Bengal Election 2026: बंगाल 2026 विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की शर्मनाक हार और भाजपा की भारी जीत को लोकतांत्रिक जनादेश कहना बिलकुल गलत है. यह संस्थागत लूट, खुली धांधली, अपर कास्ट मीडिया नैरेटिव, ईवीएम मैनीपुलेशन, वोटर लिस्ट हेराफेरी और ऐतिहासिक रूप से अपर कास्ट और अपर क्लास लौबी के गठजोड़ का एक काला और शर्मनाक अध्याय है. यह तानाशाही के जरिए चरम निर्लज्जतापूर्ण तरीके से लोकतंत्र की हत्या का ऐतिहासिक दोहराव है. बंगाल पर जीत असल में 1757 में हुई ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत जैसी ही है जब सिराजुद्दौला हारे थे.
यह बंगाल चुनाव जैसे रौबर्ट कलाइव ने 1757 में मुट्ठीभर सेना के साथ बंगाल को जीत लिया था वैसे अब चुनाव आयोग की सेना के साथ जीता गया. 1757 में नवाब सिराजुद्दौला की हार क्लाइव की सेना से नहीं बल्कि आंतरिक फूट और गद्दारी से हुई. मीर जाफर ने धोखा दिया. धनी, सेठ, अपर कास्ट, अपर क्लास बैंकर और व्यापारियों ने लौबी बना कर ब्रिटिश को पैसा, खुफिया जानकारी और पूरा राजनीतिक समर्थन दिया. सिराज की सत्ता को चुनौती देने वाली इस पूरी लौबी ने रौबर्ट कलाइव के बंगाल में घुसने का रास्ता साफ किया. न सिराजुद्दौला का राज कोई लोकप्रिय राज था न ममता का राज पूरी तरह लोकतांत्रिक था. लेकिन जीत के लिए जब छल, फरेब का इस्तेमाल किया जाय तो इसे जनादेश नहीं कह सकते. क्लाइव बंगाल की परेशान जनता को बचाने के लिए प्लासी नहीं आया था. उस का मकसद भी राज कर के समृद्ध बंगाल को लूटना ही था.
प्लासी: 1757 में सिराजुद्दौला की हार के पीछे असली गद्दार कौन थे
1757 की प्लासी की लड़ाई को सिर्फ उन के सिपहसालार मीर जाफर की गद्दारी बता दिया जाता है. पर हकीकत यह है कि सिराजुद्दौला के खिलाफ एक पूरा इकोसिस्टम खड़ा हो गया था. जिस में मीर जाफर के अलावा बंगाल के बड़े सेठसाहूकार और दरबार के कुछ ऊंची जाति व ऊंची हैसियत वाले लोग भी शामिल थे. असल में तो मीर जाफर सिराजुद्दौला का फूफा और बंगाल की सेना का बख्शी था. रौबर्ट क्लाइव ने उसे नवाब बनाने का लालच दिया जैसे ममता बनर्जी के सहयोगी सुवेंदु अधिकारी को दिया गया था. 23 जून, 1757 को प्लासी के मैदान में मीर जाफर के साथ 50,000 सैनिक खड़े थे लेकिन वे लड़े नहीं. सिर्फ 15,000 सैनिक सिराज के साथ लड़े, बाकी तमाशा देखते रहे. नतीजा यह हुआ कि 3,000 अंगरेजों ने 50,000 की फौज को हरा दिया. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि मीर जाफर ने कलाइव का साथ भी उस युद्ध में नहीं दिया पर सिराजुद्दौला की सेना को भगवाने में सहयोग दिया.
बंगाल के ब्राह्मण, कायस्थ, बनिया और जगत सेठ उस लड़ाई में रौबर्ट क्लाइव के साथ थे. जगत सेठ, महताब राय और स्वरूप चंद के अलावा मारवाड़ी और कुछ जैन परिवार उस दौर में बंगाल के सब से बड़े बैंकर थे. सिराज ने गद्दी पर बैठते ही इन से 3 करोड़ रुपए नजराना मांगा. उस वक़्त के कुछ सेठ अंगरेजों को ब्याज पर कर्ज देते थे. यह सेठों की कमाई का बड़ा जरिया था. सिराजुद्दौला ने इस पर रोक लगा दी जिस से व्यापारी और सेठों को भारी नुकसान होने लगा.
उमीचंद ने क्लाइव और मीर जाफर के बीच दलाली की. राय दुर्लभ कायस्थ था जो सिराज का खजांची तो था ही, साथ ही, मीर जाफर का रिश्तेदार भी था. प्लासी में सिराजुद्दौला के पक्ष में सेना ले कर खड़ा रहा पर लड़ा नहीं. मानिकचंद कायस्थ, कलकत्ता का फौजदार था. 1756 में अंगरेजों से रिश्वत ले कर कलकत्ता छोड़ कर भाग गया. कृष्ण बल्लभ ब्राह्मण, जो ढाका के नायब राजा राज बल्लभ का बेटा था, को सिराज ने कैद किया तो वह परिवार अंगरेजों से मिल गया. सिराज 22 साल की उम्र में नवाब बना था. वह गुस्सैल, जिद्दी और तजरबेहीन था. गद्दी पर बैठते ही उस ने पुराने अमीरों, सेठों, दरबारियों को नाराज कर दिया. अंगरेजों ने इसी नाराजगी का फायदा उठाते हुए सेठों व ताकतवर लोगों को अपने पक्ष में मिला लिया.
ममता बनर्जी के पास राजनीति का तजरबा तो था लेकिन वे बेहद गुस्सैल, जिद्दी और दंभी हैं. उन्होंने कांग्रेस और मार्क्सवादी पार्टी से बना कर नहीं रखी, ठीक सिराजुद्दौला की तरह.
अंगरेज, बंगाली बनियों के सूद के पैसों पर व्यापार करते थे. सेठों का सारा कारोबार अंगरेजों से लेनदेन पर चलता था. अंगरेज सिराजुद्दौला को टैक्स न दे कर सेठों के सूद की भरपाई कर लेते थे. सिराज ने अंगरेजों पर टैक्स लगाया तो इस से अंगरेजों के साथ बंगाली बनियों का भी नुकसान हुआ. जगत सेठ का माल अंगरेजों के जहाज से चीन और यूरोप तक जाता था. कई बार जगत सेठ का सामान बंगाल की सीमा में ही लूट लिया जाता और सरकार की ओर से कोई सुरक्षा न मिलती थी. सरकार की सख़्ती बढ़ी तो अंगरेज और बनिए सिराज के खिलाफ हो गए. अंगरेजों से मीर जाफर को नवाबी, राय दुर्लभ को दीवानी और जगत सेठ को लूट से सुरक्षा का वादा मिला. सिराज ने अलीवर्दी खान के पुराने वफादारों को हटा कर अपने लोगों को सत्ता में फिट कर दिया. इस से हिंदूमुसलिम दोनों नाराज हो गए.
ममता बनर्जी के साथ जो मारवाड़ी समाज कम्यूनिस्टों के शासन के समय से जुड़ा था 2016 के आतेआते वह ममता से नाराज हो गया और भाजपा के लिए काम करने लगा.
सिराजुद्दौला को धोखा देने वालों में मीर जाफर मुसलिम था, जगत सेठ जैन, राय दुर्लभ कायस्थ, उमीचंद सिख था तो सिराजुद्दौला के साथ मोहन लाल कायस्थ, मीर मदन और नौवे सिंह हजारी जैसे लोग थे. मीर मदन प्लासी में लड़ते हुए मारा गया. इस से यह साबित होता है कि प्लासी की लड़ाई अपर कास्ट बनाम नवाब नहीं थी बल्कि पुराना एलीट बनाम नया नवाब थी. मीर जाफर के साथ मिल कर जगत सेठ, राय दुर्लभ, उमीचंद जैसी अपर क्लास लौबी ने सिराज को धोखा दिया. असल में तो यह अपर कास्ट की साजिश से ज्यादा अपर क्लास के मुनाफे का मामला था.
क्लाइव के पास 3,000 सिपाही थे. सिराज के पास 65,000 की फ़ौज थी. इन में जीता वो जिस ने दुश्मन को खरीद लिया. जगत सेठ की कोठी उस वक्त बैंक औफ इंगलैंड से बड़ी थी. जिस के पास पैसा, सत्ता उस की. नौजवान शासक सिराज ने अंगरेज, सेठ, फौज और रिश्तेदार इन सब को एकसाथ नाराज किया जिस का नतीजा यह हुआ कि वह बुरी तरह हार गया. सिराजुद्दौला के इतिहास से यह बात साफ हो जाती है की पौलिटिक्स में सब को दुश्मन नहीं बनाया जा सकता.
सिराजुद्दौला की लोकल बौडी मशीनरी की सीधी लड़ाई अच्छेखासे पढेलिखे, बातों में माहिर भारतीयों की नब्ज पहचानने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी की मशीनरी, सेठों के धन, गद्दारों की फ़ौज और अपने सगे रिश्तेदारों की गुटबंदी से थी. इस लड़ाई में अपर कास्ट नैटवर्क, गद्दारों और अंगरेजों का घिनौना गठजोड़ साफ नजर आया. सबकुछ पहले से प्लान किया गया था. मीर जाफर ने सिराजुद्दौला के साथ गद्दार की भूमिका बड़ी बेशर्मी के साथ निभाई.
इतिहास रिपीट नहीं करता, राइम करता है
यह सच है कि इतिहास रिपीट नहीं होता लेकिन राइम जरूर करता है. 1757 की प्लासी और 2026 की बंगाल पौलिटिक्स में राइमिंग बिलकुल एकजैसी है. दोनों लड़ाइयों में एलीट, अपर कास्ट और कुछ अंदर के लोगों की मज़बूरी, लालच या गद्दारी एकजैसी रही. 1757 में बंगाल के एलीट पाला बदल चुके थे. जगत सेठ, राय दुर्लभ, उमीचंद सिराज से नाराज थे, इसलिए कलाइव के खेमे में जा मिले तो 2026 में टीएमसी के पुराने नेता शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रौय, अर्जुन सिंह समेत 7 सांसद और लगभग 35 विधायक मोदी और शाह के खेमे में चले गए थे.
1757 की प्लासी की जंग में सेठों को लगा कि अंगरेजों से व्यापार करना आसान होगा और 2026 चुनाव में मारवाड़ी-गुजराती कारोबारी लौबी को लगा कि भाजपा राज में ममता का सिंडिकेट टैक्स खत्म होगा और केंद्र की स्कीम का फायदा मिलेगा.
क्लाइव ने मीर जाफर को नवाब बनाने का लालच दे कर अपने साथ मिलाया तो आरएसएस ने ईडी, सीबीआई और गवर्नर के जरिए शिक्षक भरती, कोयला, पशु तस्करी घोटालों का डर दिखा कर टीएमसी नेताओं को अपने पाले में किया. सिराज को जालिम, जिद्दी नौजवान बताया गया तो ममता के खिलाफ तानाशाह, भाइ भतीजावाद, तुष्टिकरण का नैरेटिव चलाया गया. दोनों ओर कोई विचारधारा नहीं, सिर्फ गद्दी की लड़ाई रही. प्लासी की लड़ाई बाहरी अंगरेज बनाम बंगाली मुसलिम सिराज की थी. बंगाली सिराज हार गया और बाहरी अंगरेज जीत गए. 2026 की लड़ाई बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी नागपुर वाली पार्टी की रही. ममता खुद को बंगाल की बेटी और बीजेपी को बाहरी पार्टी कहती रहीं और उन के साथ ही खेला हो गया.
नवाब के पास पैसा और सेना दोनों थी, फिर भी हार गया. टीएमसी के पास पैसा और कैडर दोनों था, फिर भी हार गई. अंगरेज के पास बंदूक और तोपों की ताकत थी तो बीजेपी के पास ईवीएम, आरएसएस और चुनाव आयोग की शक्ति थी.
बंगाल में 6 प्रतिशत ब्राह्मण और 6 प्रतिशत कायस्थ हैं और ये भाजपा के कोर वोटर हैं. 2019 लोकसभा में 57 फीसदी अपर कास्ट ने भाजपा को वोट दिया और तब टीएमसी के साथ 38 फीसदी अपर कास्ट था लेकिन 2026 में यह समीकरण पूरी तरह बदल गया. इस चुनाव में अपर कास्ट पूरी तरह बीजेपी के साथ हो गया. वहीं अपर क्लास की बात करें तो कोलकाता के बड़े बिजनैसमैन, चाय बागान मालिक, जूट मिल मालिक नोटबंदी और जीएसटी के बाद से बीजेपी से नाराज थे लेकिन हवा बदलती हुई देख बीजेपी के साथ हो लिए.
प्लासी में जनता सो रही थी, एलीट बिक गया. 2026 में भी जनता सो रही थी मीडिया और ईवीएम ने मिल कर खेला कर दिया. 2026 में ममता की हार में मौडर्न क्लाइव मौडल और भी क्रूर और भी संगठित रूप में काम कर रहा था. ममता की लोकल बौडी मशीनरी की सीधी लड़ाई भाजपा-आरएसएस की मशीनरी, प्रोपगैंडा मीडिया, ईडी-सीबीआई और चुनाव आयोग से थी. इस लड़ाई में अपर कास्ट नैटवर्क का प्रशासन, न्यायपालिका, मीडिया और कौर्पोरेट फंडिंग में घिनौना गठजोड़ साफ नजर आया. औब्जरवर्स की मिलीभगत थी, वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर नाम काट दिए गए, सुप्रीम कोर्ट से ले कर सुरक्षाबलों तक अपनी निष्पक्षता नहीं दिखा पाए. जैसे सबकुछ पहले से प्लान किया गया था. चुनाव आयोग ने तो भाजपा के एक्सटैंशन और रबड़ स्टैंप की भूमिका बड़ी बेशर्मी के साथ निभाई.
इतिहास से सबक लेना क्यों जरूरी है
मराठा साम्राज्य का पतन आंतरिक कलह, पेशवाओं की कमजोरियों और सरदारों के लालच के कारण हुआ. पेशवा काल में ब्राह्मण वर्चस्व ने मराठा सरदारों में दरार पैदा की जिस का ब्रिटिशों ने पूरा फायदा उठाया. उन्होंने प्लासी के युद्ध की घटनाओं के बारे में सुना भी नहीं होगा क्योंकि तब इतिहासकार कहां थे जो बताते. प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को अपनों ने धोखा दिया जिस से उस का पतन हो गया. यह पैटर्न आज भी बिलकुल वैसा ही है. प्लासी में जगत सेठ जैसे अपर क्लास बैंकरों ने विदेशी का साथ दिया और मराठाओं के पतन में ब्राह्मण व्यवस्था ने सामाजिक एकता को चूर किया. ममता बनर्जी ने वक्त रहते न कांग्रेस से सहयोग मांगा न मार्क्सवादी कम्यूनिस्टों से.
भाजपा सरकार विदेशी सरकार नहीं है. विशुद्ध देशी है. उस की क्लाइव से तुलना इसलिए की जा सकती है कि जो तरीके क्लाइव ने 1757 में अपनाए थे वे बारबार दोहराए गए थे और आज भी दोहराए जा रहे हैं. क्लाइव की जीत का देश को नुकसान हुआ. भाजपा की जीत एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है चाहे वह प्रक्रिया खराब ही हो.
हां, ब्रिटिश काल हो, सिराजुद्दौला काल हो या आज का हिंदुत्व काल, सत्ता परिवर्तन में अपर कास्ट और अपर क्लास नैटवर्क हमेशा से नए शासक के साथ ही खड़े होते रहे हैं. अपना वर्चस्व और लूट बचाने की खातिर यह उन की मजबूरी और जरूरत दोनों है.
कोई भी सत्ता सिर्फ बाहर वाले से नहीं हारती बल्कि अपनी गलतियों और अपने लोगों के डर, लालच व नाराजगी की वजह से भी हारती है. जब अंदर के सेठसाहूकार, अफसर और नेता बिक जाएं तो प्लासी दोहराई जाती है. 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी थी, आज आरएसएस की ईस्टवेस्ट इंडिया कंपनी है. नाम बदलते हैं, खेल वही रहता है.
कांग्रेस यह चैलेंज कई दशकों से सह रही है लेकिन सीख नहीं रही. भाजपा ने क्लाइव की नीति को सीखा और अपनाया ही नहीं बल्कि पूरी तरह लागू भी किया. जनता को इस का लाभ मिला है या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि आप खुद क्या हैं. आप भाजपा समर्थक हैं तो आप के अच्छे दिन हैं. वहीं, आप भाजपा से नाराज हैं तो आप काकरोच जैसे हैं जो जिंदा तो रहता है पर किसी का कुछ बिगाड़ नहीं पाता. Bengal Election 2026





