Film Review: फिल्म की कहानी मंगलपुर नाम के एक रहस्यमयी गांव से शुरू होती है, जहां बरसों से किसी की शादी नहीं हुई. वजह है कि गांव में ‘वधूसुर’ नाम का राक्षस है, जो दुलहन को गायब कर देता है. इस के रहस्य की जड़ें एक पुराने फ्लैशबैक में छिपी हैं. वहीं दूसरी तरफ लंदन में रहने वाला अर्जुन आचार्य (अक्षय कुमार) अपनी बहन मीरा (मिथिला पारकर) की शादी के लिए एक सही जगह ढूंढ रहा है. अर्जुन अच्छे घर का है मगर सिर पर उधारी भी बहुत है. उस के पिता (जीशु सेनगुप्ता) भी चाहते हैं कि मीरा की शादी अच्छे से हो, तभी अर्जुन को पता चलता है कि मीरा 500 करोड़ रुपए की संपत्ति और एक भव्य हवेली की वारिस है.
अर्जुन मंगलपुर गांव पहुंच कर अपनी बहन की शादी उसी हवेली में करना चाहता है. यहां कुछ किरदार दिखाई देते हैं जैसे असरानी इस महल का मैनेजर यानी केयरटेकर है और परेश रावल वैडिंग प्लानर है. राजपाल यादव इलैक्ट्रिशियन है. अर्जुन के कहने पर ये सभी इस महल को शादी के लिए सजाने में जुट जाते हैं. इस दौरान हवेली में अजीबोगरीब घटनाएं घटने लगती हैं. पहले अर्जुन इन घटनाओं को नकारता है मगर धीरेधीरे उसे भी भूतिया घटनाओं का अनुभव होने लगता है. इसी दौरान कौमेडी का थोड़ाबहुत तड़का भी है. मगर एक समय बाद ये सभी किरदार पुराने जमाने की पाइपलाइन के रिसाव की तरह लगते हैं.
रोहन शंकर और अभिलाष नायर द्वारा लिखित यह पटकथा दो भागों में बंटी लगती है. पहला भाग थोड़ाबहुत हंसाता है मगर दूसरा भाग तो शेयर मार्केट में हुए क्रैश की तरह गिरने लगता है. दोनों भागों में तालमेल की कमी है कहानी में न सस्पैंस है, न ट्विस्ट जो आप को सीट से बांधे रखे. कई सीन ऐसे लगते हैं जैसे बस टाइम भरने के लिए जोड़े गए हों. कुल मिला कर, स्क्रिप्ट अधूरी और बिना दिशा की महसूस होती है.
फिल्म का वीएफएक्स इतना घटिया है कि वधूसुर राक्षस कम, कालेज के नाटक का रावण ज्यादा लगता है. डर का माहौल जीरो है. कौमेडी में 20 साल पुराने जोक्स, वही गिरनाफिसलना चल रहा है. प्रियदर्शन ने ‘भागम भाग’, ‘चुप चुपके’, ‘भूलभुलैया’, ‘स्त्री’, ‘मुंज्या’ का अजीब सा कौकटेल बना कर छोड़ा है. यानी फिल्म वह दिखाने की कोशिश करती है जो पहले की फिल्मों में हो चुका है.
राजपाल यादव 2-3 बार हंसा देते हैं, बाकी टाइमपास लगता है, जबरदस्ती हंसाने की एक्टिंग चल रही है. हीरोइन वामिका गब्बी है मगर उस की भूमिका फिल्म पर कोई इम्पैक्ट नहीं डालती. फर्स्टहाफ थोड़ाबहुत ठीक भी है मगर सैकंडहाफ में तंत्रमंत्र, फ्लैशबैक और आचार्य खानदान का इतिहास दिखाया गया है. फिल्म में जबरन घुसाया मायथोलौजिकल एंगल इसे आउटडेटेड बना देता है.
फिल्म का टैक्निकल डिपार्टमैंट लगता है सब छुट्टी पर थे. निर्देशक प्रियदर्शन ने अपनी पुरानी फिल्मों में अक्षय कुमार के मीम हूबहू चिपका डाले हैं. डायलौग ऐसे हैं कि एक भी लाइन याद नहीं रहती. फिल्म का म्यूजिक प्रीतम ने कंपोज किया है. अरिजीत सिंह की आवाज में ‘तू ही दिसदा…’ गाना सुनने में अच्छा लगता है.
सिनेमेटोग्राफी के नाम पर हवेली बहुत डल लगती है. फिल्म 2 घंटा 57 मिनट की है. 90 मिनट भी झेलना मुश्किल है. अक्षय कुमार इस फिल्म को ढोते हैं, बचाते नहीं. वही आंखें घुमाना, वही पंच डिलीवरी. मगर इफैक्टिव नहीं. उम्र के इस पड़ाव में उन की कौमिक टाइमिंग भी थकी हुई लगती है. क्लाइमैक्स में अक्षय के दो सरप्राइज रोल कर दिए गए हैं लेकिन दर्शक सरप्राइज नहीं होते.
प्रियदर्शन-अक्षय जोड़ी की पहले की फिल्म ‘भूलभुलैया’ में साइंस ने अंधविश्वास को हराया था. ‘भूत बंगला’ ने 16 साल बाद उसी अंधविश्वास को हार पहना कर स्टेज पर खड़ा कर दिया गया है. यह प्रोग्रैस नहीं, रिग्रेशन है. डबल मीनिंग जोक्स भी सुनने में अजीब लगते हैं.
यह फिल्म न डराती है, न हंसाती है, सिर्फ पकाती है और थिएटर से निकलते ही लगता है कि 3 घंटे की सजा मिली थी. फिल्म की शुरुआत से ही दर्शक कनैक्ट नहीं कर पाते. फिल्म हौरर और कौमेडी का मिश्रण बनाने के चक्कर में फंस गई, लेकिन दोनों ही पहलुओं में यह पूरी तरह असफल रहती है. बेशक, यह प्रियदर्शन-अक्षय वाली हिट जोड़ी की सब से कमजोर फिल्म है. film Review





