Parenting Tips: पेरैंटिंग के माने और तौरतरीके हर दौर में बदलते रहे हैं लेकिन बच्चों को ले कर इतनी चिंता पहले कभी नहीं थी जितनी आजकल के पेरैंट्स में है जो बच्चों की सेहत को ले कर खतरनाक स्तर तक की चिंता वह भी इतनी कि बेवजह पैथोलौजी तक पहुंच जाए. यह किसी चिंता का हल नहीं है. बल्कि वक्त और पैसों की बरबादी के अलावा बच्चों में डर पैदा करने वाली बात भी है. इस से बचा जाना जरूरी है इसलिए किसी भी जांच के लिए पैथोलौजी तभी जाएं जब पीडियाट्रिशियन कहे.
खुद पर तो प्रयोग करते ही रहते हैं लेकिन सेहत के मामले में इंटरनेटी ज्ञान का कहर पेरैंट्स अपने बच्चे पर भी ढा रहे हैं. इन दिनों गूगल, एआइ और तमाम सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स की आधीअधूरी और गलतसलत जानकारियों ने बजाय आसान करने के पेरैंटिंग को और मुश्किल और जटिल बना दिया है. नए दौर के पेरैंट्स का केयरिंग होना हर्ज की बात नहीं, लेकिन उन की हद और जरूरत से ज्यादा सुरक्षात्मक होने की आदत जिसे मनोविज्ञान की भाषा में पेरैंटल ओवर प्रोटेक्शन कहते हैं वह बच्चे के न तो शारीरिक विकास के लिए ठीक है और न ही मानसिक विकास के लिए ठीक है.
हर किसी को ठीक वैसा ही इश्तहारों वाला बच्चा चाहिए जो गोलमटोल होता है, हरदम एक्टिव रहता है, जिस के घुंघराले बाल होते हैं और जो आमतौर पर मुस्कुराता रहता है. वह रोता तभी है जब बेचने वाले को कोई घुट्टी या ग्राइप वाटर नुमा कुछ बेचने बच्चे को हैरान परेशान और बैचेन दिखाना रहता है. इन परेशानियों और तकलीफों से बच्चे को बचाने पेरैंट्स हर वो चीज खरीदते हैं जिसे विज्ञापन जरूरी बता देते हैं.
यह भी बहुत ज्यादा हर्ज की बात नहीं क्योंकि यह सब बच्चे को आमतौर पर नुकसानदेह नहीं होता. लेकिन सेहत के मामले में खुद को बच्चों का डाक्टर समझ और मान लेना जरूर बच्चे को खतरे में डाल सकता है. इस से भी ज्यादा खतरे की बात है बच्चे को खुद से पैथोलौजी ले जा कर तरहतरह की जांचे करवाना जो गैरजरूरी होती हैं. यह आदत जोखिम को कम नहीं करती उलटे बढ़ा सकती है. क्योंकि एक गलत मैडिसन की तरह एक गलत जांच रिपोर्ट भी जानलेवा बन जाती है. अकसर डाक्टर उसी टेस्ट रिपोर्ट की बिना पर दवाइयां लिख देते हैं जिस रिपोर्ट को पेरैंट्स उस के पास ले गए होते हैं.
भोपाल के वरिष्ठ पीडियाट्रिशियन एएस चावला की माने तो आमतौर पर बच्चों को बहुत ज्यादा पैथोलौजी टेस्ट्स की जरूरत नहीं होती. लेकिन पेरैंट्स हर वक्त बच्चे की सेहत को ले कर आशंकित रहते हैं. उन्हें लगता है कि उन के बच्चे की शारीरिक और मानसिक गतिविधियां सामान्य नहीं हैं. इसलिए वे अपने वहम की पुष्टि के लिए बिना डाक्टर के निर्देश के पैथोलौजी जा कर तरहतरह की जांच करा लाते हैं. कई पेरैंट्स तो इतने झक्की होते हैं कि एक पैथोलौजी से रिपोर्ट नार्मल आए तो क्रौस चेक के लिए दूसरी में जा धमकते हैं. इस से कुछ हासिल नहीं होता हां वक्त और पैसे की जरूर बरबादी होती है और बच्चे पर भी गलत असर पड़ता है. जिसे दरअसल में इलाज की जरूरत होती है अनावश्यक जांचों की नहीं.
कहीं मेरा बच्चा बीमार तो नहीं
न्यूक्लियर फैमिली के इस दौर में बिनाशक पेरैंट्स के लिए बच्चे से ज्यादा कीमती और अहम कुछ और नहीं क्योंकि एक या दो बच्चों से ज्यादा की बात कोई सोचता ही नहीं. दूसरे मांबाप बनने की उम्र भी बढ़ रही है. आमतौर पर बच्चा 30 की उम्र के बाद ही पैदा किया जा रहा है शहरी इलाकों में कामकाजी होने के चलते तो यह उम्र और बढ़ती जा रही है. भारत में भी अमेरिका और यूरोप की तरह बच्चा प्लान कर पैदा किया जा रहा है. यानी बच्चा अब पहले की तरह होता नहीं है बल्कि बाकायदा प्लानिंग के तहत पैदा किया जाता है.
पेरैंट्स की यह सजगता अच्छी बात है लेकिन बुरी बात है अपने बच्चे को अकसर बीमार समझना. एक बच्चे की अपनी दुनिया और मूड होता है जिस के तहत कभी वह खुश तो कभी उदास दिखता है कभी कम खाता है तो कभी ज्यादा खाता है. दिक्कत बस यहीं से शुरू होती है कि जरा सा भी बच्चे को सुस्त देखा या जरूरत से ज्यादा रोते देखा तो नए दौर के पेरैंट्स की जान निकलने लगती है. उन्हें लगता है कि बच्चे को कोई तकलीफ है और वह बीमार है. वे तुरंत भागते हैं डाक्टर के पास.
बातबात में डाक्टर के यहां भागने तक में भी हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है बच्चे को विटामिन, प्रोटीन और कैल्शियम यहां तक कि मिनरल्स भी इंटरनेटी नालेज के तहत नाप कर देना. बुखार अगर 100 डिग्री छूने लगे तो यह मान लेना कि हो न हो इंफैक्शन हो गया है डाक्टर का क्या है वह तो नब्ज देख कर और स्टैथस्कोप से छाती और पीठ टटोल कर पैरासिटामाल टाइप की 2-4 दवाइयां लिख कर कह देता है कि चिंता की कोई बात नहीं. एकाध दो दिन में बच्चा ठीक हो जाएगा बस ये दवाइयां वक्त पर देते रहें.
ये हैं गैरजरूरी जांचें
वक्त पर दवाइयां देने से भी बच्चा एकदम ठीक नहीं होता तो पेरैंट्स को डाक्टर यानी पीडियाट्रिशियन में ही खोट नजर आने लगता है. मसलन इन के यहां तो भीड़ उमड़ी रहती है इसलिए 500-1000 की फीस ले कर टरका देते हैं या फिर इस डाक्टर को ज्यादा एक्सपीरियंस नहीं… लेकिन अगर दूसरे तीसरे ने भी यही किया तो क्या हम खुद ही पैथोलौजी जा कर टेस्ट करा लाते हैं जिस से बीमारी जल्द पकड़ में आ जाए और बच्चा ठीक हो जाए. इस में हर्ज क्या है क्योंकि दूसरी तीसरी बार जाएंगे तो खुद डाक्टर टेस्ट कराने के लिए कहेगा.
आखिर हम भी तो टेस्ट कराते हैं आजकल तो डाक्टर देखता बाद में है पहले दर्जनों टेस्ट प्रिसक्रिब्शन पर लिख देता है. बस यहीं से शुरू होती है बच्चे की असल परेशानी जिसे वह बेचारा बीमारी और तकलीफ की तरह बयां नहीं कर पाता. इंटरनेट की मेहरबानी से हर कोई सामान्य जांचों के बारे में थोड़ा बहुत जानने लगा है जैसे कि सीबीसी यानी कम्प्लीट ब्लड काउंट जिस से बीमारी खासतौर से वायरल इंफैक्शन जल्द पकड़ में आ जाता है. लेकिन सीबीसी की सलाह पीडियाट्रिशियन तभी देते हैं जब बच्चे का बुखार 5 दिन तक ठीक न हो.
बच्चे की कमजोरी और सुस्ती में भी यह जांच कराइ जाती है लेकिन फर्क डाक्टर और पेरैंट्स के देखने और समझने का होता है. पेरैंट्स को 1-2 दिन की बीमारी या बुखार में ही बच्चा सुस्त और कमजोर दिखने लगता है लेकिन डाक्टर सप्ताह भर इंतजार करने के बाद यह सलाह देते हैं. अब दूसरे तीसरे दिन ही बिना डाक्टर के लिखे सीबीसी के लिए बच्चे को ले कर पैथोलौजी पहुंच जाना नादानी की बात है.
इसी तरह के दूसरे टेस्ट जो बहुत आम हो चले हैं ईएसआर और सीआरपी हैं जिन के फुलफार्म भी अधिकतर पेरैंट्स नहीं जानते. लेकिन यह ज्ञान उन्हें सहज प्राप्त है कि एनीमिया और निमोनिया जैसा खतरनाक इंफैक्शन इन्हीं से पकड़ में आता है. सूजन, टीबी और दूसरी गंभीर बीमारियों को पहचानने के लिए भी इन्हीं का सहारा लिया जाता है. लेकिन ये भी सीबीसी की तरह ये भी तब तक गैरजरूरी हैं जब तक पीडियाट्रिशियन न कहे. साधारण सर्दी खांसी और 2-4 दिन तक चलने वाले बुखार में ये जांचे नहीं करवाना चाहिए.
हैरानी की बात तो यह है कि ये टेस्ट किसी भी बीमारी का नाम नहीं बताते सिर्फ बीमारियों की तरफ इशारा करते हैं जिन्हें बच्चे की हालत देख कर डाक्टर ही समझ सकता है. और उसी के आधार पर इलाज व दवाइयां तय करता है. चूंकि पैथोलौजी रिपोर्ट में गड़बड़ी बाले आंकड़े मोटे अक्षरों यानी बोल्ड लैटर्स में लिखे जाते हैं इसलिए यह तो देखने वाले को समझ आता है कि वैल्यू नार्मल नही हैं. लेकिन इन से सिवाय डाक्टर के कोई और यह तय नहीं कर सकता कि बीमारी क्या हो सकती है. कई बार ये वैल्यूज अस्थाई भी होती हैं इसलिए खुद से बीमारी का अंदाजा लगाना और महज इसलिए बच्चे को सुई टुचवाना बेवकूफी है कि हम डाक्टर से पहले बीमारी जान लेना चाहते हैं.
50 हजार के लगभग पीडियास्ट्रीयिशंस की सब से बड़ी संस्था आईएपी यानी इंडियन एकेडमी आफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइंस में भी साफसाफ कहा गया है कि स्वस्थ बच्चे की गैरजरूरी जांचे नहीं कराइ जानी चाहिए. इन गाइडलाइंस जो मैडिकल शब्दाबली के चलते आम आदमी की समझ से बाहर हैं के निर्देशों के मुताबिक ही डाक्टर टेस्ट की सलाह देते हैं.
मेरा बच्चा भूखा है
बच्चा ढंग से खा पी नहीं रहा यह चिंता 100 फीसदी पेरैंट्स को रहती है, फिर भले ही बच्चा अपनी जरूरत के मुताबिक डाइट ले रहा हो पेरैंट्स को वह भूखा ही दिखता रहता है. वे चाहते हैं बच्चा हर वक्त कुछ खातापीता रहे तभी स्वस्थ है. इसलिए खासतौर से मम्मियां हर वक्त उस के मुंह में कुछ न कुछ ठूंसती रहती हैं और अकसर बच्चे के उलटी कर देने तक उन्हें तसल्ली नहीं होती. कम डाइट का संबंध सीधे विटामिनों की कमी से जोड़ना हर भारतीय मांबाप की पहचान है इसलिए वे जल्द ही महज शक के चलते विटामिन डी और बी 12 की जांच करवाने के लिए पैथोलौजी जा धमकते हैं.
इन दिनों थायराइड बीमारी की गिरफ्त में हर कोई आ रहा है जिस का ताल्लुक चूंकि वजन के घटने बढ़ने और बच्चों के मामले में उस की ग्रोथ से ज्यादा है इसलिए यह टेस्ट भी महज अपनी तसल्ली के लिए पेरैंट्स करा रहे हैं. जबकि बच्चों में बड़ों के मुकाबले थायराइड की बीमारी बहुत कम होती है. आजकल वजन लेने की मशीनें घरघर में मौजूद हैं जिन में बच्चे को हर 2-3 दिन भाजी तरकारी की तरह तौला जाना भी आम है और जिस दिन बच्चे के वजन में किलो आधा किलो का भी फर्क देखने को मिलता है उस दिन पेरैंट्स कूद कर इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि हो न हो बच्चे को या तो थायराइड हो गया है या फिर डाइबिटीज की गिरफ्त में वह आ गया है.
ये आशंकाएं ऊपरी हवा की तरह होती हैं जिन का कोई वजूद नहीं होता. इस के बाद भी बच्चे को पैथोलौजी की हवा खिलाना उस के साथ ज्यादती ही है. बच्चा छोटा हो या बड़ा एकाध दो दिन तक उस के बारबार पेशाब करने की वजह या ज्यादा पानी पीने की वजह डाइबिटीज ही है यह सोच दरअसल में उस पेरैंटल ओवर प्रोटेक्शन की तरफ इशारा करती है जिस से बचने की सलाह कोई भी डाक्टर या पीडियाट्रिशियन देता है.
पीडियाट्रिशियन की सलाह पर ध्यान दें
आमतौर पर पीडियाट्रिशियन एलर्जी टेस्ट की भी सलाह भी तभी देते हैं जब अपने तजुर्बे और लक्षणों के आधार पर जरूरी समझते हैं. इस समझ से न केवल असहमति बल्कि उसे खामोखामां में चुनौती देने की मानसिकता की देन है एलर्जी टेस्ट और उस में भी फूड एलर्जी टेस्ट कराना. बड़ों की तरह बच्चों का भी अपना टेस्ट होता है जो बदलता रहता है. इसलिए यह चिंता और टेस्ट दोनों फिजूल हैं कि बच्चा चूंकि खास किस्म का आइटम नहीं खा रहा है इसलिए हो न हो उसे फूड एलर्जी ही हो गई है जिस की जांच करा लेना कोई हर्ज की बात नहीं.
यही बात सामान्य एलर्जी पर लागू होती है मसलन लगातार या बारबार छींक आना, स्किन पर रेशेज आना ये बहुत आम लक्षण हैं जो वक्त रहते दूर हो जाते हैं. इसलिए बच्चों एलर्जी टेस्ट दूसरे टेस्टों की तरह ही गैरजरूरी है और यह महंगा भी होता है. दिल्ली के ग्रेटर नोएडा स्थित ए होलिस्टिक चाइल्ड केयर के चाइल्ड स्पेशलिस्ट आशुतोष श्रीवास्तव की माने तो बच्चों के बढ़ते पैथोलौजी टेस्ट चिंता का विषय तो इस लिहाज से है कि ये अकसर डाक्टरों की सलाह के बगैर करवाए जाते हैं. इस से एक बड़ा नुकसान डाक्टर और पेरैंट्स के बीच अविश्वास पैदा होने का भी है.
बकौल आशुतोष पेरैंट्स को बच्चों के डाक्टरों पर भरोसा रखना चाहिए. डाक्टर बहुत जरूरी होने पर ही पेथोलौजिकल टेस्ट्स की सलाह और हिदायत देते हैं. अधिकतर बीमारियां और परेशानियां दवाइयों से ही ठीक हो जाते हैं. डाक्टरों को भी चाहिए कि वे पेथोलौजिक्ल टेस्ट्स की सलाह बहुत जरूरी होने पर ही दें.
बचें किड्स हेल्थ पैकेज से
मुमकिन है आशुतोष का इशारा कम्प्लीट चाइल्ड हेल्थ पैकेज जैसे पनपते ट्रैंड पर हो जो न केवल दिल्ली बल्कि तमाम मेट्रो शहरों के बाद अब बी टियर शहरों में भी देखने में आ रहा है. बड़ी और नामी पैथोलौजी लैब्स इन पैकेज को अलगअलग नामों से बेच रही हैं. इस के लिए प्रचार और इश्तहारबाजी भी आम हो चली है.
ये पैकेज न केवल लुभावने बल्कि डरावने भी होते हैं जो अब औनलाइन भी चल रहे हैं. इन का मजमून ही पेरैंट्स को पैथोलौजी तक आने उकसाने वाला होता है. इस में कहा जाता है कि क्या आप का बच्चा बारबार बीमार पड़ता है, क्या आप उस की हेल्थ व ग्रोथ को ले कर चिंतित हैं, तो अब चिंता छोड़िए और आइए हमारी लैब में जहां बच्चे की सभी जांचें भारी डिस्काउंट पर की जाती हैं. मसलन सीबीसी, थायराइड प्रोफाइल, विटामिन बी 12 और विटामिन डी सहित कैल्शियम और लीवर – किडनी फंक्शन टेस्ट ब्लड सुगर और यूरिन रूटीन.
इन विज्ञापनों के मुताबिक इस पैकेज से फायदे ये हैं कि बच्चे की बीमारियों की जल्दी पहचान हो जाती है, डाक्टर को डायग्नोस करने में सहूलियत रहती है और आप खुद बच्चे की ग्रोथ और डेवलपमेंट की सही निगरानी कर सकते हैं. दर्द रहित सैंपल व घर से सैंपल लेने की सुविधा उपलब्ध है कौल करें…
डर की इस दुकानदारी से पेरैंट्स को लगने लगता है कि क्या हर्ज है अगर दो चार हजार रु में बच्चे की सारी जांचें हो रही हैं. यानी जरूरत होती नहीं जरूरत पैदा की जाती है.
लेकिन हर्ज है
अब यह पेरैंट्स के सोचने और फैसला लेने की बात है कि क्यों अच्छे खासे सामान्य बच्चे के इतने सारे टेस्ट करवाए जाएं और उन के बच्चे की सेहत की चिंता ये पैथोलौजी लेब्स क्यों कर रही हैं. जाहिर है पैसा कमाने के लिए जिस में इस बात की कोई गारंटी नहीं कि टेस्ट रिपोर्ट्स सही ही होंगी वाश बेसिन टेस्ट भी जम कर होते हैं. ऐसे में एक गलत रिपोर्ट पेरैंट्स को तनाव में और डाक्टर को भ्रम में डाल सकती है.
दूसरा तीसरा हर्ज यह है कि इस से बच्चे के मन में स्थाई डर भी बैठता है. 80 – 90 फीसदी बच्चे सुई या इंजेक्शन से बेवजह नहीं डरते. उन्हें बारबार पैथोलौजी ले जाया जाए तो उन पर बुरा असर पड़ता है. उन्हें आगे चल कर नीडल फोबिया भी हो सकता है जिस से बचने वे लंबे समय तक अपनी परेशानी छिपा भी सकते हैं बच्चे बारबार पैथोलौजी ले जाने के चलते खुद को कमजोर भी समझने लगते हैं जिस से उन का आत्मविश्वास कम होता है. गलत रिपोर्ट पर डाक्टर अगर इलाज शुरू कर दे तो इस में खतरे ही खतरे हैं इसलिए बेवजह गैर जरूरी जांचों से बच्चे को बचाएं और बिना डाक्टर की हिदायत के पैथोलौजी न जाएं. Parenting Tips
8 अप्रेल 2026 को भेजा गया





