Soldier Story: अफसर बनने के बाद मेरी दूसरी पोस्ंिटग फौरवर्ड एरिया की एक वर्कशौप में हुई. मैं कैप्टन बन चुका था. मु?ो पठानकोट ट्रांजिट कैंप में रिपोर्ट करनी थी. ट्रांजिट कैंप स्टेशन के बिलकुल सामने था. मैं ने कुली से सामान उठवाया और ट्रांजिट कैंप के औफिस के बरामदे में रख दिया. अफसर कमांडिंग के कमरे में एक लैफ्टिनैंट साहब बैठे हुए थे. मैं अंदर गया तो उस ने मु?ो उठ कर सैनिक सम्मान दिया और बैठने के लिए कहा. मैं ने अपना मूवमैंट और्डर दिया. उस ने अपने औफिस से 2 जवान बुलवाए और मेरा सामान एक कमरे में रखने के लिए कहा. मु?ा से कहा, ‘‘आप कमरे में जाएं. आज शाम तक पता चल जाएगा कि श्रीनगर की फ्लाइट है या नहीं. अगर हुई तो सुबह

5 बजे एयरपोर्ट जाना होगा. स्टेशन वैगन लेने आएगी. अगर नहीं हुई तो 2 दिन आप को यहीं रुकना होगा. जवानों और जूनियर अफसरों को श्रीनगर जाने के लिए डीलक्स बसें मिलती हैं. अगर सभी को एयरलिफ्ट की सुविधा होती तो पुलवामा में 40 जवान शहीद न होते लेकिन अब भी जवानों और जूनियर अफसरों को बसों से भेजा जाता है. सब हथियारबंद होते हैं. कुछ चीजें सेना के हाथ में नहीं होतीं. हालांकि, वे जवान भारतीय सेना के नहीं थे. वे थे अर्धसैनिक बल के जवान जो सेना को हर जगह असिस्ट करते थे.

मैं कमरे में आ गया. कमरा पुराना लेकिन शानदार था. हर सुविधा उपलब्ध थी. मैं ने अभी यूनिफौर्म उतार कर नाइट सूट पहना ही था कि एक जवान मेरे लिए चाय ले कर आया. सफर से आया था, चाय की जरूरत भी थी. उसी समय व्हिसल हुई. मैं ने जवान से पूछा ‘‘यह व्हिसल किस लिए हुई है?’’

‘‘सर, जवानों की चाय के लिए.’’

पता भी था कि व्हिसलें सब जवानों के लिए होती हैं. हम अफसरों को मैसेंजर मैसेज देते हैं. आगे जवान ने कहा, ‘‘सर, यह आप के बैड के साथ स्विच लगा है. अगर किसी चीज की जरूरत पड़े तो यह घंटी बजा दीजिएगा. मैं हाजिर हो जाऊंगा. वैसे, 8 बजे बार खुलता है और उस के बाद डिनर शुरू हो जाता है.’’

ड्रिंक जवानों और जूनियर अफसरों को भी मिलती है लेकिन उन के लिए कोई बार नहीं बना रखा है. बार सिर्फ अफसरों के लिए होता है.

सोच रहा था कि अगर फ्लाइट शनिवार की हुई तो मैं 2 दिन क्या करूंगा. अमृतसर में मेरा घर था. वहां जाने को मन नहीं करता था. उस घर में मैं हमेशा उपेक्षित रहा हूं. हां, यहां से 20 किलोमीटर दूर मेरा पुश्तैनी गांव है. वहां दादू से मिल आऊंगा. वे मु?ो बहुत प्यार करते हैं. वे हमेशा कहते, ‘मेरा फौजी अफसर आ गया.’

मैं बार में बैठा ड्रिंक ले रहा था तो मु?ो बता दिया गया था कि फ्लाइट शनिवार की है. मैं ने लैफ्टिनैंट साहब को बताया कि 2 दिन की फरलो लीव चाहिए. यहां से 20 किलोमीटर दूर मेरा गांव है. 2 दिन के लिए वहां जाना चाहता हूं. मैं शुक्रवार शाम को लौट आऊंगा.’’

उन्हें कोई एतराज नहीं था. मेरा 2 दिन का फरलो लीव सर्टिफिकेट बना दिया गया. मेरे जाने से ट्रांजिट कैंप वालों को 2 दिन के राशन का फायदा होता. जवान या जूनियर अफसर भी जाते हैं तो उन का भी राशन बचेगा. इस बारे में कोई नहीं सोचता कि ट्रांजिट कैंप वाले उस राशन का क्या करते हैं. सभी को घर जाने का मोह रहता है. फरलो लीव में हम ट्रांजिट कैंप की स्ट्रैंथ पर रहते और केवल राशन का फायदा रहता. वापस आने पर लीव सर्टिफिकेट फाड़ दिए जाते. मैं ने जब गांव के लिए बस पकड़ी तो सुबह के 10 बज चुके थे. नाश्ता मैं ने ट्रांजिट कैंप में ही कर लिया था. आधे घंटे में मैं ?ाकोलाड़ी बस स्टैंड पर उतरा. स्टैंड के सामने हलवाई की दुकान अब भी थी. बचपन से मैं इस दुकान को देखता आया था. कुछ और दुकानें भी खुल गई थीं.

गांव के लिए टैंपों और बसें चलने लगी थीं. नहीं तो पहले गांव तक पैदल जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. सड़क भी कच्ची होती थी. बरसात के दिनों में कच्ची सड़क पर मैं बहुत बार फिसल जाता था. पक्की सड़क बनने पर टैंपों और बसें चलने लगी थीं.

मैं अपने गांव का टिकट ले कर बस में बैठा. बस ने मु?ो 20 मिनट में ही गांव में उतार दिया. गुरुद्वारे से घर की ओर जा रहा था कि रास्ते में कई जानकार मिले. सब से ‘सत श्री अकाल’ हुई. बलवंत की दुकान के पास मु?ो सिमरन मिली, मेरी बचपन की सहेली. उस की शादी हो गई थी. मुझे देख कर मुसकराई और ‘सत श्री अकाल’ की. मेरी क्लासफैलो भी रही थी. मेरा और उस का मजाक चलता था. मैं ने कहा, ‘‘अडि़ए सिमरन, तू शादी के बाद बहुत सोहनी हो गई ऐ. ससुराल वाले क्या खिलाते हैं? वह मुसकराई. बोली तो कुछ नहीं लेकिन हाथ से इशारा किया कि वह मारेगी.

वह हमेशा मुझे ‘अड़या’ कहा करती थी और मैं ‘अडि़ए’ कहता था. मैं मुसकराया और आगे बढ़ गया. तरलोके की दुकान पर बहन लाजो मिली वह भी अपने बच्चे के साथ. वह वैसी ही दुबलीपतली थी. आंखें मिलीं तो ‘सत श्री अकाल’ की. दुबलीपतली होने के कारण सभी उसे ‘सुकड़ी’ कहते थे. मैं ने कहा, ‘‘नी ‘सुकडि़ए’ तू तो वैसी की वैसी है. तेरे ससुराल वाले घट खिलांदे ने? सिमरन तो बहुत सोहनी हो गई ऐ.’’

 

तरलोके ने कहा, ‘‘नहीं भाजी, ऐदा वजूद ही ऐसा है. जिना मरजी खिला लो, इस ने वैसे ही रहना ऐ.’’

तरलोका ‘सुकड़ी’ कहतेकहते रह गया. लाजो ने आंखें तरेरीं और हाथ से मारने का इशारा किया, कहा, ‘‘मेरा मुंडा तो संडा ऐ.’’

मैं मुसकरा कर आगे बढ़ गया, कहा, ‘‘अज घर आके दसांगा.’’

मैं घर पहुंचा तो दादू खेतों को जाने के लिए तैयार थे. मु?ो देख कर बहुत खुश हुए. मैं ने पांव छुए और आशीर्वाद लिया. उन्होंने कहा, ‘‘मैं खेतों का चक्कर लगा कर आता हूं, तुम आराम करो.’’

‘‘दादू, मैं भी आप के साथ चलता हूं. मैं ज्यादा दूर से नहीं आया हूं. पठानकोट से आया हूं.’’

‘‘पोस्ंिटग पठानकोट हुई है?’’

‘‘नहीं दादू, पोस्ंिटग तो श्रीनगर से आगे की है. प्लेन शनिवार को जाएगा, इसलिए मिलने आ गया.’’

‘‘चंगा किता.’’

मेरी आवाज सुन कर दादी भी कमरे से बाहर आ गई थीं. मैं ने उन के भी पांव छू कर आशीर्वाद लिया. मैं जब भी गांव आता, दादू के लिए रम की 2 बोतलें जरूर ले कर आता. मैं ने बोतलें टेबल पर रख दीं और दादू के साथ खेतों में जाने के लिए तैयार हो गया.

‘‘पुत्तर, यह तुम चंगा करदे हो, मेरे लिए रम ले आंदे हो. मैं सारा दिन खेतां च कम कर के थक जादां हां. दो पेग लगाता हूं तो सारी थकावट दूर हो जांदी ऐ. मेरी सर्दियां मजे नाल कट जादियां ने. तू ने खाना खाना होएगा?’’

‘‘हां दादू, खेतां च चक्कर मार कर खाते हैं.’’

दादी को खाना बनाने के लिए कहा तो उन्होंने ने कहा, ‘‘ दाल, चावल, माहनी बना हुआ है. इसे पसंद भी है. रात नू जो कहेगा, बना देंगे.’’

‘‘ठीक है, दादी.’’

मैं ने रास्ते में दादू से पूछा, ‘‘दादू, होर पिंड दा की हाल ऐ?’’

‘‘ठीक ऐ, वो बिशन दी मां होती थी न, वह अपने घर के सामने कुएं में डूब कर मर गई.’’

‘‘अच्छा, वह जो सारे पिंड च सोटी ले कर घूमती थी. किसी को कुछ नहीं सम?ाती थी. अपनी सास को बहुत तंग किया करती थी. यह अभिमान था कि वह चालीस किले की मालकिन है.’’

‘‘हां, जब किसी कारण सास के शुगर से आए जख्मों पर मारती थी तो वह कहती थी, ‘चरसतिए, तू सात जन्म तक ऐवें रहे. तेरे नाल वी ऐदां होवे.’

‘‘बात केवल इतनी होती थी कि उसे भूख जल्दी लग जाती थी. वह रोटी मांगती और चरसती उसे देती नहीं थी, कहती, ‘‘जब सब के लिए बनेगी तब मिलेगी. इसी बात पर झगड़ा बढ़ जाता और चरसती इसी बात पर उस के जख्मों पर सोटी मारती. कहते हैं न, फौजी अफसर साहब, ‘‘सेर को सवासेर मिल जाता है. बिशन की वोहटी आई तो उस ने वही व्यवहार अपनी सास के साथ किया. तंग आ कर कुएं में छलांग लगा दी. पिंड दे लोग कहने लगे, ‘‘बिशन दी वोहटी चरसती की सास बन कर आ गई है.’’

‘‘हां दादू, कर्मों का हिसाब तो देना ही पड़ता है. सदा दिन एकजैसे नहीं रहते.’’

‘‘हां, तिलक तेरा दोस्त भी नहीं रहा.’’

‘‘उस के बारे में पता चला था.’’

सारी बातें पंजाबी भाषा में हो रही थीं. कई और भी लोगों के मरने की बात बताई. उन में मास्टर ज्ञान चंदजी भी थे जो पिंड के बच्चों को पढ़ाया करते थे. वे पैसे नहीं लेते थे. अनाज के बदले बच्चों को पढ़ाते. मैं अफसोस से कुछ बोल नहीं पाया.

पहले हम गांव भाद्दे वाले खेतों में गए. चना बहुत शानदार लगा हुआ था. दादू ने कहा, ‘‘पहले मैं खड़ी फसल आड़ती नू बेच देदां सी. अब मैं मंडी च जा कर बेचूंगा. मैंनू ओथे दुकान अलौट हो गई ऐ. वहां बेचने से चार पैसे ज्यादा मिल जानगे.’’

‘‘ठीक ऐ, दादू, ट्रैक्टरट्रौली तो है ही. थोड़ी मेहनत पड़ेगी. घर के लिए भी चना और कनक बच जाया करेगी.’’

‘‘हां, 2 नौकर हैं, वे मेरे नाल रहेंगे. घर दे कौल खेत च मैं ने मौसमी सब्जियां लगवाई हैं. नई तां सब्जियां भी खरीदनी पैंदयां सी. पिसली बार बाड़ लगा कर तू ने चंगा किता. सब्जियां चोरी नहीं होतीं और फसल खराब नहीं होती.’’

‘‘बस दादू, मेरी सर्विस 60 साल तक है. उस के बाद मैं ने ऐथे ही आ जाना ऐ.’’

दादू बहुत खुश हुए, ‘‘शाबाश पुत्तर, कोई तो है जो मेरे बुजुर्गों की जमीन संभालेगा. नई तां मैं नू कोई उम्मीद नई सी.’’

दादू काफी देर आसमान की ओर देखते रहे. मैं ने ही कहा, ‘‘दादू, कमला वाले आम के बाग और खेतों में चलें.’’

कमला विधवा थी, उस ने दादू को बाग बेच दिया था. शहर बेटे के पास चली गई थी. जब हम वहां पहुंचे तो फसल वहां भी लहलहा रही थी. पेड़ पर खूब आम लगे हुए थे. बहुत से आम नीचे टपके हुए थे. मैं तो टपके हुए आमों को कूल में धो कर खाने लगा. इतने मीठे, रसीले आम मैं ने कभी नहीं खाए थे.

दादू ने कहा, ‘‘अपने नाल पेटी भर के लेजा.’’

‘‘ले जाता, दादू लेकिन एयरफोर्स के जहाज में खाने की चीजें नहीं ले जा सकते.’’

घर लौटे तो दादी ने दाल, चावल और महानी खाने के लिए रखा. पेट तो आम खाने से ही भर गया था. थोड़े से खाए.

दादी ने पूछा, ‘‘क्यों पुत्तर, घट क्यों खाया?’’

‘‘अम्ब खान नाल ही पेट भर गया सी. रातीं खा लूंगा.’’

2 दिन रह कर मैं ट्रांजिट कैंप लौट आया. ये 2 दिन मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं थे. घर के खाने का स्वाद अभी भी मुंह में था. मैं बहन लाजो के घर भी गया. उस का भाई मेरा लंगोटिया यार था.

शनिवार सुबह 6 बजे प्लेन उड़ा और एक घंटे के अंदर ही मैं श्रीनगर पहुंच गया. एयरपोर्ट से मैं ने कमांडिंग अफसर कर्नल बंसल साहब को मोबाइल किया. उन्होंने कहा, ‘‘मैं गाड़ी भेज रहा हूं, पहुंचने में एक घंटा लग जाएगा.’’

‘‘ठीक है, सर. मैं एयरफोर्स कैंटीन में बैठा हूं.’’

कश्मीर में आतंकवाद न के बराबर रह गया था. केवल दक्षिण कश्मीर में छिटपुट घटनाएं हो जाती थीं. घात लगा कर हमले किए जाते थे. हमारे जवान उन का सफाया कर रहे थे. वे भी धरे जा रहे थे जो आतंकवादियो को पनाह देते थे. ये औपरेशन चुपचाप किए जा रहे थे. हां, कश्मीर मीडिया को इस की सूचना दी जाती थी. मैं सोच रहा था कि आतंकवादियों के इतने अड्डे बने कैसे? कौन दोषी है इस के लिए? इन सवालों के उत्तर मिल भी जाएं तो उन जवानों का क्या जो शहीद हो गए हैं. जिस घर का जीव चला जाता है, पता उन्हें लगता है.

मैं ने एयरफोर्स की अफसर कैंटीन से चाय और ब्रैडमक्खन लिया और आराम से बैठ कर खाने लगा. एक घंटे बाद मेरे मोबाइल की घंटी बजी, मैं ने ‘हैलो’ कहा.

‘‘जयहिंद सर, मैं हवलदार सावन सिंह बोल रहा हूं. आप के लिए गाड़ी ले कर आया हूं.’’

‘‘ठीक है, सावन सिंह, आप सामान लेने वाली जगह पर पहुंचें, मैं आ रहा हूं.’’

सामान लिया और यूनिट के लिए चल दिए. एक घंटे बाद अफसर मेस पहुंचे. सारे कमरे लकड़ी के बनाए गए थे. छतें ढलान वाली थीं इसलिए कि अगर बर्फ या बरसात हो तो छत पर पानी न रुके. कमरे अंदर से बहुत शानदार थे. अटैच वाशरूम के साथ गीजर आदि की सुविधाएं उपलब्ध थीं. लगता ही नहीं था कि कमरे लकड़ी के बने हैं.

औफिसर कमांडिंग कर्नल बंसल के अलावा 3 अफसर ईएमई के थे. केवल मैं और्डिनैंस अफसर था. मेरा विभाग वर्कशौप को स्पेयरपार्टज देने के लिए था.

मैं अभी यूनिफौर्म उतार कर गरम नाइट सूट पहन कर बैठा ही था कि मेरे लिए नाश्ता आ गया. नाश्ते में 4 ब्रैड पीस और 2 अंडों का आमलेट था. थरमस में चाय थी. मैं ने नाश्ता किया. चाय पी और पलंग पर लेट गया. मैं ने दादू और अमृतसर के अपने घर में बता दिया कि मैं अपनी नई यूनिट में पहुंच गया हूं.

मेरा आज से इस मौसम में घुलमिल जाने के लिए 3 दिन का रैस्ट था. मैं पलंग पर लेटा और सो गया. 11 बजे के करीब दरवाजा खटका तो मैं उठा. एक जवान चाय और स्नैक्स ले कर खड़ा था. जवान टेबल पर रख कर चला गया. मैं ने थरमस से चाय कप में डाली और स्नैक्स के साथ पीने लगा. चाय चाहे पाउडर के दूध की थी लेकिन बहुत टेस्टी थी. स्नैक्स भी अच्छे थे. खा कर मैं फिर पलंग पर लेट गया. मेरा सहायक क्वार्टरमास्टर से गरम कपड़े ले कर आ गया था. जो यूनिफौर्म फिट करवानी थी, वे यूनिट टेलर के पास ले कर चला गया. बोला, ‘‘सर, बूट आ कर तैयार कर दूंगा.’’

मैं ने नाप के लिए पुरानी यूनिफौर्म देते हुए कहा, ‘‘ठीक है, यूनिफौर्म की पैंट और कमीज 2 इंच खुली रखें. नीचे बहुत से कपड़े पहनने पड़ेंगे.’’

‘‘जानता हूं, सर. मैं ने इसीलिए एक्स्ट्रालार्ज साइज इश्यू करवाए हैं.’’

‘‘गुड. ले जाओ.’’

मैं लेट गया तो मेस से फोन आया, ‘‘सर, मैं अफसर मेस से हवलदार नायर बोल रहा हूं. सर, आप की डाइट के बारे पूछना था.’’

‘‘मैं ऐग ईटर हूं. मीट बिलकुल नहीं खाता.’’

‘‘ठीक है, सर. थैंक्यू.’’

मैं फिर सो गया. 2 बजे मेरे लिए लंच हौटकेस में आया. 2 सब्जियां, दाल, चावल और रोटी सब था. सलाद के साथ रायता भी था. टेस्टी था. पेट भर खाया.

जवानों और जूनियर अफसरों को भी 3 दिन का रैस्ट मिलता है लेकिन उन्हें अपनेअपने मेस में जा कर खाना पड़ता है. फिर रैस्ट करते हैं. मैं तब तक मेस में जा कर खाना नहीं खा सकता था जब तक डाइनिंगइन पार्टी नहीं हो जाती. उस के लिए

2 दिन अभी बाकी थे. समयसमय पर मु?ो सब कमरे में मिलता रहा. 2 दिन बाद पार्टी हुई तब मैं रैगुलर ड्यूटी करने लगा.

टैक्निकल स्टोर के स्टाफ में कलर्क, स्टोरकीपर तथा अन्य जनरल ड्यूटी करने वाले मिला कर कुल 17 जवान थे. काम का लोड बहुत था. खासकर इश्यू और रिसीप्ट का. बहुत से रिसीप्ट वाउचर साइन के लिए पैंडिंग थे. मैं ने अपने स्टोरकीपरों से कहा, ‘‘एक कुरसीटेबल अपने सैक्शन में रख देना. मैं पीछे बैठ कर वाउचर साइन करता रहूंगा. आप का इश्यू रिसीप्ट भी नहीं रुकेगा. लेजर मेरे औफिस में लाने की जरूरत नहीं है. मैं ने एक दिन में ही सारे वाउचर साइन कर दिए. पूरी इनवैंट्री कंप्यूटराइज हो रही थी. फिर लेजरों का काम नहीं रहेगा. मु?ो आइटम देख कर ओके करना होगा.

लंच के समय कर्नल बंसल साहब ने हम से कहा, ‘‘चाहे हम लड़ाकू फौज के नहीं हैं लेकिन खुफिया रिपोर्ट हैं कि सौफ्ट टारगेट पर हमले होने के चांस अधिक हैं. हम लड़ाई के लिए ट्रेंड नहीं हैं. केवल बेसिक ट्रेनिंग हमारे साथ है. हमारे पास हथियार, गोलाबारूद भी आत्मरक्षा के लिए हैं. मेरे ब्रिगेड कमांडर ने कहा है कि हो सकता है कि हम समय पर मदद न दे पाएं. सभी जवान, जूनियर अफसर और अफसर अपनेअपने हथियार और गोलियां साथ ले कर ड्यूटी करेंगे. आज शाम को

6 बजे मैं ने सैंट्रल रोलकौल रखी है. आप सभी आएंगे.’’

मैं कर्नल बंसल साहब के चेहरे पर चिंता की रेखाएं साफ देख रहा था. मैं ने कहा, ‘‘सर, आप चिंता न करें, हर हालत में हम मुकाबला करेंगे.’’

और अफसरों ने भी मेरी बात का समर्थन किया. लंच कर के मैं अपने औफिस में अपने सैक्शन के जवानों को इकट्ठा कर के कर्नल बंसल साहब के इंस्ट्रक्शन बताए, कहा, ‘‘24 घंटे होशियार रहना है.’’

मैं ने अपने सभी जवानों के चेहरों को गौर से देखा. उन के चेहरों पर किसी तरह की शिकन या डर नहीं था. हवलदार राम सिंह ने कहा, ‘‘सर, ऐसी धमकियां रोज आती रहती हैं. आज क्वार्टरगार्ड से अपने हथियार और गोलियां भी ले लेंगे. सर, आप बिलकुल चिंता न करें.’’

दूसरे रोज हमारे जवानों के साथ पूरी वर्कशौप अपनेअपने हथियारों के साथ काम कर रही थी. अच्छा लगा कि पूरी यूनिट वारमोड पर आ गई है. दिन में भी चारों तरफ खोदे गए मोरचों में डीएससी यानी डिफैंस सिक्योरिटी कोर के जवान खड़े मिले. अपनी ओर से सुरक्षा के सारे प्रबंध कर दिए गए थे. हम अफसरों की ड्यूटी यह थी कि अपने काम के साथ सारी सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखना, विशेषकर रात के समय. कर्नल बंसल साहब खुद चैक करते थे. किसी भी दुर्घटना की जिम्मेदारी उन की थी. वे रातदिन इस के लिए ऐक्टिव रहते थे.

15 दिन में कोई दुर्घटना नहीं घटी. एक दिन सुबह 3 बजे के करीब दूर कहीं गोलियों की आवाज सुनी. पूरी यूनिट अलर्ट हो गई. सभी मोरचों पर थे. सभी जवानों के पास नाइटविजन थे. वे आतंकवादियों की हरकतों को देख रहे थे. दूर थे. हमारे हथियारों की रेंज में नहीं थे. जब रेंज में आए तो वे हम पर फायर करते, हम ने उन पर फायर शुरू किया. आदेश था कि कोई औटोमैटिक फायर नहीं करेगा. सभी रैपिड फायर करेंगे ताकि बैरल से एकएक, दोदो गोलियां निकलें. मकसद यह था कि हमारी गोलियां खत्म न हो जाएं और आतंकवादी इतने नजदीक न आ जाएं कि वे हम पर ग्रेनेड से या रौकेट लौंचर से हमला कर सकें. गुथमगुथा की लड़ाई न करनी पड़े. जैसे ही रेंज में आए, हमारी ओर से रौकेट लौंचर और एलएमजी से फायर किए गए. दोनों तरफ से गोलियां भी चलीं.

आतंकवादियों को उम्मीद नहीं थी कि हम इस तरह सावधान होंगे और हमला करेंगे. मुठभेड़ ज्यादा देर नहीं चली. वे 3 थे और काफी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद ले कर आए हुए थे. लंबी लड़ाई लड़ने आए थे. इस ?ाड़प में हमारे 2 जवान भी घायल हुए जिन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचा दिया गया.

रिपोर्ट बना कर ब्रिगेड हैडक्वार्टर भेजी गई. ब्रिगेड कमांडर साहब ने विजिट किया. सारी यूनिट को शबाशी दी, कहा, ‘‘ऐसे ही सावधान रह कर बहादुरी से लड़ना है. कर्नल बंसल साहब ने और हथियार और गोलाबारूद मांगा, जिस की पूर्ति एक हफ्ते में कर दी गर्ह. रात के समय एक तरह से पूरी यूनिट मोरचे पर होती.

तीनों आतंकवादी पाकिस्तानी थे. रिपोर्ट कमांड हैडक्वार्टर से आर्मी हैडक्वार्टर चली गई थी. फिर कोई हमला नहीं हुआ. आतंकवादियों के हथियार और गोलाबारूद ब्रिगेड हैडक्वार्टर के क्वार्टरगार्ड में जमा करवा दिए थे. तीनों आतंकवादियों के शव भी सेना अस्पताल भेज दिए थे ताकि मीडिया को दिखाया जा सके. पाकिस्तानी इन शवों को कभी वापस नहीं लेते, सारे प्रूफ होने पर भी. उन्हें सम्मान से दफना दिया जाता. भारतीय सेना का यह मानवीय रूप हमेशा रहा है.

रात की सतर्कता वैसी ही रही. दिन में वर्कशौप नौर्मल मोड पर आ गई. मेरा ध्यान स्टोर के प्रबंधन पर चला गया कि किसी भी पार्ट के लिए गाडि़यों, टैंकों या अन्य संबंधित मशीनों की रिपेयर न रुके. इस के लिए डीलरों से संपर्क बना रहा. वे पार्टज सप्लाई करते रहे. हमारा चैक यह था कि वर्कशौप से पुराना ले कर नया देना. पार्ट हम जौबकार्ड पर देते. पुराने सामान को हम सौलवेज डिपो भेज देते. जो क्लर्क डिटेल था, उस से डीलरों के बिल जल्दी क्लियर करने के लिए कहा जिस से उन्हें पेमैंट जल्दी मिल सके.

मैं ही नहीं, दूसरे अफसर भी बारीबारी से जो जवान घायल हुए थे उन्हें देखने अस्पताल जाते थे. एक के दाहिने कंधे पर गोली लगी थी. उस का पूरा दाहिना बाजू बेकार हो गया था. दूसरे के पैर में गोली लगी थी. गोली निकालने पर भी इन्फैक्शन के कारण उस का आधा पैर काट दिया गया था. दुख की बात यह थी वे ठीक हो कर दोबारा सर्विस में नहीं आ सकते थे. ऐसा सभी घायल सैनिकों के साथ होता है.

मैडिकल पैंशन और सर्विस पैंशन दे कर उन्हें घर भेज दिया जाता है. यह नहीं कि उन्हें सड़क पर छोड़ दिया जाता है. उन्हें जिला सैनिक बोर्ड सरकारी नौकरियों में एडजस्ट करते हैं. जो अपाहिज होते हैं, उन्हें दूध, सब्जी के बूथ दे कर सैटल किया जाता है. वे अपने परिवार के साथ मिल कर स्थापित हो जाते हैं. बहुत कम सैनिक ऐसे होते हैं जो बिलकुल कुछ नहीं कर पाते हैं. वे अपनी पैंशन से गुजारा करते हैं. उन्हें भी सेना की ओर से सारी सुविधाएं मिलती हैं. मैं अपने खयालों से तब उबरा जब मेरा क्लर्क कलपुर्जों की डिमांड साइन करवाने आया. वे अपने डिपो से कलपुर्जे डिमांड करते रहते हैं. जो पुर्जे डिपो में नहीं होते उन्हें लोकल परचेज किया जाता है. रिपेयर का काम किसी तरह रुकता नहीं है. 3 साल का स्टौक मेनटेन करते हैं. इसी तरह दूसरे विभाग भी करते हैं.

सब से मुश्किल होता है यहां से जवानों और जूनियर अफसरों का छुट्टी जाना. उन्हें सड़कमार्ग से छुट्टी जाना पड़ता है. फिर घर जाने के लिए वे रास्ते की तकलीफों के बावजूद छुट्टी पर जाते रहते हैं. ट्रांजिट कैंपों में खाना अच्छा नहीं मिलता लेकिन इस की कोई भी जवान शिकायत नहीं करता. सोचते हैं, कौन सा हमें सदा यहां रहना है. एकदो दिन में आगे के लिए गाडि़यां मिलेंगी और घर चले जाना है. बस, जीने के लिए खाते हैं.  पहले तो नहीं था लेकिन अब सेना का इंटैलिजैंट विभाग को इस की जिम्मेदारी दी गई कि वे ट्रांजिट कैंप के खाने को चैक करें कि वहां ठहरने वाले जवानों को और जूनियर अफसरों को खाना ठीक से मिलता है या नहीं. अफसर कोई फौरवर्ड एरिया में जाने वाला ट्रांजिट कैंप में ठहरता, उसे खाना हमेशा अच्छा मिलता. उन का खाना अलग से बनता. यह भी तब हुआ जब एक धाकड़ कमांडर को पता चला. उस ने खुद भेष बदल कर चैक किया. अफसर समेत पूरा स्टाफ बदल दिया गया. वहां जो कमियां थीं उन्हें पूरा किया गया.

इंटैलिजैंट विभाग के अधिकारी रोज खाना चैक करते. तब से खाना ठीक मिलने लगा उन्हें भी जो रास्ते की कठिनाइयों के कारण ट्रांजिट कैंप में लेट पहुंचते थे. नहीं तो उन्हें भूखे सोना पड़ता था या वे अपनी यूनिट से खाना ले कर आते थे. खाना तो दोपहर को ही शाम के लिए बन जाता था. देखा कि 20 जवान और आ गए और बनाई हुई दाल कम पड़ेगी तो उसी में पानी डाल कर 20 जवानों को खाना दे दिया जाता जो बिलकुल बेस्वाद होता. दाल उबाल कर रखने के लिए बड़ेबड़े फ्रिज और प्रैशरकुकर दिए गए. हमारी सब यूनिटों में भी ऐसे ही किया गया. वैसे, ऊंचे इलाकों में प्रैशरकुकर के बिना खाना नहीं बन पाता.

अब सब ठीक कर दिया गया था. छुट्टी के लिए पूरे साल का प्रोग्राम बन जाता और उसी के अनुसार सभी छुट्टी पर जाते रहते. 31 दिसंबर तक सभी छुट्टी काट कर यूनिट में आ जाने चाहिए. अगर सभी जवान 31 दिसंबर तक छुट्टी काट कर नहीं आते तो इस का प्रभाव कमांडिंग अफसर की गुप्त रिपोर्ट पर पड़ता. समयसमय पर यह चैक होता रहता कि प्रोग्राम के अनुसान छुट्टी गया है या नहीं? जवानों को पता है कि अगर 31 दिसंबर तक छुट्टी नहीं काटी तो उन की छुट्टी कम कर दी जाएगी. 31 दिसंबर तक उन्हें यूनिट में होना चाहिए. इसी तरह 3 साल ऐक्टिव सर्विस कर के मेरी एक बड़े डिपो में पोस्टिंग हो गई.

इन्हें आजमाइए

? बच्चों के स्कूल टिफिन में रोजाना अलगअलग आइटम्स रखें ताकि बोरिंग न लगे. कभी सैंडविच, कभी परांठा, कभी राइस या दाल का कौम्बिनेशन.

? हलका कार्टिगन, श्रग या श्रग स्टाइल जैकेट पहनें. यह लुक क्लासी बनाता है और बौडी शेप कवर करता है.

? घर में होटल जैसा फील और खूबसूरती के लिए फेयरी लाइट, एलईडी स्ट्रिप, टेबल लैंप या वार्म लाइट लगाएं.

? सुबह उठते ही और सोने से पहले मोबाइल से दूर रहें. बेवजह की स्क्रौलिंग आप का समय और ध्यान खा जाती है.

? हर समय लोगों पर निर्भर रहना सही नहीं, खुद के साथ समय बिताना आप को मजबूत बनाता है.

? जूते से आवाज आए तो तलवे के नीचे थोड़ा पाउडर डाल दें-स्क्वीकिंग बंद हो जाएगी.

? टेप का किनारा ढूंढ़ना हो तो टेप के किनारे पर छोटा कागज चिपका दें, बारबार ढूंढ़ना नहीं पड़ेगा.

? अलमारी में कौटन में थोड़ा परफ्यूम डाल कर रखें, कपड़े पहनते समय हलकी खुशबू रहती है.

? खाना हमेशा सजा कर पेश करें. सुंदर प्रेजैंटेशन खाने का स्वाद भी बढ़ाता है. Soldier Story:

 

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