Lord Macaulay: प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि मैकाले के एजुकेशन सिस्टम को खत्म करना जरूरी है क्योंकि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था गुलामों की फौज तैयार करती है. यहां सवाल यह है कि अगर मैकाले से पहले भारतीय शिक्षा व्यवस्था इतनी ही उन्नत थी तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था से निकली महान हस्तियां नजर क्यों नहीं आतीं? तमाम भारतीय इतिहासकार, डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, समाज सुधारक और नेता मैकाले की शिक्षा लागू होने के बाद ही क्यों पैदा हुए? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षित होने वाली पहली पीढ़ी में भारत की ऊंची जाति के लोग ही क्यों थे? अगर मैकाले की शिक्षा व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तो ऊंची जाति के लोगों ने इस का बहिष्कार क्यों नहीं किया?

अयोध्या में राममंदिर ध्वजारोहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मैकाले की शिक्षा नीति को ले कर कहा कि मैकाले ने मानसिक गुलामी की नींव रखी. प्रधानमंत्री ने आने वाले 10 सालों में मैकाले के एजुकेशन सिस्टम को खत्म करने का टारगेट रखा है. इस से यह साफ होता है कि अंगरेजों के जमाने से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म करने की तैयारी चल रही है. ऐसे में आइए जानते हैं कि लौर्ड मैकाले आखिर कौन थे और उन के एजुकेशन सिस्टम से मानसिक गुलामों की फौज कैसे पैदा होती है.

मैकाले की शिक्षा नीति से मानसिक गुलामों की फौज खड़ी होती है, यह नैरेटिव आरएसएस की विचारधारा की उपज है. संघ की नजर में लौर्ड मैकाले ही नहीं, विलियम बैंटिक, ज्योतिराव फुले, डा. अंबेडकर और महात्मा गांधी जैसे लोग विलेन ही हैं. वर्ष 1945 में नाथूराम गोडसे द्वारा संपादित पत्रिका ‘अग्रणी’ में दशहरे पर प्रकाशित एक कार्टून में रावण के 10 सिरों में 10 महान हस्तियों को दर्शाया गया था. उन में कुछ वे लोग थे जो देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे और कुछ सामाजिक क्रांति के नेता थे. उन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और डा. अंबेडकर जैसे लोग शामिल थे.

इस कार्टून में रावण की ओर तीरकमान लिए वीर सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को राम और लक्ष्मण के रूप में दिखाया गया था. इस पत्रिका के संपादक नाथूराम गोडसे थे जो हिंदू महासभा से जुड़े थे और तब सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे.

हालांकि उस वक्त रावण के 10 सिरों में मैकाले नहीं थे लेकिन आज संघ के खलनायकों की लिस्ट में मैकाले टौप पर हैं. मैकाले को विलेन बनाने के पीछे बहुत से कारण छिपे हैं. ज्योतिराव फुले, डा. अंबेडकर और महात्मा गांधी की सीधी आलोचना से भारत के बुद्धिजीवी नाराज हो जाते हैं और वे संघ की वास्तविकता को उजागर करने में लग जाते हैं. आरएसएस बुद्धिजीवी वर्ग के साथ सीधे टकराव से हमेशा बचता है, इसलिए आरएसएस के लिए मैकाले जैसे अंगरेज आसान शिकार होते हैं.

प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था कैसी थी

इतिहास को ले कर आरएसएस हमेशा भ्रम पैदा करता आया है. भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था के बारे में भी संघ का अपना ?ाठा इतिहास है जिस के तहत वह दावा करता है कि अंगरेजों के आने से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था उत्कृष्ट थी. पहले भारत में स्कूलों की जगह गुरुकुल चलते थे. आरएसएस के अनुसार, अंगरेज मानते थे कि भारत की शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सब से ज्यादा विकसित और अच्छी व्यवस्था है. इसे खत्म करने के लिए ही मैकाले को भारत भेजा गया.

मैकाले का कहना था कि वे भारत के लोगों को ऐसी शिक्षा देना चाहते हैं जिस से वे रंग या शक्ल से तो भारतीय रहें लेकिन उन का दिमाग ब्रिटिश हो. मैकाले के बारे में दक्षिणपंथी जमात वर्षों से इस तरह का भ्रम फैलाती आई है. जबकि, सच्चाई इस से अलग है.

यह सच है कि थौमस बेबिंगटन मैकाले भारत में इंग्लिश भाषा में पढ़ाई के जनक थे. 10 जून, 1834 को मैकाले ने गवर्नर जनरल की काउंसिल के कानूनी सदस्य के रूप में काम करना शुरू किया था. बौद्धिक क्षमता और शिक्षा के मामले में मैकाले ब्रिटिश सरकार के तमाम राजनेताओं में सब से ऊपर थे. यही वजह है कि उन्हें भारत में लोक शिक्षा समिति का सभापति बनाया गया. इस के बाद 1935 में मैकाले ने अपना मशहूर स्मरणपत्र गर्वनर काउंसिल के सामने रखा जिसे इंडियन एजुकेशन एक्ट की नींव कहा जाता है.

मैकाले ने सब उलट दिया

मैकाले ने गुरुकुलों और मदरसों को खत्म करने का काम किया. साथ ही, अरबी और संस्कृत में होने वाली पढ़ाई का भी अंत कर दिया. गुरुकुल और मदरसों की जगह उन्होंने कौन्वेंट स्कूलों और अंगरेजी पर जोर दिया, साथ ही, उन्होंने संस्कृत और अरबी भाषाओं में चलने वाले मदरसों व गुरुकुलों को मान्यता देने से इनकार कर दिया. इस के बाद से ही अंगरेजी मीडियम स्कूलों की व्यवस्था शुरू हो गई जो आज तक चली आ रही है.

ब्रिटिश सरकार के चार्टर एक्ट 1833 के तहत भारत के लिए विधि आयोग का गठन किया गया जिस के अध्यक्ष बन कर थौमस मैकाले 10 जून, 1834 को भारत आ पहुंचे. उसी वर्ष मैकाले ने भारत में नई शिक्षा नीति की नींव रखी. थौमस बेबिंगटन मैकाले शिक्षा क्रांति के जनक ही नहीं थे, उन्होंने न्याय को भी आम आदमी की पहुंच में ला कर खड़ा कर दिया.

6 अक्तूबर, 1860 को मैकाले द्वारा लिखी गई भारतीय दंड संहिता यानी इंडियन पीनल कोड लागू हुआ. आईपीसी लागू होने पर कानून की नजर में ब्राह्मण और शूद्र सभी बराबर हो गए. आईपीसी से पहले भारत में अगर ब्राह्मण  हत्या का आरोपी भी होता था तो उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाता था. शूद्र और औरतों को शिक्षा का अधिकार नहीं था.

मैकाले भारत के शूद्रों/अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए किसी मसीहा से कम न थे. वे हजारों साल से शिक्षा के अधिकार से वंचित समाज के लिए मुक्तिदूत बन कर भारत आए थे. उन्होंने शिक्षा पर पुरोहित वर्ग के एकाधिकार को समाप्त कर सभी को समान रूप से शिक्षा पाने का अधिकार दिया और पिछड़ों, दलितों व आदिवासियों और औरतों के लिए दरवाजे खोल दिए.

ब्रिटिश गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक द्वारा गठित सार्वजनिक शिक्षा समिति के अध्यक्ष के रूप में मैकाले ने अपने विचार ‘मैकाले मिनट्स’ में

2 फरवरी, 1835 में दिए और उन के विचार ब्रिटिश सरकार द्वारा 7 मार्च, 1835 को स्वीकार किए गए. मैकाले ने सामाजिक भेदभाव, शिक्षण में भेदभाव और दंड संहिता में भेदभाव देख कर ही आधुनिक शिक्षा पद्धति की नींव रखी और भारतीय दंड संहिता लिखी. मैकाले की मौडर्न एजुकेशन पौलिसी में सब के लिए शिक्षा के द्वार खुले थे, वहीं भारतीय दंड संहिता के कानून ब्राह्मण  और अतिशूद्र सब के लिए समान बने.

गैरबराबरी पर खड़ी थी गुरुकुलों की व्यवस्था

पौराणिक व्यवस्था से भारत के उच्च वर्ग को इतनी महानता प्राप्त होती रही थी कि वे अपनेआप को धरती का प्राणी होते हुए भी आसमानी पुरुष यानी देवताओं के भी देव सम?ा करते थे. मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति से ब्राह्मणों को अपने सारे विशेषाधिकार छिनते नजर आए. इसी कारण से उन्होंने खुल कर मैकाले की नीति का विरोध किया और आज भी कर रहे हैं.

दक्षिणपंथियों की नजर में लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति केवल बाबू बनाने की शिक्षा देती है जबकि सच यह है कि लौर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति से शूद्र भी बाबू बन सकते हैं. प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति से तो यह कल्पना से परे की बात है. बस, इसी बात से मैकाले की आलोचना जायज हो जाती है.

मैकाले को विलेन बताने वाले कभी यह नहीं बताते कि प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के किस काल में किस राजा के यहां कोई अतिशूद्र वर्ग का व्यक्ति मंत्री, पेशकार, महामंत्री या सलाहकार हुआ करता था? इसलिए इन जातियों के लिए तो यह शिक्षा पद्धति कुहनी पर लगा गुड़ ही साबित हुई. प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की लाख अच्छाइयां रही होंगी पर यदि शूद्रों को पढ़ाया ही नहीं जाता हो, गुरुकुलों में प्रवेश ही नहीं होता हो तो यह किस काम की?

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का आधार प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथ रहे. इस एजुकेशन सिस्टम के तहत शिक्षा सिर्फ ऊंची जाति, खासकर ब्राह्मणों, को दी जाती थी. गुरुकुलों में धार्मिक पूजापाठ और कर्मकांड पढ़ाया जाता था. धार्मिक ग्रंथ, देवीदेवताओं की कहानियां, चिकित्सा, तंत्रमंत्र, ज्योतिष, जादूटोना यही सब सिलेबस का हिस्सा थे. इस एजुकेशन सिस्टम का माध्यम मुख्यतया संस्कृत रहता था. इस में ज्ञानविज्ञान, भूगोल, इतिहास और आधुनिक विषयों का अभाव रहता था या अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से बात कही जाती थी. राम ने हजारों वर्ष राज किया, भारत जम्बू द्वीप में था, कुंभकर्ण का शरीर कई योजन था, हनुमान सूरज निगल गए.

पौराणिक शिक्षा पद्धति के तहत पूरे देश में कभी ऐसा कोई गुरुकुल या विद्यालय नहीं खोला गया जिस में सभी वर्णों और जातियों के बच्चे पढ़ते हों. ब्राह्मणों की शिक्षा नीति ने कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया, बल्कि लोगों को अंधविश्वासी, धर्मप्राण, अतार्किक और सबकुछ भगवान पर छोड़ देने वाला ही बनाया. गुरुकुलों में प्रवेश से पूर्व छात्र का यज्ञोपवीत संस्कार अनिवार्य था. चूंकि हिंदू धर्म शास्त्रों में शूद्रों का यज्ञोपवीत संस्कार वर्जित है, इसलिए शूद्र तो गुरुकुलों के द्वार तक भी नहीं पहुंच सकते थे.

औरतें तो वैसे भी जन्मजात शूद्र थीं, इसलिए उन्हें भी शिक्षा से वंचित रखा गया. भारतीय शिक्षा व्यवस्था में तर्क का कोई स्थान नहीं था. धर्म और कर्मकांड पर तर्क करने वाले को नास्तिक करार दिया जाता था. इस से छात्र विश्व से भी परिचित नहीं हो पाते थे क्योंकि भारत से बाहर का ज्ञान तो वर्जित था.

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की तारीफों का ढिंढोरा पीटने वाले लोग कभी गुरुकुलों की सच्चाई नहीं बताते. पौराणिक शिक्षा व्यवस्था ने भारत की बहुसंख्यक आबादी को शिक्षा से वंचित रखा और भारत के उच्च वर्ग को काहिल और अकर्मण्य बनाए रखा, जिस से यह देश हजारों वर्षों तक गुलाम रहा.

मैकाले की इंग्लिश शिक्षा का कमाल

लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति का आधार परिस्थितियों के अनुसार पैदा हुई जरूरतें रहीं और इस शिक्षा व्यवस्था से उन्होंने वंचित तबके को भी जोड़ दिया. लौर्ड मैकाले ने शिक्षक भरती की नई व्यवस्था की, जिस में हर जाति व धर्म का व्यक्ति शिक्षक बन सकता था. तभी तो डा. अंबेडकर के पिता रामजी सकपाल जैसे लोग सेना में शिक्षक बन पाए. मैकाले की व्यवस्था में धार्मिक पूजापाठ और कर्मकांड के बजाय तार्किकता को महत्त्व दिया गया. इस में इतिहास, कला, भूगोल, भाषाविज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और ऐडमिनिस्ट्रेशन शामिल हैं. मैकाले की शिक्षा का माध्यम शुरू में इंग्लिश भाषा और बाद में इस के साथसाथ सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएं हो गईं.

मैकाले की शिक्षा में ज्ञानविज्ञान, भूगोल, इतिहास और आधुनिक विषयों को महत्त्व दिया गया और इस में अवैज्ञानिक बातों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई. मैकाले की नीति के तहत 1835 से 1853 तक भारत के ज्यादातर जिलों में स्कूल खोले गए. यहीं से भारत के मौडर्नाइजेशन की नींव पड़ी. भारत में स्वाधीनता आंदोलन में लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति का बहुत भारी योगदान रहा क्योंकि लोग मौडर्न शिक्षा का हिस्सा बनने लगे. उन्हें देशविदेश की जानकारी मिलने लगी. अगर शूद्रों और अतिशूद्रों का भला किसी शिक्षा से हुआ तो वह लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ही हुआ.

मैकाले ने संस्कृत साहित्य पर प्रहार करते हुए लिखा है, ‘‘क्या हम ऐसे चिकित्साशास्त्र का अध्ययन कराएं जिस पर इंग्लिश पशुचिकित्सा को भी लज्जा आ जाए. क्या हम ऐसे ज्योतिष को पढ़ाएं जिस पर अंग्रेज बालकबालिकाएं हंसें. क्या हम ऐसे भूगोल बालकों को पढ़ाने को दें जिस में शीरा तथा मक्खन से भरे समुद्रों का वर्णन हो.’’ लौर्ड मैकाले संस्कृत तथा फारसी भाषा पर धन व्यय करना मूर्खता सम?ाते थे.

मैकाले : मसीहा या विलेन

देखा जाए तो मैकाले भारत में एक मसीहा के रूप में आए जिन्होंने 4 हजार वर्ष पुरानी सामंतशाही व्यवस्था को ध्वस्त कर के, जाति और धर्म से ऊपर उठ कर, एक इंसानी समाज बनाने का आधार दिया. लौर्ड मैकाले ने शिक्षा और कानून के जरिए वर्णव्यवस्था को ध्वस्त किया तथा गैरबराबरी वाले साम्राज्य को उखाड़ फेंका. मैकाले की शिक्षा के कारण ही ज्योतिबा फुले, साहूजी महाराज, पेरियार रामास्वामी और बाबासाहेब अंबेडकर जैसे लोग सामने आए जिन्होंने भारत का नया इतिहास लिखा.

स्वामी विवेकानंद ने मैकाले की लेखनशैली और बौद्धिक क्षमता की तारीफ की है. प्रसिद्ध इतिहासकार आर सी मजूमदार ने माना कि मैकाले की शिक्षा नीति ने भारत में आधुनिक विज्ञान और इंग्लिश के जरिए वैश्विक ज्ञान तक पहुंच बनाई. संजीव सान्याल, जो अर्थशास्त्री और मोदी सरकार के सलाहकार रह चुके हैं, ने कई बार कहा कि मैकाले की इंग्लिश शिक्षा ने भारत को 19वीं सदी में ही वैश्विक पटल पर ला खड़ा किया और आधुनिक भारत की नींव रखी.

वैज्ञानिक और कमैंटेटर आनंद रंगनाथन कहते हैं, ‘‘मैकाले ने भारत को इंग्लिश दे कर सब से बड़ा उपकार किया, वरना हम आज भी संस्कृत में सौफ्टवेयर कोड लिख रहे होते.’’ अमेरिकी बुद्धिजीवी डेविड फ्राली ने कहा कि मैकाले की नीति ने अनजाने में भारत को आधुनिक बनने का रास्ता दिखा दिया. उदारवादी कौलमनिस्ट जैसे स्वप्न दासगुप्ता, तवलीन सिंह ने भी लिखा कि मैकाले ने भारत में एक नई बुद्धिजीवी पीढ़ी तैयार की जो बाद में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व कर सकी.

जवाहरलाल नेहरू स्वयं मैकाले के बहुत बड़े प्रशंसक थे. आज के भारत में लौर्ड मैकाले की खुल कर तारीफ करने वाले बुद्धिजीवी यह तर्क देते हैं कि ‘मैकाले की वजह से ही भारत आज सूचना क्रांति का हिस्सा बन सका.’

ऊंची जाति वालों के मसीहा थे मैकाले

1835 में थौमस मैकाले के मिनट औन एजुकेशन के लागू होने के बाद ही भारत में वैचारिक क्रांति की शुरुआत हुई. सती उन्मूलन, विधवा विवाह, बाल विवाह पर रोक और कई सामाजिक सुधार करने वाले नेता मैकाले की शिक्षा से ही उभरे और समाज में बड़े परिवर्तन कर पाए.

मैकाले की नीति ने ही 19वीं सदी में भारत की शिक्षा व्यवस्था को आकार देना शुरू किया जिस में सरकारी स्कूल, कालेज और यूनिवसिटीज में इंग्लिश भाषा, पश्चिमी विज्ञान, कानून और साहित्य पर जोर दिया गया. इस से पहली और दूसरी पीढ़ी के वे तमाम लोग निकल कर सामने आए जिन्हें आज हम 19वीं और 20वीं सदी के महान लोगों में गिनते हैं. आज आरएसएस और बीजेपी जिन बड़े नेताओं को अपने आदर्श के रूप में रखती है उन में से ज्यादातर मैकाले की शिक्षा की पैदाइश ही हैं.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कलकत्ता के प्रैसिडैंसी कालेज से इंग्लिश में औनर्स किया और कलकत्ता यूनिवर्सिटी से एमए और कानून की डिग्री ली थी.

एम एस गोलवलकर ने नागपुर के हिस्लाप कालेज से स्नातक और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से एमएससी तथा कानून की पढ़ाई की थी. बीएचयू के नाम में भले ही हिंदू शब्द जुड़ा था लेकिन उस का पाठ्यक्रम मैकाले की शिक्षा पर ही आधारित था.

के बी हेडगेवार ने कलकत्ता के नैशनल मैडिकल कालेज से मैडिसिन में डिग्री ली. यह कालेज भी मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा था.

लाला लाजपत राय ने रेवाड़ी के गवर्नमैंट हायर सैकंडरी स्कूल और लाहौर के गवर्नमैंट कालेज से पढ़ाई की, जो सीधे ब्रिटिश सरकारी शिक्षा प्रणाली के तहत थे जिसे मैकाले ने बनाया था. अरविंदो घोष ने इंगलैंड में सैंट पौल स्कूल और कैम्ब्रिज के किंग्स कालेज से पढ़ाई की, जो पूरी तरह ब्रिटिश शिक्षा थी. बाल गंगाधर तिलक ने पूना के डेक्कन कालेज से गणित और संस्कृत में स्नातक किया. हालांकि तिलक की शुरुआती शिक्षा घर पर हुई लेकिन कालेज स्तर पर उन्होंने मैकाले की शिक्षा को ही ग्रहण किया.

विनायक दामोदर सावरकर ने पूना के फर्गयूसन कालेज से स्नातक किया और लंदन में कानून की पढ़ाई की. फर्गयूसन कालेज डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी का था, लेकिन पाठ्यक्रम ब्रिटिश था. बंकिम चंद्र चटर्जी ने हुगली कालेजिएट स्कूल और प्रैसिडैंसी कालेज से पढ़ाई की जो मैकाले की नीति पर चलने वाली संस्थाएं थीं. वे कलकत्ता यूनिवर्सिटी के पहले स्नातकों में से एक थे. गोपाल कृष्ण गोखले ने बौम्बे के एलफिंस्टन कालेज से स्नातक किया और लंदन में कानून की पढ़ाई की. यह ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली का हिस्सा था.

ये सभी नेता ब्रिटिश काल में शिक्षित हुए. इन तमाम लोगों की पढ़ाई उस मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के कारण हुई जो इंग्लिश भाषा और पश्चिमी ज्ञान पर आधारित थी. विडंबना देखिए कि मैकाले की शिक्षा से निकले इन में से कई नेताओं ने बाद में मैकाले के एजुकेशन सिस्टम की आलोचना की.

सवाल यह है कि मैकाले के एजुकेशन सिस्टम के लागू होने से पहले भारत का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग क्या कर रहा था? अगर मैकाले से पहले भारतीय शिक्षा व्यवस्था इतनी ही उन्नत थी तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था से निकले लोग नजर क्यों नहीं आते? तमाम भारतीय इतिहासकार, वैज्ञानिक, समाज सुधारक और नेता मैकाले की शिक्षा लागू होने के बाद ही क्यों पैदा हुए? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था लागू होने के बाद इस देश में 600 से ज्यादा रियासतें थीं, सभी रियासतों ने अपनी औलादों को मैकाले की दी हुई ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में ही क्यों शिक्षित किया? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षित होने वाली पहली पीढ़ी भारत की ऊंची जाति के लोग थे. अगर मैकाले की शिक्षा व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तो ऊंची जाति के लोगों ने इस का बहिष्कार क्यों नहीं किया?

इंग्लिश शिक्षा को खत्म करना कितना व्यावहारिक

भारत में ऐसे विद्वानों की कमी नहीं है जो प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का गुणगान करते नहीं थकते और लौर्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति को पानी पीपी कर गालियां देते हैं. लौर्ड थौमस बेबिंग्टन मैकाले को भारत के दक्षिणपंथी इंग्लिश शिक्षा प्रणाली थोपने और भारतीय सभ्यता को हीन बताने वाला कहते हैं लेकिन ये लोग खुद ही कौन्वेंट स्कूलों की पैदावार होते हैं या अपने बच्चों को महंगे इंग्लिश माध्यम स्कूलों में पढ़ाते हैं.

अगर मैकाले की शिक्षा इतनी ही खराब है तो देश में धड़ल्ले से कौन्वेंट स्कूल क्यों खोले जा रहे हैं? बीजेपी के ज्यादातर नेताओं के बच्चे महंगे इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ते हैं जिन की फीस लाखों में है. कई नेताओं के बच्चे तो विदेशों में पढ़ते हैं.

भारत में ज्यादातर ‘कौन्वेंट स्कूल’ आज भी ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित होते हैं. उन में अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि मैकाले को गरियाने वाले लोग ईसाई मिशनरीज द्वारा संचालित स्कूलों की तर्ज पर अपने गुरुकुल भी नहीं खोल पाए. ये महंगे कौन्वेंट स्कूल पूरी तरह मैकाले के एजुकेशन सिस्टम पर आधारित होते हैं और इतने महंगे होते हैं कि आम आदमी तो इन स्कूलों के बारे में सोच भी नहीं सकता.

दिल्ली के सैंट फ्रांसिस स्कूल की सालाना फीस तकरीबन 20 लाख रुपए है. लौरेटो कौन्वेंट स्कूल दिल्ली/ कोलकाता की फीस 12 लाख रुपए तक सालाना है. दिल्ली के सैंट थौमस स्कूल  की फीस 10 लाख रुपए सालाना है. दिल्ली के ही कारमेल कौन्वेंट स्कूल की फीस 9 लाख रुपए सालाना है. मैटर डे स्कूल  की फीस 9 लाख रुपए सालाना है तो ला मार्टीनियर कालेज की फीस 15 लाख रुपए सालाना है. बिशप कौन्वेंट बौयज स्कूल, शिमला की फीस 5 लाख रुपए है. गुड शेफर्ड इंटरनैशनल स्कूल, ऊटी की फीस 15 लाख रुपए है. वुडस्टौक स्कूल, मसूरी की फीस 18 लाख रुपए है. द दून स्कूल, देहरादून की फीस 12 लाख रुपए है.

इन महंगे स्कूलों की बात छोड़ दी जाए तो भारत में निजी इंग्लिश माध्यम स्कूलों की संख्या यूडीआईएसई 2021-22 के आंकड़ों के आधार पर प्राइमरी से सीनियर सैकंडरी तक 14,89,115 है. इन में सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल  10,22,386 हैं. निजी अनएडेड स्कूल  3,35,844 हैं.

वर्ष 2019-20 के यूडीआईएसई डेटा के अनुसार, इन स्कूलों में हर साल तकरीबन 2 करोड़ 65 लाख बच्चों का एडमिशन होता है जिन में 26 प्रतिशत छात्र इंग्लिश माध्यम स्कूलों में पढ़ते हैं. इन में सरकारी और निजी दोनों शामिल हैं. 90 प्रतिशत निजी स्कूलों में इंग्लिश माध्यम से ही पढ़ाई होती है और हर आम आदमी अपने बच्चे को इन्हीं इंग्लिश माध्यम स्कूलों में ही पढ़ाना चाहता है जिन के जनक मैकाले हैं. अगर इस शिक्षा व्यवस्था से गुलाम पैदा होते हैं तो सब से पहले बीजेपी के हर कार्यकर्ता और हर नेता को इन का बहिष्कार करना चाहिए और अपने बच्चों को गुरुकुलों में पढ़ाना चाहिए.

स्वदेशी की बात करने वालों के बच्चे विदेशों में क्यों पढ़ते हैं

बीजेपी के कई बड़े नेताओं के बच्चे विदेशी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई कर चुके हैं या कर रहे हैं. यह राष्ट्रवाद या स्वदेशी शिक्षा की बात करने वाले नेताओं का दोगलापन नहीं तो और क्या है? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की बेटी पराकला वांग्मयी ने लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से पढ़ाई की है. वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के दोनों बच्चे ध्रुव और राधिका गोयल ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका इन्वैस्टमैंट बैंकिंग की पढ़ाई की है. विदेश मंत्री एस जयशंकर के बेटे ध्रुव जयशंकर ने मैकालेस्टर कालेज और जौर्जटाउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका से एमए किया है.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे नीरज सिंह ने लीड्स यूनिवर्सिटी, ब्रिटेन से एमबीए किया है. नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेटे महाआर्यमन सिंधिया ने येल यूनिवर्सिटी, अमेरिका से एमबीए किया है. बीजेपी की नेता स्मृति ईरानी की बेटी शैनेल ईरानी ने जौर्जटाउन यूनिवर्सिटी, अमेरिका से एलएलएम किया है. वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह ने जौनसन एंड वेल्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका से होटल मैनेजमैंट किया है.

वर्ष 2020 की एक रिपोर्ट में मोदी सरकार के 56 मंत्रियों में से 12 के बच्चे विदेशी यूनिवर्सिटीज में पढ़े थे. गृहमंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह ने भारत में ही निरमा यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है जो मैकाले की शिक्षा व्यवस्था पर आधारित है.

हालांकि यह ट्रैंड सिर्फ बीजेपी तक सीमित नहीं है, कांग्रेस, सपा और कई विपक्षी पार्टियों के नेताओं के बच्चे भी विदेशों में पढ़े हैं या पढ़ रहे हैं लेकिन राष्ट्रवाद और स्वदेशी का ढिंढोरा सिर्फ बीजेपी पीटती है, इसलिए उस के नेताओं को तो अपने बच्चों के लिए गुरुकुलों की व्यवस्था करनी चाहिए?

हर साल लाखों भारतीय स्टूडैंट्स पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं. प्रधानमंत्रीजी को मैकाले के एजुकेशन सिस्टम को खत्म करने से पहले ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि यह ब्रेनड्रेन रुक सके.

प्रधानमंत्री के ताजा बयान को देखें तो उन के हिसाब से मैकाले की दी हुई शिक्षा व्यवस्था मानसिक गुलाम तैयार करती है जिसे खत्म करना जरूरी है. अगले 10 वर्षों में उन्होंने इस व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का संकल्प भी लिया है लेकिन 200 वर्षों से चली आ रही मैकाले की शिक्षा व्यवस्था कैसे उखाड़ फेंकी जाएगी, इस पर प्रधानमंत्री के पास कोई ब्लूप्रिंट नहीं है. इस वक्त बीजेपी के तमाम पढ़ेलिखे लोग और आरएसएस के भी तमाम पढ़ेलिखे लोगों को जोड़ लिया जाए तो इन में ज्यादातर लोगों ने मैकाले की शिक्षा व्यवस्था से ही पढ़ाई की है. सवाल यह है कि क्या ये सभी लोग मानसिक तौर पर गुलाम हैं?   द्य

इंग्लिश भाषा की महत्ता

थौमस मैकाले की शिक्षा नीति के बारे में तमाम तरह के भ्रम पैदा किए जाते हैं जबकि ऐतिहासिक नजरिए से समझते तो मैकाले ने शिक्षा व्यवस्था में क्रांति ला कर भारत के लोगों को सभ्य और शिक्षित बनाया. मैकाले शिक्षा नीति के तहत ब्रिटिश काउंसिल ने एक लाख रुपए का शुरुआती बजट तय किया था जिसे कैसे खर्च करना है, इस के बारे में मैकाले कहते हैं, ‘‘एक लाख रुपए पूरी तरह से गवर्नर जनरल इन काउंसिल के अधिकार में होने चाहिए, ताकि भारत में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन का उपयोग जिस भी तरीके से उचित सम?ा जाए, किया जा सके. गवर्नर जनरल को यह पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे अरबी और संस्कृत के अध्ययन को प्रोत्साहित करना वैसे ही बंद कर दें जैसे गवर्नर जनरल को मैसूर में बाघ मारने के इनाम को कम करने या कैथेड्रल में होने वाले भजनकीर्तन पर सरकारी खर्च रोकने का अधिकार है.’’

अब सवाल यह है कि मैकाले को अरबी और संस्कृत से समस्या क्या थी? इस का जवाब भी मैकाले ने शिक्षा समिति के सामने रखा था.

मैकाले कहते हैं, ‘‘सभी लोग इस बात पर सहमत हैं कि भारत के आम लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं में न तो साहित्यिक और न ही वैज्ञानिक ज्ञान उपलब्ध है. ये भाषाएं इतनी गरीब और असभ्य हैं कि जब तक इन्हें किसी दूसरी भाषा से समृद्ध नहीं किया जाता, तब तक इन में किसी मूल्यवान पुस्तक का अनुवाद करना आसान नहीं होगा. जिन लोगों के पास उच्च शिक्षा प्राप्त करने के साधन हैं उन की बौद्धिक उन्नति किसी ऐसी भाषा के माध्यम से ही हो सकती है जो उन की मातृभाषा न हो. संस्कृत में लिखी गई सभी पुस्तकों से प्राप्त ऐतिहासिक ज्ञान इंगलैंड के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली साधारण पुस्तकों से भी कम मूल्यवान है. भौतिक और नैतिक दर्शन के हर क्षेत्र में भारत की भाषाओं की अपेक्षा इंग्लिश ज्यादा समृद्ध है.’’

तर्क के दृष्टिकोण से देखें तो मैकाले ने कड़वा सच कहा था. मदरसे या गुरुकुल में शिक्षा के नाम पर जो कुछ पढ़ाया जाता था उसे एजुकेशन नहीं कहा जा सकता था. आज भी मदरसों और गुरुकुलों की शिक्षा पद्धति में कोई ज्यादा बदलाव नहीं है. ये शिक्षण संस्थाएं बाद में हैं पहले ये धार्मिक संस्थाएं होती हैं जिन का उद्देश्य महज मुल्लाओं और पोंगापंडितों को तैयार करना होता है.

सवाल यह है कि अगर मैकाले इंग्लिश की वकालत न कर के पर्शियन की वकालत करते तो क्या आज नरेंद्र मोदी खुश होते? वर्ष 1835 में हिंदी कहां लिखी जा रही थी, यह भाजपा बताएगी क्या? संस्कृत में कौनकौन से ग्रंथ वर्ष 1835 के आसपास लिखे गए और छपे और करोड़ों ने पढ़े? मैकाले की शिक्षा नीति लागू होने से पहले इतिहास, भूगोल, भौतिकी, एस्ट्रोनौमी, मैडिसिन और तकनीक पर भारतीय भाषाओं में कितना काम हुआ?

क्या भाजपा के बुद्धिजीवी नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के लिए उन संस्कृत ग्रंथों के नाम लेंगे जो 6 से 12 साल तक के बच्चों को वर्ष 1835 में पढ़ाए जा सकते थे. उस समय तक तो बाल रामायण और बाल महाभारत संस्कृत में नहीं लिखी गई थीं. मैकाले संस्कृत और फारसी की बात कर रहे थे, उस भाषा की नहीं जो अलगअलग जगह बोली तो जा रही थी, लिखी नहीं जा रही थी. Lord Macaulay

 

 

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