Indian Railways: रेलवे को आम आदमी की सवारी कहा जाता है. आम आदमी को बिहार से दिल्ली जाना हो या गांव से निकल कर परदेश की यात्रा करनी हो रेलवे ही एकमात्र विकल्प हुआ करती थी. रेलवे में आगे और पीछे जनरल बोगी होती थी जिस में जब चाहे गरीब आदमी बैठ कर अपने गंतव्य तक पहुंच जाता था. समय के साथ रेलवे में कई बदलाव हुए लेकिन जनरल बोगी वहीं की वहीं रही लेकिन अब जनरल बोगी की पहचान खतरे में है.

सरकार की नजर थर्ड एसी पर है क्योंकी एसी बोगी से ज्यादा कमाई होती है. लगातार जनरल बोगी को कम किया जा रहा है जिस से जनरल और स्लीपर दोनों की हालत खराब हो गई है. स्लीपर क्लास अब जनरल जैसा लगने लगा है. लोग फर्श पर, सीट के नीचे, बाथरूम के पास सो कर यात्रा करने पर मजबूर हो रहे हैं. अब सवाल यह है की जहां 80 परसेंट लोग 5 किलो राशन की लाइन में लगे हों वहां हर आदमी थर्ड एसी या स्लीपर में कैसे सफर करे.

भारतीय रेलवे के कुल कोचों में जनरल और स्लीपर कोच अभी भी 70 प्रतिशत के करीब हैं. रेलवे के पास कुल कोचों की संख्या 82,200 है जिस में 57,200 कोच नौन एसी यानि जनरल और स्लीपर हैं. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 2025 में संसद में बताया था कि अगले 5 साल में 17,000 अतिरिक्त नौन एसी यानि जनरल और स्लीपर कोच बनाए जाएंगे. 2024 से 25 के बीच जनरल या अनरिजर्व्ड कोच से 651 करोड़ यात्रियों ने सफर किया. वहीं 2022 से 23 के बीच यह आंकड़ा 553 करोड़ था यानी मांग हर साल बढ़ रही है.

फिर समस्या कहां है? कई लोकप्रिय लंबी दूरी की ट्रेनों खासकर मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में रेक कंपोजिशन बदला जा रहा है. LHB कोच आने के बाद कुछ ट्रेनों में जनरल बोगी 4 और 5 से घटा कर 3 और 4 कर दी गई. स्लीपर भी कम किए गए और उन की जगह 3एसी और 2एसी बढ़ा दिए गए. साउथर्न रेलवे और सैंट्रल रेलवे ने 2025 में कई ट्रेनों में यह प्रयोग किया. नतीजा यह हुआ की उसी ट्रेन में जनरल टिकट वाले यात्री कम जगह में फंस गए और रिजर्व्ड स्लीपर में भी अनरिजर्व्ड यात्री घुस गए.

रेलवे के इस गैरजरूरी प्रयोग से सब से ज्यादा परेशानी आम आदमी को झेलनी पड़ रही है. रेलवे प्राइवेट कंपनी जैसा व्यवहार कर रही हैं. जहां सिर्फ मुनाफा देखा जाता है. इस प्रयोग से रेलवे की कमाई जरूर बढ़ी है. एसी क्लास अब पैसेंजर राजस्व का 54 फीसदी हिस्सा दे रही है जबकि नौन एसी से केवल 41 परसैंट प्रौफिट ही आ रहा है. एक एसी कोच से जितनी कमाई होती है उतनी 3 या 4 जनरल और स्लीपर कोच से नहीं होती. रेलवे कहता है कि एसी से मिले पैसे से नई लाइनें, स्टेशन, वन्दे भारत, सुरक्षा और इलेक्ट्रिफिकेशन जैसे काम हो रहे हैं जिस से रेलवे का मौडर्नाइजेशन किया जा रहा है लेकिन आम आदमी के लिए ये मौडर्नाइजेशन खासा महंगा पड़ रहा है.

देश की बड़ी आबादी अभी भी बेहद गरीबी में जीवन जी रही है. आज भी भारत में जनरल क्लास का किराया दुनिया में सब से सस्ता है जिस से गरीब आदमी के लिए लंबी दूरी की यात्रा सस्ती पड़ती है लेकिन इसी आम आदमी के जनरल डिब्बे को कम कर दिया जाएगा तो भीड़ स्लीपर में शिफ्ट हो जाएगी. रेलवे नौन एसी को सब्सिडी देता है लेकिन मांग इतनी ज्यादा है कि कुछ ट्रेनों में जनरल बोगी बैकअप जैसी हो गई है.

अमृत भारत ट्रेनें पूरी तरह नौन एसी हैं. इस में 8 से 12 स्लीपर कुछ और 2 जनरल कुछ होते हैं. कुछ जोन में न्यूनतम 12 नौन एसी कोच रखने का नियम भी आ रहा है लेकिन समस्या जमीनी है खासकर त्योहारों और शादी के सीजन में तो रेलवे में बेतहाशा भीड़ बढ़ती है. कई लोग यात्रा के दौरान मर जाते हैं. भगदड़ में मौते होतीं हैं लेकिन व्यवस्था के नाम पर स्पेशल ट्रेनें चला दी जाती हैं. अचानक शुरू होने वाली इन स्पेशल ट्रेनों के बारे में गरीब आदमी को कोई जानकारी तक नहीं होती जिस से समस्या वहीं की वहीं बनी रहती है इस से आम आदमी की परेशानी जरा भी कम नहीं होती.

लाखों यात्री रोज ये दुर्दशा झेल रहे हैं. रेलवे को प्राइवेट जैसा मुनाफा कमाना ठीक है लेकिन सब के लिए जगह की व्यवस्था करना रेलवे का सब से बड़ा भी कर्तव्य है. Indian Railways

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