Women Reservation Bill India: पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल की विधानसभाओं के चुनावों में प्रचार के लिए मुद्दा पैदा करने के लिए भाजपा ने जो बवंडर खड़ा किया उस के पीछे ‘बड़ेसाब’ तो आरएसएस ही था जो सवर्ण महिलाओं को ले कर दिक्कत में था कि इन का क्या करें, ये तो मंदिरों में भजनपूजन और कलश यात्राओं में ही अच्छी लगती हैं. अगर ये संसद में बड़े पैमाने पर आ गईं तो हिंदू राष्ट्र और ब्राह्मण राज का सपना ध्वस्त हो जाएगा. महिला आरक्षण बिल इसी मकसद से एक साजिश के तहत लाया और फिर गिरवाया गया.

महिला आरक्षण पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में जो बिल लाया गया और जो दोतिहाई बहुमत न पाने के कारण गिर गया, असल में वह एक ढोल पीटना ही था. सरकार की मंशा महिलाओं को न नौकरियों में आरक्षण देने की थी, न समाज में और न ही न्यायपालिका या कार्यपालिका में. यह ढोल केवल संसद और विधानसभाओं में बजाने के लिए था. इस में पोल ही पोल है.

बीती 16 और 17 अप्रैल को महिला आरक्षण बिल के नाम पर संसद में चर्चा और बहस के नाम पर जो प्रायोजित शोबाजी व ड्रामेबाजी जानबूझ कर की गई उस से पहले सरकार अगर कुछ सांसदों का प्रतिनिधि मंडल या अध्ययन मंडल एक बहुत छोटे से नार्डिक देश स्वीडन भेज देती तो शायद ही नहीं, बल्कि तय है कि सब से पहले उस का ध्यान इस तरफ ही जाता कि वहां की संसद में महिलाओं के लिए अलग से कोई आरक्षण नहीं है. इस के बाद भी आधी से जरा ही कम यानी 46 फीसदी महिलाएं संसद में हैं.

स्वीडन की संसद रिक्सडाग में कुल 349 सीटें हैं जिन में से महिला सांसदों की संख्या 157 है. इस आंकड़े में हैरान कर देने वाली 2 प्रमुख बातों में से पहली यह है कि स्वीडन में महिलाओं को अलग से कोई कानूनी, लैंगिक या जातिगत आरक्षण नहीं मिला हुआ है और दूसरी यह है कि यह आंकड़ा पूरी दुनिया के औसत से लगभग 27 फीसदी ज्यादा है और भारत से तो 30 फीसदी ज्यादा है.

हमारी संसद में बहस के दौरान और सदन के बाहर भी सत्तारूढ़ और विपक्षी दल दोनों ही एकदूसरे पर आरोप लगा रहे थे कि चूंकि तुम महिलाविरोधी हो इसलिए बिल पारित नहीं होने दे रहे. खासतौर से भाजपा तो 17 अप्रैल की वोटिंग के बाद बेहद तिलमिलाई और बौखलाई हुई थी (यह भी पूर्वनियोजित था). उस की महिला सांसद संसद परिसर में हाथ में तख्तियां और मुंह में हायहाय के नारे लगा रही थीं कि ‘महिला शक्ति का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान’.

विपक्षी दलों के अड़ जाने और वर्तमान संख्या में महिलाओं को आरक्षण देने की मांग संसद द्वारा ठुकरा दिए जाने पर नरेंद्र मोदी 19 अप्रैल की रात न्यूज चैनल्स पर प्रकट हो गए. उन्होंने यथासंभव दयनीय चेहरा बना कर जो संबोधन राष्ट्र के नाम दिया वह भाजपा प्रचार ज्यादा था. उस का एक पार्ट दुर्वासा ऋषि सरीखा था जो बातबात में श्राप देने को कुख्यात थे.

मोदी ने सब से पहले तो देशभर की महिलाओं से माफी मांगते कहा, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन नहीं हो पाया, इस के लिए मैं देश की माताओंबहनों से क्षमा प्रार्थी हूं.’ वर्ष 2014 से 2026 तक इस तरह का संशोधन न लाने के लिए दोषी कौन है, यह बात वे छिपा गए.

यह कूटनीति है कि दूसरे को गलत ठहराने के लिए उस के सही कदम पर माफी मांग लो ताकि दरअसल खुद की की गई गलती छिप जाए. यहां मानसिक डर भी था कि असल गलती तो खुद भाजपा ने इस संबंध में वर्ष 2023 में बिल में बदलाव कर सदन में पेश करने की की थी. वह बिल कानून की शक्ल में साल 2023 में ही विपक्षी दलों की सहमति से पारित हो गया था. वह लागू नहीं हो पाया था क्योंकि उस बिल में शर्त यह थी कि आरक्षण 2026 में होने वाली नई जनगणना और उस के बाद होने वाले लोकसभा व विधानसभाओं के क्षेत्रों के परिसीमन के बाद होगा. इस बाबत इस बार संविधान (131वां संशोधन) परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 भी पेश किए गए थे.

बकौल मोदी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम व तृणमूल कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने मिल कर सदन में इस अधिनियम की भ्रूण हत्या कर दी. दुर्वासा स्टाइल में उन्होंने कहा, ‘जो पाप किया है, जनता द्वारा उस की सजा से वे बच नहीं पाएंगे.’

कहना तो कायदे से उन्हें यह चाहिए था कि आदर्श भारतीय नारी तो अपना अपमान करने वालों को भी माफ कर देती है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह को बेहतर मालूम था कि उन के पास दोतिहाई बहुमत नहीं है, फिर भी लोकसभा अध्यक्ष पर दबाव डाल कर उन्होंने यह विशेष सत्र बुलाया. उस का मकसद महिला आरक्षण विधेयक को पीठ पर लाद कर दरअसल परिसीमन विधेयक पारित कराना था. जब विपक्ष ने यह मंशा पूरी नहीं होने दी तो उसे विलेन साबित करने की कोशिश की जा रही है.

लेकिन इस बार सबकुछ पहले जैसा नहीं था. केवल मुट्ठीभर भाजपा कार्यकर्ता ही मुख्य सड़कों पर उतरे. सोशल मीडिया पर जो तुक की पोस्टें वायरल हुई थीं उन में प्रमुख यह थी कि अगर 307 सांसद और बढ़ जाते तो उन के भारीभरकम वेतन और भत्तों सहित पैंशन का भार तो उस जनता के सिर पर ही पड़ता जिस की कमर पहले ही से महंगाई की मार से टूटी हुई है. दूसरे, अगर महिला आरक्षण इतना ही जरूरी है तो पहले मौजूदा 543 सीटों में ही दे दिया जाए जिस का विरोध विपक्ष नहीं कर रहा था. राजनीति में दिलचस्पी न रखने वालों ने भी कहा कि यह तो भाजपाई ट्रिक थी जिस ने इस मुद्दे को लंबे समय तक के लिए दफना दिया है.

दक्षिणपूर्व की हताशा

क्यों यह अधिनियम पारित नहीं हो पाया, इस से पहले यह सम?ाना मौजूं है कि बिल लाने के लिए सरकार ने यही वक्त क्यों चुना? जवाब बहुत आसान और सरल है कि 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों को ले कर भाजपा बहुत घबराई हुई थी क्योंकि इन राज्यों, खासतौर से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल, में उस के पास हमेशा की तरह वोट मांगने के लिए मुद्दों का टोटा था. असल में यह कदम भाजपा का शुद्ध चुनावी टोटका था जिस के तहत मंशा विपक्ष को महिलाविरोधी प्रचारित कर वोटरों से वोट झटकने की थी.

यह पहले से ही मालूम था कि चूंकि यह संविधान संशोधन बिल था इसलिए इसे पारित कराने के लिए एनडीए सरकार को दोनों सदनों में जरूरी दोतिहाई यानी लोकसभा में 352 और राज्यसभा में 164 वोट चाहिए थे लेकिन लोकसभा में उस के अपने महज 240 थे. बाकी के लिए उसे जनता दल यूनाइटेड और चंद्रबाबू नायडू पर निर्भर रहना था. दूसरा पेंच, इस से जुड़े परिसीमन बिल का था जिस के तहत भाजपा लोकसभा सीटों की संख्या 2011 की जनगणना के आधार पर 543 से बढ़ा कर 850 कर देना चाह रही थी.

तीसरा पेंच, ओबीसी के आरक्षण का था जिस पर कांग्रेस सहित सपा और आरजेडी खासतौर से एतराज उठा रहे थे. ये तीनों चाहते थे कि महिलाओं के साथसाथ ओबीसी को भी आरक्षण मिले, कम से कम ओबीसी महिलाओं को तो मिले. संसद में बहस के दौरान गृहमंत्री अमित शाह की एक चालाकी उजागर भी हुई थी जब परिसीमन पर विपक्ष भारी पड़ने लगा तो वे बोले, ‘मुझे एक घंटा दीजिए, मैं संशोधित विधेयक ले कर लौटूंगा जो सीटों में 50 फीसदी वृद्धि की गारंटी देगा.’

सोशल मीडिया एक्स पर नायिनी अनुराग रेड्डी ने शाह के इस कथन को निशाने पर लेते लिखा, ‘एक घंटा, बस, इतना ही समय लगता है दक्षिण भारत की रक्षा करने के लिए, तो फिर यह पहले ही क्यों नहीं किया गया? यह मूल मसौदे में क्यों नहीं था? इस विधेयक की समीक्षा किस ने की? इसे मंजूरी किस ने व कब दी? वे किस का इंतजार कर रहे थे विपक्ष की चुप्पी का या विपक्ष के आत्मसमर्पण नहीं करने का?’ इस पोस्ट का सार यह है कि विपक्ष ने सवाल उठाया तो संसद को सुनना पड़ा.

यह एजेंडा भी दरअसल आरएसएस का दिया हुआ है जो खालिस धर्म, हिंदुत्व और इन में भी ब्राह्मणपूजक राजनीति, समानता और समरसता के नाम पर करता है. उस की यह नीति दक्षिण में नहीं, उत्तर भारत में चलती है.

यह ब्राह्मणवादी संगठन अपने जन्म से ही महिला विरोधी रहा है. दूसरे, तमाम धर्मों की तरह सनातन धर्म भी महिलाओं को दोयम दर्जे का मानता है. इस बिल को संसद में ला कर फेल करवाने की चाल भी आरएसएस की ही थी क्योंकि दलितों के बाद खासतौर से सवर्ण महिलाएं उस के गले की फांस और हड्डी बनी जा रही थीं जिन का दबाव और अपेक्षाएं संघ से बढ़ रहे थे.

इन से छुटकारा पाने का घोषित और संवैधानिक तरीका वही था जो 18 अप्रैल को संसद में देखा गया. आरएसएस सहित भाजपा और दूसरे हिंदूवादी दल व संगठन कैसे महिला विरोधी हैं, इसे आरएसएस के महिला संबंधी विचारों से सम?ा जा सकता है. यह भाजपा की मूलनीति से जुड़ा मसला है.

आरएसएस का एजेंडा आरएसएस का शताब्दी वर्ष

2 अक्तूबर, 2025 को समारोहपूर्वक नागपुर के रेशमबाग मैदान में मनाया गया था. अव्वल तो न्यूज रीडर की तरह लिखालिखाया जो भाषण संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दिया वह उन के कई मौकों पर दिए गए भाषणों का संकलन ही था पर आरएसएस की 100 वर्षीय मंशा उन्होंने यह कहते स्पष्ट कर दी कि विविधता और हमारी संस्कृति का पूर्ण स्वीकार और सम्मान जो हम सभी को एक सूत्र में बांधता है वह राष्ट्रवाद है. यह हमारे लिए हिंदू राष्ट्रवाद है. हिंदवी, भारतीय और आर्य सभी हिंदू के पर्यायवाची हैं.

100 साल के अपने विवादित सफर में संघ ने जिन मुद्दों पर जानबू?ा कर तटस्थता ओढ़े रखी है, स्त्री विमर्श यानी महिलाओं की भूमिका उन में से एक है. उस दिन अपने भाषण में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दुनियाभर की बातें कीं लेकिन महिलाओं पर चुप्पी साधे रख जता दिया कि कुछ मामूली बदलावों और हलके से लचीलेपन के साथ हिंदुओं का यह संगठन अपने पौराणिक हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर अडिग है जिस में अहल्या, द्रौपदी, सीता सदा ही पीडि़त रही हैं लेकिन सभी को पूजा जाता है, देवी सा माना जाता है. संदेश यह है कि पत्थर बनो, जुए में हारो, कठिन परीक्षा दो.

पिछले साल 2024 के भाषण में तो मोहन भागवत ने भाजपा की 2 दिग्गज नेत्रियों विजयाराजे सिंधिया और सुषमा स्वराज के योगदान का तो उल्लेख कर दिया था लेकिन इसी कैटेगरी की दिग्गज कांग्रेसी इंदिरा गांधी का नाम नहीं लिया. उन्होंने या उन के पूर्वजों ने कभी फातिमा शेख या सावित्रीबाई फुले जैसी महिलाओं का भी जिक्र नहीं किया जिन्होंने महिला शिक्षा को एक मिशन की शक्ल दी थी.

आरएसएस ने कभी दिल से महिला आरक्षण की हिमायत नहीं की क्योंकि यह उस के एजेंडे में ही नहीं है कि महिलाओं को सत्ता में संवैधानिक भागीदारी दी जाए. इसलिए उस ने बड़ी मासूमियत से भाजपा के जरिए यह बिल ऐसे वक्त में पेश करवाया जिस में उस का गिर जाना गारंटीड था. अगर वाकई में वह इस मुद्दे पर गंभीर होता तो इसे नरेंद्र मोदी के पहले या दूसरे कार्यकाल में पारित करवा सकता था. मंशा तो इस मुद्दे की भ्रूण हत्या करना नहीं बल्कि गर्भाशय ही निकलवा देने की थी जिस में वह कामयाब भी रहा.

यह सवाल मौजूं है और दिलचस्प भी कम नहीं कि कोई भी क्यों औरतों पर संघ का स्पष्ट रुख चाहता है. इस के लिए संघ की स्थापना से ले कर आज तक के माहौल पर गौर करें तो यह एक सामाजिक दबाव संघ पर है जिस की वजह फैमिनिस्ट या वामपंथी या कोई और नहीं बल्कि खुद सवर्ण महिलाएं हैं जो अब शिक्षा पा कर और कांग्रेसी युग के कानूनों के सहारे परिवार और समाज में अपनी मौजूदगी व दखल साबित कर चुकी हैं. जाहिर है इस कामयाबी में किसी संघ या हिंदूवादी संगठन का कोई योगदान नहीं रहा है बल्कि यह खुद शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर होती इन महिलाओं की धार्मिक घुटन और रूढि़यों से उबरने की कोशिशों का नतीजा है कि लोग संघ से उन की बाबत

सवाल करें.

साल 1925 में जब आरएसएस का गठन हुआ था तब उस में ब्राह्मण पुरुषों का दबदबा था और आज भी है. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब कुछ गैरब्राह्मण वैश्य और मामूली तादाद में गैरसवर्ण मसलन दलित, ओबीसी जातियों वाले पुरुष भी इस से जुड़ गए हैं. 100 साल की इस इकलौती उपलब्धि में महिलाएं कहीं नहीं हैं.

पौराणिक इमेज पर जोर

नागपुर के 2 अक्तूबर के अहम जश्न और जलसे में भी महिलाएं कहीं नहीं थीं. 21,000 चुनिंदा स्वयंसेवकों में किसी महिला का न होना महिलाओं से ताल्लुक रखते हर उस सवाल का जवाब है जो आरएसएस से अकसर मांगा जाता है. हिंदू राष्ट्र की विचारधारा या केंद्रीय विचार में महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की ही है. यह हकीकत 1925 से ले कर हर कभी उजागर होती भी रही है. गुरुजी के नाम से मशहूर आरएसएस के दूसरे सरसंघसंचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने अंगरेजी में लिखी गई अपनी किताब ‘द बंच औफ थौट्स’ में यह स्पष्ट किया भी है.

आरएसएस इस किताब को अपनी श्रीम्दभगवदगीता और रामचरितमानस से कम नहीं मानता जिस का हिंदी अनुवाद ‘विचार नवनीत’ शीर्षक से हुआ है. गोलवलकर महिलाओं को रीढ़ की हड्डी तो कहते हैं लेकिन कई शर्तें भी महिलाओं पर थोपते हैं. मसलन :

द्य महिलाओं का शिक्षित होना अनिवार्य है लेकिन यह शिक्षा राष्ट्रीय चेतना और नैतिक मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए न कि पश्चिमी प्रभाव वाली होनी चाहिए.

द्य वे महिलाओं को देवी करार देते उन की शक्ति को आध्यात्मिक रूप से जोड़ते हैं. यह चेतावनी देना वे नहीं भूलते कि आधुनिक पश्चिमी प्रभाव महिलाओं की पारंपरिक भूमिका को कमजोर कर सकता है. इसलिए उस का सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव होना जरूरी है. राष्ट्रीय जीवन में स्त्रियों की भूमिका को स्पष्ट करते यानी समेटते हुए सार रूप में कहा गया है कि हमारी भूमि की स्त्रियां हमारे समाज की मुख्य आधारशिला रही हैं. वे त्याग, सेवा और निस्वार्थ भावना की प्रतीक हैं. राष्ट्र की उन्नति के लिए पुरुष को जन्म देना, उन का पालनपोषण करना और उन्हें राष्ट्रभक्ति का संस्कार देना आदि सब स्त्री की प्रमुख जिम्मेदारियां हैं.

द्य एक और जगह बड़ी भावुक सी बात यह कही गई है जिसे रोजरोज दोहराया जाता है कि हमारी संस्कृति में स्त्री को देवी का स्थान प्राप्त है. दुर्गा, लक्ष्मी, सीता और सावित्री उस के आदर्श हैं. दहेज प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियां समाज को कमजोर करती हैं, इन्हें त्यागना होगा. स्त्री को सभी हिंदुओं की माता मान कर समान अवसर प्रदान किए जाएं ताकि वह जातपांत के भेदभाव से उठ कर ‘राष्ट्र एकता’ की प्रतीक बने.

कहनेसुनने में यह बात बड़ी जज्बाती और आकर्षक लगती है लेकिन यह ठीक वैसी ही है जैसी यह कह देना कि छुआछूत बुरी बात है, दलित भी हमारे भाई हैं, उन्हें प्रताडि़त नहीं किया जाना चाहिए वगैरहवगैरह और फिर दलित घर में आ जाए तो उस के लिए जाने के बाद गोमूत्र या गंगाजल से घर को धुलवाना.

मौजूदा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत तो कई बार एक घाट और एक श्मशान का राग आलाप चुके हैं लेकिन ऐसे प्रवचननुमा विचारों से बदलता कुछ नहीं है, उलटे, दबंगों को याद जरूर आ जाता है कि अरे, इन छोटी जाति वाले का तो श्मशान भी अलग होता है और पनघट भी. इन्हें तो हमारी बराबरी का हक ही नहीं. आरएसएस ने सत्ता तो पा ली लेकिन गांवों में एक घाट, एक श्मशान, एक ही मंदिर का इंतजाम वह नहीं कर पाया.

औरत होने के मायने

यही महिलाओं के मामले में होता है कि उन्हें मीठीमीठी बातों के जाल में उलझ कर सिर्फ यह एहसास कराया जाता है कि चूंकि तुम देवी हो इसलिए तुम्हारा धर्म अपने देवो यानी पुरुषों को खुश रखना और बच्चे पैदा करनी है और उन की परवरिश इस तरह करना है कि वे भी कट्टर हिंदू ही बनें.

18 अप्रैल को महिलाओं का सत्ता में भागीदारी का जो सपना टूटा वह हमेशा ही सपना था, असलियत तो वह होनी ही नहीं थी. अकेली महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हराने के लिए अमित शाह 15-20 दिन कोलकाता में रहे, चुनाव आयोग ने हर रोज नियम बदले, कितने ही मुकदमे हुए, कितनों को ही गिरफ्तार किया गया.

इस विकट के दोहरेपन और विरोधाभास को कम ही लोग सम?ा पाते हैं क्योंकि आरएसएस का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जिस बुनियाद पर खड़ा है वह मनुस्मृति है जिस की नींव में गीता और रामायण आदि जैसे धर्मग्रंथ हैं जो हर तरह से स्त्रीविरोधी हैं. ‘विचार नवनीत’ में कैसे महिलाओं को उड़ने की कहनेभर की आजादी देने के बाद किस तरह की हिदायतों से उन के पर कुतरे गए हैं, ‘विचार नवनीत’ में ही देखिए :

द्य  आज की कुछ स्त्रियां पाश्चात्य सभ्यता के चकाचौंधपूर्ण आकर्षण में उल?ा कर अपनी मूल शक्ति और सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो रही हैं. यह भटकाव न केवल उन्हें बल्कि पूरे राष्ट्र को कमजोर कर रहा है. स्त्री को अपनी दुर्गा शक्ति को फिर से जागृत करना होगा, न कि विदेशी मौडल का अनुकरण करना.

द्य कुछ आधुनिक प्रवर्तियां स्त्रियों को घरपरिवार की पवित्र जिम्मेदारियों से अलग कर रही हैं जिस से समाज की नींव हिल रही है. यह न तो समाज के हित में है और न राष्ट्र के. हमें अपने परंपरागत आदर्शों की तरफ लौटना होगा जहां स्त्री सेवा और त्याग की प्रतीक बने.

इस के बाद कुछ कहनेसुनने की जरूरत नहीं रह जाती कि दरअसल आरएसएस हिंदू सवर्ण महिला से यही अपेक्षाएं रखता है कि वे दासी बनी रहें, बच्चे पैदा करती रहें, मर्दों की चाकरी और यौन इच्छाएं पूरी करती रहें. अपने अधिकारों के बाबत वे मुंह न खोलें, सिर्फ अपने कर्तव्य देखें जिन्हें मनुस्मृति में जोर दे कर कहा गया है. यानी, सीधेसीधे महिलाओं को इस बाबत मजबूर किया जाता रहा है कि वे पौराणिक किस्सेकहानियों के मुताबिक जिएं. उसे महिलाएं दफ्तरों या संसद में नहीं बल्कि कलश यात्राओं में ज्यादा अच्छी व आकर्षक लगती हैं. महिलाओं का उद्धार या कल्याण संसद में बहस करने से नहीं बल्कि मंदिरों में भजनकीर्तनों पर ?ामने से होगा.

लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि बीच में 1950 में हिंदू मैरिज एक्ट 1956 में हिंदू सक्सेशन एक्ट वगैरह आ गए जिन्होंने इन बंधनों और बेडि़यों से औरतों को आजादी दिलाने के लिए बराबरी के हक दे दिए. वे जब कानून बने थे तो आरएसएस सहित सारे हिंदूवादी तिलमिला उठे थे जो आज तक जारी है. ऐसा दोबारा न हो, इस के लिए आरएसएस ने अभी से फील्ंिडग करनी शुरू कर दी है, मसलन लिवइन रिलेशनशिप को निशाने पर लेते मोहन भागवत ने अपने नेक खयाल पेश करते हुए कोलकाता में 20 दिसंबर को कहा, ‘लिवइन रिलेशनशिप जिम्मेदारी लेने की अनिच्छा दर्शाते हैं. आप जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं, यह सही नहीं है.’

यह सीधीसीधी अभिजात्य धौंस है कि सही क्या है, यह संघ बताएगा, समाज या कानून इस का फैसला न करें क्योंकि सब से ऊपर अब आरएसएस है. लिवइन से महिलाओं को कई ?ां?ाटों से छुटकारा मिला है. वे इस रिश्ते में खूंटे से बंधी गाय नहीं रह जातीं जिस का काम सुबहशाम दूध देना और एक के बाद एक बछड़े जन्म कर गौवंश को आगे बढ़ाना रहता है. यह महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मसला है, इसलिए संघ को अखर रहा है. संघ दरअसल महिलाओं को आजाद नहीं करना चाहता है.

इतना ही नहीं, मोहन भागवत ने कोलकाता में ही मीठे शब्दों में यह इशारा भी कर दिया कि महिला की 19 से 25 साल की उम्र के बीच शादी हो जाए और 3 बच्चे हों तो मातापिता का स्वास्थ्य अच्छा रहता है. अपनी इस बात के फायदे गिनाते उन्होंने अति यह कहते कर डाली कि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार लोगों को अहंकार को नियंत्रित करना सीखने में मदद मिलती है.

संघियों में सपाट बयानी के लिए जाने और प्रचारित होते रहने वाले मोहन भागवत बड़ी मासूमियत से एक तीर से दर्जनभर निशाने लगा गए, मसलन यह कि शादी जल्दी होगी तो बच्चे भी ज्यादा और जल्द होंगे जिस से हिंदू राष्ट्र भी जल्द बन जाएगा. पेरैंट्स को बेहतर सेहत का औफर या ?ांसा भी उन्होंने दिया. अब यह तो वही जानें कि ज्यादा बच्चे होने से अहंकार दूर होने की बात कौन से लोक के मनोवैज्ञानिक करते हैं लेकिन अगर ऐसा हुआ तो सारा भार महिलाओं को ही उठाना पड़ेगा, उन की सेहत भी दांव पर लग जाएगी और कैरियर भी शुरू होने से पहले खत्म हो जाएगा. और यही, आरएसएस की मंशा भी है. क्या इस तरह नियंत्रित करने वाली महिलाओं को भाजपा वास्तव में संसद व विधानसभाओं में आरक्षण देना चाहती है?

असल मकसद पौराणिक युग

2 अक्तूबर को एक बार फिर मोहन भागवत ने हिंदू राष्ट्र का अपना सनातनी संकल्प नागपुर से दोहराया, साथ ही, विश्वगुरु बन जाने की बात भी कही. इस में सभी वर्गों और जातियों के सहयोग की अपेक्षा भी उन्होंने की. यह अपेक्षा, दरअसल, धौंस थी जिस से दलित, आदिवासी और महिलाएं आरएसएस की अधीनता स्वीकार लें.

उन दिनों में एक नया विवाद आई लव मोहम्मद बनाम आई लव महादेव शबाब पर था जिसे ले कर सवर्ण हिंदू आक्रोशित और उत्तेजित थे. यह सब जानबूझ कर पैदा किया गया था जिसे हर किसी ने समझ भी कि विवाद बेसरपैर का है लेकिन आरएसएस अपने मकसद में कामयाब रहा था कि अगर धर्म का राज्य चाहिए तो समयसमय पर ऐसे टोटके छोड़े जाने जरूरी हैं.

यह सब इसलिए भी कि कोई यह सवाल न करने लगे कि घोषित तौर पर संघ को यह राग आलापते 100 साल हो गए लेकिन हिंदू राष्ट्र के कहीं अतेपते नहीं हैं और इन 100 सालों में उस ने हिंदुओं के लिए किया क्या है. यही माहौल आरएसएस चाहता है कि हिंदू और हिंदुत्व के नाम पर बस, इसी तरह के सवाल उठते रहें, कोई भी तुक की बात न करे. बात हो तो सिर्फ मंदिरों और दानदक्षिणा की, पंडेपुजारियों की जिन की रोजीरोटी का जिम्मा संघ ने उठा रखा है. बात हो तो ब्राह्मण राज की जिस के लिए क्याक्या जतन नहीं किए जा रहे.

इस बाबत मोहन भागवत ने कुंभ का जिक्र करते हुए कहा, ‘हमारे सामने पुरानी व नई चुनौतियां उपस्थित हैं. उन को अधिक स्पष्ट करने वाला भी वही कालावधि है जैसे प्रयागराज में एक विशाल महाकुंभ हुआ. आधुनिक व्यवस्थापन के सारे कीर्तिमान तोड़ कर एक जागृति उपक्रम तो उस ने प्रस्थापित किया ही, साथ ही संपूर्ण भारत में श्रद्धा व एकात्मकता की लहर भी उस ने दौड़ा दी.’

लेकिन यह यानी धार्मिक आयोजनों का गुणगान एक बहुत बड़ा खतरा उस धर्मनिरपेक्ष देश और संविधान के लिए है जिस का विरोध आरएसएस शुरू से करता रहा है कि संविधान पाश्चात्य मौडल पर आधारित है, इसे मनुस्मृति आधारित होना चाहिए.

साल 1939 में ही गोलवलकर ने आरएसएस की मंशा बहुत कम शब्दों में साफ कर दी थी कि भारत में जो भी रहेगा उसे हिंदू संस्कृति के मुताबिक जीना होगा. यही मोहन भागवत आज भी दोहरा रहे हैं. यानी, विविधता के लिए देश में कोई जगह नहीं. मुसलमानों को निशाने पर लेते उन्होंने कहा, ‘छोटीबड़ी बातों पर यह केवल मन में संदेह है, इसलिए कानून हाथ में ले कर रास्तों पर निकल आना, गुंडागर्दी व हिंसा करना यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है. मन में प्रतिक्रिया रख कर या किसी समुदाय विशेष को उकसाने के लिए शक्ति प्रदर्शन करना जैसी घटनाओं को योजनापूर्वक करवाया जाता है.’

यही अब संघ कह रहा है कि हजारों सालों से हिंदू परंपरा पर आधारित भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है जिस पर संघ, भाजपा को ढाल बना कर शासन करेगा.

मोहरा बनी महिलाएं

महिलाएं संघ के आयोजनों में होती हैं पर वे जुलूसों के संचालन करने वालों पर फूल बरसाती, कलश यात्राओं में सिर पर कलश ढोते होती हैं. ये सवर्ण महिलाएं हमेशा की तरह भूल गई थीं कि यह उन की भूमिका और योगदान पर पौराणिक हमला है जो यह बताता है कि उन का अपना कोई वजूद नहीं है, उन का वजूद घर के उन मर्दों से ही है जिन का खुद का वजूद आरएसएस बन गया है.

इसी मानसिकता के चलते महिलाओं ने आरक्षण बिल को गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि उन्हें मर्दों के राज में इस के पारित होने का भरोसा ही नहीं था और कभी पास भी हो गया तो ताकत उन के नहीं, बल्कि पुरुषों के हाथ ही आएगी. जिस तरह सरपंच पति और सरपंच पार्षद इफरात से पाए जाते हैं उसी तरह सांसद पति और विधायक पति भी होने लगेंगे. यानी, महिलाओं को पुरुषों के इशारे पर नाचने को मजबूर होना पड़ता है क्योंकि उन का कोई स्वतंत्र अस्तित्व समाज व समाज पर हुकूमत करने वाले धर्म में नहीं है.

तब तिलमिला उठे थे

आज जो भगवा गैंग एकजुट हो कर महिला आरक्षण बिल पर हायहाय कर रहा है उस का असल चेहरा बेहद कुटिल और वीभत्स है. देश आजाद होने के बाद जब संविधान बना तो उस का विरोध इन्हीं लोगों यानी आरएसएस, हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद जैसे कट्टर हिंदूवादी संगठनों व दलों ने किया था. संविधान सभा ने 26 नवंबर, 1949 को संविधान को अपनाया था. इस के ठीक 4 दिनों बाद आरएसएस के मुखपत्र ‘और्गेनाइजर’ के लंबेचौड़े संपादकीय में लिखा गया था-

हमारे संविधान में प्राचीन भारत के अद्वितीय संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है. मनु (स्मृति) के कानूनों की आज भी विश्व प्रशंसा करता है तथा लोग खुद ही उन का पालन करते हैं लेकिन हमारे संवैधानिक विद्वानों के लिए इस का कोई मतलब नहीं है. इस के लिखे और छपने के वक्त ही डाक्टर भीमराव अंबेडकर हिंदू कोड बिल का मसौदा भी तैयार कर रहे थे. उस का मकसद था मनुस्मृति और ब्राह्मणवाद को समाप्त कर समानता का राज स्थापित करना जिस से स्वतंत्र भारत में दलित, आदिवासी, पिछड़े यानी शूद्र और मुसलमान सहित महिलाएं स्वाभिमान और आत्मसम्मान से जी सकें.

ऐसा हुआ भी. जैसे ही हिंदू कोड बिल का मसौदा सामने आया तो सिरे से सारे हिंदूवादी नमक पड़े केंचुए की तरह तिलमिला उठे थे. और्गेनाइजर में ही लिखा गया था कि यह हिंदू समाज पर एटम बम है. हम हिंदू कोड बिल का विरोध करते हैं. यह विदेशी और अनैतिक सिद्धांतों पर आधारित है. यह हिंदू कानूनों, संस्कृति और धर्म पर क्रूर व अज्ञानी हमला है. हिंदू महासभा के मुखिया पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो संसद में कहा था कि हिंदू कोड बिल हिंदू संस्कृति की भव्य संरचना तोड़ देगा.

यह विरोध की ही सही फिर भी सभ्य भाषा थी लेकिन तत्कालीन दिग्गज हिंदू धर्मगुरु स्वामी करपात्री महाराज ने तो अंबेडकर पर निशाना साधते यह तक कह डाला था कि ब्राह्मणों के क्षेत्र में पूर्व अछूत का हमला है. तब देशभर में मैसेज यह गया था कि हिंदू एक अछूत शूद्र द्वारा लिखित कानून स्वीकार नहीं करेंगे.

करपात्री ने इसे धर्मयुद्ध की संज्ञा देते मार्च 1949 में एंटी हिंदू कोड बिल कमेटी का ही गठन कर डाला था जिस में आरएसएस, रामराज्य परिषद और हिंदू महासभा सहित देशभर के धर्मगुरु और पंडेपुजारी शामिल हुए थे. उसी साल आरएसएस ने अकेले दिल्ली में ताबड़तोड़ 79 मींटिगें आयोजित की थीं. फिर 11 और 12 दिसंबर, 1949 की हाड़ कंपा देने वाली ठंड में दिल्ली देशभर से आए सनातनियों से पट गई थी. पहले दिन रामलीला मैदान में वक्ताओं ने हिंदू कोड बिल की तुलना एटम बम के साथसाथ रोलर एक्ट से भी की थी.

दूसरे दिन 12 दिसंबर को आरएसएस कार्यकर्ताओं की अगुआई में संसद तक बड़ा पैदल मार्च किया गया था जिस में हिंदू कोड बिल मुर्दाबाद, पंडित नेहरू मुर्दाबाद और नेहरू हुकुमत छोड़ दो जैसे नारे लग रहे थे. प्रदर्शनकरियों ने नेहरू और अंबेडकर के पुतले जलाए थे और शेख अब्दुल्ला की कार को आग के हवाले कर दिया था. इधर, बाकी देश के शहरों और गांवों में भी ब्राह्मण और गैरब्राह्मण सवर्ण सभाएं कर हिंदू कोड बिल का विरोध कर रहे थे.

इसलिए तिलमिलाए थे

यह उपद्रव बेवजह नहीं था. दरअसल, हिंदू कोड बिल में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए थे. हिंदू विवाह अधिनियम 1956 में शादी और तलाक से ताल्लुक रखते कानून थे जो महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देने के साथसाथ एक से ज्यादा शादी करने को अपराध करार देते हैं. यानी, औरत को सौत से छुटकारा देते हैं. ऐसा ही एक था हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 जो महिलाओं को भी संपत्ति का अधिकार देता है. इस में मनमोहन सिंह सरकार ने 2005 में संशोधन करते पैतृक संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर हिस्सा और अधिकार दिए थे जो सनातनियों को तब रास आया था न आज हजम होता है.

कांग्रेस में इस का अंदरूनी विरोध सवर्ण सांसदों ने किया था. कुछ तो एकएक कर बाकायदा भाजपा में चले भी गए. इसी तरह का विरोध कांग्रेस में ही रहते डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने भी संविधान और हिंदू कोड बिल का किया था. इसी तरह हिंदू दत्तक और भरण पोषण अधिनियम 1956 और हिंदू अल्पसंख्यक और भरणपोषण अधिनियम 1956 भी सनातनियों को बहुत अखरे थे. ये भी औरतों को मर्दों के बराबर हक देने वाले थे. इस मुद्दे पर ‘सरिता’ पत्रिका में शृंखलाबद्ध तरीके से तथ्यातमक लेख प्रकाशित किए गए हैं, पाठकों को यह सीरीज जरूर पढ़नी चाहिए ताकि वे ऐतिहासिक सच से रूबरू हो सकें. यह सीरीज सरिता की वैबसाइट पर भी पढ़ी जा सकती है.

सनातनियों का तब यह विरोध इतना तीव्र और आक्रामक था कि एक दफा तो लग रहा था कि सरकार को हिंदू कोड बिल आग के हवाले करना पड़ेगा और महिलाओं सहित दलितों व आदिवासियों को बराबर का हक नहीं मिलेगा. देश फिर धार्मिक गुलामी की गर्त में चला जाएगा. इस विरोध पर नेहरू का शांत रवैया देख कर भीमराव अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन बाद में नेहरू ने हिंदू कोड बिल के उक्त 4 टुकड़े कर देश में कानून और संविधान का राज कायम किया था. उस से कुंठित और बौखलाए नरेंद्र मोदी आएदिन नेहरू पर किसी न किसी बहाने भड़ास निकाल ही लेते हैं.

आज वही मोदी, भाजपा और तमाम हिंदूवादी महिला आरक्षण बिल पर राहुल गांधी सहित कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को कोस रहे हैं. उन्हें तो खासतौर से राहुल और प्रियंका गांधी से नेहरू का वास्ता और दुहाई देते कहना चाहिए कि देखिए, आप के परदादा ने महिलाओं के लिए इतना कुछ किया था. उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार दिए तो आप क्यों महिला आरक्षण संशोधित बिल का विरोध कर रहे हैं लेकिन मोदी और पूरे भगवा गैंग में इस सच को सार्वजनिक तौर पर स्वीकारने की तो दूर की बात है, जिक्र करने का भी साहस नहीं है क्योंकि इस से उन के पूर्वजों की पोलपट्टी खुल जाएगी.

‘चित भी मेरी और पट भी मेरी और सिक्का मेरे बाप का’ की तर्ज पर, दरअसल, ताजी साजिश यह है कि बिल पास ही न हो और अगर गिरतेपड़ते कभी हो भी जाए तो सत्ता महिलाओं के जरिए सवर्ण पुरुषों के हाथों में रहे. जैसे मंदिर में हिंदू महिला पूजा का थाल पकड़े आरती उतारती रहती है और पति पंडेपुजारी के पैर छूते उस के थाल में चढ़ावा चढ़ाता रहता है वैसा ही कुछ अलग तरीके से संसद में हो. अब इस मुद्दे पर देखने को कुछ नहीं बचा है. खुद भगवा गैंग ने महिला आरक्षण का ढोल बजाबजा कर फोड़ और फाड़ दिया है तो कोई क्या कर लेगा, इस चालाकी का तोड़ तो शायद ब्रह्मा के पास भी न होगा.

स्वीडिश मौडल है हल

इस विधेयक का अब क्या होगा, यह कोई नहीं बता सकता लेकिन इस से परे स्वीडन की राजनीति पर गौर किया जाना चाहिए जहां प्रमुख राजनीतिक दल ग्रीन पार्टी, लेफ्ट पार्टी, स्वीडिश सोशल डैमोक्रेटिक पार्टी वगैरह टिकट वितरण जिपर सिस्टम से करते हैं यानी एक पुरुष एक महिला यह क्रम चलता रहता है. इसलिए रिक्सडाग में महिला सांसद आधी के लगभग हैं. हमारे यहां की पार्टियां इसे अपना पाएंगी, इस में शक है क्योंकि उन पर भी कब्जा मर्दों का ही है. मिसाल महिला आरक्षण बिल पर सब से ज्यादा हल्ला मचा रही भाजपा की ही लें, तो उस में कभी कोई महिला अध्यक्ष नहीं रही और जो मौजूदा नेत्रियां हैं वे महज शोपीस हैं.

ओडिशा में बीजद के नवीन पटनायक ने साल 2016 से एक अच्छी पहल की थी कि 33 फीसदी टिकट महिलाओं को देना शुरू कर दिया था. अब ताजे बवंडर के बाद डीएमके सांसद पी विल्सन ने राज्यसभा में एक प्राइवेट बिल इस आशय का पेश किया है कि उन की पार्टी बिना परिसीमन और जनगणना के तुरंत ही महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए तैयार है. अब इस प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई होगी लेकिन कोई और पार्टी ऐसी पहल करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रही.

महिलाओं को संसद में आरक्षण देने से बदलाव आंशिक ही होंगे लेकिन उन का कल्याण या भला शिक्षा व जागरूकता से ही होगा, इस के लिए अब जरूरी हो चला है कि उन्हें सामाजिक और धार्मिक दबावों से मुक्त करने के लिए अभियान छेड़े जाएं, विधेयक लाए जाएं, बहसें की जाएं और धरनेप्रदर्शन भी किए जाएं लेकिन यह तभी संभव होगा जब हिंदूवादी संगठन और पार्टियां महिलाओं को मंदिरों में ढकेलना बंद करें, उन्हें उन के मसलों से ताल्लुक रखते फैसले लेने दें. स्वीडन इस की बेहतर मिसाल है जहां 100 फीसदी साक्षरता है, जागरूकता है, शादीतलाक और जौब की आजादी है. सब से अहम बात, वहां आर्थिक आत्मनिर्भरता है, इसलिए वहां स्वाभिमान और आत्मसम्मान भी हैं जिन पर भाजपा सिर्फ गाल बजाती रही.

अगर वाकई भारतीय जनता पार्टी की नीयत साफ होती तो 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में वह महिलाओं को 33 फीसदी टिकट दे देती और कांग्रेस व इंडिया गठबंधन के मुंह बंद कर देती. असल में सवर्ण पुरुष घबराए हुए हैं कि अगर वाकई महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिल गया तो उन्हें मिलने वाले मौके कम हो जाएंगे. Women Reservation Bill India

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