Gen Z: जहां पहले रिश्तों में अपनापन, धैर्य और समझ थी, वहीं आज के बच्चों में स्पीड, स्क्रीन और सैल्फसैंटर्ड सोच बढ़ती जा रही है. जेनजी इस बदलाव का चेहरा बन चुकी है.

आज डिजिटल एज का समय है. हर चीज फास्ट, इंस्टैंट और स्क्रीनड्रिवन हो चुकी है. इस बदलाव ने बच्चों की लाइफ को सुविधाजनक जरूर बनाया है, लेकिन इस ने उन के रिश्तों की गहराई को कम भी कर दिया है. पहले का बचपन भले ही टैक्नोलौजी से दूर था लेकिन उस में एक सच्चाई, एक मासूमियत और एक भावनात्मक जुड़ाव था. आज का बच्चा बहुतकुछ जानता है, बहुतकुछ कर सकता है, लेकिन कहीं न कहीं वह फील कम करता है जबकि रिऐक्ट ज्यादा करता है.

फैमिली रिलेशनशिप्स में बदलाव

पहले फैमिली सिर्फ एक सिस्टम नहीं, बल्कि एक इमोशनल यूनिट होती थी. घर में बातचीत होती थी, एकदूसरे के दिन के बारे में पूछा जाता था और हर सदस्य दूसरे के सुखदुख में शामिल होता था. बच्चे अपने पेरैंट्स के साथ बैठ कर बातें करते थे, उन के साथ टीवी देखते थे और छोटीछोटी चीजों में खुशी ढूंढ़ लेते थे.

आज की लाइफस्टाइल में यह सब धीरेधीरे कम हो गया है. अब घर में साथ रहना तो है लेकिन साथ जीना कम हो गया है. पेरैंट्स अपने काम और स्ट्रैस में व्यस्त हैं जबकि बच्चे अपनी डिजिटल दुनिया में. बातचीत की जगह अब स्क्रीन इंटरैक्शन ने ले ली है.

कई बार ऐसा होता है कि बच्चे अपनी समस्या पेरैंट्स से शेयर करने के बजाय गूगल या यूट्यूब पर सर्च करते हैं. इस से उन का इमोशनल कनैक्शन कमजोर होता जाता है. यह भी देखा गया है कि आज के बच्चे पेरैंट्स की बातों को जल्दी जज करते हैं. उन्हें लगता है कि पेरैंट्स आउटडेटेड हैं, उन की सोच पुरानी है. यह सोच एक दूरी पैदा करती है, जहां बच्चे गाइडैंस लेने के बजाय खुद ही सबकुछ समझने की कोशिश करते हैं भले ही वे अंदर से कन्फ्यूज्ड क्यों न हों.

सिबलिंग्स बौंडिंग में बदलाव

सिबलिंग्स का रिश्ता पहले जीवन का सब से मजबूत सपोर्ट सिस्टम होता था. भाईबहन एकदूसरे के साथ अपनी हर बात शेयर करते थे. वे साथ खेलते थे, साथ पढ़ते थे और एकदूसरे के बिना अधूरे लगते थे.

आज के समय में यह रिश्ता धीरेधीरे कोएग्जिस्टैंस में बदलता जा रहा है. यानी, साथ रहते तो हैं लेकिन साथ जीते नहीं हैं. एक ही घर में रहते हुए भी भाईबहन अलगअलग स्क्रीन में खोए रहते हैं. उन के बीच बातचीत कम हो गई है और अगर होती भी है तो वह बहुत सीमित और जरूरत तक ही होती है.

यह बदलाव सिर्फ टैक्नोलौजी की वजह से नहीं है, बल्कि बढ़ती इंडिविजुअल सोच का भी असर है. अब हर बच्चा अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है, जो अच्छी बात है, लेकिन इस चक्कर में वह अपने सब से करीबी रिश्ते को नजरअंदाज कर देता है. धीरेधीरे यह दूरी इतनी बढ़ जाती है कि बड़े होने पर भाईबहन सिर्फ फौर्मल रिलेशन में सिमट जाते हैं.

फ्रैंडशिप और सोशल लाइफ

दोस्ती पहले दिल से जुड़ी होती थी, अब कई बार यह डिस्प्ले बन कर रह गई है. सोशल मीडिया ने दोस्ती को एक पब्लिक शो बना दिया है, जहां लोग अपनी दोस्ती को दिखाते ज्यादा हैं, निभाते कम.

आज के बच्चे अपने फ्रैंड्स के साथ कम और उन की पोस्ट्स के साथ ज्यादा जुड़े रहते हैं. औनलाइन ऐक्टिव रहना ज्यादा जरूरी हो गया है बजाय रियल कनैक्शन बनाने के. कई बार दोस्ती का आधार भी बदल जाता है. अब यह इस बात पर निर्भर करती है कि कौन कितना कूल है, किस के कितने फौलोअर्स हैं और कौन कितना ट्रैंडिंग है.

यह सब एक सतही दोस्ती को जन्म देता है, जहां गहराई नहीं होती. ऐसे में जब कोई बच्चा सच में इमोशनल सपोर्ट चाहता है तो उसे वह नहीं मिल पाता. इस से अंदर ही अंदर अकेलापन बढ़ता है, जिसे बच्चे अकसर चिल या ओके कह कर छिपाने की कोशिश करते हैं.

नेबर्स और रिलेटिव्स के साथ रिलेशन

पहले समाज एक ‘कम्युनिटी’ की तरह होता था. नेबर्स सिर्फ पड़ोसी नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा होते थे. उन के साथ एक भरोसा और अपनापन होता था. आज यह सब लगभग खत्म हो गया है. लोग अब अपनी प्राइवेसी में रहना पसंद करते हैं. नेबर्स के साथ बातचीत सीमित हो गई है और रिश्ते सिर्फ औपचारिक रह गए हैं.

रिलेटिव्स के साथ भी यही

स्थिति है. पहले त्योहारों और फंक्शंस में मिलनाजुलना होता था, जिस से रिश्ते मजबूत होते थे. अब यह सब कम हो गया है. इस का असर बच्चों पर भी पड़ता है. वे रिश्तों की वैल्यू को उतनी गहराई से नहीं समझ पाते, क्योंकि उन्होंने उसे महसूस ही नहीं किया होता.

टीचर्स के साथ रिलेशन

टीचर्स पहले जीवन के मार्गदर्शक होते थे. बच्चे उन्हें सिर्फ पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि एक रोल मौडल मानते थे. आज यह रिश्ता भी बदल गया है. अब टीचर्स को सर्विस प्रोवाइडर की तरह देखा जाने लगा है. बच्चे सवाल करते हैं, जो अच्छी बात है, लेकिन कई बार यह सवाल रिस्पैक्ट के बिना होते हैं. वे जल्दी रिजल्ट चाहते हैं और अगर उन्हें कुछ समझ नहीं आता तो वे तुरंत इंटरैस्ट खो देते हैं. इस से टीचरस्टूडैंट रिलेशन की गहराई कम हो जाती है और इस से सीखने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है.

लैंग्वेज में बदलाव

जेन जी की लैंग्वेज उन की पहचान बन चुकी है. यह लैंग्वेज फास्ट, शौर्ट और मिक्स होती है. इस में स्लैंग और शौर्टकट का ज्यादा इस्तेमाल होता है.

यह लैंग्वेज स्टाइलिश तो लगती है लेकिन इस में भावनाओं की कमी होती है. शब्द छोटे हो गए हैं, उन के पीछे की भावना भी छोटी हो गई है. अब ‘थैंक यू’ और ‘सौरी’ भी कई बार सिर्फ औपचारिक शब्द बन कर रह गए हैं, जिन में सच्चाई कम होती है.

रिऐक्शन में बदलाव

आज के बच्चों के रिएक्शन बहुत इंस्टैंट हो गए हैं. वे जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, जल्दी इरिटेट हो जाते हैं और कई बार बिना सोचेसमझे प्रतिक्रिया दे देते हैं. उन के रिऐक्शन में धैर्य और समझ की कमी दिखती है. वे चीजों को गहराई से समझने के बजाय जल्दी निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं.

‘आई डोंट केयर’, ‘व्हाटएवर’, ‘ओके फाइन’ जैसे शब्द उन के आम रिऐक्शन बन गए हैं. यह दिखाता है कि वे कई बार अपनी भावनाओं को समझने के बजाय उन्हें नजरअंदाज करना आसान समझते हैं. इसलिए समय की जरूरत है कि हम बच्चों को सिर्फ स्मार्ट नहीं, बल्कि इमोशनली स्ट्रौंग भी बनाएं ताकि वे सिर्फ कनैक्टेड न हों, बल्कि सच में जुड़े हुए भी हों. Gen Z

 

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