Hindi stories: राजीव और सोनल अभी 32 और 30 वर्ष के थे. उम्र कम थी, पर अनुभव अधिक. बड़ी छोटी सी उम्र से अपने पैरों पर खड़े होने का खयाल उन के मन में घर कर गया था. दोनों ने 21 वर्ष की आयु से कमाना शुरू कर दिया था. दोनों के ही मन में यह खयाल उन के नजदीक आने की वजह बना. पढ़ाई के साथ पार्टटाइम काम, फिर नौकरी मिलने के बाद दोनों ही विवाह के बंधन में बंध गए. नौकरी में प्रमोशन मिला और फिर शहर बदला. उन का जीवन मानो एक अंतहीन दौड़ था. अब जीवन एक पड़ाव पर आया था.
वे सूरत जैसे व्यस्त महानगर में स्थापित थे. राजीव एक निजी कंपनी में प्रोजैक्ट मैनेजर था और सोनल एक वित्तीय संस्था में वरिष्ठ पद पर कार्यरत. दोनों की दिनचर्या इतनी व्यस्त थी कि सप्ताह का अंतर भी कभीकभी कैलेंडर देख कर समझ आता.
बच्चों के विषय में अकसर लोग पूछते-
‘अब तो सोचिए.’
वे मुसकरा देते.
सच यह था कि उन्होंने अभी बच्चे न करने का निर्णय लिया था. उन्हें लगता था, यदि बच्चों को जीवन में समय ही न दे पाएं तो केवल आर्थिक सुविधा का क्या अर्थ?
इन्हीं वर्षों की अथक मेहनत और अनुशासन ने उन्हें 2 फ्लैटों का मालिक बना दिया था. एक में वे स्वयं रहते थे, दूसरा निवेश के रूप में लिया था. दोनों फ्लैट एक ही मकान में थे.
राजीव अकसर कहता-
‘हम ने बहुत किराए के घर देख लिए. अब कम से कम स्थिरता तो हो.’
वह अपने बचपन को भूला नहीं था. पिता की सीमित आय, बारबार घर बदलना, मां की चिंता और पिता का वही एक सूट जो हर शादी में पहना जाता था.
‘अभी तो कई साल और चल जाएगा.’
पिता का वह वाक्य उस के भीतर कहीं स्थायी हो गया था. जब बिल्डिंग के दूसरे फ्लैट को किराए पर देने की बात आई तो कई विकल्प थे. अच्छे पैकेज वाले दंपती, छोटा परिवार, समय पर किराया – सब सुविधाजनक विकल्प. पर आखिरकार उस ने मिस्टर गुप्ता को चुना.
गुप्ताजी एक निजी दफ्तर में क्लर्क थे. आय सीमित थी. परिवार बड़ा- पत्नी,
2 बच्चे और वृद्ध मां. साधन कम थे, पर व्यवहार में गरिमा थी.
सोनल ने हलका सा विरोध किया-
‘‘राजीव, हमें स्थिर किराएदार चाहिए. तुम जानते हो, हमारी ईएमआई अभी भी चल रही है.’’
राजीव ने शांत स्वर में कहा-
‘‘जानता हूं पर हर निर्णय सिर्फ गणित से नहीं लिया जाता.’’
कुछ ही दिनों में गुप्ता परिवार उन के मकान में शिफ्ट हो गया.
समय अपनी गति से चलता रहा. किराया कभीकभी कुछ दिन देर से आता, पर आ जाता. एक शाम अचानक सोनल औफिस से लौटते हुए सीढि़यों पर फिसल गई. टखने में हलकी मोच आ गई. राजीव उस दिन बाहर शहर गया हुआ था. दरवाजे की आहट सुनते ही गुप्ताजी की पत्नी दौड़ी चली आईं. उन्होंने सोनल को सहारा दिया, बर्फ लगाई, बच्चों को दवा लाने भेजा. वृद्ध मां ने अपने पुराने घरेलू नुस्खे बताए.
रात को जब राजीव लौटा तो देखा, सोनल के लिए खिचड़ी बना कर रखी गई थी. सोनल ने सारी बात राजीव को बताई. यह भी बताया कि जब उस ने खिचड़ी के लिए धन्यवाद कहा तो और बोली थी कि अरे, इस की क्या जरूरत थी?
गुप्ताजी मुसकराए, ‘‘पड़ोसी हैं, इतना तो बनता है.’’
कुछ महीनों बाद राजीव की कंपनी में अचानक प्रोजैक्ट संकट आ गया. उसे लगातार 3 रातें औफिस में रुकना पड़ा.
उन दिनों गुप्ताजी रोज सुबह उन के दरवाजे के बाहर दूध का पैकेट रख जाते. एक दिन सोनल ने पूछा, ‘‘क्यों कष्ट कर रहे हैं, आप?’’
वे बोले, ‘‘भाभीजी, हम तो नीचे ही जाते हैं. 2 पैकेट उठाने में क्या फर्क पड़ता है?’’
छोटीछोटी बातें थीं. पर उन दिनों सोनल ने पहली बार महसूस किया कि सुविधा और सहयोग अलग चीजें हैं. एक वर्ष पूरा होने पर सोनल ने सहज स्वर में कहा, ‘‘सुनो, इस बार रैंट एग्रीमैंट रिन्यू न करें. मेरी कंपनी में नए अकाउंटैंट आए हैं मिस्टर बत्रा. पतिपत्नी 2 ही हैं. व्यवस्थित रहेंगे.’’ राजीव का चेहरा बदल गया.
‘‘तुम्हें क्या दिक्कत है?’’
‘‘दिक्कत नहीं है,’’ सोनल ने शांत पर दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘पर हमें व्यावहारिक भी होना चाहिए.’’
राजीव की आवाज भर्रा गई, ‘‘हर चीज में व्यावहारिक होना जरूरी है क्या?’’
कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद सोनल ने सीधे पूछा, ‘‘तुम्हारी यह सहानुभूति क्यों है? गुप्ताजी तुम्हारे लगते क्या हैं?’’
लंबा मौन.
फिर बहुत धीमी आवाज, ‘‘कुछ नहीं लगते लेकिन जब उन्हें देखता हूं, मु?ो अपना बचपन दिखता है. मु?ो मेरे पिता दिखाई देते हैं.’’
वह बाहर चला गया. उस रात सोनल बहुत देर तक जागती रही. उसे याद आया, मोच वाली रात, दूध के पैकेट, खिचड़ी और वृद्ध मां की चिंता. उस दिन के बाद सोनल ने रैंट का विषय नहीं उठाया. पर भीतर कुछ बदल गया था. उसे पहली बार समझ आया कि राजीव केवल एक फ्लैट किराए पर नहीं दे रहा था, वह अपने पिता के संघर्ष को सम्मान दे रहा था.
कुछ दिनों बाद औफिस से लौटते समय सोनल ने देखा, गुप्ताजी की वृद्ध मां सीढि़यां चढ़ते हुए हांफ रही थीं. वह तुरंत आगे बढ़ी, उन का हाथ थामा और धीरेधीरे ऊपर तक छोड़ आई. दरवाजे तक पहुंचतेपहुंचते वृद्धा ने कहा, ‘‘बेटी, हमेशा खुश रहो.’’
उस रात सोनल देर तक सोचती रही. उस ने महसूस किया कि वे दोनों दिनरात कमाते रहे, भविष्य सुरक्षित करते रहे, निवेश बढ़ाते रहे. पर जीवन की गर्माहट तो इन्हीं छोटे स्पर्शों में थी. अब जब भी किराया कुछ दिन देर से आता, वह हिसाब की कौपी बंद कर देती. अब गुप्ताजी खुद ही जब किराया कभी लेट होता तो संकोच से बोलते, ‘‘2 दिन की देर हो गई, माफ कीजिए.’’
तो सोनल सहज मुसकान के साथ कहती, ‘‘कोई बात नहीं.’’
अब वह समझ चुकी थी कि समृद्धि केवल बैंक बैलेंस में नहीं होती. कभीकभी वह मनुष्यता में भी जमा होती है. बालकनी से नीचे देखते हुए वह अकसर सोचती- उन के पास पैसा अधिक है, समय कम. गुप्ताजी के पास पैसा कम है, पर रिश्तों के लिए समय है. शायद इसी संतुलन का नाम जीवन है.
उस फ्लैट में अब केवल किराएदार नहीं रहते थे. वहां सहयोग, स्मृति और मानवीय गरिमा साथ रहती थीं. और राजीव के भीतर पिता की अधूरी तपस्या को एक शांत सम्मान मिल गया था. Hindi stories





