Political Defection: अब से कुछ ही साल पहले कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के तौर पर उभरी आम आदमी पार्टी की एक बड़ी खूबी यह थी कि उस में गैरराजनीतिक लोगों की भरमार थी. इस से जुड़े युवाओं में अधिकतर मध्यवर्गीय थे जिन के दिलों में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था. ये युवा अमीरीगरीबी, धर्म और जातपांत की मानसिकता से कोसों दूर थे. लेकिन चंद सालों में ही आप से जुड़े अधिकतर नेता अपने सिद्धांतों से भटक कर चमकदमक की गिरफ्त में आ गए. राघव चड्डा सहित 7 सांसदों का आप छोड़ कर भाजपा में शामिल होना इस का एक उदाहरण है.
भाजपा की एक बड़ी खूबी यह है कि वह कई मोरचों पर एकसाथ काम कर सकती है क्योंकि उस के कर्मठ कार्यकर्ता पौराणिक युग के कर्मकांडी, वर्णव्यवस्था वाला माहौल फिर से जमाने में कभी भी कहीं भी और हर जगह भी लगे रहते हैं. एक तरफ पश्चिम बंगाल में भाजपा ममता बनर्जी के किले को ध्वस्त करने लगी थी तो वहीं वह दिल्ली और पंजाब में नार्सिस्ट राघव चड्ढा को फोड़ कर आम आदमी पार्टी के चीथड़े करने में लगी हुई थी. उस समय अरविंद केजरीवाल जज के सामने खुद जिरह करने में व्यस्त थे.
नार्सिसस ग्रीक पौराणिक कथाओं का एक पात्र है जो बहुत सुंदर युवक था जैसा कि ज्यादा स्मार्ट और सुंदर लोगों के साथ अकसर होता है वही नार्सिसस के साथ हुआ. वह आत्ममुग्धता, स्वार्थ और अकड़ का शिकार हो गया जिसे अपने मुकाबले अपने वाले ही तुच्छ यानी घटिया, मामूली, बेकार और छोटे नजर आने लगे.
यही आम आदमी पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए खूबसूरत, महत्तवाकांक्षी और स्वार्थी सांसद राघव चड्डा के साथ हुआ जिसे आप में घुटन होने लगी थी, तमाम पार्टी भ्रष्ट और जहरीली नजर आने लगी थी. उसे लग रहा था कि आप में उस का कोई भविष्य नहीं है और अपनी काबिलीयत के मुताबिक वह कुछ ज्यादा डिजर्व करता है. सो, वह एक ऐसी पार्टी में चला गया जो पावर में है, साफ़सुथरी है, भ्रष्ट नहीं है, उस में जहरीले लोग नहीं हैं, वह पार्टी व्यक्तिवादी नहीं है और कुछ स्वार्थी लोगों के शिकंजे में नहीं है.
नार्सिसस शब्द या व्यवहार से पैदा हुए नार्सिसिज्म नाम के दिमागी नुक्स की सब से पहले मशहूर मनोवैज्ञानिक सिंगमड फ्रायड ने परिभाषा दी. इस के बाद वक्तवक्त पर कई मनोवैज्ञानिकों ने इस पर शोध किए लेकिन सभी इस बात पर सहमत थे कि कई लोगों में आत्ममुग्धता का रोग होता है और यह सामान्य अवस्था में कोई बहुत बड़ा खतरा नहीं . बाद में इस बीमारी की लपेट में आए लोगों को नार्सिसिटिक कहा जाने लगा.
नार्सिसिटिक आदमी हमेशा बेचैन और परेशान रहता है. उसे लगता रहता है कि वह सब से काबिल और खूबसूरत है. बाकी उस के आसपास के लोग भोंदू, निकम्मे, गंवार और नाकाबिल हैं जिन के साथ रहना अपनी जिंदगी बरबाद करना है. लिहाजा, ऐसे लोगों में रहा जाए जो उस की कद्र करें और महत्तवाकांक्षाएं पूरी कर पाएं. यानी, नार्सिसिटिक आदमी स्वार्थी और लालची भी हो जाता है जिसे स्वीकारने में उसे कोफ़्त होने लगती है. यही कोफ़्त कुंठा में तबदील हो जाती है जिसे मनोविज्ञान की भाषा में सुपीरियौरिटी कौम्पलैक्स कहा जाता है.
यही राघव चड्डा ने किया तो सियासी लिहाज और रिवाज के मुताबिक नया कुछ नहीं किया. देश में दलबदल बहुत आम है और अकसर छोटेमोटेमझोले नेता सब से पहले उसी सीढ़ी को धक्का दे कर गिराते हैं जिस पर से हो कर वे छत पर पहुंचे होते हैं.
कहानी छत पर पहुंचने की
साल 2011-12 में समाजसेवी अन्ना हजारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन ने देशभर के युवाओ को एकजुट करने में कामयाबी हासिल कर ली थी. अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से प्रभावित युवाओं को लगने लगा था कि अब शिक्षित युवाओं को अपना कैरियर और कामधंधा छोड़ कर कांग्रेस के खिलाफ राजनीति में आ जाना चाहिए, तभी देश सुधरेगा.
ऐसे ही हजारों नौजवानों में से एक थे गोरेचिट्टे राघव चड्डा जो दिल्ली के लगभग उच्चवर्गीय गैरराजनीतिक पंजाबी खत्री परिवार से थे. पेशे से चार्टर अकाउंटैंट राघव को आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने शुरू से ही मुंह लगाए रखा क्योंकि उन में वे खूबियां थीं जो मौजूदा दौर के युवाओं में होनी चाहिए. फर्राटे से इंग्लिश बोल लेना इन खूबियों में सब से अहम थी. यह वह दौर था जब मीडिया आप को हाथोंहाथ ले रहा था.
आप को भी वाकपटु नेताओं की जरूरत थी जो टीबी डिबेट्स में जा कर पार्टी का पक्ष मजबूती से रख सकें. यह काम चूंकि राघव चड्डा बखूबी कर रहे थे, इसलिए आम लोग उन्हें जाननेपहचानने भी लगे थे. 2012 में ही जब लोकपाल बिल का मसौदा तैयार हो रहा था तब केजरीवाल ने राघव को भी इस टीम में शामिल किया था. इस के बाद उन्हें आप का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बना दिया गया. साल 2015 में महज 26 साल के इस युवा को आप के कोषाध्यक्ष जैसे अहम पद से भी नवाजा गया.
इस दौरान आप में टूटफूट भी जम कर हुई. अन्ना के आंदोलन के दौरान कई नामी पत्रकार, साहित्यकार और बुद्धिजीवी आप से जुड़े थे. वे एकएक कर खिसक लिए, मसलन योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, शाजिया इल्मी, एंकर आशुतोष और कैप्टन जी आर गोपीनाथ वगैरह.
आप छोड़ कर जाने वालों में से कुछ तो वे थे जो भगवावादी सरकार को पिछले दरवाजे से लाने की जुगत में थे तो कुछ बेहद लोकतांत्रिक हार्डकोर थे. दूसरे वर्ग को लगता था कि भले ही आईआरएस हों, `अरविंद` उन के सामने कुछ नहीं जो देखते ही देखते दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा और वाकई में अपने वादों व इरादों के मुताबिक आम लोगों के भले के काम ईमानदारी से करने लगा. इन में शिक्षा और सेहत से जुड़े कामों की तो आज भी मिसाल दी जाती है कि जो काम दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने किए वे पहले कोई और नहीं कर पाया था. पहला वर्ग तो 2014 में भाजपा सरकार बनते ही आम आदमी आंदोलन से अलग हो गया जिन में किरण बेदी, अनुपम खेर, कुमार विश्वास थे.
तब तक राघव चड्डा की हैसियत दोयम दर्जे की थी. लेकिन केजरीवाल उन्हें बराबर भाव देते रहे. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें दक्षिणी दिल्ली से टिकट दिया गया जिस में वे भाजपा के रमेश बिधूडी के मुकाबले हार गए. 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्हें दिल्ली के राजिंदरनगर सीट से लड़ाया गया. आप की प्रचंड लहर की वजह से वे जीत गए. इस के बाद राघव को दिल्ली जल बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया.
साल 2022 राघव के लिए एक बड़ी सौगात ले कर आया जब अरविंद केजरीवाल ने उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला लिया. किसी भी 33 साल के युवा के लिए यह किसी सपने के पूरे होने जैसी बात थी. वे देश के सब से कम उम्र के राज्यसभा सांसद कहलाए. यह, दरअसल, इनाम था क्योंकि 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में सह प्रभारी के रूप में राघव ने काफी मेहनत की थी. आप तब 117 में से 92 सीटें जीत कर न केवल सत्ता पर काबिज हुई थी बल्कि देश की पहली ऐसी छोटी क्षेत्रीय पार्टी बन गई थी जिसे 2 राज्यों में बहुमत मिला हुआ था.
शायद यही वह मुकाम था जहां से राघव के अंदर का नार्सिसस सिर उठाने लगा था. पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता निभाने के लिए उन्होंने खासतौर से भाजपा पर हमले जारी रखे. ‘भाजपा अनपढ़ गुंडों की पार्टी है’ उन का यह बयान काफी सुर्ख़ियों में रहा था.
जैसे ही राज्यसभा में आप के नेता संजय सिंह की शराब घोटाले में गिरफ्तारी हुई तो यह पद उन्हें सौंप दिया गया. गुजरात विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाने सहित कई छोटीमोटी उपलब्धियां राघव के खाते में दर्ज हुईं. यह सिर्फ और सिर्फ अरविंद केजरीवाल की मेहरबानियां और भरोसा दोनों थे जिसे तोड़ने से पहले राघव ने कुछ नहीं सोचा, वे अपनी काल्पनिक उपलब्धियों में डूबतेइतराते रहे.
मुमकिन है अरविंद अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर उन्हें देखने लगे हों हालांकि सार्वजनिक तौर पर ऐसा कोई इशारा उन्होंने कभी नहीं किया. मुमकिन यह भी है कि राघव को ही ऐसा लगने लगा हो कि अब पार्टी में वही साफ़सुथरे और काबिल नेता बचे हैं जो कुछ कर गुजरने की कूवत रखता है. वरना तो अधिकतर अधेड़, फूहड़, बूढ़े हैं जो समय की खा रहे हैं और जिन पर आएदिन भाजपा और कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रहती हैं. हालांकि इस वक्त तक वे खुद 35-40 करोड़ के आसामी हो गए थे. इतना पैसा वे सीए रहते तो नहीं कमा सकते थे.
परिणीति से शादी ने दिलाई शोहरत
अब तक इस में भी कोई शक नहीं रह गया था कि राघव चड्डा युवाओं के एक बड़े वर्ग में लोकप्रिय हो चले थे. लेकिन अरविंद केजरीवाल की तरह रोलमौडल नहीं बन पाए थे. जेन जी स्वाभाविक तौर पर अपनी उम्रजनित उत्सुकता के चलते उन में दिलचस्पी लेने लगी थी और सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर उन्हें फौलो भी करने लगी थी. इस शोहरत को चारचांद लगाए अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा से उन की शादी ने जो काफी चर्चित रही थी.
यह शादी सितंबर 2023 में उदयपुर के महंगे होटल लीला पैलेस में हुई थी. मेहमानों को एक दूसरे महंगे होटल ताज लेक पैलेस में ठहराया गया था. इस होटल के सौ से भी ज्यादा कमरे दो दिनों के लिए बुक किए गए थे. इस राजसी टाइप की शादी में करोड़ों रुपए खर्च हुए थे जो आप की सादगी के सिद्धांत के चिथड़े उड़ाते हुए थे.
इस न्यू कपल के मेहमानों में खास थे अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान, आदित्य ठाकरे, संजय सिंह, आतिशी और संजय सिंह सहित सौरभ भारद्वाज यानी आप की पूरी टीम ने शिरकत की थी. टैनिस स्टार सानिया मिर्जा भी इस शादी में परिणीति की सहेली होने के नाते शामिल हुईं थीं. पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह और मशहूर फैशन डिजायनर मनीष मल्होत्रा भी खास मेहमानों में शुमार थे. शादी कुछ विवादों से भी घिरी रही थी जिन के कोई खास माने नहीं लेकिन इतना तय है कि खर्च ने राघव को नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी के सादगी के दावे को जरूर कठघरे में खड़ा कर दिया था.
जिस तरह राघव चड्डा राजनीति में कोई बहुत बड़ा नाम नहीं है उसी तरह परिणीति भी बहुत बड़ी ऐक्ट्रेस नहीं हैं जिन के हिस्से में बी और सी ग्रेड की फ़िल्में ज्यादा आईं, मसलन ‘लेडीज वर्सेज रिकी बहल’, ‘इश्कजादे’, ‘हंसी तो फंसी’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’. सिर्फ ‘गोलमाल अगेन’ इकलौती फिल्म थी जिस ने बौक्स औफिस पर कमाई की थी. बाकी दर्जनभर फिल्मों ने तो बौक्स औफिस पर पानी भी नहीं मांगा था.
शादी के बाद बदले
शादी के बाद पत्नी और गृहस्थी में तो राघव का मन लग गया और जल्द ही वे एक बेटे के पिता भी बन गये लेकिन राजनीति और आप में अपनी भूमिका को ले कर वे एक छटपटाहट का शिकार होने लगे. दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार से पहले ईडी, सीबीआई जैसी एजेंसिया आप के पीछे लगा ही दी गई थीं. हार के बाद भाजपा के अरविंद केजरीवाल और दूसरे नेताओं पर ताबड़तोड़ हमले लगातार बढ़ते जा रहे थे. नेताओं को तरहतरह से परेशान कर जेल भेजा जा रहा था तब राघव की तटस्थता और ख़ामोशी को हर किसी ने नोटिस किया था. मार्च 2021 में जब शराब नीति घोटाले में अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया था तब आप के प्रमुख नेता आतिशी, सौरभ भारद्वाज, संदीप पाठक और गोपाल राय तो सड़कों पर विरोध करते दिखे थे लेकिन राघव के अतेपते नहीं थे.
असल नार्सिसस यहीं से शुरू हुआ लगता है कि तथाकथित रूप से काबिल होने के बाद भी उन्हें कामचलाऊ मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं दिया गया और आतिशी को क्यों दिया गया. इस के बाद राघव पार्टी के अहम कार्यक्रमों से गैरहाजिर रह कर अपना विरोध जताने लगे. इस का दूसरा पहलू फंस जाने का डर भी था क्योंकि ईडी ने नोटिस उन्हें भी दिया था.
लेकिन अब तक भाजपा राघव के डर, कमजोरी और महत्त्वाकांक्षाओं की रीडिंग ले चुकी थी, लिहाजा, उस ने उन पर डोरे डालना शुरू कर दिए. साम, दाम, दंड, भेद में माहिर भाजपा की ग्रिप में आने से राघव खुद को बचा नहीं पा रहे थे. जहां उन्हें सुरक्षा और इनाम दोनों मिलना तय दिख रहे थे ठीक वैसे ही जैसे वक्तवक्त पर कांग्रेस के दर्जनभर नेताओं को दिखने लगे थे. इन में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सब से उपर है जो 22 विधायकों सहित भाजपा में शामिल हो गए थे और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिर गई थी. जिस के एवज में सिंधिया इन दिनों केंद्रीय मंत्री हैं.
कल तक तेजतर्रार आवाज में बोलते रहने वाले राघव ने खासतौर से भाजपा के खिलाफ राज्यसभा में भी बोलना बंद कर दिया तो अरविंद केजरीवाल का माथा ठनकना कुदरती बात थी. हालांकि गुपचुप पक रही खिचड़ी की गंध हर किसी को आई थी पर इसे गंभीरता से किसी ने नहीं लिया था. इस की 2 वजहें थीं. पहली तो यह कि राघव कोई बड़ा खतरा पार्टी के लिए नहीं थे, दूसरी वजह थी पार्टी का उन पर अटूट भरोसा.
लेकिन आप का भरोसा तोड़ने में राघव ने देर नहीं लगाई. हद उस वक्त हो गई जब उन्होंने दलबदल कानून से बचने यानी अपनी सांसदी सलामत रखने के लिए दूसरे सांसदों को पटाना व घेरना शुरू कर दिया. ये खबरें जैसे ही केजरीवाल तक पहुंचीं, उन्होंने बीती 2 अप्रैल को उन्हें राज्यसभा के उपनेता पद से हटा दिया.
यही राघव चाहते थे क्योंकि वे खुद पार्टी छोड़ने की हिम्मत तब नहीं जुटा पा रहे थे. अंदर का गिल्ट उन्हें रोक रहा था. आप और केजरीवाल के एहसान भी दबाब का काम कर रहे थे जिस से वे 24 अप्रैल को मुक्त हो कर भगवा खेमे में जा बैठे. पार्टी छोड़ने के लिए उन्होंने वही घिसेपिटे बहाने बनाए और गिनाए जिन का जिक्र ऊपर किया गया है. इस दिन उन्होंने खुद सहित सात सांसदों के आप छोड़ भाजपा जौइन करने की घोषणा की. बाकी 6 सांसद संदीप पाठक, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सहनी भी उन्हीं के जैसे महत्त्वाकांक्षी और कभी के लो प्रोफाइल नेता हैं. देशभर के लोगों ने इस टूटफूट को गौर से देखा और यह मान लिया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह का जवाव नहीं जिन्होंने कोई दर्जनभर छोटी पार्टियां मिटा कर रख दी हैं.
युवाओं ने निकाली भड़ास
राघव का यह कदम आम आदमी से जुड़े युवाओं को रास नहीं आया और उन्होंने धड़ाधड़ सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स पर उन्हें अनफौलो करना शुरू कर दिया. 23 अप्रैल तक सोशल मीडिया पर उन के 1.46 करोड़ फौलोअर्स थे जिन में से कोई 11 लाख ने तो 24 घंटे के अंदर उन्हें अनफौलो कर दिया था. जेनजी ने उन्हें धिक्कारते और विश्वासघाती कहते अपनी फीलिंग्स शेयर कीं. 30 अप्रैल तक उन्हें नापसंद करने वालों की तादाद 30 लाख तक जा पहुंची. यह सिलसिला अभी भी जारी है. युवाओं ने उन्हें गद्दार, धोखेबाज और बिकाऊ कहते उन के वे वीडियो शेयर किए जिन में वे भाजपा को कोसते नजर आ रहे हैं. भाजपा में राघव चड्ढा के लिए कुछ ख़ास करने को नहीं होगा, यह पक्का है. अब उत्तर भारत में भाजपा दलबदलुओं को पनाह दे रही है, ओहदे नहीं.
भाजपा जौइन करते वक्त प्रैस कौन्फ्रैंस में राघव चड्डा ने वजह यह बताई थी कि आप अपने मूल आदर्शों, मूल्यों और नैतिकता से भटक गई है. बकौल राघव, ऐसे में उन के पास 3 विकल्प बचे थे, पहला यह कि वे राजनीति छोड़ दें, दूसरा यह कि पार्टी को सुधारें और तीसरा यह कि नया रास्ता चुन लें. तीसरा रास्ता चुन उन्होंने साबित कर दिया कि देश हिंदू राष्ट्र होना चाहिए जिस में वर्णव्यवस्था सब से उपर होती है.
हालिया विधानसभा चुनाव नतीजों ने यह साबित भी कर दिया क्योंकि असम में हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस से और पश्चिम बंगाल में सुभेंदु अधिकारी टीएमसी से आयात किए गए थे. अब पंजाब के मद्देनजर राघव ले लिए गए जो इन दोनों राज्यों के नतीजे देख अपने फैसले की टाइमिंग पर खुश हो सकने का पूरा हक रखते हैं. पर लगता नहीं कि भाजपा उन्हें कोई बड़ा इनाम देगी. कोई छोटामोटा पद दे कर गाड़ीबंगला दे सकती है.
दरअसल, कास्ट और क्लास के कौम्पलैक्स से ग्रस्त इस युवा को आप के देशी लोग वैसे ही लगने लगे थे जैसे साफ़सुथरे शहरियों को देहाती लगते हैं, जैसे सवर्णों को दलित और जैसे पैसे वालों को गरीब लगते हैं. श्रेष्टता की इस ग्रन्थि से नार्सिसस भी ग्रस्त था जिस का अंत बेहद दुखद हुआ था. कहानी के मुताबिक, वह नदी के पानी में अपना प्रतिबिंब देखदेख कर मुग्ध होता रहता था और आखिर में कमजोर हो कर मर गया था.
श्रेष्ठता का भाव बहुत से देशों में है और कुछ इस भाव को ले कर सफल भी हुए हैं पर कुछ ने इस के बावजूद लोकतंत्र, नैतिकता, स्वतंत्रताओं और मौलिक अधिकारों को पूरी जगह दी. भारत से ये सब धीरेधीरे समाप्त हो रहे हैं. Political Defection





