Assam Elections: पश्चिम बंगाल में जहां एसआईआर के जरिए 27 लाख वोटरों को वोट देने नहीं दिया गया, वहीं असम में चुनाव आयोग के परिसीमन पर सवाल उठ रहे हैं. असम में हिंदुमुसलिम ध्रुवीकरण का लाभ भी मिला. हिंदुमुसलिम मुद्दा खूब चलाया गया और चुनाव आयोग तमाशा देखता रहा. अगर चुनाव आयोग इस तरह खामोश रहेगा तो संविधान की मंशा के अनुरूप चुनाव कैसे होंगे? 2023 में चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं के परिसीमन करने के बाद हुए असम के विधानसभा चुनाव में इस का प्रभाव देखने को मिला.
मुसलिम बाहुल्य सीटों के वोट तितरबितर हो गए. परिसीमन के कारण मुसलिम बहुल वोट वाली सीटों की संख्या 35 से घट कर 22 रह गई, जिस से कांग्रेस और एआईयूडीएफ को बड़ा नुकसान हुआ. परिसीमन के बाद भी विधानसभा सीटों की संख्या 126 ही रही. आमतौर पर चुनावों में मुसलिम बहुल और हिंदू बहुल की गिनती होनी ही नहीं चाहिए पर जब एक दल ने धर्म को सफल चुनावी हथियार बना लिया तो परसीमन का सवाल बड़ा हो जाता है.
परिसीमन के जरिए प्रतिनिधित्व के समीकरण को बदल दिया गया, जिस से मुसलिम विधायकों की संख्या 25 से कम रही. बहुसंख्यक वर्ग के हिस्से में 90 सीटों के मुकाबले 103 सीटें आ गईं. नए परिसीमन में बंगाली मूल के मुसलिम वोटरों का दबदबा कम हो गया. नए परिसीमन में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 16 से बढ़ा कर 19 हो गई. अनुसूचित जाति की सीटें एक बढ़ कर 9 हो गईं. परिसीमन से निचले, मध्य और दक्षिणी असम के कांग्रेस के प्रभाव वाली सीटों को भी खत्म कर दिया गया.
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा शुरू से ही हिंदूमुसलिम करते रहे. भाजपा की अगुआई वाले एनडीए ने असम में 102 सीटों पर जीत हासिल की. इस में भाजपा को 82, असम गण परिषद और बीपीएफ को 10-10 सीटें मिलीं. कांग्रेस गठबंधन को 29 सीटें ही मिल सकीं. मुसलिम बहुल सीटों पर मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया. इस वजह से विधायकों में हिंदूमुसलिम का फर्क साफ दिखने लगा है. विपक्ष की 29 सीटों में से 22 विधायक मुसलिम वर्ग से हैं. विपक्ष में हिंदू विधायकों की संख्या बेहद कम हो गई. ’80 बनाम 20′ की जो लड़ाई धर्म की राजनीति को बढ़ावा दे रही है वह असम के चुनाव परिणामों में साफतौर पर देखी जा सकती है. Assam Elections





