Emotional Hindi Story: औफिस में आए भाई के कौल की ‘घर आ जा, शाम को जरूरी बात करनी है’ ने पसोपेश में डाल दिया. मन को शांत कर पूछा, ‘‘कुछ खास?’’
‘‘हां, मां ने घर में ब्लास्ट कर दिया.’’
‘‘ब्लास्ट? क्या मतलब?’’
‘‘मां को पापा से तलाक चाहिए,’’ कह कर भाई ने फोन रख दिया.
तलाक? वह भी शादी के 35 साल बाद. मां को क्या हो गया? ये तो वास्तव में सठिया गई हैं. दादीनानी बनने के बाद अब तलाक? ऐसा क्या हो गया जो इस उम्र में इन्हें तलाक की जरूरत पड़ गई. इन्हें और पापा को तो कभी लड़ते भी नहीं देखा. इतना जरूर था कि रिटायरमैंट के बाद पापा अपने समाजसेवा वाले स्थान पर रह रहे थे और मम्मी भाईभाभी के साथ अपने घर में. गाहेबगाहे पापा घर आ जाते या कुछ दिन मम्मी वहां चली जातीं.
समाजसेवा के विभिन्न कार्य करना पापा का शौक था विशेषकर शिक्षा से संबंधित, जैसे गरीब व वंचित बच्चों को पढ़ाना, उन में पुस्तकें बांटना, उन की जरूरतों का अन्य सामान बांटना आदिआदि. स्कूलों से गरीब और पढ़ाई में कमजोर बच्चों को ढूंढ़ उन्हें मुफ्त ट्यूशन देने का कार्य तो उन का पसंदीदा था. इस में मम्मी को भी सहयोग देने को कहते थे.
मगर मम्मी का कहना था कि दान घर से शुरू होता है. दूसरों की मदद करने और इस समाज को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने के लिए हमें पहले खुद पर काम करना चाहिए और अपने करीबी लोगों की जरूरतों को पूरा करना चाहिए. इसलिए उन्होंने स्वयं को हम दोनों भाईबहन की शिक्षादीक्षा व घरगृहस्थी में ही सीमित कर लिया. उन का कहना था, ‘आप ही बाहर सुधारो, मैं तो घर और बालबच्चों को संभाल कर ही खुश हूं.’
रिटायरमैंट के बाद पिछले 2 सालों से पापा ने स्वयं को पूर्णता इसी कार्य में समर्पित कर दिया था. बच्चों व शिवांश की शाम की व्यवस्था कर मम्मी के घर पहुंच कर देखा कि घर में सन्नाटा पसरा हुआ है. मां अपने कमरे में, भाभी किचन में और भतीजे के साथ बिजी भाई.
‘‘क्या हुआ? इतना अचानक, ये सब कब, कैसे और क्यों?’’ कह कर मैं ड्राइंगरूम में बैठ गई. अब वहां हम चारों- मैं, मम्मी, भाई और भाभी- बिना कुछ बोले शांत बैठे थे इस ऊहापोह में कि बात कहां से शुरू करें.
‘‘मां, क्या हो गया?’’ कह कर मैं ने ही बात शुरू की.
‘‘क्या? क्या हो गया है, श्रेय ने तुम्हें बताया नहीं? मुझे तुम्हारे पापा से तलाक चाहिए.’’
‘‘तलाक पापा से मगर क्यों? ऐसी क्या बात हो गई जो इस उम्र में आप को
तलाक चाहिए?’’
‘‘क्यों, तलाक की भी कोई उम्र होती है? कानून में लिखा है क्या कि तलाक इस से इस उम्र में ही लेना चाहिए या मिलेगा?’’ मम्मी ने थोड़े गुस्से में कहा, वे ऐसे सवालों के लिए तैयार थीं.
‘‘अरे मां, बात उम्र की नहीं, कोई कारण भी तो हो तलाक लेने का?’’
‘‘पारस्परिक सहमति से भी तलाक होता है न. हम भी ले लेंगे. हिंदू विवाह
कानून 1955 की 13 बी धारा में दिया हुआ है न,’’ मम्मी ने पूरी तैयारी कर ली थी.
‘‘आप ने और पापा ने यह डिसीजन लिया है? कब डिसाइड किया?’’
‘‘अभी तो मैं ने ही निर्णय लिया है. पारस्परिक सहमति भी हो जाएगी.’’
‘‘क्या मजाक है? आप ने निर्णय ले लिया, पापा न माने तो? और फिर क्यों चाहिए आप को तलाक? कोई तो कारण होगा?’’
‘‘हां है. और बहुत बड़ा कारण है. उन्हें मेरी जरूरत ही नहीं. तो इस बंधन में रहने का लाभ? जब से हमारी शादी हुई, समाजसेवा मेरी सौत के रूप में हमेशा हमारे साथ रही. कहीं जाना हो तब या तो समय नहीं या वहां भी किसी और रूप में समाजसेवा. सोचा, परिवार बढ़ेगा, तब शायद जनून कम हो. फिर तुम मेरी गोद में आई, लगा अब तो ध्यान घर और मेरे-तुम्हारे ऊपर आएगा. मगर नहीं. हम तो घर की मुरगी ही रहे. जैसे अगर वे शिक्षा दान नहीं करेंगे तो गरीब बच्चे अनपढ़ ही रह जाएंगे.
‘‘समय के साथ श्रेय भी आ गया और तुम ने स्कूल जाना शुरू किया, तब फिर उम्मीद जगी कि शायद तुम्हारी पढ़ाई में रुचि लेंगे और दोनों बच्चों की परवरिश और घर में ध्यान देंगे. नहीं, मगर ऐसा नहीं हुआ. औफिस और समाजसेवा ही उन का पहला प्यार और कर्तव्य रहा. हमारी तरफ तो उन का कर्तव्य मात्र नौकरी कर घरखर्च की पूर्ति करना ही रहा. सामंजस्य बिठातेबिठाते इसी उम्मीद पर रही कि चलो, रिटायरमैंट के बाद कितना ही समाजसेवा कर लें, फिर भी हम दोनों को एकसाथ बैठने व सुखदुख बांटने का समय मिलेगा ही.
‘‘तुम दोनों की जिम्मेदारियों के पूरे होने और रिटायरमैंट के बाद भी उन का यह रवैया असहनीय है. मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं, कुछ सपने मैं ने भी देखे थे कि जिम्मेदारियां समाप्त होने के बाद हम क्या करेंगे, कैसे करेंगे. मुझे अब अपनेआप को ढूंढ़ना है. फिर उस रिश्ते को ढोते रहने का क्या लाभ जिस में मन अशांत रहे.
‘‘इसलिए, मुझे तलाक चाहिए.’’
‘‘ठीक है. कहां रहेंगी आप तलाक के बाद?’’
‘‘अपने घर में.’’
‘‘भाईभाभी?’’
‘‘जैसे अभी रहते हैं मेरे साथ.’’
‘‘पापा?’’
‘‘जैसे अभी रहते हैं- समाज सेवा के आश्रम में.’’
‘‘तो बदलेगा क्या? अभी भी तो आप ऐसे ही रहती हैं.’’
‘‘तुम्हारे पापा के साथ मेरा रिश्ता. मेरी उन से अपेक्षा.’’
कमरे में पूर्ण सन्नाटा पसर गया.
मां कुछ रुक कर बोलीं, ‘‘जिंदगी में विवाह सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए नहीं होता. विवाह 2 जनों के साथ सुखदुख बांटने और रोजमर्रा की छोटीबड़ी बातों को शेयर करने के लिए होता है. जब तुम्हारे पापा ने अपनी जिम्मेदारी निभाने से साफ इनकार कर दिया तो मैं इस रिश्ते को क्यों ढोऊं? विवाह एक तरफ का फैसला नहीं होता.
‘‘मैं नहीं चाहती कि जब मुझे जरूरत हो, मैं किसी का हाथ पकड़ कर चलने की कोशिश कर रही हूं, वह जना दिखे ही नहीं. मैं उस विवाह के ?ाठ के सहारे बाकी के साल नहीं गुजारना चाहती जो कभी हुआ था ऐसा लगता ही नहीं. तुम लोगों को हमेशा की तरह आजादी रहेगी कि तुम कब पापा से मिलो, कब न मिलो. पर मुझे आजादी रहेगी कि मैं उन से न मिलूं और यदि कोई कभी मुझे मिला तो उस के साथ हंसनेबोलने पर मुझे कोई गिल्ट न हो.’’
हम दोनों के पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि पापा का व्यवहार तो हम होश संभालने के बाद से देखते आ रहे थे. आज अगर मां दुनिया से लड़ने को तैयार हैं तो हम न करने वाले कौन होते हैं? Emotional Hindi Story
लेखक – अमिता आनंद





