Human Rights Issue: किन्नर कितने ही शिक्षित और जागरूक हो जाएं, फिर भी उन के प्रति समाज के नजरिए के बदलने की उम्मीद न के बराबर ही दिखती है. इस की वजह मौजूदा वर्णव्यवस्था में किन्नरों की दोयम दर्जे की स्थिति तो है ही, खुद किन्नर भी अपनी तरफ से अपनी बेहूदी हरकतें छोड़ने की पहल नहीं करते. जेन कौशिक के खुद को ट्रांसजैंडर कहलाने और सुप्रीम कोर्ट में एक मुकदमा जीत जाने से मुख्यधारा में उन की जगह बन पाएगी, इस में शक है.

तय है दूसरे तमाम ट्रांसजैंडर्स की तरह जेन कौशिक को भी समझ आ गया होगा कि उस जैसियों के लिए बराबरी का ख्वाब कभी हकीकत में नहीं बदल सकता. अगर जेन की मंशा महज एक मुकदमे के जरिए मुख्यधारा में शामिल हो जाने की थी तो उस पर पानी फिर गया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उस के साथ न्याय करने की अपनी जिम्मेदारी तो निभा दी है लेकिन उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए उस के पास भी कोई कानून नहीं.

जेन को समझ यह भी आ गया होगा कि जिसे मेनस्ट्रीम यानी मुख्यधारा कहा जाता है उस पर मुट्ठीभर सवर्ण काबिज हैं. वरना तो दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक और सवर्ण औरतें तक भी सिरे से वर्णव्यवस्था की शिकार हैं. इस पौराणिक सिस्टम पर कानून का भी जोर नहीं चलता. अगर चलता होता तो देश में रोजरोज के झगड़े, विवाद और फसाद खड़े नहीं हो रहे होते.

इस की ताजी मिसाल यूजीसी की नई गाइडलाइंस हैं जिन के लागू होते ही ऊंची जाति वालों ने वह बवाल काटा कि एक बार तो यह लगने लगा था कि अब सोशल मीडिया पर चल रही सवर्णों और गैरसवर्णों के बीच की जूतमपैजार सड़क पर आने को है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के स्टे ने हालात संभाल लिए जिस पर यही कहा जा सकता है कि छुरी तरबूज पर गिरे या तरबूज छुरी पर, कटना आखिरकार तरबूज को ही पड़ता है. जेन कैसे तरबूजे के मानिंद कटी, इस से पहले उस के बारे में जानने की कोशिश में वही कहानी सामने आती है जो आमतौर पर अधिकतर किन्नरों की होती है.

राहुल बना जेन

31 वर्षीय जेन दिल्ली के बुराड़ी इलाके के पिछड़े समुदाय के एक खातेपीते घर में लड़के के रूप में पैदा हुई थी. पेरैंट्स ने उस का नाम राहुल रखा था. मांबाप के अलावा घर में 2 छोटी बहनें भी थीं. जेन जब 13-14 साल की थीं तब उसे जैंडर डिस्फोरिया का एहसास हुआ. जैंडर डिस्फोरिया यानी जैंडर आइडैंटिटी डिसआर्डर किसी भी लड़के या लड़की के लिए बेहद असहज और तनावपूर्ण स्थिति होती है. उस में वह अपनी लैंगिक पहचान को ले कर दुविधा में पड़ जाता है. यही जेन यानी राहुल के साथ हुआ.

दोटूक कहें तो इस स्थिति में खासतौर से टीनऐजर उम्र के मुताबिक शरीर में आ रहे बदलावों से छुटकारा पाने की हद तक परेशान हो उठता है. मसलन, दाढ़ी और स्तन से घृणा भी वह करने लगता है. दूसरी बड़ी दिक्कत उस का न चाहते हुए भी विपरीत लिंगी की तरह बरताव करने की इच्छा होती है जिसे रोक पाना उस के बस की बात नहीं होती. लड़के लड़कियों की तरह व्यवहार करने लगते हैं और लड़कियां लड़कों की तरह. यह वह स्टेज होती है जिस में चिंता, कशमकश, बेचैनी और डिप्रैशन घेरने लगता है. अकेले रहने की इच्छा यानी सामाजिक अलगाव भी इस का अहम लक्षण है.

जैंडर डिस्फोरिया की मुकम्मल वजह आज तक सामने नहीं आ पाई है लेकिन माना यह जाता है कि बायोलौजिकल और हार्मोनल व एक हद तक पर्यावरणीय कारकों की वजह से भी यह स्थिति हो सकती है. सहूलियत के लिए या किन्नरों को अपमानित न करने की मंशा से इसे प्राकृतिक विविधता शब्द से नवाज दिया गया है. राहुल जब 8वीं क्लास में आया तो उस के ये लक्षण सहपाठियों से छिपे न रह सके. हुआ वही जिस का ऐसे मामलों में डर होता है कि सहपाठी उस की खिल्ली व मजाक उड़ाने लगे लेकिन उस ने घरवालों से खुद में आ रहे इन बदलावों को छिपाए रखा. दूसरी दिक्कत तब शुरू हुई जब साल 2018 के लगभग पेरैंट्स उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगे. यह राहुल की समझदारी ही कही जाएगी कि उस ने सीधेसीधे मांबाप को बता दिया कि वह खुद एक महिला है, इसलिए महिला से शादी नहीं कर सकता.

समझदारी मांबाप और भाईबहनों ने भी दिखाई और राहुल को हर तरह का सहयोग दिया. ऐसी हालत में उसे भावनात्मक सहारे और सहानुभूति की ज्यादा जरूरत थी जोकि परिवार से मिला लेकिन जैंडर डिस्फोरिया का एक और बड़ा लक्षण यह होता है कि इस से ग्रस्त लोगों में खुद को दूसरे यानी विपरीत लिंग में देखने की इच्छा बेहद मजबूती से होने लगती है. अकसर यह इच्छा कितनी महंगी पड़ती है, इसे जेन के उदाहरण से भी समझा जा सकता है.

परिवार पर राज उजागर कर राहुल का खुद को हलका महसूस करना कुदरती बात थी पर यहीं से उस के लड़की बनने की ख्वाहिश और जोर मारने लगी तो उस ने अपनी यह इच्छा, जो मजबूरी ज्यादा थी, घरवालों को बताई. कौशिक परिवार के सब्र, समझा और हिम्मत की जो इस जटिल और कठिन स्थिति में भी राहुल के साथ खड़े रहे और उसे लड़की बनने की इजाजत दे दी. न केवल इजाजत दी बल्कि उस के जेन बनने तक के सफर में साथ भी दिया जिस का अहम पड़ाव ट्रांजिशन होता है.

2018 में ही राहुल औपरेशन के जरिए जेन बन गया. इस तरह के औपरेशन को मैडिकल की भाषा में जैंडर रीअसाइनमैंट सर्जरी कहा जाता है जो इन दिनों बेहद आम है. इतनी आम कि औपरेशन के जरिए लिंग परिवर्तन कराने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है. दिल्ली के एम्स स्थित ट्रांसजैंडर क्लिनिक के मुखिया डाक्टर मनीष सिंघल के मुताबिक साल 2023 से जनवरी 2026 तक 139 जैंडर अफौर्मिंग सर्जरी और 56 माइनर औपरेशन हुए थे.

इस प्रक्रिया में जननांग और वेशभूषा बदल जाते हैं. इस दौरान 69 ट्रांसजैंडर मर्द से औरत बने और 71 औरत से मर्द बने. 33 ने जननांग बदलवाने के लिए सर्जरी करवाई. जानकारी के मुताबिक अधिकतर औपरेशन 20 से 30 साल की उम्र वाले कराते हैं. देशभर के हाल और आंकड़े इस से जुदा नहीं होंगे, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

बड़ी आसानी से राहुल कौशिक जेन कौशिक बन गया लेकिन इस के बाद उस की जिंदगी और भी ज्यादा दुश्वार होती गई. इस की एक वजह उस का अपने ही शरीर से खिलवाड़ करना सम?ा आता है. खिलवाड़ इन मानो में कि अगर राहुल राहुल ही रहता, जेन न बनता तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता. अभी तक जेन को सार्वजनिक जीवन और दुनियादारी का कोई खास तजरबा नहीं था. इस का सार यह निकलता है कि एक किन्नर किन्नर ही रहेगा, इस के सिवा कुछ और वह नहीं हो सकता.

अच्छी बात है कि जेन इस मिथक को तोड़ना चाह रही थी. शिक्षा और नौकरी के जरिए उस ने इस की कोशिश भी की. सर्जरी के बाद जेन ने अपना फोकस पढ़ाई व कैरियर पर ज्यादा रखा लेकिन इस से पहले वह साल 2016 में राजस्थान से बीए की डिग्री फर्स्ट डिविजन में ले चुकी थी. इस के अगले ही साल 2017 में उस ने हरियाणा से नर्सरी टीचर ट्रेनिंग में डिप्लोमा कोर्स किया. जेन अब तक अतीत के कड़वे अनुभवों से लगभग उबर चुकी थी, इसलिए पढ़ाई में उस ने मुड़ कर नहीं देखा. 2019 में उस ने गुजरात से एमए की डिग्री पौलिटिकल साइंस में हासिल की. साल 2020 में वह उत्तर प्रदेश की एक यूनिवर्सिटी में बीएड यानी बैचलर औफ एजुकेशन के लिए इनरोल हुई थी. उसी समय इंग्लिश से एमए भी उस ने कर लिया.

अब जेन अपनी डिग्रियों, जो उस ने लगन व मेहनत से हासिल की थीं, के चलते आत्मविश्वास से भरी हुई थी. चूंकि उस ने टीचिंग में जाने का मन बना लिया था इसलिए डिग्रियां भी उसी को टारगेट करते ली थीं. मेहनत और काबिलीयत रंग लाईं. साल 2022 में उसे उत्तर प्रदेश के एक प्राइवेट स्कूल लखीमपुर खीरी स्थित उमा देवी चिल्ड्रन स्कूल में सोशल साइंस व इंग्लिश टीचर की नौकरी 45 हजार रुपए महीने की सैलरी पर मिल गई. शायद जिंदगी में पहली बार इतनी खुश हुई होगी क्योंकि अब वह अपने पैरों पर खड़ी थी और दुनिया को दिखा सकती थी कि ट्रांसजैंडर्स भी आम लोगों के बराबर होते हैं.

लेकिन इस बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाते उसे एक हफ्ता ही गुजरा था कि छात्रों और स्टाफ को मालूम हो गया कि जेन ट्रांसजैंडर है. इस के पहले यह बात स्कूल के प्रिंसिपल को ही पता थी जिन्होंने कथित तौर पर इसे छिपा कर ही उसे नौकरी पर रखा था. देखते ही देखते स्कूल में जेन मजाक और उत्सुकता का पात्र बन गई. यहां तक तो बात ठीक थी लेकिन छात्र और स्टाफ के लोग उसी मानसिकता और पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे जिस से पूरी दुनिया है कि ट्रांसजैंडर समाज से बाहर के और दोयम दर्जे के प्राणी हैं. चूंकि वे मूलतया किन्नर और हिजड़े हैं इसलिए इन्हें स्कूल में पढ़ाने का हक ही नहीं. इस के लिए जम कर उस का मजाक उड़ाया गया, ताने मारे गए और भद्दे कमैंट्स किए गए. जाहिर है जेन इस सब से परेशान हो उठी थी और हैरान भी थी कि एक हफ्ते पहले तक सभी लोग उसे इज्जत की नजर से देख रहे थे लेकिन एकाएक ही सभी की नजर और नजरिया इतना कैसे बदल गए कि वह उपहास और उत्पीड़न का पात्र बन गई.

जेन की वजह से सारा स्कूल असहज हो उठा तो प्रिंसिपल साहब को चिंता हुई कि ऐसे कैसे कैंपस में अनुशासन रहेगा और कैसे बच्चे पढ़ेंगे, सो, उन्होंने जेन पर इस्तीफा देने का दबाव डाला. ये वही प्रिंसिपल साहब थे जिन्होंने दया खा कर कह लें या उस की डिग्रियां व योग्यता देख कर नौकरी पर रखा था. अब वही जेन से इस्तीफा मांग रहे थे. चूंकि कोई और रास्ता नहीं था इसलिए उस ने इस्तीफा दे दिया.

लड़ाई सार्थक या निरर्थक

देश क्या पूरी दुनिया में 3 तरह के किन्नर होते हैं. पहले वे जो हुजूम बना कर भीख, नेग और खैरात मांग कर जिंदगी गुजर करते हैं और अपनी बदतमीजियों, बेजा वसूली व बेहूदी हरकतों की वजह से बदनाम हैं और दहशत का दूसरा नाम हैं. दूसरे वे जो देहातों में रहते अकेले दूसरों के रहमोकरम पर जीते हैं. एक तरह से वे निर्वासित और एकाकी जिंदगी जीने को मजबूर रहते हैं. इन किन्नरों की कुल संख्या लगभग 5 लाख का 65 फीसदी है.

तीसरे वे होते हैं जो जन्मजात किन्नर नहीं होते, खुद को ट्रांसजैंडर कहते और कहलाना पसंद करते हैं. पिछले कुछ सालों से वजूद में आए ये किन्नर पढ़ेलिखे होते हैं, जागरूक होते हैं और अपने कानूनी व संवैधानिक अधिकार जानते हैं. इसीलिए इन की आमदनी दूसरे किन्नरों से ज्यादा होती है. नैशनल लाइब्रेरी औफ मैडिसिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक किन्नरों की औसत मासिक आमदनी लगभग 15 हजार रुपए है. कोई 30 फीसदी किन्नर 5,000 से 7,500 रुपए महीना कमाते हैं. 15 फीसदी 10 हजार से 20 हजार रुपए महीना तक कमा लेने वाले किन्नरों की संख्या 37 फीसदी है लेकिन लगभग 14.5 फीसदी किन्नर ऐसे हैं जो 20 से 50 हजार रुपए महीना तक कमा लेते हैं. जाहिर है जेन जैसे ट्रांसजैंडर तीसरी कैटेगरी में आते हैं जो शिक्षित हैं और जिन्होंने किन्नरों का परंपरागत पेशा नहीं अपनाया है.

ये कूल्हे व छातियां मटका कर और हाथ से ताली बजा कर नहीं बल्कि मेहनत और शिक्षा के जरिए इज्जतदार तरीके से गुजरबसर करना चाहते हैं लेकिन समाज इन्हें भी स्वीकार नहीं कर रहा है तो यह समाज की खामी है. पर इस ज्यादती को जेन ने अपनी नियति मानते खामोशी से हजम नहीं कर लिया बल्कि अपने हक और न्याय के लिए उस ने हर वह दरवाजा खटखटाया जो उस के लिए खुल सकता था. स्कूल से निकाले जाने पर कार्रवाई करते उस ने सब से पहले राष्ट्रीय महिला आयोग में ज्यादती और भेदभाव की शिकायत दर्ज कराई.

शिकायत रंग लाई क्योंकि राष्ट्रीय महिला आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार को जांच कराने के निर्देश दिए. यह रंग जल्द ही फीका पड़ गया क्योंकि होने जाने के नाम पर आयोग और सरकार फाइलफाइल खेलते रहे. इस का फायदा उठाते स्कूल प्रबंधन ने काउंटर अटैक करते जेन पर एक करोड़ रुपए की मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया. लेकिन स्कूल प्रबंधन उस वक्त घबरा उठा जब सरकारी दफ्तरों से इस मामले में सफाई और जानकारी मांगते पत्र आने लगे और मीडिया भी इस दिलचस्प मामले में दिलचस्पी लेने लगा. हद तो उस वक्त हो गई जब एक दिन लखीमपुर खीरी के मोहम्मदी पुलिस स्टेशन से एसएचओ साहब पुलिस दलबल सहित दौरे पर आ धमके.

इस सब से न केवल स्कूल की साख पर बट्टा लग रहा था बल्कि छात्रों और स्टाफ में भी दहशत पैदा होने लगी थी. कुल जमा धंधा खतरे में पड़ने लगा था क्योंकि कुदरती तौर पर पेरैंट्स अपने बच्चों को ऐसे स्कूल में पढ़ाने से परहेज ही करते हैं जहां किन्नर टीचर हो और आएदिन पुलिस भी आ धमकती हो. इधर, दिल्ली में अपने घर वापस आ गई जेन शुरुआती कार्रवाई से उत्साह से भर उठी थी और पूछताछ में पुलिस को फिल्मी अंदाज में उस ने बताया था कि, मैं ट्रांसजैंडर्स के अधिकारों के लिए लड़ रही हूं ताकि आइंदा किसी ट्रांसजैंडर का इस तरह अपमान और उत्पीड़न न हो. मेरे साथ स्कूल में बुरा सुलूक किया गया और स्टाफ के सामने मु?ो बेइज्जत किया गया. जवाब में स्कूल प्रबंधन की तरफ से प्रिंसिपल साहब ने इन आरोपों का खंडन करते जेन को ही यह कहते लपेटे में ले लिया कि उस ने कभी अपनी ट्रांसजैंडर पहचान को उजागर नहीं किया.

यह कितना सच है कितना झूठ, कहा नहीं जा सकता लेकिन अपनी लैंगिक पहचान जेन उजागर कर देती तो क्या बच्चे और स्टाफ उसे सहज ढंग से ले पाते, इस की गारंटी कोई प्रिंसिपल तो क्या, सरकार और अदालत भी नहीं ले सकतीं क्योंकि फसाद की असल जड़ पहचान नहीं बल्कि समाज का नजरिया है जो सदियों व मध्यकाल से वैसा ही है जैसा कि आज है. सुर्खियां बनने लगीं और हल्ला मचने लगा तो स्कूल प्रबंधन ने एक कदम पीछे हटते मानहानि का मुकदमा वापस ले लिया. साथ ही, जैंडर सैंसिटाइजेशन कोर्स चलाने का वादा भी किया.

इस से बात आईगई सी हो गई और जेन ने 2023 में गुजरात के जामनगर के एक स्कूल जेपी मोदी स्कूल में नौकरी के लिए अप्लाई कर दिया. स्कूल का औफर लैटर मिलते ही उस ने अपने सारे जरूरी डौक्यूमैंट्स स्कूल प्रबंधन को भेज दिए. पिछले मामले से सबक लेते हुए इस बार उस ने अपनी पहचान उजागर करते पहचानपत्र भी भेज दिए ताकि भविष्य में लखीमपुर खीरी सरीखा बखेड़ा खड़ा न हो.

लेकिन इस स्कूल में तो जेन को पढ़ाने का भी मौका नहीं मिला. पहचान होते ही स्कूल ने उस से अपना औफर वापस ले लिया. कोई 8 महीने वह बेरोजगार रही. इस के बाद मई 2025 में हैदराबाद के एक प्राइवेट बोर्डिंग स्कूल में उसे नौकरी मिल गई. यहां इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तो उस की पहचान को ले कर कोई विवाद/फसाद नहीं हुआ और जेन सुकून से नौकरी कर रही है लेकिन इस के पहले के स्कूलों के भेदभाव और मनमानी के खिलाफ उस ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली थी और जीती भी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा

जब महिला आयोग ने कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति कर अपनी ड्यूटी बजा दी जिस से जेन को कुछ हासिल नहीं हुआ तो उस ने 2023 में ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर अपनी याचिका में उस ने दोनों स्कूलों पर आरोप लगाया था कि उस से उस की ट्रांसजैंडर पहचान के चलते भेदभाव किया गया व अपमानित भी किया गया. इन स्कूलों से बर्खास्तगी पर उस ने अपना वाद ट्रांसजैंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 और संविधान के अनुच्छेदों 14, 15, 17,19 और 21 के उल्लंघन के रूप में पेश किया.

अपनी याचिका में उस ने अपने तमाम शैक्षणिक दस्तावेज यानी डिग्रियां पेश कीं व अपनी सर्जरी का भी ब्योरा दिया. अपनी याचिका में जेन ने बट फौर टैस्ट यानी पहचान न होती तो ऐसा न होता का हवाला देते दलील दी कि स्कूलों की कार्रवाई गरिमा, जीवन और पेशे के अधिकार अनुच्छेद 21, 19 का उल्लंघन है जो आर्थिक मौत के बराबर है. याचिका में उस ने अनुच्छेद 14 समानता, 15 भेदभाव और 17 अस्पृश्यता निषेध का भी उल्लेख किया. उस ने न केवल स्कूलों बल्कि राज्य से भी मानसिक पीड़ा के एवज में मुआवजा मांगा. राज्यों से इसलिए कि उन्होंने ट्रांसजैंडर एक्ट 2019 के तहत कार्रवाई नहीं की थी.

सुप्रीम कोर्ट ने जेन की दलीलों से इत्तफाक रखते 17 अक्तूबर, 2025 को दिए अपने फैसले में गुजरात के जेपी मोदी स्कूल को आदेश दिया कि वह बतौर मुआवजा जेन को एक लाख रुपए दे लेकिन लखीमपुर खीरी के स्कूल उमा देवी चिल्ड्रंस अकादमी को भेदभाव के सुबूत नाकाफी मानते हुए मुआवजे से छूट दे दी लेकिन केंद्र सरकार सहित गुजरात और उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वे जेन को 50-50 हजार रुपए मुआवजा दें क्योंकि वे ट्रांसजैंडर एक्ट के मुताबिक जेन के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाए थे.

बदहाली का जिम्मेदार कौन

बिलाशक जेन कानूनी लड़ाई जीत गई है लेकिन सामाजिक लड़ाई जीत पाई, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं और न ही इस फैसले से दूसरे किन्नरों की बदहाली दूर होने वाली है. खुद किन्नर भी अपनी तरफ से कोई कोशिश इस तरफ नहीं करते क्योंकि मांग कर और नेग वसूली के नाम पर छीन कर खाना उन्होंने अपना हक समझ लिया है. यह पैसा कमाने का आसान रास्ता भी है. इसलिए किन्नर जेन की तरह पढ़लिख कर इज्जत वाला कोई रोजगार या नौकरी नहीं करते. सच यह भी है कि समाज लगातार इन का तिरस्कार और अपमान करता ही करता है तो हालात सुधरने के चांस न के बराबर ही दिखते हैं.

जो किन्नर पढ़लिख कर रोजगार की सोचते हैं, उन से भी नौकरी देने वाले डरेंगे कि इन किन्नरों का क्या भरोसा जो जेन की तरह जाने कब सीधे सुप्रीम कोर्ट चले जाएं और जुर्माना या मुआवजा हमें देना पड़े. इसलिए उन्हें नौकरी ही मत दो, इस से क्या फायदा. किन्नरों की बदहाली का जिम्मेदार कौन, इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि धर्म, जिस ने किन्नरों को कभी आदमी होने का दर्जा दिया ही नहीं, बल्कि इसे पूर्वजन्म के पापों की देन बता कर इन्हें मुख्यधारा से बाहर धकेल दिया. रामायण और महाभारत में किन्नरों का जिक्र मिलता है लेकिन उस से यह नहीं लगता कि उन्हें कोई सम्मानजनक दर्जा मिला हुआ था.

एक लोककथा के मुताबिक जब राम जंगल जा रहे थे तब उन्हें छोड़ने किन्नर भी गए थे. वन जाते वक्त राम ने कहा, सभी नरनारी वापस चले जाएं. 14 साल बाद जब वे लौटे तो नरनारी जा चुके थे लेकिन किन्नर नदी किनारे ही खड़े थे. राम ने इस से खुश हो कर उन्हें आशीर्वाद दिया. इस आशीर्वाद से किन्नरों को न तब कुछ मिला था न आज मिल रहा है. महाभारत की कहानी में वृहन्नला नाम के किन्नर का जिक्र आता है जो दरअसल अर्जुन था. अज्ञातवास के दौरान अर्जुन राजा विराट की बेटियों को डांस और म्यूजिक सिखाता था. एक प्रसंग में अर्जुन स्वीकारता है कि वह न पुरुष है न स्त्री है बल्कि नपुंसक है.

महाभारत की लड़ाई में शिखंडी नाम का किन्नर भी है जो पूर्वजन्म में अंबा था जिस ने भीष्म को मारने की प्रतिज्ञा की थी. यक्ष के वरदान से शिखंडी का जैंडर चेंज हुआ था. युद्ध में वह शिखंडनी के रूप में लड़ा था. थोक में प्रतिज्ञाएं लेने वाले भीष्म ने एक प्रतिज्ञा यह भी ली थी कि वह युद्ध में किसी स्त्री या नपुंसक पर हमला नहीं करेगा. भीष्म को मारने के लिए अर्जुन ने इसीलिए शिखंडी की आड़ ले कर उस पर तीर चलाए थे.

त्रेता और द्वापर में किन्नरों के सामाजिक बहिष्कार के स्पष्ट प्रसंग नहीं मिलते लेकिन उन के सम्मान या मुख्यधारा में होने के भी प्रमाण नहीं मिलते. बात बिगाड़ी सनातनियों के संविधान मनुस्मृति ने जो सीधेसीधे किन्नरों को पूर्वजन्म का दोषी शूद्रों की तरह बताती है. उस के चलते आज भी किन्नरों से नफरत आम है. इस ग्रंथ के अध्याय 9 के श्लोक 49 व 50 में मनु कहता है कि पुरुष, स्त्री और नपुंसक ये तीनों अपनेअपने कर्मों के अनुसार जन्म लेते हैं.

बस, तभी से किन्नर भी अपना अगला जन्म सुधारने के लिए पूजापाठ और दानदक्षिणा में लगे हैं लेकिन इस के लिए वे जेन कौशिक जैसियों को आदर्श नहीं मानते कि अगला तो किसी ने देखा नहीं, पहले पढ़लिख कर मेहनत कर, यह जन्म तो सुधार लें.

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...