Romantic Film: निर्देशक विवेक सोनी की यह फिल्म एक मैच्योर लव स्टोरी बनने की कोशिश थी जिस में अर्ली एज में प्रैग्नैंसी, कैरियर, जिम्मेदारियां, टूटते रिश्ते, मैंटल प्रैशर सब है. समस्या सिर्फ इतनी है कि फिल्म इन सब मुद्दों को समझने से ज्यादा इन्हें इंस्टाग्राम रील की तरह सजाने में लगी हुई है.

फिल्म की कहानी आरव (लक्ष्य) और चांदनी (अनन्या पांडे) की है. दोनों हैदराबाद के इंजीनियरिंग कालेज में मिलते हैं. चांदनी कालेज की टौपर है, वह क्लासिकल डांस भी करती है और स्पोर्ट्स में भी आगे है. वहीं आरव भी पढ़ाई में टौपर है. वह शर्मीला है मगर कबीर सिंह की तरह दिन में एक पैकेट सिगरेट फूंक जाता है, टैंशन में रहता है तो रिजर्व में रखी 3 और फूंक डालता है.

आरव चांदनी को इंप्रैस करने के लिए उस के साथ कपड़ों की ट्यूनिंग करना शुरू करता है. चांदनी को उस का ऐसे प्यार का इजहार करना पसंद आता है. दोनों में प्यार हो जाता है.

एक दिन पता चलता है कि चांदनी प्रैग्नैंट हो गई है. उम्र छोटी है तो दोनों बच्चा अबौर्ट कराने का फैसला करते हैं, मगर एकाएक अस्पताल में चांदनी की ममता जाग जाती है और वह अबौर्शन के लिए मना कर देती है. दोनों फैसला कर लेते हैं कि वे पढ़ाई के साथ बच्चा भी पाल लेंगे.

वे फैमिली को अपनी सिचुएशन बताते हैं मगर परिवार वाले दोनों को सपोर्ट नहीं करते. यहीं से असल जिंदगी की समस्याएं शुरू हो जाती हैं. अब उन के पास अपनी पढ़ाई, बच्ची की जिम्मेदारी, खर्चा चलाने और फिर कैरियर में आगे बढ़ने के चैलेंजेस खड़े हो जाते हैं.

कच्ची उम्र में बढ़ी ये जिम्मेदारियां वे हैंडल नहीं कर पाते और एक दिन गरमागरमी में आरव का हाथ चांदनी पर उठ जाता है. यहां से आरव के पछतावे और चांदनी के अलगाव का दौर शुरू होता है, लेकिन यह दौर इतना उबाऊ और रिपीटिटिव होता है कि कोफ्त होने लगती है.

हर सीन ऐसा लगता है जैसे उसे जरूरत से ज्यादा देर तक खींचा गया हो ताकि बैकग्राउंड में कोई सैड सौंग बज सके और कैमरा इन दोनों में से किसी के चेहरे पर 20 सैकंड तक रुक सके. हद यह कि थिएटर में बैठा जेनजी, जो आमतौर पर 3-4 घंटे की वैब सीरीज एक रात में खत्म कर देता है, वह यहां उबासियां लेते दिखता है.

फिल्म का हीरो ज्यादातर टाइम दुखी या रोती शक्ल बनाए घूमता है. उस की इंटैंस आंखें बोलती तो हैं पर बहुत ज्यादा दोहराव उस के असर को खत्म कर देता है. अनन्या पांडे कुछ जगह ठीक लगती है, उस के बचपन का ट्रैजिक पास्ट दिखाया गया है जिस चलते उस का स्ट्रौंग और बोल्ड डिसीजन लेने वाला इंडिपेंडैंट किरदार है.

फिल्म तकनीकी रूप से बहुत लंबी नहीं है, लेकिन इमोशनल सीन जबरदस्ती और उन्हें ज्यादा गहरा करने की कोशिश में निर्देशन फिल्म को उबाऊ बना देता है.

हालांकि, फिल्म में हैदराबाद जरूर खूबसूरत दिखता है. चौड़ी सड़कें, कालेज कैंपस, बारिश, कैफे आदि सबकुछ चमकता रहता है. फिल्म में संगीत कमजोर पक्ष है, यह कहानी को बचाने के बजाय उसे और भारी बना देता है. थीम सौंग ‘चांद मेरा दिल…’ हर कुछ देरी में बजता रहता है. ऐसा लगता है जैसे फिल्म जबरदस्ती महसूस करवाना चाहती है कि यह सीन बहुत दर्दनाक है. इस से फिल्म कमजोर पड़ती है.

‘चांद मेरा दिल…’ की सब से बड़ी विडंबना यह है कि इस में अच्छे विषय हैं, मौडर्न रिलेशनशिप की घुटन, जल्दी बड़े हो जाने का डर, पैरेंटहुड का प्रैशर, कैरियर, मगर इतने विषयों को निर्देशक समेटने में असमर्थ दिखाई पड़ा है. एक और बड़ी समस्या है कि फिल्म में साइड कैरेक्टर को बिलकुल स्पेस नहीं दिया है, जैसे आरव के दोस्त जो कि फनी कैरेक्टर हैं और माहौल को खुशनुमा बनाते हैं, उन्हें एकदो पंच मारने लायक जगह दी गई है.

इसके अलावा दोनों मुख्य किरदारों के परिवार वाले तो कैमियो जैसे लगे. फिल्म पूरी तरह से 2 किरदारों पर केंद्रित है. अगर साइड किरदारों को थोड़ा और स्पेस मिलता तो फिल्म दिलचस्प हो सकती थी. Romantic Film

 

 

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