Religious Event in Train: हाल ही में एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसमें चलती ट्रेन के एक कोच में रुद्राभिषेक होता दिखाई दिया. इस कार्यक्रम के लिए पूरे कोच को लगभग 3 लाख रुपये देकर बुक किया गया था. वीडियो सामने आने के बाद सवाल उठे कि क्या भारतीय रेलवे का इस्तेमाल इस तरह के धार्मिक आयोजनों के लिए किया जा सकता है? विवाद बढ़ने पर रेलवे ने सफाई दी कि कोच को नियमों के अनुसार निजी रूप से बुक किया गया था और जब तक किसी तरह की एक्टिविटी से सुरक्षा, संचालन या दूसरे यात्रियों को परेशानी नहीं होती तब तक निजी बुकिंग की परमिशन है लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होते हैं.
अगर यही तर्क सही है तो क्या यह सुविधा हर धर्म के लोगों को समान रूप से मिलेगी? क्या कोई मुस्लिम संगठन पूरे कोच में नमाज़ या इज्तेमा का आयोजन कर सकता है? क्या कोई सिख संगठन कोच बुक कर कीर्तन कर सकता है? क्या कोई ईसाई समूह प्रार्थना सभा आयोजित कर सकता है? क्या कोई नास्तिक संगठन इसी तरह कोच बुक कर नास्तिकता का प्रचार कर सकता है?
अगर इन तमाम सवालों का जवाब हाँ में है तो रेलवे को इसकी स्पष्ट नीति सार्वजनिक करनी चाहिए और अगर जवाब नहीं में है तो फिर यह समानता के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ होगा. अब एक दूसरा सवाल. अगर कोई उद्योगपति 3 लाख रुपये देकर पूरा कोच बुक करे और उसमें गोल्फ खेलने का इंतज़ाम कर दे, या डांस पार्टी आयोजित करे या चलता-फिरता कैफे बना दे तब भी क्या रेलवे यही तर्क देगा कि कोच निजी रूप से बुक था? अगर कोई फिल्म निर्माता कोच में शूटिंग करने लगे, कोई कंपनी उत्पाद लॉन्च करने लगे या कोई शादी की संगीत पार्टी चलती ट्रेन में करने लगे तो क्या रेलवे उतनी ही सहजता से अनुमति देगा?
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