Army Story: कैप्टन कर्नल नेहरा साहब मुझे डिपो के अफसर मेस में मिले. मैं पीटी ड्रैस में उस समय नाश्ता कर रहा था. वे भी नाश्ता करने आए थे. मैं उन के अधीन हवलदार रहते हुए एक यूनिट में काम कर चुका था. शायद उन्होंने मु?ो अब भी हवलदार समझ था, इसीलिए उन की टोन में रूखापन था. नाश्ता करते हुए मैं ने उन्हें कुछ भी जवाब देना श्रेष्ठ नहीं समझ . अफसर मेस का यही नियम था. नाश्ता, लंच या डिनर करते चुप रहा जाए. कोई बड़ा अफसर विजिट के लिए आए तो भी उठना नहीं है. अगर कुछ पूछा जाता है तो बैठेबैठे ही उत्तर देना है. यह नियम हरेक पर लागू है. अगर कोई उठने भी लगता है तो उसे मना कर दिया जाता है.
‘‘तुम यहां कैसे? तुम्हें अफसर मेस में नाश्ता करने की परमिशन किस ने दी?’’ उन की आवाज में गुस्सा था, माथे पर बल पड़े हुए थे.
मैं ने मेस के नियम के रहते फिर भी उन्हें जवाब नहीं दिया. केवल मुंह पर उंगली रख कर चुप रहने का इशारा किया. मेरे ऐसा करने पर वे और गुस्सा हो गए. उन्होंने मेस हवलदार को जोर से आवाज लगाई. वह ‘सर’ कह कर भागा हुआ आया. कर्नल साहब ने गुस्से की टोन में ही मेरी ओर इशारा करते हुए पूछा, ‘‘ये श्रीमान यहां कैसे नाश्ता कर रहे हैं? यहां अलाऊ नहीं है.’’
‘‘क्यों सर, ये कैप्टन साहनी साहब हैं, नई पोस्ंिटग पर आए हैं.’’
वे बहुत समय तक मुझे हैरानी से देखते रहे. मैं नाश्ता कर चुका था. नाश्ता करते रहने पर भी उन्होंने मेरी ओर प्रश्न उछाला था, ‘‘आप अफसर कब और
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