धार्मिक राष्ट्र का निर्माण करती हुई दिखाई देती हैं. यह फैमिनिस्ट रिविजन है या धार्मिक प्रोपगैंडा?

अमीश त्रिपाठी की नजर में महिलाओं को एम्पावर करने का सब से अच्छा तरीका है उन्हें धार्मिक बना दो. अमीश त्रिपाठी की पौराणिक औरतें सिर्फ धर्म की स्थापना के लिए वौरियर और स्ट्रौंग हैं. जैसे, वे आज की औरतों को प्रेरणा दे रहे हैं कि तुम तब तक ही स्ट्रौंग हो तब जब तुम धार्मिक हो. मंदिर जाओ, पूजा करो और देखो, कैसे तुम्हारी लाइफ बदल जाएगी.

धार्मिकता नहीं छोड़ी

अमीश त्रिपाठी के कुंठित विचार सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं. अमीश त्रिपाठी के इंटरव्यूज देखिए, वे महिलाओं के अधिकारों पर बात करते हैं लेकिन हमेशा अपनी बातों को भारतीय संस्कृति और धार्मिक संदर्भों से जोड़ देते हैं. एक जगह वे कहते हैं कि पश्चिमी एक्सट्रीम फैमिनिज्म गलत है, असली फैमिनिज्म भारतीय मूल्यों में है और उन के भारतीय मूल्य का मतलब धार्मिक मूल्य ही होता है.

असल में वे आज की महिलाओं से कह रहे हैं कि ‘फैमिनिज्म मत अपनाओ, देवी बनो. शिव की तरह पति ढूंढ़ो, राम की तरह बलिदान दो.’ क्या यह सशक्तीकरण है या महिलाओं को वापस उन पुराने ढांचे में फिट करने की कोशिश है जिन से बाहर निकालने के लिए भारतीय संविधान बना. अमीश त्रिपाठी का एजेंडा साफ है. फैमिनिस्ट बनो, लेकिन धार्मिक फैमिनिस्ट. बाहर से मौडर्न और अंदर से मंदिर.

अगर अमीश त्रिपाठी की किताबें सच में फैमिनिज्म के फेवर में होतीं तो सीता औफिस जाती, सती कैरियर बनाती और काली बौस बनती लेकिन नहीं, उन की फैमिनिस्ट औरतें सब की सब धार्मिक योद्धा हैं. शायद अगली किताब में वे लिखें ‘फैमिनिज्म फौर देवीज- हाउ टू बी स्ट्रौंग एंड स्टिल डू पूजा’. क्या मजाक है. अमीश त्रिपाठी की चालाकी पकड़ी गई है. फैमिनिज्म की आड़ में महिलाओं को धार्मिक बनाने का यह छिपा एजेंडा है.

अमीश त्रिपाठी जैसे लेखकों के लिए फैमिनिज्म बड़ा अच्छा टूल है जिस के जरिए वे औरतों को नई बोतल में पुरानी शराब बेच रहे हैं. धर्म के ठेकेदारों के लिए औरतों को धार्मिक बनाना बेहद जरूरी है लेकिन ट्रैडिशनल बाबाओं की जमात यह काम नहीं कर पा रही, इसलिए अमीश त्रिपाठी जैसे मौडर्न दिखने और लिखने वाले बाबाओं की जरूरत है. युवाओं और औरतों को धर्म का गुलाम बनाने का जो काम बड़ेबड़े कथावाचक और बाबा नहीं कर पा रहे वह काम अमीश त्रिपाठी जैसे लोग आसानी से कर रहे हैं. Indian Culture

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