Inspirational Story: घर, पति, बच्चे, क्या एक स्त्री का वजूद इन्हीं से है? उस का खुद का आत्मसम्मान, व्यक्तित्व, अधिकार कुछ नहीं. शादी के 25 साल बाद सीता आज खुद को तलाश रही थी और इन्हीं ‘देखो, आखिरकार यह सीता सुंदरी वैडिंग रिजौर्ट तैयार हो ही गया,’ संजय ने उसे देखते हुए गर्व से कहा था, ‘अब तुम इस की मालकिन हो और इसे तुम्हें ही संचालित करना है.’ वह हंस कर रह गई थी. ठीक ही है. अब वह इसी बहाने व्यस्त रहेगी.
21 वर्ष की आयु में ही उन की शादी हो गई थी. रांची में मायका व्यापारिक था तो जमशेदपुर में ससुराल उस से भी बड़ा बिजनैस साम्राज्य वाला था. ऐसे में बच्चे कब हुए, बड़े हो कर पंखदार बने और उड़ चले, यह पता ही न चला. बड़े बेटे को अमेरिका जाने का शौक था. सो, वह उधर मैनेजमैंट की पढ़ाई करने अमेरिका क्या गया, वहीं का हो कर रह गया. दूसरे बेटे ने चार्टर्ड अकांउटैंसी पढ़तेपढ़ते अपना अलग बिजनैस मुंबई में खड़ा कर लिया था. बेटी अपनी ससुराल जा बसी थी.
उसे लगा कि अब उसे चैन मिलेगा. मगर चैन कहां था.
आरंभ से ही उस ने अपने पति संजयजी को कभी स्थिर नहीं देखा. उन के जमाजोड़ में हमेशा बिजनैस व व्यापार समाहित था. इतनी बड़ी प्रौपर्टी के मालिक होते हुए भी उन्हें चैन नहीं था. इस आदमी के पीछे उस ने अपनी सोने सी जिंदगी स्वाहा कर दी. दिन को दिन नहीं और रात को रात नहीं समझ और वे रुपए कमाने के लिए आजीवन भागते फिरे. इतना सारा रुपया कमाने और तमाम तामझाम बटोरने के बावजूद उन्हें चैन नहीं था. सातसात शहरों में मकान और 2 फ्लैट हैं इन के. उसी हिसाब से बिजनैस भी फैला हुआ है. फिर भी उस ने कोई शिकायत नहीं की.
और कितना चाहिए जीने के लिए. बीच में जब उन्हें कुछ कारोबारी परेशानी हुई तो बाबाओंसाधुओं के पीछे वे पागलों की तरह भागते फिरे थे लेकिन लाखों रुपए गंवा कर उन मंत्रतंत्र, टोनेटोटकों से कुछ न हुआ. उन से जब मोह भंग हुआ, तब तक समय कुछ और आगे खिसक चुका था. अब तो वे साधुओंबाबाओं के नाम पर ही बिदक जाते थे.
अब उन्हें समाजसेवा का फुतूर सवार हुआ था. पहले तो उसे भी लगा कि कोई चुनाव वगैरह लड़ने का चक्कर तो नहीं. चलो, कोई बात नहीं. यह भी दौर निकल ही जाएगा लेकिन वैसी कोई बात नहीं थी. राजनीति में उन की कोई रुचि नहीं थी. समाजसेवा करना इतना बुरा नहीं है. अब जब सबकुछ सही हुआ है तो वे यहां कुछ सदाशयता दिखा रहे हैं, सो, क्या बुरा कर रहे हैं.
पहले भी उस ने नहीं कहा था कि इन बाबाओं के पीछे भागो. कभी उस की इन में रुचि रही भी नहीं. मगर वे कभी हरिद्वार तो कभी कनखल के आश्रमों के चक्कर काटते रहे. उसे भी लगता रहा कि इहलोक के साथ परलोक भी सुधर जाए तो क्या बुरा है. यह कोई आश्चर्य की बात भी नहीं. बुढ़ापे में लोग अध्यात्म की ओर मुड़ते ही हैं. उसे तो यही लगा था कि चलो, अच्छा है कि मोहमाया से मुक्ति मिली. यह तो बाद में पता चला कि ये तथाकथित बाबा लोग भी बिजनैस के लिए संपर्कसूत्र के रूप में इन बिजनैसमैनों के लिए भी काम करते हैं.
हर बाबा की नजर दान से मिलने वाले पैसे और घरगाड़ी की सुविधाओं पर लगी रहती है. वैराग्य का उपदेश देने वाले सभी बाबा जम कर आधुनिक से आधुनिक गैजेट इस्तेमाल करते हैं और नाइकी के जूते, रोलैक्स की घडि़यां पहनते हैं. मगर उस दिन उस बाबा ने जो कुछ कहा, उस से उस का सर्वांग जल उठा था.
उन्हीं में से एक बाबा से उस ने कहा था कि इस दुनियावी भागदौड़ में उस का स्थान कहां है तो वे हंस कर बोले थे, ‘आप का इतना पावनपवित्र नाम सीता है, जो जगतजननी हैं. आप भी कुछ समाजसेवा किया करें तो समय सुंदर व्यतीत होगा. कुछ लोगों का समय बदलेगा तो कुछ का भविष्य संवर जाएगा.’
‘इन के नाम पर ही तो मैं शहर में एक सीता सुंदरी रिजौर्ट तैयार कर रहा हूं. उस में सारा कुछ तो इन्हीं के नाम है. जो भी आयव्यय होगा, इन के ही हस्ताक्षरों से तो होगा. मगर यह खुद ऐक्टिव नहीं होतीं, तो हम क्या करें? सो, हमें ही सारा कुछ मैनेज करना होता है. इन्हें कुछ समाजसेवा करनी ही चाहिए,’ संजय बोले थे.
अब यह समाजसेवा की कैसे जाए? तब संजय ने ही कुछ महिला समितियों के नाम सु?ा दिए थे. उन की किटी पार्टियों को देख कर जल्द ही मन ऊब गया कि क्या इसी को समाजसेवा कहते हैं. मगर जो था, सामने ही था. उसे ?ोलना मजबूरी थी. ऐसे में कुछ और संस्थाओं से उस का जुड़ाव हुआ था तो वह उन में अपना मन रमाने लगी थी.
इतने बड़े व्यापारिक साम्राज्य को जोड़ लेने के बाद भी उस के पति संजय को चैन नहीं था. बड़ा बेटा उन दिनों अमेरिका से भारत आया था तो उसे वे एक प्लौट दिखाने ले गए थे. ज्यादा कुछ नहीं, डेढ़ करोड़ रुपए का प्लौट था. उन का कहना था कि अगले 10 वर्षों में शहर फैलते हुए इधर ही आ जाएगा तो यहां एक बड़ा सा शौपिंग मौल बना लेंगे. बेटे ने आजिजी से कहा, ‘अब हम कहांकहां रहेंगे और क्याक्या करेंगे, पापा. पहले ही मुझे अमेरिका से यहां आनेजाने में परेशानी होती है. आप शांति से रहिए. अच्छाभला तो आप का बिजनैस तथा रिजौर्ट भी चल ही रहा है, जो आप ने मां के नाम पर तैयार किया है.’
हां, उसी के नाम पर है रिजौर्ट- सीता सुंदरी वाटिका- है. और वह उस का मैनेजमैंट संभालती भी थी. मगर उस पर उस का कितना हक है, यह उसे उस दिन पता चला था.
दरअसल हुआ यह कि सिटी क्लब नामक एक संस्था निर्धन युवतियों के सामूहिक विवाह का हर वर्ष आयोजन करती थी. चूंकि इस संस्था से वह जुड़ चुकी थी, उस की मीटिंगों में भी उस का आनाजाना होता था, ऐसे ही एक मीटिंग में संस्था के अध्यक्ष दीनदयालजी ने जानकारी दी कि इस बार निर्धन युवतियों के विवाह के लिए ढेरों आवेदन आए हुए हैं. सो, हम ने 100 युवतियों के विवाह का लक्ष्य रखा है. इस के लिए बड़ा खर्च तो होगा ही, समारोहस्थल भी बड़ा होना चाहिए. उसी पर विचार करना है.
अब यह विचार क्या करना था. लगभग सभी एकमत थे कि इस के लिए सीता सुंदरी रिजौर्ट ही उपयुक्त स्थल हो सकता है. इस के लिए उस की रजामंदी चाहिए थी. वह एकदम चौंक उठी थी. उस की रजामंदी से क्या तात्पर्य है उन का. आज तक उस ने कभी किसी काम में अपनी रजामंदी नहीं दी. कभी उस की जरूरत ही नहीं समझ गई या कभी उस से रायमशविरा किया गया. संजय ही सारे लेनदेन का ताम?ाम संभालते थे. सो, उस ने साफसाफ कहा कि पहले उस के पति से बात कर ली जाए.
उन दिनों संजय दिल्ली गए थे. बाद में पता चला कि वे उधर ही से फ्लाइट से मुंबई चले जाएंगे और उन का टूरप्रोग्राम 3-4 दिनों के लिए बढ़ सकता है. ऐसे में उस ने ?ि?ाकते हुए कहा था कि उन से पूछ कर बात करते हैं.
‘अरे मैडम, आप भी क्या बात करती हैं,’ संस्था के कोषाध्यक्ष रमाशंकर बोले थे, ‘संजय सर क्या आप के निर्णय से बाहर जाएंगे. वैसे भी, यह रिजौर्ट आप के नाम है. आप बस हां कर दीजिए. न हो, तो अभी उन से बात कर लीजिए.’
‘अब पता नहीं, वे किस मीटिंग में बिजी हों,’ उस ने बात टालने की कोशिश की, ‘रात में जब वे फुरसत में होंगे, मैं उन से बात कर जानकारी दे दूंगी.’
अब कुछ संयोग ऐसा रहा कि उसी समय संजय का फोन आ गया था. बातचीत के क्रम में उन्होंने पूछा कि कुछ कहना हो तो कहो. और तब उस ने संक्षेप में पूरी बात बता दी कि ये लोग इस बार का अपना सामूहिक वैवाहिक कार्यक्रम बड़े स्तर पर करना चाहते हैं. इस के लिए ये चाहते हैं कि वह आयोजन हमारे रिजौर्ट में किया जाए.
‘‘तो तुम निर्णय नहीं ले सकतीं क्या, वह सीता सुंदरी रिजौर्ट तो तुम्हारे नाम पर ही है न. तो एक तरह से मालकिन तो तुम ही हो,’’ वे बोले, ‘‘आखिर, शादीविवाह के लिए ही तो बना है वह रिजौर्ट. सो, उन के लिए बुक कर दो.’’
वह अभी यह कहना ही चाहती थी कि ‘वे तो रिजौर्ट को निशुल्क मांग रहे हैं’ कि संजय ने फोन बंद कर दिया और इसी के साथ जैसे उछल कर संस्था के कोषाध्यक्ष रमाशंकर सामने आ गए थे, ‘‘मैं ने कहा था न मैडम कि वे औब्जेक्शन नहीं करेंगे. वे तो आप को सीधे मालकिन ही मान रहे हैं. ऐसे में अब सिर्फ आप के हां की जरूरत है.
और इस तरह बात आगे बढ़ गई थी. वह तो विवाद तब उठा जब संजय यहां आ कर जाने कि वह रिजौर्ट उन्हें संस्था को निशुल्क देना होगा.
संजय को फिर दिल्ली टूर पर जाना था. ऐसे में सीता ने संस्था के पदाधिकारियों को सजेस्ट किया कि वे संजय से आमनेसामने बात कर लें और इसी के साथ संस्था के प्रतिनिधि शाम के समय उस के घर पहुंच गए थे. सारी बात सुन कर संजय बोले, ‘‘नहींनहीं, ऐसा कैसे हो सकता है. हम अपने भवन को फ्री में किसी को क्यों दें? सीता को बिजनैस के बारे में क्या पता है? हमें यहां सौ प्रकार के खर्चे झेलने होते हैं. स्टाफ को वेतन देना होता है. वह रिजौर्ट तो कभी किसी को निशुल्क नहीं दिया है, न ही देंगे.’’
संस्था के लोगों ने संजय को समझने की कोशिश की कि यह चैरिटी शो है. आप जैसे बिजनैसमैन के माध्यम से ही इस प्रकार के सामाजिक कार्य चला करते हैं. मगर वह सब व्यर्थ रहा. उन लोगों के सामने उन्होंने साफ कह दिया, ‘‘उस औरत को क्या पता बिजनैस के बारे में. कभी घर से बाहर निकली भी है, जो जानेगी कि दुनिया क्या और कैसी है. यहां सब मैं ही मैनेज करता हूं. पैसा कहां से आता है, कहां जाता है, यह मैं ही जानता हूं. मैं सम?ा नहीं पा रहा कि उस ने भावुकता के नाम पर आप को वैडिंग रिजौर्ट निशुल्क देने की स्वीकृति कैसे दे दी. बताइए, इतना बड़ा समारोह आप लोग कर रहे हैं, आप लोगों का लाखों रुपया खर्च हो रहा है.
‘‘निर्धन, निराश्रित लड़कियों की शादी कराना पुण्य का काम तो है ही और ऐसे में 100 लड़कियों की शादी तो और भी अच्छी बात है. निसंदेह आप की संस्था सराहनीय काम कर रही है लेकिन सारा कुछ निशुल्क तो नहीं है न. उन के लिए आप जो साजोसामान खरीद रहे हैं वह मुफ्त तो नहीं ही मिला होगा. सही है कि कुछ लोगों ने सामान के पैकेट दान किए और कुछ लोगों ने नकद रकमें दी हैं. तभी तो आप इतना कुछ कर पा रहे हैं. वहां हजारों लोगों का भोजन बनेगा. आजकल खाने की प्लेट भी हजार रुपए से कम में नहीं बैठती. फिर आप लोग हम से इतनी अपेक्षा क्यों किए बैठे हैं कि हम अपना रिजौर्ट फ्री कर दें? हमें बताइए कि आप को सीता सुंदरी रिजौर्ट निशुल्क क्यों चाहिए? बस, इसलिए कि सीता देवी ने इस के लिए हामी भर दी और आप तैयारियों में लग लिए. अरे, थोड़ाबहुत सब्सिडी ले लीजिए, और क्या चाहिए?
‘‘वह बेवकूफ औरत क्या जाने कि हमारे भी कितने खर्चे हैं. हम सरकार को आयकर भरते हैं. जीएसटी चुकानी पड़ती है हमें. और फिर बिजलीपानी, साफसफाई, मेंटिनैंस के खर्चे. यह सब आएगा कहां से? देख ही रहे हैं कि इन शादीविवाह के मौसम में लोडशेडिंग भी कितनी होती है. ऐसे में 4-5 घंटे जेनरेटर चला तो वही हजारों का तेल हजम कर जाता है. ऐसे में आप ही बताइए कि हम सारा कुछ निशुल्क कर सड़क पर आ जाएं?’’ संजय आवेश में बोले थे.
समिति के सभी सदस्य जड़वत बैठे उसी को देख रहे थे और वह शर्म से गड़ी जा रही थी. अब कार्यक्रम सामने था तो लेनदेन की बात हो रही है. क्या और किस को कहे वह कि उस के कहे का कोई मूल्य नहीं है. संजय ने ही तो उसे इस समूह के साथ जोड़ा था कि कुछ समाजसेवा तुम भी कर लो. और इस प्रकार वह इस संस्था से विगत 2 वर्षों से जुड़ी हुई थी. लेकिन आज की मीटिंग बिना कुछ तय किए खत्म हो गई थी.
अगले दिन फिर समिति के लोग उस के पास आए और कहने लगे, ‘‘मैडम, सारे निमंत्रणपत्र छप कर बंट चुके हैं. कार्यक्रम का एजेंडा भी तैयार है. वैसे भी, इस वैवाहिक मौसम में इतनी जल्दी कोई अच्छा सा रिजौर्ट नहीं मिल सकता. आप ही कुछ कीजिए, बड़ी मेहरबानी होगी.’’
‘‘अच्छा, मुझे कुछ वक्त दीजिए,’’ उस ने संक्षिप्त जवाब दिया था, ‘‘मैं कुछ सोचती हूं कि मैं क्या कर सकती हूं. कल सुबह मिलिए.’’
अगले दिन वे आए. उस ने कुछ निर्णय ले लिया था. उस ने स्पष्ट कहा, ‘‘3 दिन के 6 लाख रुपए किराया होता है. यदि आप इस के बिजलीपानी, साफसफाई और मेंटिनैंस आदि के खर्च वहन करें तो मैं अपनी स्वीकृति दे सकती हूं.’’
अध्यक्ष दीनदयाल के निर्देश पर कोषाध्यक्ष रमाशंकर तत्काल 50 हजार रुपए का चैक काटने लगे थे. उस ने रिजौर्ट के मैनेजर को बुला कर उसे रिसीव कराया और इस प्रकार वहां सामूहिक विवाह की तैयारी चलने लगी थी. सबकुछ शांतिपूर्वक निबट गया था. समिति के कोषाध्यक्ष रमाशंकर ने रिजौर्ट के प्रबंधक के कहने पर शेष खर्चों के
22 हजार रुपए का एक और चैक दे दिया था. संजय उस समय तो कुछ बोले नहीं लेकिन उन्हें सारी जानकारी मिल चुकी थी. शाम में जब समिति के कुछ पदाधिकारी उस से बात कर रहे थे, वे उस पर फट पड़े, ‘‘तुम बेवकूफ औरत, तुम्हें पता है कि पैसे कैसे आते हैं? जरा बाहर निकलो तो पता चले कि पैसा कमाना कितना कठिन है. तुम्हारी तरह ऐसे पैसे लुटाते रहे तो सारा कुछ खत्म हो जाएगा. बताओ कि इस घाटे की भरपाई कैसे होगी?’’
पलभर में ही उस का चेहरा स्याह हो आया था. कुछ शर्म से, कुछ ग्लानि से वह कुछ कह नहीं पा रही थी. इतने संभ्रांत लोगों के बीच उस की ऐसी बेइज्जती. वह एकदम से स्तब्ध थी. यह आदमी कितना काईंया और धूर्त है. उस ने कैसे इस के साथ इतने दशक बिताए थे. अभी भी उसे ही इंगित करते क्या कुछ कहे जा रहा है और उस के सामने सिवा चुप्पी ओढ़ने के उस के पास कुछ और है ही नहीं. उसे लगा कि यह धरती फटे और वह उस में समां जाए.
वह गलत कहां है, यह उसे सम?ा नहीं आ रहा था. इस धर्मसंकट में तो संजय ने ही उसे डाला था और अब वे रुपयों की दुहाई दे रहे हैं. औरतों का क्या यही जीवन है. जो बेटेबेटी थे, वे बड़े होते ही अपनी दुनिया में मस्त हो गए. और जो यह पति है, हमेशा एक पैर घर में, दूसरा हवाई जहाज में रखे रहता है, उसे भी उस की प्रतिष्ठा का जरा भी खयाल नहीं. तो फिर वह ऐसे घर में क्यों रहे जहां उस की बात का मान नहीं.
उस के अंतर्मन में जो ज्वालामुखी था वह यदि फटा तो उसे संभालेगा कौन? आरंभ से ही वह स्वाभिमानी प्रवृत्ति की रही. पिता का भी विशाल व्यापार था, जो उन के मरते ही उन के भाइयों के नाम हो गया था. अब जब उस ने कुछ जानकारी ली, तब उसे उस के एक भाई ने बताया कि पिता ने अपने जीतेजी दिल्ली के इस पौश इलाके में एक फ्लैट उस के नाम बुक किया था. इस से जो किराया आता था, वह उस के अकाउंट में ट्रांसफर होता था. संयोगवश, उस का किराएदार उसे खाली कर गया था.
उस ने मन ही मन कुछ निश्चय किया और दिल्ली चली आई. यहां अपने पिता के मित्र नारायणजी के घर वह कई बार आ चुकी थी. उस ने वहां बात की और फिर उस फ्लैट में शिफ्ट हो गई. यहां आ कर वह क्या करेगी, यह ज्वलंत प्रश्न था. बीएससी, बीएड की उस के पास डिग्रियां थीं और उसे पढ़ाने का शौक भी था लेकिन कभी उस के नौकरी करने की जरूरत नहीं समझ गई. नारायणजी ने अपने एक मित्र के दिल्ली के ही एक प्राइवेट स्कूल में उसे विज्ञान शिक्षिका की नौकरी दिलवा दी थी, जिस से उस का जीवन आराम से कटने लगा था.
संजय ने सुना तो वे दौड़े चले आए थे. मगर उस ने एक नहीं मानी थी. उस ने स्पष्ट कह दिया, ‘‘यह मेरा घर है. आप को भी रहना है तो यहीं रहिए लेकिन मैं जमशेदपुर नहीं जाने वाली. वहां का घर और सीता सुंदरी रिजौर्ट आप का है तो आप का ही रहे. मुझे उस से कोई मतलब नहीं है. मुझे भी अपनी स्वतंत्रता और अस्मिता चाहिए, जो मुझे यहां मिल रही है.’’
हम जब अपनी भावुकता में होते हैं, अपने ही लोग उस का नाजायज फायदा उठाने की कोशिश करते हैं. मगर जैसे ही हम सजगसतर्क होते हैं, उस से पीछा भी छूट जाता है. और यही हुआ. अब विगत 3 वर्षों से वह यहां रह रही है. तीनों बच्चे भी कभीकभार यहां चले आते हैं तो कोई बात नहीं. मगर वह कहीं नहीं जाती. उस के पास अब समय भी नहीं है.
वह कई ऐक्सरसाइज घर पर ही शौकिया कर लिया करती थी और यहां तो अब वह बिलकुल स्वतंत्र थी. खेलों, खासकर बैडमिंटन में उस की रुचि रही. अब अवसर मिला तो अकसर ही विद्यालय के प्लेग्राउंड में कभीकभार खेलती भी थी, खासकर, स्पोर्ट्स टीचर मनोरमाजी के साथ खास दोस्ती ही हो गई थी. इस के बाद तो उस ने सोसाइटी के भी प्लेग्राउंड के नैट पर नियमित बैडमिंटन खेलते अपनी अलग पहचान बना ली थी. अपनी स्टूडैंट लाइफ में उस का बैडमिंटन स्पोर्ट्स में कोई सानी नहीं था. मगर अब तो जैसे सारा कुछ जो छूट गया था, फिर पुनरावृत्त हो रहा था.
एक दिन अचानक मनोरमाजी ने उसे जानकारी दी कि प्रौढ़ों की एक संस्था ने दिल्ली की राज्य स्तरीय महिला बैडमिंटन प्रतियोगिता का आयोजन किया है. इस प्रकार उस ने बातबात में उस में प्रतिभागिता के लिए फौर्म भर दिया था.
उस ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि इस आयु में भी दिल्ली के राज्य स्तरीय महिला बैडमिंटन में वह कुछ इस तरह भागीदारी करेगी. प्रतियोगिता में उसी की आयु की कई महिलाएं थीं जो अपनी आयु वाली खिलाडि़यों के साथ खेल रही थीं. उसे फाइनल में भी जाने का अवसर मिल गया. आज का दिन उस के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था. यह अलग बात थी कि यहां उसे, कम अंतरों से ही सही, हार खानी पड़ी और रजत पदक से संतोष करना पड़ा.
सभी उस से कुछ सहानुभूति सी जताने में लगे थे. वहीं, उसे इस बात की सराहना मिलनी चाहिए थी कि 53 साल की उम्र में वह इस मुकाम पर तब पहुंची है जब उस ने विधिवत कोई तैयारी नहीं की थी. उस ने तो बस विगत वर्षों के दौरान एक शौक के रूप में बैडमिंटन खेलना शुरू किया था कि यह मुकाम मिल गया. फिर भी बिना किसी भाव के वह हंस कर बोली थी, ‘‘मैं ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि इस उम्र में मैं किसी खेल में भागीदारी भी करूंगी. मैं ने तो इस खेल को खेलभावना से लिया. ऐसे में जो भी मुझे मिला, मुझे मंजूर है.’’
शाम को सोसाइटी मैनेजमैंट ने उस के रजत पदक जीतने के उपलक्ष्य में एक पार्टी का आयोजन किया था, जिस में सोसाइटी के लोगों ने भागीदारी की थी. कितने ही स्त्री, पुरुष, बच्चे उसे प्रशंसाभरी नजरों से देख रहे थे और वह उन के बीच एक रोलमौडल के रूप में उपस्थित थी.
कौन कहता है कि भीड़ सिर्फ राजनेताओं के इर्दगिर्द उमड़ती है. इस भीड़ को देख कर यह लगता है कि मनुष्य यदि सही है तो उस के प्रयासों के आगे भीड़ बिछने को बैठी रहती है. मगर उस ने तो यह भी कभी नहीं चाहा था. उस ने तो बस अपने आत्मविश्वास को बनाए रखने और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए यह राह निकाली थी.
साढ़े 5 हजार फ्लैटों वाले दिल्ली की इस सोसाइटी में जब वह रहने आई थी तो उसे कोई नहीं जानता था. झारखंड के उस शहर जमशेदपुर में पहली बार उस ने निर्णय लिया कि उसे अकेली ही रहना है तो यहीं रहेगी और पिछले 3 सालों से वह अकेली ही रह रही है. उस के फ्लैट में एक मेड आ कर सारा काम कर जाती थी. जब वह रात को लौटी तो वह वहीं थी.
‘‘अरे, तुम घर नहीं गईं?’’ उस ने सवाल किया, ‘‘क्या बात है?’’
‘‘बात क्या होना है, मैम, आज आप को मैडल मिला है. इतनी बड़ी खुशी का दिन है. सो, आप को देखना चाहती थी,’’ सलमा बोली, ‘‘वहां सोसाइटी के हौल में इतना बड़ा जलसा हुआ, खानापीना हुआ. यह देख कर बहुत अच्छा लगा कि यह सब आप की शान में आयोजित किया गया है.’’
‘‘ओह, तो यह बात है. ठीक है, अब तुम चाहो तो जा सकती हो.’’
‘‘जी, अब जाऊंगी ही. मगर आप को देख कर मुझे बहुत खुशी मिली है.’’
‘‘अरे, ऐसा कुछ किया नहीं मैं ने. वह तो बस बातबात में सबकुछ होता चला गया था. खैर, तुम खुश हो तो मैं भी खुश हूं.’’
बैड पर पड़ी वह सोच रही थी कि आज वह इस मुकाम तक पहुंच गई, यह क्या कम है. सोसाइटी वाले उस की इज्जत करते हैं, पूरा सम्मान देते हैं और क्या चाहिए. इसी इज्जत और सम्मान के लिए तो उस ने शहर जमशेदपुर छोड़ा था, अपने पति के व्यापारिक साम्राज्य को तिलांजलि दे दी थी. बेटे बाहर सैटल हैं. जब किसी को उस की परवा नहीं तो वही सब की क्यों परवा करे.
उम्र भी तो कोई चीज होती है. मगर 55 वर्ष की उम्र इतनी ज्यादा नहीं होती कि कोई चीज नए सिरे से शुरू न की जा सके. यह क्या कम है कि वह अपने विद्यालय के बच्चों के अलावा सोसाइटी के बच्चों के बीच भी रोलमौडल के रूप में पहचान बना चुकी है. बच्चे उस से अपनी परेशानी साझ करते और वह उन्हें यथासंभव उस के समाधान बताती थी. यह उस के सुझावों का ही परिणाम था कि अनेक बच्चे गुटखातंबाकू से ले कर ड्रग्सड्रिंक्स तक के मकड़जाल से भी मुक्त हुए थे.
यहां उस ने अपनी पढ़ाई का पूरा सदुपयोग सा किया है. यहां रहने वाले बच्चे उस से अपनी पढ़ाई के सवाल पूछने आते हैं तो भरसक वह उन्हें सहयोग करती और दिशानिर्देश देती है. इस मामले में तो ये बच्चे उसे अपने अभिभावकों से भी ज्यादा उस की इज्जत करते हैं. उस के सुखदुख का पूरापूरा खयाल रखते हैं कि वह अकेली रहती है. मगर उन बच्चों को देख कर, उन से मिल कर उसे लगता है कि वह अकेली कहां है.
सोसाइटी का मैनेजमैंट अलग उस का खयाल रखता है. वह कई बार उन्हें समुचित सलाह देती और उन के मशविरे में शामिल भी होती है. यहां सारे न्यू ईयर डे, वैलेंटाइन डे, मदर्स डे, क्रिसमस, दीवाली, होली भी सामूहिक रूप से होते हैं, जिस से यहां एक अद्भुत समां बंध जाता है. ऐसे में अकेलेपन का आभास हो भी तो कैसे?
शुरू में उसे खूब सुनना पड़ा था, ‘ओह, तो आप अकेले रहती
हैं. बच्चों के पास क्यों नहीं चली जातीं?’ और वह हंस कर रह जाती थी. अब सब को यह बताना जरूरी है क्या कि उस के पति कितने बड़े व्यापारी आदमी हैं. जब वह अपने पति के पास नहीं रही तो बच्चों के पास क्यों जाए और क्यों वह अपनी आजादी को, अपने अस्तित्व को बच्चों के हाथों में सौंप दे. वह कोई पुराने समय की सीता नहीं है. फिर वह उन बातों के लिए धरती में क्यों समाए जब उस ने कुछ गलत किया ही नहीं?
नौकरानी सलमा के जाने के बाद उस ने मेन डोर बंद किया और बैड पर जा गिरी. आंखें नींद से बो?िल थीं. मगर नींद जो थी, आ ही नहीं रही थी. नींद कहीं किसी अतीत में जो भटकने लगी थी. जीवन के जद्दोजेहद और प्रवाह में पता ही नहीं चला कि जीवन के 25 वर्ष कैसे निकल गए थे. मगर अब उसे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं, संतुष्टि थी. यह तो कुछ ऐसा संयोग रहा कि वह इस राज्य स्तरीय महिला बैडमिंटन खेल प्रतियोगिता की उपविजेता बन कर सामने आ गई है. जो भी हो, आज वह खुश थी. बहुत खुश.
तभी मोबाइल की घंटी बजी. देखा, संजय का फोन था. लगता है किसी ने उसे बताया होगा. उस ने कुछ सैकंड सोचा, कौल को डिक्लाइन कर के फोन स्विच औफ कर दिया. आज वह बिना डिस्टर्ब हुए सोना चाहती थी. Inspirational Story
सवालों के जवाब ढूंढ़ रही थी.





