SIR Process: संविधान ने वोटर को वोट देने का कानूनी हक दे रखा  है. एसआईआर प्रक्रिया के जरिए उन को वोट देने से रोक दिया गया. एसआईआर बिहार से ले कर पश्चिम बंगाल तक विवादों के घेरे में रही है. ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका निष्पक्ष कैसे मानी जा सकती है? अदालत तक चुनाव आयोग की इस मनमानी पर मूकदर्शक बनी रही और नतीजा, चुनाव आयोग के धुएं में बंगाल हार गया.

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने चुनाव प्रक्रिया की खामियों को उजागर कर दिया है. संविधान बनाने वालों ने कभी सोचा नहीं होगा कि सत्ता के प्रभाव में चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं सरकार के इशारे पर इस तरह की मनमानी करेंगी. पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जीत पर जब भी बात होगी, वोटर लिस्ट की एसआईआर यानी विशेष गहन समीक्षा में मनमानी और केंद्र सरकार द्वारा 2 लाख, 50 हजार अर्धसैनिक बलों की तैनाती का औचित्य जैसे सवाल सामने खड़े होंगे. चुनाव परिणामों पर इन के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता. संविधान निर्माताओं ने भय के वातावरण में नहीं बल्कि खुले आसमान व निडर माहौल में चुनाव कराए जाने की कल्पना की थी.

चुनाव पार्टियों के कैडर द्वारा लड़े जाते हैं पर बंगाल में चुनाव तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ने नहीं, चुनाव आयोग ने लड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने कोई दखल नहीं दिया कि चुनाव आयोग के मतदाता सूची तैयार करने की आड़ में असल में बाहरी कार्यकर्ता या चुने हुए अफसर घरघर जा कर वोटरों से मिल रहे थे. इस के पीछे एक छिपा डर स्पष्ट था कि जो केंद्र सरकार चाहती है वह करोगे तो ठीक, वरना न जाने क्या होगा. सरकारी खर्च और सरकारी बंदूक के साए में मतदाता सूची तैयार करने में ही बता दिया गया कि अब तृणमूल कांग्रेस का पत्ता साफ करना है.

जो मशीनरी चुनाव आयोग ने बंगाल में झोंकी वह बड़ी से बड़ी पार्टी नहीं तैयार कर सकती. चुनाव आयोग ने थानेदार बदल दिए , जिलाधीश बदल दिए, सचिव बदल दिए. यह काम कभी कोई पार्टी नहीं कर पाती. चुनाव आयोग के पास वोट काटने से ले कर वोटर को वोट देने और गिनने तक के अपार अधिकार जमा कर दिए गए हैं. चुनाव आयोग अपने अधिकार की मनमानी परिभाषा गढ़ रहा था और उस का एक ही उद्देश्य था कि ममता बनर्जी को हटाना है. इस काम में भाजपा के छिपे कैडर,. जो हर सरकारी दफ्तर में बहुतायत में हैं, ने भी पूरी सहायता दी. सरकारी बाबू जानता है कि जनता की कमजोर नब्ज को कैसे दबाया जाए. वर्णव्यवस्था को फिर से वापस लाने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए इस सरकारी कैडर ने तनमन से साथ दिया.

शुरुआत में चुनावों से ठीक पहले पश्चिम बंगाल की एसआईआर प्रक्रिया के तहत 91 लाख वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. उन में से 64 लाख वोटरों के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया और उन में 27 लाख नामों को ‘जांच के धीन’ रख कर वोट देने से वंचित रखा गया जबकि इन लोगों ने सत्यापन के लिए दस्तावेज जमा किए थे. चुनाव आयोग के अफसरों के अनुसार, उन में तकनीकी गलतियां थीं. उन 27 लाख वोटरों के कानूनी अधिकारों का खुल्लमखुल्ला हनन हुआ. यह संदेश था कि जो कहते हैं वही करना वरना हिंदू हो या मुसलमान, मतदान का अधिकार ही छीन लिया जाएगा.

यह आरोप ही भयावह है कि एसआईआर प्रक्रिया के जरिए उन लोगों को वोट डालने के मौलिक अधिकार से वंचित रखा गया जिन से केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को विरोध की आशंका थी. संविधान का अनुच्छेद 326 देश के हर उस नागरिक को वोट देने का अधिकार देता है जिस की उम्र 18 साल से अधिक हो. वोट देने की प्रक्रिया और नियम को ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951’ में विस्तार से बताया गया है. वोट देने को लोकतंत्र का सब से बड़ा अधिकार माना जाता है. 1947 से पहले के अंगरेजों के राज और फिर स्वतंत्रता के राज में आम आदमी को जो मिला उन में वोट दे कर अपने जनप्रतिनिधि को चुनने का हक सब से बड़ा था.

कहां गया 27 लाख वोटरों का हक

वोटरों के वोट देने के अधिकार पर फैसला करने से पहले चुनाव कराए ही क्यों गए? बात केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है. असम में एसआईआर प्रक्रिया विवादों में रही है. उस से पहले बिहार में भी वह विवादों में घिरी रही. चुनाव आयोग की तानाशाही के बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में करीब 92 फीसदी मतदान हुआ था. जब कुल वोटरों की संख्या कम हो जाती है तो वोट देने का प्रतिशत अपनेआप बढ़ जाता है. सो, बढ़े हुए मतदान पर चुनाव आयोग की पीठ ठोंकने का कोई मतलब नहीं है.

असम में चुनाव आयोग की खलनायकी भूमिका एसआईआर की वजह से नहीं बल्कि दोषपूर्ण परिसीमन की वजह से थी. असम में निर्वाचन क्षेत्रों को इस तरह डिजाइन किया गया ताकि भाजपा को ही लाभ पहुंचे. नतीजतन, सत्तारूढ़ भाजपा फिर अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो गई. चुनाव आयोग इस शिकायत की अनदेखी करता रहा कि चुनाव से पहले और चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद केंद्र सरकार ने बंगाल की टीएमसी सरकार के हर काम में अड़ंगा लगाया.

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले जिस तरह से भाजपा की पसंद के अफ़सरों को तैनात करने में तरजीह दी उस पर भी सवाल उठ रहे हैं. टीएमसी सरकार के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को हटा कर दुष्यंत नारियाला को नया मुख्य सचिव नियुक्त किया. गृह सचिव जगदीश प्रसाद मीणा की जगह संघमित्रा घोष को राज्य का नया गृह सचिव बनाया गया. चुनाव आयोग ने कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना जैसे महत्त्वपूर्ण जिलों सहित 13 जिला मजिस्ट्रेटों का तबादला किया.

प्रशासन के अफ़सरों के साथ ही साथ पुलिस महकमे में बड़े पैमाने पर बदलाव किये गए. डीजीपी पीयूष पांडे को हटा कर सिद्धनाथ गुप्ता को पश्चिम बंगाल का नया कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त किया गया. कोलकाता में पुलिस कमिश्नर सुप्रतिम सरकार की जगह अजय कुमार नंद को नया कमिश्नर बनाया गया. एडीजी विनीत गोयल को हटा कर अजय मुकुंद रानाडे को कानून व्यवस्था का नया अतिरिक्त महानिदेशक बनाया गया.

अफसरों के अलावा राज्यभर के 170 पुलिस थानों के प्रभारियों सहित कुल 184 पुलिस अधिकारियों के तबादले किए गए. चुनाव आयोग ने राज्य की 294 सीटों में से 73 रिटर्निंग औफिसर्स को भी बदल दिया था. इस में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का निर्वाचन क्षेत्रभवानीपुर भी शामिल था.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जो 27 लाख वोट काटे गए थे, उस के पहले किसी और राज्य में ऐसा नहीं किया गया. कहीं और इतनी बड़ी संख्या में वोट नहीं कटे थे. यह कुल वोट का 4.3 प्रतिशत होता है. ममता बनर्जी का दावा है कि ये ज्यादातर मुसलिम थे या टीएमसी समर्थक थे. पश्चिम बंगाल की 48 ऐसी सीटें हैं जिन में वोटरों की संख्या 2021 के चुनाव के मुकाबले कम थी, जबकि जनसंख्या बढ़ चुकी थी. साफ है कि नाम कटने से वोटर मतदान नहीं कर पाए. यह चुनाव संविधान के अधिकार का खुला मजाक दिखता रहा. लोकतंत्र में न केवल दिखना चाहिए कि मतदान हो रहा है, असल में बिना डरे, बिना हक छीने चुनाव हो तो ही चुनाव माने जाएंगे.

बंगाल में चुनाव आयोग ही जीता है, इस का एक सुबूत नए मुख्यमंत्री द्वारा सुब्रतो गुप्ता के मुख्यमंत्री के निजी सचिव की नियुक्ति है. सुब्रतो को चुनाव आयोग ने स्पैशल औब्जर्वर के पद पर सिर्फ चुनाव के लिए नियुक्त किया था.

चुनाव आयोग चाहता तो सभी काटे वोटरों को अस्थायी रूप से वोट डालने का अधिकार दे सकता था क्योंकि उंगली पर लगे निशान से कोई दोबारा वोट नहीं दे सकता. जिन के नाम कटे वे भारतीय नागरिक हैं और इन सब ने पिछले कई चुनावों में मतदान किया था. इन सब के तो राज्य में 2002 की वोटर लिस्ट में भी नाम थे. 27 लाख मतदाताओं में से किसी को भी न्यायिक अधिकारियों द्वारा वोटर लिस्ट से अभी तक बाहर नहीं किया गया है. इस के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रैल, 2026 को मतदाता सूची के लिए बनाई गई अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा अपीलों के निबटारे के लिए कोई समयसीमा निर्धारित करने से इनकार कर दिया था.

भाजपा को भाया एसआईआर का गणित

चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने ममता बनर्जी की हार में कैसे भूमिका निभाई, इस को समझने के लिए भाजपा और टीएमसी को मिले वोट शेयर को देखना होगा. पश्चिम बंगाल में विधानसभा की 294 सीटें हैं. 2021 के विधानसभा में टीएमसी को 2 करोड़, 89 लाख, 68 हजार, 281 वोट लगभग 48.02 फीसदी वोट और 215 सीटें मिली थीं. वहीं भाजपा को 2 करोड़, 28 लाख, 50 हजार, 710 वोट यानी 37.97 फीसदी वोट और 77 सीटें मिली थीं. दोनों के बीच वोटों का अंतर 60.6 लाख था.

2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 2 करोड़, 92 लाख, 18 हजार, 815 वोट यानी लगभग 45.85 फीसदी वोट और 206 सीटें मिलीं. दूसरी तरफ टीएमसी को 2 करोड़, 60 लाख, 02 हजार, 017 वोट यानी लगभग 40.80 फीसदी और 81 सीटें मिलीं. टीएमसी और भाजपा के बीच वोट का अंतर करीब 32.17 लाख वोट का रहा. भाजपा के वोट 8 फीसदी बढ़े तो टीएससी के वोट 7 फीसदी गिर गए.

पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटाए गए थे. इन में पहले चरण में 27 लाख वोटरों को जांच के दायरे में रख कर वोट डालने की अनुमति नहीं दी गई. इस के बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घट कर 6.75 करोड़ रह गई थी. जिन सीटों पर 5,000 से कम वोट डिलीट हुए हैं, वहां की 13 में से 12 सीटें भाजपा ने जीती हैं. इसी तरह जहां 5,000 से 15,000 वोट कटे हैं, वहां की 64 में से भाजपा ने 46, जहां 15,000 से 25,000 वोट कटे हैं, वहां की 69 में से भाजपा ने 44 और जहां 25,000 से ज्यादा वोट कटे हैं, वहां की 147 सीटों में से 88 सीटें भाजपा ने जीती हैं.

इस तरह से देखा जा सकता है कि भाजपा की जीत में एक भूमिका एसआईआर से मुसलिम मतदाताओं की घटी संख्या भी है. यह केवल व्यावहारिक राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि दुनिया में लोकतंत्र पर होने वाली बहसों का हिस्सा बनने वाला है. एसआईआर के बाद हटाए गए नामों में 57.47 लाख हिंदू (63 प्रतिशत) और 31.1 लाख मुसलिम (34 प्रतिशत) हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य में मुसलिम आबादी 27 प्रतिशत है. पश्चिम बंगाल के चुनावी आंकडे इस बात को सही साबित करते हैं कि टीएमसी की हार के पीछे एसआईआर एक प्रमुख कारण रहा है. इस के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार है और यह चुनाव कम, थोपा गया निर्णय ज्यादा नजर आने लगा है.

ममता ने हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ा

जैसी कि उम्मीद थी कि टीएमसी नेता और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस तरह का चुनाव अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा. उन के मुताबिक, उन के साथ मारपीट की गई. ममता बनर्जी ने कहा है कि अब उन का लक्ष्य इंडिया गठबंधन को मजबूत करना है. वे एक छोटे कार्यकर्ता के रूप में इसे मजबूत बनाने का काम करेंगी. अब तो उन के पास कुरसी भी नहीं है, इसलिए एक आम इंसान की तरह काम करेंगी. अब वे आजाद हैं. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लोगों की सेवा में बिता दी है. अपनी 15 साल की सरकार में उन्होंने न तो एक पैसा सैलरी ली और न ही पैंशन ली है. अब वे आजाद हैं तो वे काम करेंगी, जो उन्हें करना है.

तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों से संबंधित कई गंभीर आरोप हैं जिन की जांच केंद्रीय एजेंसियां ईडी और सीबीआई कर रही हैं. इन में कोयला घोटाला, मनीलौन्ड्रिंग और अवैध खनन के आरोप शामिल हैं. इस में एक पश्चिम बंगाल के आसनसोल क्षेत्र में ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड की खदानों से अवैध रूप से कोयला निकाले जाने का आरोप है. ईडी के अनुसार, इस अवैध व्यापार से हुई कमाई के मुख्य लाभार्थियों में अभिषेक बनर्जी और उन के करीबी शामिल हैं. जांच एजेंसियां उन की पत्नी रुजिरा बनर्जी के बैंकौक और लंदन स्थित विदेशी खातों की जांच कर रही हैं, जिन में करोड़ों रुपए के लेनदेन का संदेह है. पश्चिम बंगाल शिक्षक भरती घोटाला भी मुद्दा बन गया था.

सीबीआई ने अपनी पूरक चार्जशीट में एक ‘अभिषेक बनर्जी’ का नाम लिया है, जिस ने कथित तौर पर अवैध नियुक्तियों के लिए 15 करोड़ रुपए की मांग की थी. पशु तस्करी और 2026 के चुनावों में हुई हिंसा में भी अन्य लोगों का हाथ बताया जा रहा है. मई 2026 में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा नेताओं ने अर्जुन सिंह व अभिषेक बनर्जी पर शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथरथ की हत्या करवाने का सीधा आरोप लगाया है. यह बात दूसरी कि जांच एजेंसियां सैकड़ों गवाहों को अदालतों में पेश कर के मामले बना कर ममता बनर्जी को जेल में नहीं तो अदालतों के गलियारों में तो बैठा ही सकती हैं.

आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह कहते हैं, ‘देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है और यदि यही स्थिति जारी रही तो लोकतंत्र खत्म  हो जाएगा. पश्चिम बंगाल में यदि मतदाताओं को मतदान से वंचित नहीं किया गया होता तो चुनाव के परिणाम पूरी तरह अलग होते. यह लोकतंत्र की जीत नहीं, बल्कि लूटतंत्र की जीत है.’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी संजय सिंह ने कहा, ‘यदि समय रहते सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया होता तो लाखों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते थे. यह वोटरों के लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ न्याय नहीं है. देश में जिस तरह से लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग हो रहा है और यदि यही स्थिति जारी रही तो लोकतंत्र कमजोर होता जाएगा. इतिहास में उन लोगों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा, जो इन परिस्थितियों में चुप रहते हैं.’

अपनी प्रतिक्रिया देते वरिष्ठ पत्रकार विष्णु नागर अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, ‘इन्होंने लोकतांत्रिक विधि को इतना भ्रष्ट कर दिया है कि आज पश्चिम बंगाल उस का शिकार है. कल केरल हो सकता है. जहां आज उस का कोई अस्तित्व नहीं है. कल संसद में ये 400 के पार जा सकते हैं. अगली बार 543 में से 500 भी ला सकते हैं. चुनाव लूटने में तो बेशर्मी ही इन का एकमात्र आसरा है.’

वे आगे लिखते हैं, ‘भ्रष्ट चुनावी व्यवस्था को सुधारना क्या संभव रह गया है? जनता में गहरा अंसतोष है. मगर उस को प्रशासनिक और न्यायिक मशीनरी के जरिए प्रतिबंधित करने की अनैतिक गैरकानूनी विधियां इन के पास हैं. सारी वैधानिक संस्थाएं इन के सामने हथियार डाल चुकी हैं या खरीद कर अपहर्त कर ली गई हैं. इन्होंने नैतिक बोध की लगभग पूरी तरह से हत्या कर दी है.’

राजद यानी राष्ट्रीय जनता दल की नेता कंचना यादव ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते लिखा कि ‘बिहार के बाद पश्चिम बंगाल का चुनाव भाजपा ने जीता नहीं, बल्कि लूटा है. केंद्रीय बलों, सीबीआई, धनबल और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मदद से यह किया गया है. इसलिए भाजपा इसे चाहे जितनी भी जीत के रूप में मनाए, लेकिन इतिहास में इसे लोकतंत्र की हत्या के रूप में याद रखा जाएगा.’

जो तरीका भाजपा ने अपनाया है, वह एक विदेशी शासक का नई जमीन हथियाने का है जिस में टैंक, मिसाइल छोड़ कर सबकुछ इस्तेमाल किया गया. भाजपा को अपनी नीतियों के प्रचार करने की जरूरत ही नहीं थी जैसे पहले के आक्रमण करने वाले राजा नहीं करते थे. एक धर्मभीरु, गरीब, समाज इस तरह की चुनौती का सामना नहीं कर सकता क्योंकि एक तरफ बंदूकें थीं और दूसरी तरफ पार्टियों के झंडे. 1947 में जो आजादी मिली और 1950 में जो संविधान मिला वह अब समाप्त सा ही है. अब अगर रिजर्वेशन पर गाज गिरे, अब अगर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ परिवारों की महिलाओं के अधिकार, जिन,में अब अगर सत्ता का केंद्र पास के मंदिर का पुजारी हो जो पौराणिक सोच थोपे, तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि अब भाजपा का कैडर नहीं बल्कि  चुनाव आयोग का कैडर अगले सभी चुनाव लड़ेगा,

तुनकमिजाज ममता में क्या बदलाव आएगा

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में सब से बड़ी लड़ाई पश्चिम बंगाल में लड़ी गई. पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की हार का प्रभाव पूरे विपक्ष पर पड़ा है. ममता बनर्जी को सब से मजबूत विपक्षी नेता माना जाता था. लोकसभा में उन की कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बाद तीसरी सब से बड़ी पार्टी है. सब से बड़ा सवाल यही है कि तुनकमिजाज स्वभाव की ममता बनर्जी अपने बयान पर कब तक कायम रह पाएंगी?

2024 के लोकसभा चुनाव के पहले इंडिया ब्लौक बनाने के समय ममता बनर्जी सब से अधिक सक्रिय थीं. जद (यू) के नेता नीतीश कुमार को ले कर सभी विपक्षी नेताओं से बात कराने का काम ममता बनर्जी ने किया. जब इंडिया ब्लौक का संयोजक चुनने का नंबर आया तो ममता बनर्जी नीतीश कुमार के खिलाफ हो गईं. ममता बनर्जी के खराब व्यवहार के चलते नीतीश कुमार इंडिया ब्लौक छोड़ कर चले गए. अगर यह गलती विपक्ष से न हुई होती तो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना संभव ही न होता. जब इंडिया ब्लौक को दोबारा मजबूत करने की बात हो रही है तब सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी अपनी तुनकमिजाजी छोड़ पाएंगी?

भाजपा के खिलाफ एकजुट होगा विपक्ष

दूसरी ओर 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 240 सीटें मिली थीं. विपक्ष में कांग्रेस को 99, समाजवादी पार्टी को 37 और टीएमसी को 29 सीटें मिली थीं. लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने अपनी गलतियों में सुधार किया. इस के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में विपक्ष को हरा कर दिखा दिया. तब भी ममता बनर्जी को लग रहा था कि भाजपा पश्चिम बंगाल का चुनाव नहीं हरा पाएगी. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी कांग्रेस या किसी और के साथ समझौता करने को तैयार न थीं. अब अपना किला गंवाने के बाद उन की समझ में विपक्षी एकता का महत्त्व आया है. यह गुस्सा अब निरर्थक है. लोकतंत्र की लुटिया तो उन्होंने ही डुबो दी जिन्हें इस से लाभ मिल रहा था.

क्षेत्रीय पार्टियां

आज के दौर में चुनावी हार के बाद क्षेत्रीय पार्टियों के लिए अपनी पार्टी को टूट से बचा पाना मुश्किल होता है. दिल्ली की हार के बाद आम आदमी पार्टी टूट गई. इस बार चुनावी हार में एसआईआर एक प्रमुख मुद्दा है लेकिन इस के अलावा भी कई कारण होते हैं जिन को विपक्षी दल स्वीकार नहीं करते. ममता बनर्जी जैसे ही देश की राजनीति में अपना समय देंगी, पश्चिम बंगाल में उन की रहीसही पार्टी खतरे में पड़ जाएगी. भाजपा जिस तरह से धर्म की राजनीति कर रही है, दूसरे दलों के पास उस का विकल्प नहीं है. विपक्षी दलों में एकता नहीं है. सारे दल वैचारिक तौर पर अलगअलग हैं. इन का जन्म ही कांग्रेस के विरोध में हुआ था. ममता बनर्जी को अपने दल में पूजापाठी मन से हिंदूमुसलिम करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है, भाजपा उन्हें तुरंत ले जाएगी.

विपक्ष को एकजुट करना सब से बड़ी परेशानी है. 2027 में सब से बड़ा विधानसभा का चुनाव उत्तर प्रदेश में है. उत्तर प्रदेश की राजनीति भाजपा बनाम छोटेछोटे दलों की बची हुई है. यहां भी बसपा को विपक्ष के खेमे में शामिल करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि वह अभी तक गैस्ट हाउस कांड को भुला नहीं सकी है. यह लोकतंत्र के लिए बहुत ही दुखद है. पश्चिम बंगाल में वामदल, एआईएमआईएम, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस थे, जिन में धर्मनिरपेक्ष भाजपा विरोधी  वोट बंट जाता है, जबकि भाजपा बहुसंख्यकों की राजनीति करती है और उस का वोट किसी पार्टी में नहीं बंटता.

विपक्ष की एकता और चुनावी रणनीति केवल कागजों पर बनती है. अगर कांग्रेस ने तमिलनाडु में विजय की पार्टी से समझौता कर लिया होता तो उस के लिए वह बड़ा फायदेमंद होता. लेकिन कांग्रेसी नेता पी चिदंबरम ने मना किया तो कांग्रेस साथ नहीं गई. इसी तरह की तमाम गलतियां विपक्ष ने 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले और बाद में की हैं, जिन से भाजपा को जीत मिलती जा रही है. लगातार चुनाव आयोग, सीबीआई, ईवीएम और ईडी पर आरोप लगाने से जनता को समझ आ जाता है कि विपक्ष अपना नकारापन छिपा रहा है. देश में जो व्यवस्था बनी है उसी के हिसाब से काम करना पडता है. इसी राह पर चलते हुए भाजपा को हराया जा सकता है. भाजपा को हराने के लिए विपक्ष अब कोई दूसरा चुनाव आयोग तो नहीं बना सकता.

पश्चिम बंगाल की हार के बाद अगर विपक्ष एकजुट हो सकेगा तब उसे आगे सफलता मिल सकती है. अगर बिहार की तरह चुनाव में हार के बाद निष्क्रिय हो कर बैठ जाएगा तो उस का भला नहीं हो सकता. विपक्ष के लिए जरूरी है कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए सही तरह से चुनावी रणनीति तैयार करे. सो, ही वह लड़ाई में वापस आ पाएगा. जब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव बिहार में वोट अधिकार रैली कर रहे थे, तब इस में ममता बनर्जी शामिल नहीं हुईं. इस के चलते ही जब पश्चिम बंगाल में एसआईआर हो रहा था तब भी विपक्षी दलों ने पूरी ताकत से इस मुद्दे पर उन का साथ नहीं दिया.

विपक्ष को यह मान लेना चाहिए कि भाजपा से मुकाबला केवल कांग्रेस कर सकती है. ऐसे में वह कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करे और कांग्रेस भी बड़ा दिल दिखाए. वह क्षेत्रीय दलों को खुलेदिल से अपनाए, तभी विपक्ष भाजपा का मुकाबला करने के लिए मजबूती से खड़ा हो पाएगा. विपक्षी दलों को वैसे ही एकजुट होना पड़ेगा जैसे कांग्रेस के खिलाफ 1975 में एकजुट हुआ था. यह काम आज के दौर में मुश्किल है, क्योंकि हर पार्टी के नेताओं ने भ्रष्टाचार किया है. उन की इस कमजोर नस को दबा कर केंद्र की भाजपा सरकार उन की एकजुटता को तोड़ सकती है.

’80 बनाम 20′ का मुद्दा विकास में बाधक है

’80 बनाम 20′ का मुद्दा भले ही भाजपा को चुनाव जीतने में मदद कर रहा हो, पर देश का विकास तभी होगा जब 100 फीसदी लोग आपस में मिलजुल कर आगे चलेंगे. ’80 बनाम 20′ का मुद्दा धार्मिक विभाजन की बात करता है. महाराष्ट्र में ‘बंटोगे तो कटोगे’ का नारा खूब चला था और भाजपा को इस का लाभ मिला. पश्चिम बंगाल में भी यह मुद्दा भाजपा की जीत का बड़ा कारण बना. भाजपा ने ममता बनर्जी को एंटी हिंदू साबित कर के जीत हासिल कर ली. यह देश के विकास में रोड़ा अटकाने वाला काम है.

धर्म पर राजनीति करने वाले दल धर्म के आसपास ही अपना विकास देखते हैं. यह बात केवल भारत की ही नहीं है, दुनिया के तमाम देश अब धर्म की राजनीति पर आगे बढ़ रहे हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के पीछे धर्म की राजनीति का प्रभाव रहा है. नेपाल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका और भारत एक ही तरह के राजकाज से चल रहे हैं. दक्षिण एशिया के सभी देशों में धार्मिक कट्टरता और संकीर्णता एक नया खतरा बन कर मंडरा रही है.

नेपाल ने राजशाही को खत्म कर के अपने लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था चुनी थी. अब फिर नेपाल को एक हिंदू राज्य में बदलने की कोशिश हो रही है. यही हाल बंगलादेश का हुआ है. श्रीलंका में लोकतंत्र खत्म हो गया है. भारत के आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू समर्थक दलों के लोग भारत और नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. श्रीलंका में अहिंसा में विश्वास रखने वाले बौद्ध धर्म के कई भिक्षुओं ने मुसलिमों के खिलाफ आंदोलन चला रखा है. मुसलिमों के धार्मिक स्थलों और उन की बस्तियों पर अकसर हमले किए जाते हैं. देश में मुसलिमों के खिलाफ नफरत में तेजी से वृद्धि हुई है.

म्यांमार में तो बौद्ध भिक्षु ही नहीं, वहां की सरकार भी रोहिंग्या मुसलिमों के खिलाफ है. सैकड़ों रोहिंग्या मुसलिम मारे जा चुके हैं और उन की कई बस्तियां जला कर खाक कर दी गई हैं. हजारों रोहिंग्या भाग कर दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं. पाकिस्तान में कहने को बने हुए लोकतंत्र को सब से बड़ा खतरा ही वहां के धार्मिक कट्टरपंथियों से है. धार्मिक कट्टरपंथ का मुकाबला करने में वहां का लोकतंत्र फेल ही हो गया है. ईशनिंदा जैसे विषयों से जुड़े कानूनों ने धार्मिक चरमपंथ को बढ़ावा दिया है और अल्पसंख्यक पहले से अधिक असहाय व असुरक्षित हो गए हैं. धार्मिक कट्टरपंथी देश के लोकतांत्रिक संस्थानों पर भी असर डालने लगे हैं. राजनीतिक दलों में धार्मिक कट्टरता का मुकाबला करने का संकल्प खत्म हो गया है.

धार्मिक कट्टरपंथ भी एक तरह की राजनीतिक पार्टी है जो थोड़े से लोगों के बल पर राजनीति में अपना बड़ा हिस्सा हासिल करना चाहता है. ये कट्टरपंथी लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते. इन के लिए जनता के मौलिक अधिकारों का मतलब नहीं है. इन्हें सिर्फ पूजापाठ से मतलब है. दक्षिण एशियाई देशों में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और पिछड़ापन है. इस की सब से बड़ी वजह धार्मिक कट्टरवाद ही है. निर्माण और सुप्रबंध धर्म से नहीं होता, बुद्धि से होता है. देश का माहौल स्थायी, सुरक्षा, स्वतंत्रताओं का हो तो भविष्य के लिए काम करने की प्रेरणा जागती है. लोकतंत्र में सरकार का काम देश चलाने का होता है. मंदिर चलाना सरकार का काम नहीं होता. लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं पर तंत्र स्थायी होता है, नीतियां धीरेधीरे बदलती हैं, रातोंरात नहीं.

भाजपा सरकार मंदिर चलाने में जुटी है. इस का सब से बड़ा कारण यह है कि मंदिर से पार्टी को पैसा और प्रचार दोनों मिलते हैं. सालभर देश में छोटेबड़े धार्मिक आयोजन होते रहते हैं, जो धर्म का प्रचार करते हैं. धर्म और राजनीति के बीच एक बहुत ही महीन रेखा खिंची है, जिस का भेद अब धीरेधीरे मिट गया है. अब विपक्षी दल भी धर्म की तरफ बढ़ने का प्रयास करते हैं पर वहीं उन के सामने ’80 बनाम 20′ का खतरा बढ़ जाता है. ममता बनर्जी ने एक और जगन्नाथ मंदिर दीघा में बनाया, इस के बाद भी उन की हार हो गई. राजनीति और धर्म के बीच रेखा के धुंधला होने से पक्ष और विपक्ष दोनों ही धार्मिक राजनीति की तरफ बढ़ रहे हैं जिस से देश का विकास प्रभावित हो रहा है. SIR Process

 

 

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