Emotional Stories: अमन ने एक झटके से टीवी को रिमोट से बंद किया और रिमोट को टेबल पर पटक दिया. कुछ गिरने से अंदर वाले कमरे में सोई आराधना की नींद अचानक खुल गई. उस ने जल्दी से अपने पास पड़े मोबाइल में टाइम देखा. अढ़ाई बजने को थे. उस ने लाइट जलाई और उठ कर बाहर वाले कमरे में आ गई.

अमन सोफे पर हाथों से सिर को पकड़े बैठा था. आराधना उस के पास आ  कर बैठी और धीरे से उस की पीठ सहलाने लगी. उस दिन 20 अप्रैल के अखबार में प्रकाशित एक फैनीवाले की खबर पढ़ी थी कि उस ने पहलगाम की उस घटना को कैसे ?ोला था.

‘‘क्या हुआ, आज फिर नींद नहीं आ रही क्या?’’ उस ने बहुत ही प्यार से पूछा.

‘‘मम्मी, ये सब क्या हो रहा है, क्या ऐसी यादें बनाने गए थे हम पहलगाम, क्या सोचा था और क्या हुआ है

यह सब?’’

‘‘पहले से तो बेटा कुछ भी पता नहीं होता, अगर ऐसा होता तब तो समूचे संसार से दुर्घटना शब्द ही गायब होता.’’

‘‘पर मम्मी, जो उस अनहोनी और अमानवीय घटना के पात्र बने हैं, अभी डेढ़ माह भी नहीं बीते, इन के प्रति तो जैसे समाज की नजरें ही बदल गई हैं. लोग यह देख रहे हैं कि कैसे अपने पति को खोने पर यह औरत अभी तक जिंदा लाश में क्यों नहीं बदल गई, इस ने लिपस्टिक क्यों लगाई है और क्यों ये पत्नियां ऐसा कह रही हैं कि हम इस का बदला तो जरूर चाहते हैं पर साथ ही, हम यह भी चाहते हैं कि किसी एक विशेष समुदाय से नफरत न की जाए, इन्हीं बातों से लोगों ने उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया है.

‘‘अलगअलग इलाकों के नेतागण लंबे से लावलश्कर और मीडिया के साथ दुर्घटनाग्रस्त परिवारों में जा रहे हैं जहां उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करनी है, परिवार के सदस्यों का दुख बांटना है जो कि है तो असंभव ही पर वहां भी वे अपनी तसवीरें खिंचवाने में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और मीडिया न्यूज चैनलों पर तो नफरत फैलाने वाले कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई है, हिंदूमुसलिम के अलावा कोई और विषय ही नहीं बचा जैसे चर्चा के लिए.

‘‘कल जब मैं सुमित के साथ आ रहा था तब देखा कि कैसे एक कालीन बेचते मुसलिम समुदाय के एक आदमी को कुछ लड़कों का दल घेरे खड़ा था और उसे धमका रहा था कि आज के बाद यदि वह उन के इलाके में नजर आया तो वहां से हाथपैर तुड़वा के ही जाएगा. तब सुमित ने बताया कि उस की तरफ भी इस तरह की बातें हो रही हैं. लोग मुसलिम डिलीवरी बौय के हाथों से खाना भी नहीं ले रहे हैं, मजदूरों से उन का नाम पूछ कर उन्हें काम से हटाया जा रहा है, मैं आप से पूछता हूं मम्मी कि क्या इस सब से माहौल कुछ सुधरेगा या और बदतर होगा?’’

‘‘मैं मानती हूं कि धर्मों में नफरत और हिंसा का पाठ भी पढ़ाया जाता है पर यदि इतिहास को देखा जाए तो पिछले कई आतंकवादी हमले इसलामिक गुटों की तरफ से ही हुए हैं. पहलगाम में तो धर्म पूछ कर जान लेना नीचता, कायरता और बर्बरता की जीतीजागती कड़वी सच्चाई है, जिस के बदले में माहौल पहले से कहीं ज्यादा बदतर हो चुका है और ऐक्शन के बदले ये रिऐक्शन हो रहा है. पर अमन, यह कोई भी तरीका नहीं है हालात को बदलने का, इस से तो इंसानों के अंदर नफरत, द्वेष, घृणा, डर और अविश्वास की उत्पत्ति ही होगी. खून के दाग खून से साफ नहीं किए जाते, बेटे. दोतरफा नफरत से तो समाज में कभी भी शांति का संदेश नहीं दिया जा सकता.’’

‘‘कभी बड़े नेताओं और अभिनेताओं को इस तरह के हालात का सामना नहीं करना पड़ता क्या?’’ अमन के स्वर में निराशा और खीझ का समावेश था.

‘‘निर्दोष लोगों को निशाना बनाना आतंकियों के लिए सब से आसान होता है क्योंकि ये बड़े लोगों की तरह सुरक्षा घेरे में घिरे नहीं होते. तुम मान सकते हो कि धर्म हो या राजनीति की चालाक नीतियां या फिर हो आतंकवाद का घिनौना कांड दरअसल पिसता, कुचलता और जान गंवाता आम और निर्दोष आदमी ही है.’’

यह बात सुन कर अमन ने एक गहरी चुप्पी के साथ अपनी मां की ओर देखा तो आराधना भी एक ठंडी सांस ले कर उठ खड़ी हुई और अमन को लगभग खींच कर उस ने उठाया.

‘‘अच्छा, टाइम तो देख क्या बज रहा है, कुछ घंटे की नींद तो ले ले, फिर कल तु?ो एक्स्ट्रा क्लास के लिए जल्दी भी तो निकलना है. चल, जा अब अपने कमरे में,’’ आराधना अमन को उस के कमरे की ओर धकेलते हुए सी बोली.

थोड़ी जद्दोजेहद के बाद अमन तो सो गया पर अब आराधना की नींद उड़ चुकी थी. पिछले महीने अमन अपने 2 दोस्तों के साथ पहलगाम घूमने गया था. समयसमय पर वह आराधना को मोबाइल से कौल करता रहता था पर 22 अप्रैल को सुबह से अमन की कोई कौल नहीं आई. सो, आराधना चिंताग्रस्त हो उठी. वह अनगिनत कौल मिला चुकी थी पर अमन के मोबाइल पर रिंग ही नहीं जा रही थी. थकहार कर वह सोफे पर बैठी ही थी कि अमन की कौल आ गई.

‘कब से फोन मिला रही हूं, कहां था तू?’ आराधना तो गुस्से से भरी हुई थी.

‘अरेअरे, यह क्या मम्मी, आज अपनी फेवरेट हरीमिर्च की सब्जी खाई है क्या?’ अमन मम्मी को चिढ़ाता हुआ सा बोला.

‘मेरी छोड़, अपनी बता, ठीक तो है न?’

‘बिलकुल ठीक हूं मैं, मम्मी. और सुनो, आज हम तीनों बैसरन घाटी जा रहे हैं, आप को पता है न, वह ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ है. कल वापस आप के पास आ जाएंगे.’

‘अच्छा, खूब एंजौय…’ तभी उस तरफ से कनैक्शन जैसे कट गया हो. वहां के नैटवर्क की जानकारी थी आराधना को, सो, इधर उस ने भी अपना मोबाइल साइड में रखा और घर के कामों में व्यस्त हो गई.

अपने पति अर्णव की असमय मृत्यु के बाद अमन ही उस के जीने का एकमात्र सहारा था. तब 7 साल का था अमन और आज 19 वर्ष के युवा में बदल चुका था. यों तो गरमी की छुट्टियों में उस का पहलगाम जाने का इरादा था पर उस के एक दोस्त जफर के मामा, जो पहलगाम में रहते थे, की मंगनी अप्रैल में होनी तय हुई तो अमन सुमित के साथ 6 दिनों के सफर पर अभी ही चला गया था. अब कल वह वापस भी आ रहा है. कल कुछ खास बनाऊंगी उस के लिए, यही सब सोचते हुए वह चाय के कप के साथ ड्राइंगरूम में चली आई और टीवी औन कर के सोफे पर बैठ गई.

चैनल बदलते हुए जैसे ही न्यूज चैनल पर रुकी तो जैसे उस की सांसें थम गईं. वहां सिर्फ ‘ब्रेकिंग न्यूज’ नहीं चल रही थी बल्कि मानवता को शर्मसार करने वाली खबर आ रही थी.

‘पहलगाम की बैसरन घाटी में आतंकी हमला’

‘अब तक 26 लोगों के मारे जाने की खबर’

‘हिंदू पूछ कर मारा गया’

‘कपड़े उतरवा कर जांचा और फिर गोलियों से भूना’

एक और नरसंहार और उस का इकलौता बेटा वहां था. वह पूरी ताकत से चीख उठी थी. काबू नहीं रहा था उस के अपने दिलोदिमाग पर, बेसुध हो कर नीचे गिर पड़ी थी.

कुछ ही देर में वह पास के हौस्पिटल में थी.

वह अंदर आईसीयू में थी, ब्लडप्रैशर बहुत हाई हो गया था. बाहर आराधना की पड़ोसिन सुजाता आराधना की बहन सुधा के साथ बैठी थी. सुजाता सुधा को बता रही थी, ‘जैसे ही आराधना की चीख सुनी मैं ने, मैं भागी आई लेकिन दरवाजा तो अंदर से बंद था. मैं ने फौरन ही पवनजी को दुकान से बुलाया, फिर बड़ी मुश्किल से छत से हम घर में घुसे, देखा, आराधना बेहोश पड़ी थी. पलंग पर लिटाते ही जैसे होश में आई वैसे ही अमन को पुकारने लगी. अगले ही पल फिर बेहोश हो गई. ऐसा लगता था जैसे वह होशोहवास खो चुकी थी. पवनजी तुरंत ही हौस्पिटल ले आए. मेरे फोन लगाते ही आप आ गईं, बताइए आप कि अमन जिन दोस्तों के साथ गया हुआ है उन से बात हुई आप की क्या, मेरे पास तो बस अमन का ही नंबर है, सो कब से उसे ही मिलाए जा रही हूं.’

‘सुजाताजी, उस के दोस्तों के नंबर तो मेरे पास भी नहीं हैं, कुछ सम?ा नहीं आ रहा कि दीदी अभी होश में आ जाएंगी तो उन्हें क्या जवाब दूंगी, रजत भी दौरे पर थे पर खबर देखते ही वापसी को निकल चुके हैं, कुछ ही देर में पहुंचते होंगे.’

‘सुधा, यह मैं आराधना का मोबाइल उठा लाई थी, ये लो और ये घर की चाबियां, मैं जरा अपने घर का चक्कर लगा आऊं, नीता घर पर अकेली है.’

सुजाता चली गई तो सुधा ने एक नजर आराधना के मोबाइल पर डाली. मोबाइल औफ था. वह एक कोने की सीट पर बैठ गई और मोबाइल को चार्जिंग पौइंट पर लगा दिया. आधे घंटे बाद उस ने मोबाइल देखा तो उस पर किसी अनजान नंबर से कई मिस्ड कौल्स थीं. उस ने उसी नंबर पर कौलबैक की तो छहसात प्रयास के बाद दूसरी तरफ घंटी गई.

‘हैलो, जी इस नंबर पर आप के नंबर से बहुत सारी कौल्स हैं, जान सकती हूं यह किस का नंबर है?’

‘हैलो, हां जी, मैं जफर का मामू पहलगाम से, यह अमन की मम्मी का नंबर है न? आप ही हैं अमन की मम्मी?’

‘जी, मैं उस की मौसी हूं, कैसा है मेरा अमन, वह ठीक तो है न, उसे कुछ हुआ तो नहीं न’ सुधा को कुछ खयाल नहीं रहा कि वह कहां है, किन लोगों के बीच है, डर और बेचैनी से उस के शारीरिक हावभाव भी अजीब से हो रहे थे और आवाज भी लड़खड़ा रही थी.

‘देखिए, आप डरिए मत, अमन, सुमित और जफर ठीक हैं, मेरे घर पर ही हैं तीनों, जल्द ही तीनों बच्चों को मैं खुद छोड़ने आऊंगा,’ आदिल ने संयमता से कहा.

‘अमन कहां है, मेरी उस से बात करवा दीजिए,’ सुधा के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

‘हैलो मौसी, मैं ठीक हूं, मौसी. मम्मी कहां हैं, मेरी बात करवाइए न उन से?’ अमन घबराया हुआ था.

‘बेटे, मम्मी ठीक हैं, न्यूज देख कर काफी डर गई थीं तो ब्लडप्रैशर कुछ ऊपरनीचे हो गया. मैं उन्हें डाक्टर के पास ले आई थी. बस, कुछ ही देर में बात करवाती हूं,’ सुधा आराधना की पूरी तबीयत बताना नहीं चाहती थी.

‘आ जा बेटा, तू जल्दी घर आ जा,’ सुधा अभी बोल ही रही थी कि फोन डिस्कनैक्ट हो गया.

सुधा बारबार फिर कौलबैक लगाने लगी पर फिर फोन मिला ही नहीं. थोड़ी देर बाद रजत भी हौस्पिटल पहुंच गए. सुधा ने उन्हें पूरी बात बताई. तभी डाक्टर राउंड पर से बाहर आए तो सुधा और रजत डाक्टर से बात करने लगे. अब आराधना की तबीयत पहले से कुछ बेहतर थी. ऐसी ही अवस्था में एक दिन गुजरा. सुधा और रजत दोनों ही बारबार आदिल को फोन मिला रहे थे पर फोन मिल ही नहीं रहा था और अमन का मोबाइल बंद था. आराधना भी होश में आ चुकी थी. उसे रूम में शिफ्ट कर दिया गया था.

सुधा ने उसे अमन के बारे में सब बता दिया था पर वह मां थी, उस की अपने बेटे को देखने की तड़प चरम पर थी. उस वक्त अमन को अपने सामने देखने के लिए वह जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी. अगले दिन दवाओं की वजह से उस की आंखें मूंदी ही थीं कि उसे अमन की आवाज सुनाई दी. वह ?ाटके से उठ बैठी.

हां, यह सपना नहीं था. अमन सच में उस के सामने था. उस के माथे पर पट्टी थी पर वह  मुसकराता आराधना के सामने था. न जाने कितनी देर तक दोनों एकदूजे के गले लग कर रोते रहे. कुछ देर बाद आराधना ने अमन के माथे की पट्टी के बारे में पूछा तो अमन के चेहरे पर भय, घबराहट और बेबसी के मिलेजुले भाव जागृत हो उठे.

काफी देर तक वह कुछ न बोला.

उसे ऐसा लग रहा था जैसे चारों तरफ जानलेवा धुआं छा गया हो. वह खुद को राक्षसों के बीच पा रहा था जो जोरजोर से अट्टहास कर रहे थे. उन के हाथों में तलवारों और भालों के रूप में बड़ीबड़ी बंदूकें थीं. उन्हें देख कर मानवजीवन अपनी सांसों की डोर को बचाए रखने के लिए तितरबितर होने लगे पर सफल नहीं हो पा रहे थे कि तभी बिजली गरजने की आवाज के समान गोलियां बरसने लगीं.

चीखपुकार से वादी थर्रा उठी. जिस दिशा में जिसे रास्ता दिखा वह अपनों संग उधर ही दौड़ा. आदिल ने भी तीनों लड़कों संग पेड़ों के बीच बनी संकरी सी राह देखी और उसी पर भागा. न जाने कौन सी सोच ने अमन को जैसे जकड़ लिया कि उस ने एक बार पीछे मुड़ कर देखा. जिस घाटी में अभी तक मासूम लोगों की हंसी गूंज रही थी वहां अब मौत का तांडव हो रहा था. खूनी बारिश हो रही हो जैसे सारी जमीन रक्तरंजित हो उठी थी और सामने खड़े दानव अभी भी दहाड़ रहे थे, आंखों से चिनगारियां उगल रहे थे.

अमन से और न देखा गया, उस की चेतना लुप्त हो रही थी, वह गिर पड़ा और माथा नीचे पड़े पत्थरों से टकरा गया. खून का फौआरा फूट पड़ा था और आंखें पूरी तरह से मूंदतेमूंदते भी उस ने खुद को ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ नहीं, ‘मौत की घाटी’ में पाया था.

आंख खुलने पर आदिल के घर पर उस ने खुद को पाया था. उस पल से वह आराधना के पास जाने के लिए जैसे अंगारों पर लोट रहा था. आदिल सभी की घरवापसी के इंतजाम में जुट गए थे.

जफर अमन को ले कर हौस्पिटल आया था और बिना किसी से मिले ही वापस लौट गया था. कुछ दिनों बाद आराधना ने महसूस किया कि अमन रात को सोते समय डरा सा रहता है, करवटें बदलता रहता है, कभीकभी तो ?ाटके से उठ कर आंखें फाड़ कर अपने चारों तरफ देखने लगता है. उस का जिस्म पूरा पसीने से तर होता है. तब आराधना घंटों उस के पास बैठी रहती है. उस से अमन की ऐसी हालत देखी नहीं जा रही थी. सुधा के कहने पर वह अमन को सुधा की सहेली ज्योति के पास ले गई जोकि मनोचिकित्सक थी. पहले तो अमन उन के पास जाने से हिचकिचाया पर फिर आराधना के बहुत जोर देने पर तैयार हो गया था.

4 सिटिंग्स के बाद डाक्टर ज्योति ने आराधना से कहा, ‘देखिए आराधनाजी, अमन के साथ जो हुआ, जो भयावह मंजर उस की आंखों के आगे से गुजरा, बिलाशक वह एक न भुलाए जाने वाला वाकेआ है. इस वक्त उसे संवेदनशील सहारे की आवश्यकता है. उम्र का नाजुक दौर है, हरेक पल साथ भी नहीं रहा जा सकता और अकेलापन भी महसूस नहीं होने देना है उस को.’

डाक्टर ज्योति ने आगे कहा, ‘अमन अपनी दिनचर्या सुधारे, कालेज में दोस्तों के साथ और पढ़ाई में दिल लगाना होगा. आप मां हैं, उस की हौबीज की तरफ उसे प्रेरित करें, टीवी पर हलकीफुलकी मनोरंजन सामग्री देखे वह, मोबाइल का एल्गोरिदम ठीक रखे वह. देखिए, मानसिक तौर पर एक ही दिन में ठीक नहीं हुआ जा सकता लेकिन एक दिन अवश्य ठीक हुआ जा सकता है, समय लगेगा. अमन की फीलिंग्स पर पूरा विश्वास, अपनापन और भरपूर प्यार ही उस की इस वक्त की सब से बड़ी दवा है, उम्मीद है आप सम?ा रही होंगी.’

‘जी, समझ रही हूं, इन सभी बातों का पूरी तरह ध्यान रखूंगी.’

यों तो आराधना एक सम?ादार और सुलझ हुई मां थी, ज्योति की सभी बातों का अच्छे से ध्यान रखती थी पर आज ब्लडप्रैशर की गोली लेना भूल गई थी तो उसे अपनी तबीयत कुछ ढीली महसूस हुई. सो, अपने कमरे में जा कर लेट गई थी वह. आंख लग गई थी उस की वरना जब तक अमन जगा रहता है वह घर का कोई न कोई काम करती हुई उस के आसपास बनी रहती है और फिर अमन से हलकीफुलकी बातें करतेकरते उसे सही समय पर सोने का निर्देश भी देती रहती है.

आज इतने दिनों बाद फिर से अमन ने उसी दुर्घटना की बातों का तार छेड़ा था पर जाहिर है कि अपनों के सरल, सुलझे व्यवहार के साथ वक्त ही अमन के दिमागी घावों को भरेगा.

सवेरे उस ने अमन की पसंदीदा इडली बनाई और शाम को जल्दी आने को कहा.

‘‘क्यों, कुछ खास है क्या?’’

‘‘आज सुधा मौसी तुम से मिलने आने वाली है, कह रही थी कि इतने दिन हो गए, जरा अमन को लाइव तो देखूं,’’ कहते हुए आराधना हंस पड़ी तो अमन भी हंसता हुआ बैग ले कर कोचिंग को चला गया.

शाम को सुधा आई तो सब से पहले उस ने अमन के बारे में ही पूछा.

‘‘आता ही होगा, मैं ने बता दिया था कि मौसी आ रही हैं आज.’’

‘‘अब कैसा व्यवहार है अमन का?’’

‘‘सुधा, व्यवहार और हालत तो पहले से बेहतर हैं लेकिन अब भी जब कभी उस दिन की कोई भी खबर उस के सामने आ जाती है तो बहुत बेचैन सा हो जाता है. कल रात भी ऐसा ही हुआ और कुछ दिनों पहले जब सुमित घर आया था तब दोनों की बातों में जफर का जिक्र आया तो दोनों एकदम खामोश हो गए.’’

तभी अमन आ गया. औपचारिक बातों के बाद अमन ने बताया कि जफर की बहन की शादी है. आज वह उसे बाहर मिला था, कार्ड उस ने वहीं दे दिया.

‘‘हां, तो अच्छी बात है, जाना जरूर तुम.’’

‘‘पर मम्मी, जफर तो अलग समुदाय.’’ अमन हिचकिचाता हुआ सा बोला.

‘‘पर बेटा, 11वीं क्लास से जब से तुम दोनों की दोस्ती हुई है तब से तो यह बात कभी नहीं सोची तुम ने?’’

‘‘तब उन लोगों ने ऐसा कुछ किया भी नहीं था.’’

‘‘तुम्हारे साथ तो आज की तारीख में भी अच्छा ही हुआ है. उस के मामा ने जो तुम्हारे और सुमित के लिए किया, वह सब भूल गए क्या?’’ आराधना आहत हो गई थी.

‘‘वैसे, सुमित के घरवालों ने तो साफ इनकार कर दिया है और सुमित खुद भी जाना नहीं चाह रहा.’’

‘‘और तुम, तुम भी नहीं जाना चाहते क्या?’’

‘‘पता नहीं’’ कह कर अमन अपने कमरे की ओर चलता बना.

आराधना और सुधा की नजरें मिलीं तो उन में मायूसी ही ?ालकी.

ये यादें जख्मों की तरह ताजी थीं, इन्हें नासूर बनने से रोकना था और अभी तो ये यादें धुंधली भी पड़ती दिखाई नहीं दे रही थीं.

‘‘दीदी, जो हुआ है उस की वजह से अमन और जफर में इस तरह की दूरी कोई हैरानी की बात नहीं लगती, अब अपने लोगों के साथ जो हुआ है उस से तो नफरत का ही जन्म होगा न.’’

‘‘सुधा, मैं समझती हूं पर अमन कोई बहुत उम्रदराज परिपक्व इंसान नहीं, अभी युवा बच्चा है. अगर अभी से अपनी उम्र की जिंदादिली, सकारात्मक विचारों को छोड़ ऐसे धर्म और नफरत के खेल में डूब जाएगा तो क्या भविष्य होगा इस का. मैं चाहती हूं कि वह एक सामान्य जीवन जिए, नफरत का यह छोटा सा बीज कल सड़े हुए फल में तबदील हो जाएगा और वह दागदार फल उस के व्यक्तित्व को, उस की सोच को मैला करता चला जाएगा जिस के परिणाम बल्कि दुष्परिणाम बहुत गंभीर भी हो सकते हैं.’’

एक दिन आराधना और अमन बाजार गए तो उन्हें वहां जफर की अम्मी मिली.

‘‘अरे अमन, आया क्यों नहीं रे फिरोजा की शादी में, सुमित भी नहीं आया,’’ जरीना ने शिकवा किया.

‘‘बस आंटी, कुछ प्रोजैक्ट्स खत्म करने थे, उन्हीं में बिजी था.’’ अमन का स्वर ठंडा ही था, यह बात आराधना ने साफतौर पर महसूस की पर इस का जिक्र उस ने घर आ कर भी नहीं किया.

‘‘अमन, कल तुम ज्योतिजी के पास नहीं गए?’’

‘‘उन की बातों से क्या होगा, मैं ने जो सब देखा है वह भूल थोड़ी न जाऊंगा मैं.’’

‘‘पर भूलने की कोशिश तो करो, अमन. वरना नफरत के उस दलदल में ऐसे डूबोगे कि किसी भी जरिए निकलते न बनेगा.’’

अमन कुछ नहीं बोला, बस, मोबाइल उठा कर घर से बाहर निकल गया.

आराधना को उस की इस हालत और उस के कुछ न सम?ाने की परिस्थिति की वजह से रोना सा आ गया.

कुछ दिनों बाद आराधना सुजाता के साथ बाजार गई. अभी वह सामान ले ही रही थी कि अचानक से उस ने लोगों की तेज चिल्लाने की आवाजें सुनी. तभी एक पत्थर बिलकुल उस के नजदीक गिरा. सुजाता उसे ले कर पास की संकरी गली में दौड़ी. वहां दोनों लोहे के एक बड़े बोर्ड के पीछे छिप गईं.

दोनों की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं. एक कोने से आराधना को गली के बाहर दिखाई दे रहा था. कुछ लड़कों का झुड था जिन के हाथों में डंडेलाठियां थीं. और ये क्या, सब से पीछे जो लड़का था वह अमन था. आराधना के दिमाग के परखच्चे उड़ गए. जिस बात के डर के साए में वह इतने दिनों से थी वही डर उस के सामने हकीकत बन कर खड़ा था. सामने की एक दुकान के बोर्ड को झुड ने लाठियों से तोड़ना शुरू कर दिया और सब चिल्ला भी रहे थे कि इस इलाके में तुम्हारी दुकानें नहीं खुलेंगी.

तभी अमन ने भी दुकान के एक शीशे पर डंडे से वार किया और फिर झुड के साथ अगली दुकानों की तरफ बढ़ चला. कुछ देर बाद जब सब वहां शांत सा लगा तो सुजाता आराधना का हाथ पकड़ कर गली के दूसरे छोर से तेजी से भागी. आराधना तो, बस, जिंदा लाश की तरह उस के साथ खिंची चली जा रही थी.

घर का दरवाजा खोलते ही सामने सोफे पर वह गिर पड़ी. उस का जिस्म जैसे उस का साथ छोड़ चुका था. दरवाजा बंद करने की हिम्मत भी उस में बाकी न थी. लगभग 3 घंटे बाद अमन घर आया.

‘‘मम्मी, कैसे लेटी हो, दरवाजा भी खुला है?’’

‘‘कहां से आ रहा है तू?’’ उस ने बर्फ समान स्वर में उसे घूरते हुए पूछा.

‘‘बस, दोस्तों के साथ ही था,’’ वह नजरें चुराता हुआ बोला.

तभी एक झन्नाटेदार थप्पड़ उस के गाल पर पड़ा.

‘‘मैं नहीं चाहती थी कि तू नफरत की आंधी में अंधा हो जाए पर तू न सिर्फ शारीरिक रूप से अंधे के समान हो गया है बल्कि तू तो भीतर से भी अंधा हो गया है. अपना वर्तमान, भविष्य सब दांव पर लगाता जा रहा है भूतकाल को जिंदा रखने के लिए. जिस गलत राह पर मैं तु?ो जाने से रोकना चाहती थी तू उसी पर चल रहा है. अरे, अंत में तू खुद को ही लहूलुहान पाएगा. मैं पूछती हूं कि आखिर इस सब से तु?ो क्या मिलेगा? बोल, कुछ बोल, अब जवाब क्यों नहीं दे रहा?’’ आराधना गुस्से में कांप रही थी.

‘‘अरे, क्या जवाब दूं, आप ने तो टीवी, अखबारों से ही जानासुना है पर मैं ने तो साक्षात देखा है. वो दरिंदे जो क्रूरता की जिंदा मिसालें बन मेरे सामने थे, जिन के लिए खून की कीमत पानी की भी नहीं थी, जो इंसानी जिंदगियों को पैरोंतले रौंदे जाने वाले कीड़ेमकोड़ों से भी कम आंक रहे थे, उन्होंने धर्म के नाम पर नरसंहार कर के अपने पशु होने का जीताजागता सुबूत पेश कर दिया था और ऐसे में आप चाहती हैं कि मु?ा में नफरत का ‘न’ भी न पनपे. इस सब से आप के अमन की जिंदगी का अमन छिन गया है, मम्मी.’’ और अमन फूटफूट कर रो पड़ा.

आराधना की भी रुलाई फूट पड़ी. उस अमानवीय घटना ने न जाने कितने ही लोगों के दिलोदिमाग में नासूर बना दिए थे, इस वक्त तो आराधना को अपने अमन की आंखों से बहता पानी भी लाल लग रहा था. जन्नत की लाल जमीन की तरह यहां का फर्श भी जैसे भावनाओं की दर्दनाक हत्या के खून से सन कर लाल हो गया था. यह सब कब और कैसे सुधरेगा, इस का जवाब आज किसी के पास नहीं था. Emotional Stories

लेखिका – रेखा टंडन

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...