Family Story: सुबह के 7 बजे थे. 51 वर्षीया मंजरी नहाधो चुकी थीं. मुट्ठी में लिए बादाम खाती व दूध पीने के साथसाथ बेटी को जगाने के लिए वे जोरजोर से आवाज लगाती जा रही थीं.

‘‘उष्मा, उठ जा. देख, सूरज सिर पर चढ़ आया है. मैं पार्क जा रही हूं. आज मुझे देर हो गई है. पापा को नाश्ता दे देना और सुनो, स्कूल समय से चली जाना.’’ 16 वर्षीया उष्मा कक्षा 9 में पढ़ती थी.

वह अपनी आंखों में अनगिनत सपने समेटे किशोरावस्था की सीढि़यों पर कदम बढ़ा रही थी. वह किसी मीठे सपने में खोई हुई गहरी नींद में थी, तभी मां की कर्कश आवाज सुन कर वह आंख मलती हई हड़बड़ा कर उठ बैठी थी.

मां एक स्वर में बोलती जा रही थीं, ‘‘पापा के लिए चाय बना दो और 2 टोस्ट दे देना. अपने टिफिन में बिस्कुट या रस्क रख लेना. ब्रैडबटर मैं ने फ्रिज से निकाल कर बाहर रख दिया है.’’

नींद की खुमारी से वह अभी पूरी तरह बाहर आई नहीं थी. उसे मां की बातें कुछ सम?ा आ रही थीं, कुछ नहीं. वह हिम्मत करती हुई बोली, ‘‘मां, प्लीज, आप पापा को नाश्ता दे कर जाइए, मुझे स्कूल के लिए देर हो जाएगी.’’

‘‘अभी कोई देर नहीं हुई है. अपना दूध बनाएगी न, उतनी देर में पापा के लिए चाय बन जाएगी,’’ कहती हुई वे दरवाजा जोर से बंद कर के बाहर जा चुकी थीं.

मजबूरीवश उसे उठना ही पड़ा क्योंकि पापा के जोरजोर से कविता पढ़ने की आवाज उस के कानों में पड़ी थी.

‘‘उष्मा बेटा, तुम स्कूल के लिए तैयार हो जाओ, मैं अपने लिए चाय बना लूंगा.’’

‘‘नहीं पापा, मैं बना देती हूं,’’ वह बेमन से किचन में चाय बनाने लगी थी.

वह उनींदी सी पापा के लिए चाय बना रही थी, तभी उस की उंगली गरम पैन से छू गई तो उस ने जल्दी से उंगली मुंह में रख ली. जलन के कारण उस की आंखों में आंसू आ गए थे. उस ने पापा की चाय टेबल पर रख दी. उंगली जल जाने के चक्कर में वह यह भूल गई थी कि वह ब्रैड टोस्टर में डाल चुकी है. जब ब्रैड जलने की महक आई तो उस को ध्यान आया. वह तेजी से अंदर की ओर जाने लगी और दरवाजे से भिड़ गई. उस की कुहनी में दरवाजे से जोर से चोट लग गई थी. उस के मुंह से आह निकल पड़ी थी.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘ब्रैड जल गई, कोई बात नहीं. मु?ो कच्ची ब्रैड दे दो, मैं चाय में डुबो कर खा लूंगा. चोट भी लग गई क्या? दवा लगा लो. ध्यान से काम किया करो.’’

फिर घड़ी देख कर वे बोले, ‘‘जल्दी से तैयार हो जाओ. तुम्हारा स्कूल का टाइम हो रहा है. सुबह जल्दी उठा करो.’’

अब उस को पापा पर भी गुस्सा आ रहा था. जल्दी उठ जाने की बात सुनते ही उस का मूड खराब हो गया था.

मम्मी के रोजरोज पार्क जाने, वहां सहेलियों संग गप करने के कारण उस के लिए मुसीबत खड़ी हो गई है. पहले वे घर में रहती थीं तो पापा का काम कर देती थीं. उस के लिए भी दूध बना देती थीं. पापा भी तो ऐसे ही हैं, उन्हें मना नहीं कर सकते. वे मां के आगे कुछ क्यों नहीं बोल पाते. मम्मी भी तो कम नहीं हैं, वे पापा की कोई बात सुनना ही नहीं चाहतीं. सुनंदा के पापा उस की मम्मी को कितनी जोर से डांट देते हैं. मेरे पापा तो बस मां की सारी बातें चुपचाप सुनते रहते हैं.

लगभग सालभर से मंजरी पर गुरु सत्यानंद महाराज का जैसे नशा छाया हुआ है. वे गुरु महाराज की शिष्या बन गई हैं. उन्होंने मां को जाने क्या घुट्टी पिला दी कि वे अपना घरद्वार ही भूल बैठीं. गुरुजी की कथानुसार कभी फल, मिठाई, रुपयापैसा यहां तक कि जेवर-कपड़ा भी दान देने से नहीं हिचकतीं. वे अपनी दुनिया में इतनी व्यस्त रहतीं कि कई बार जब वह स्कूल से आती तो घर पर ताला लटका मिलता.

वे उसे घर पर अकेला छोड़ कर गुरु सत्यानंद महाराज के प्रवचन सुनने के लिए चल देती थीं. जब वह स्कूल से लौट कर आती, किचन में कुछ खाने के लिए ढूंढ़ती तो निल बटे सन्नाटा मिलता. वह खी?ा कर रह जाती. कभीकभी तो आंखों में आंसू आ जाते. वह मां के प्रति गुस्से से भर जाती लेकिन न वह मां से कुछ बोल पाती और न ही पापा से. जब भूख बरदाश्त न होती तो मैगी बना कर खा लेती. किचन में यहांवहां रखी नमकीन खासकर कुरकुरे खाती.

जब मां लौट कर आतीं, मैगी का बरतन देखतीं व डस्टबिन में पड़ा कुरकुरे का खाली कागज देखतीं तो उस पर बरस पड़तीं, ‘‘तुम ने फिर मैगी खाई और कुरकुरे का पैकेट भी खत्म कर दिया? तुम 2 रोटी नहीं सेंक सकती थीं. तुम्हें तो हर समय चटपट खाने को चाहिए होता है. मैं तुम्हारे भले के लिए ही तो रातदिन पूजापाठ में लगी रहती हूं कि किसी तरह से तु?ो सद्बुद्धि आ जाए, तेरी जिंदगी बन जाए. मेरा भी अगला जनम सुधर जाए. यह जनम तो तुम्हारे नकारा पापा के कारण बरबाद हो गया है.’’

तभी उन का मोबाइल बज उठा था, ‘‘मंजरी, तुम तैयार हो, आज गायत्री के घर पर कार्यक्रम है, भूल गईं क्या?’’

‘‘अरे, मैं तो इस नालायक लड़की के चक्कर में सबकुछ भूल ही गई थी.

बस, चाय पी लूं, फिर चलती हूं. तुम

आ जाओ.’’

फिर बेटी से कहा, ‘‘उष्मा, एक कटोरी दे दो, चाय बहुत गरम है, जल्दी से ठंडी कर के पी लूं.’’

वह कुढ़ कर रह गई थी. उस ने कटोरी ला कर जमीन पर जोर से पटक दी थी.

‘‘तुम्हारी बद्तमीजी बढ़ती जा रही है. इस तरह से कटोरी दी जाती है? यह तुम ने चाय बनाई है कि शरबत? अपने बाप से कम थोड़े ही हो. शाम के खाने में आलूटमाटर की सब्जी बना लेना. पापा आ जाएं तो रोटी सेंक कर खिला देना. हो सकता है भजन में मु?ो देर हो जाए.’’

उस ने मन ही मन बुदबुदाया कि आज तो बना देती हूं लेकिन रोजरोज नहीं बनाऊंगी. एक दिन वह स्कूल से आई तो मां ने रोटीसब्जी बना कर रखी थी.

लौकी की सब्जी तो उसे फूटी आंख न सुहाती थी. उस ने पड़ोस के रिंकू से समोसा मंगा कर खा लिया था. मां जब लौट कर आईं तो उस पर चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘मैं बेवकूफ हूं, बीच में सत्संग से आ कर तेरे लिए खाना बनाया कि स्कूल से लौट कर आएगी तो भूख लगेगी लेकिन रोटी तो पड़ी रो रही है. हर समय तु?ो चटरपटर खाने को चाहिए.

‘‘मेरे लिए एक कप कौफी बना लाओ. मेरे सिर में बहुत जोर से दर्द हो रहा है. 2 पीस ब्रैड भी ले आना. आज प्रसाद में जरा सी

बूंदी मिली थी. रामप्रकाश कब से लाउडस्पीकर पर एनाउंस करवा रहे थे, आज का प्रसाद उन की तरफ से रहेगा. कंजूस कहीं का, भूखा मार डाला. जरा सी बूंदी दोने में रख कर दे दी.’’ फिर हंसते हुए बोलीं, ‘‘उष्मा को टौफी मिली, उस ने गुस्से में पीछे वाली औरत को दे दी थी. फिर तो सभी औरतों को उन्होंने टौफी पकड़ा कर विदा कर दिया. कंजूस कहीं का.’’

उष्मा पैर पटकती हुई किचन में चली तो गई पर गुस्से में उन्हें चिढ़ाने के लिए ढेर सारी कौफी और चीनी डाल दी.

उसे मां की बातें अच्छी नहीं लगती थीं क्योंकि उन के पास गुरुजी, कथा और प्रसाद की बातें रहती थीं या फिर पड़ोसियों की बुराइयों की बातें. वह जानबू?ा कर सारे वे काम करती जिन से मां चिढ़ जातीं और चिल्लानाडांटना शुरू कर देती थीं. वह स्कूल से आने के बाद ज्यादातर दिनभर घर में अकेले रहती क्योंकि मम्मी के पास उन के गुरुजी के कारण बहुत काम रहते. कभी प्रभातफेरी निकालनी है तो कभी कलशयात्रा. दिनोंदिन उन की इन सब कामों में संलिप्तता बढ़ती जा रही थी. यही कारण था कि उन का नैटवर्क बढ़ता चला जा रहा था.

वह अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए अपने नए एंड्रौयड फोन में गेम खेलखेल कर समय बिताती और जब बोर हो जाती तो वह फोन पर रील देखते हुए घंटों निकाल देती थी. फिर वह अपने अकेलेपन से ऊब कर अपनी फ्रैंड निया को, कभी प्रिया को फोन करती. जब लगातार वह कई दिनों तक फोन करती रही, एक दिन उसे उस की मां की आवाज सुनाई पड़ी थी.

‘‘निया, जल्दी करो, तुम्हारा ट्यूशन का टाइम हो रहा है.’’ मजबूर हो कर उसे फोन काट देना पड़ा था. आखिर एक दिन उस की मां का फोन आ ही गया, ‘‘उष्मा, तुम फोन मत किया करो, निया का टाइम बरबाद हो जाता है.’’

16 वर्षीया उष्मा सांवले रंग की थी लेकिन बड़ीबड़ी, चंचल आंखों में बहुत आकर्षण था. किशोरावस्था पर अपने कदम रखती उष्मा का तनमन दोनों ही तरंगित होता रहता. वह मन ही मन तरहतरह की कल्पनाओं में खोई रहती. उसे सजनासंवरना अच्छा लगता था. गली के मोड़ पर बड़ी सी कोठी में रहने वाला उदयन उसे बहुत अच्छा लगता था. उस की आंखें भी उस का इंतजार करती रहतीं. दोनों के बीच काफी दिनों से निगाहों ही निगाहों में एकदूसरे को देख कर आपस में मुसकराना चल रहा था.

वह भी उस के स्कूल में 12वीं क्लास में पढ़ता था. एक दिन उस ने उसे स्कूल में सब की नजरों से बचा कर एक कागज पर अपना फोन नंबर लिख कर दे दिया था. फोन नंबर देखते ही उस के गाल गुलाबी हो गए. अब तो दोनों के बीच फोन पर आपस में बातचीत शुरू हो गई. वह बाइक से स्कूल आता था. उस के पापा का मौल में बड़ा सा स्टोर था, इसलिए वह कैंटीन में अब उसे अकसर समोसा खिलाता. एक दिन वह बोला, ‘‘आज पिक्चर चलोगी ‘रौकी और रानी की प्रेम कहानी’?’’

एक क्षण को वह मां के डर से हिचकिचाई लेकिन वह तो आलिया की दीवानी थी. वह ऐसा मौका भला कैसे छोड़ती?

‘‘मुझे डर लगता है, क्लास बंक करना पड़ेगा.’’

‘‘अरे, कुछ नहीं. चलो दोनों साथ में बैठ कर मूवी देखेंगे, मजा आएगा.’’

उसे तो फ्री में पिक्चर देखने को मिली, साथ में पौपकौर्न भी. अब तो उस की हिम्मत बढ़ गई थी. वह अकसर उदयन की बाइक पर बैठ कर कभी मौल तो कभी पार्क तो कभी रैस्टोरैंट में पिज्जा खाने पहुंच जाती.

उदयन बहुत तेज बाइक चलाता तो वह उस की पीठ से डर कर चिपक जाती. उस को लगता, काश, वह ऐसे ही उस की बाइक पर चिपक कर बैठी रहे. उदयन जब कई बार उस का हाथ पकड़ता तो उस का पूरा शरीर ?ांकृत हो उठता. उस का अंदाज उसे बहुत अच्छा लगता. वह रातदिन उदयन के सपनों में खोने लगी थी.

एक दिन पार्क में उदयन ने जब उस का आलिंगन कर उसे चूम लिया था तो वह भी उस नशे में खोती जा रही थी लेकिन तभी किसी की आहट से उदयन उस से अलग हो गया था.

उष्मा इश्क में डूबी हुई अकसर स्कूल नहीं जा रही थी. स्कूल से शिकायत आई थी, ‘उष्मा स्कूल क्यों नहीं आ रही है?’ जब मंजरीजी ने उस से पूछा तो उस ने कह दिया, ‘मुझे बुखार लग रहा था, इसलिए नहीं गई थी.’ लापरवाह मां तो भक्ति के नशे में डूबी हुई थीं. वे तो बेटी  के ऊपर घर की जिम्मेदारियां डाल कर भक्ति के पाखंड में लीन होती जा रही थीं.

‘‘तुम स्कूल से आ कर क्या करती रहती हो? तुम्हारे जितनी मैं थी, पूरे घर का खाना बनाया करती थी. तुम भी रात का खाना बनाया करो, यही काम आएगा. चाहे जितना पढ़लिख लो, बढि़या खाना बनाएगी तो ससुराल वाले खुश रहेंगे. अभी से अभ्यास करो.’’

वह उदयन के प्यार में डूबी हुई थी. एक कान से सुनती, दूसरे से निकाल देती. उस को तो उदयन के साथ मजा आ रहा था. वह और उदयन मिल कर प्यारभरी बातें करते. वह खाने की शौकीन थी, इसलिए वह उसे कभी आइसक्रीम पार्लर ले जाता तो कभी रैस्टोरैंट में उस का मनचाहा कभी मोमोज तो कभी डोसा जो कहती वह खिलाता. लेकिन उस की निगाहें मौके की तलाश में थीं और एक दोपहर में वह एक पार्क के कोने में ले गया. सुनसान देख कर उष्मा थोड़ी घबराई और नानुकुर की थी परंतु उदयन के बलिष्ठ आलिंगन में वह भी अपना होश खो बैठी थी.

वह अपराधबोध से ग्रसित हो गई थी. उस का आत्मबोध उस से कह रहा था कि वह गलत रास्ते पर चल पड़ी है परंतु उदयन को देखते ही वह सब भूल जाती और फिर से उस की बाइक पर बैठ कर उस के संग चल देती लेकिन जब वह सुनसान जगह की ओर ले कर जाता तो वह घबरा उठती.

‘‘नहीं उद्यन, मुझे घर जाना है. आज पापा जल्दी आएंगे.’’

‘‘उष्मा, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, मैं तुम्हें मुफ्त में इतने दिनों से खिलातापिलाता रहता हूं क्या? मुझे लड़कियों की कमी नहीं. कहो तो तुम्हारे सामने लाइन लगा कर खड़ा कर दूं?’’

उस ने आज गुस्से में बीच रास्ते पर बाइक से उतार दिया था. वहां कोई औटो रिक्शा भी नहीं दिख रहा था. वह बहुत दूर तक पैदल आई तब कहीं रिक्शा मिला था. वह रोंआसी हो उठी थी. उदयन की नाराजगी की वजह से उस का मूड बहुत खराब था. वह रोती हुई घर लौट आई थी. अपने कमरे में जा कर पहले तो बहुत देर तक रोती रही थी और जब थक गई तो किचन में गई. जो कुछ सामने रखा था, जल्दीजल्दी खा कर लेट गई और जाने कब वह गहरी नींद में सो गई.

उस ने शाम का खाना नहीं बनाया तो केशवजी ने बाहर से खाना और्डर कर दिया. जब मंजरीजी ने बाजार का खाना देखा तो बेटी को डांटने के लिए उस के कमरे में पहुंच गईं, उष्मा अपने बैड पर लेटी हुई एकटक छत को घूर रही थी.

मंजरी चिल्ला कर बोलीं, ‘‘तुम ने हाथों में मेहंदी रचाई है क्या जो खाना बाजार से आया है?’’

‘‘मैं खाना नहीं बनाऊंगी, आप की नौकरानी हूं क्या?’’

‘‘यह घर है, होटल नहीं. यहां रहना है तो काम करना पड़ेगा. तुम्हारी इतनी हिम्मत बढ़ गई कि मु?ा से जबान लड़ाती हो.’’

वे जितनी जोर से डांटतीं, वह उतनी जोर से जवाब देती.

‘‘उष्मा, यह सब क्या है, यह तुम्हारी टेबल है कि कूड़े का ढेर? किताबें ठीक से रखा करो. जूतों को देखो कितनी धूल जम रही है, जूते का असली रंग तक भी नहीं दिखाई दे रहा, बिलकुल बरबाद लड़की है.’’

‘‘आप को क्या मतलब, आप अपने सत्संग में जाइए, अपने गुरुजी के आश्रम में ही रहने लगो.’’

‘‘दिमाग खराब हो गया है. ऐसा मन कर रहा है तेरे गाल पर जोरजोर से थप्पड़ लगाऊं, थप्पड़ पड़ते ही दिमाग ठिकाने पर आ जाएगा. तुम्हारी सारी बकवास वाली बातें मुंह से निकलना बंद हो जाएंगी.’’ वे गुस्से में तेजी से बेटी की ओर बढ़ रही थीं. उष्मा अपने कमरे की तरफ दौड़ती हुई गई और धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया था. मंजरी के लिए बेटी का इस तरह का व्यवहार सम?ा से परे था.

केशवजी जब औफिस से आए तो उन्होंने नमकमिर्च लगा कर बेटी की बदतमीजी के बारे में बताया तो वे भी चिंतित हो उठे. वे सोचने लगे कि उन की दिनभर हंसनेखेलने, क्लास में अच्छे नंबर लाने वाली लड़की को क्या हो गया है. रोज बाजार का तलाभुना खाखा कर उस का शरीर फूलता जा रहा था.

मंजरी सोचने लगीं, यह लड़की तो अपने में ही खोती जा रही है. दिनभर उलटासीधा और्डर करती रहती है. कभी पड़ोस के रिंकू से समोसा मंगा कर खा लेती है. शरीर कैसा बेडौल हो रहा है. गुरुजी से जा कर पूछना पड़ेगा कि किसी भूतप्रेत का साया तो नहीं पड़ गया. वे जरूर कोई उपाय बताएंगे. उन का अपनी सत्संगी सहेलियों के घर जमावड़ा होता था. जहां भजनकीर्तन के नाम पर एकदूसरे की चुगली ज्यादा होती थी.

मंजरी ने गुरुजी से जा कर अपनी समस्या बताई तो उन्होंने उष्मा को बुलाया लेकिन वह बिगड़ गई कि उसे नहीं जाना किसी आबा-बाबा के पास. सब ठग होते हैं. उन्होंने भभूत और रामरक्षा कलावा दिया तो वह भी किसी तरह पहनने को राजी नहीं हुई. भभूत तो उन्होंने सोते में खिला दी थी लेकिन वह तो दिनप्रतिदिन उद्दंड होती जा रही थी.

केशवजी ने पत्नी को सम?ाने का प्रयास किया कि उष्मा को प्यार से सम?ाने की कोशिश करो, डांटनेफटकारने से वह और बिगड़ जाएगी.

‘‘घर में रहा करो. उष्मा के साथ थोड़ा दोस्ताना सा व्यवहार करो. सत्संग वगैरह कम कर दो.’’

‘‘क्यों, यह जनम तो तुम्हारे जैसे पति और नालायक लड़की के कारण बिगड़ा ही है, कम से कम अगला तो सुधार लूं,’’ वे गुस्से से आगबबूला हो उठी थीं. वे अपनी अकड़ दिखा तो रही थीं परंतु वास्तव में वे बेटी के लिए परेशान थीं. वह तो बस दिनभर खाती रहती और बिस्तर पर लेट कर सो जाना या फिर छत को टुकुरटुकुर निहारते रहना.

वे समझ नहीं पा रही थीं कि बेटी को कैसे सुधारें.

‘‘मंजरी, आजकल तुम्हें घर जाने की बहुत जल्दी रहती है?’’

‘‘क्या बताऊं, प्रज्ञा, तुम तो अपनी सगी बहन से ज्यादा हो. उष्मा को जाने क्या हो गया है, दिनभर खाती है, खूब मोटी होती जा रही है, स्कूल जाना नहीं चाहती. 2-2 दिन नहाएगी नहीं, कपड़े नहीं बदलेगी या फिर खूब सजधज कर शीशे में अपने को निहारेगी. जरा कुछ भी कहो तो पहले जबान लड़ाएगी, फिर घंटों तक रोती रहेगी. गुरु महराज की भभूत से भी कुछ असर नहीं हुआ. क्या करूं, सम?ा नहीं आता. आजकल कहीं मन नहीं लगता.’’

‘‘अरे, तुम समझ नहीं रही हो,

15 साल की लड़की तो पूरी ज्वालामुखी की तरह होती है. उसे अपनी मां की कोई बात अच्छी नहीं लगती यहां तक कि वह मां की हर बात से चिढ़ने लगती है. वह आइडैंटिटी क्राइसिस से गुजर रही होती है. कुछ दिनों के बाद वह सही हो जाएगी.’’

परंतु उन को अपनी बेटी की फिक्र हो रही थी. उन्होंने पति से कहा, ‘‘सुनिए, उष्मा के रंगढंग अच्छे नहीं लग रहे हैं. मेरी तो कुछ सुनने को तैयार नहीं है. आप ही उस से बात करिए.’’

‘‘इस समय नहीं, मैं उस से कल बात करूंगा,’’ केशवजी ने उसे सम?ाबु?ा कर स्कूल जाने के लिए राजी कर लिया.

उन्होंने सुबह खुद से उसे टिफिन बना कर दिया और बेटी के माथे को प्यार से चूम लिया तो वह चुपचाप गहरी नजरों से देखती रही थी. वह ठीक से स्कूल जाने लगी. केशवजी बेटी की पसंद का खाना बनवाते. ऐसा लग रहा था कि अब सब ठीक हो गया है लेकिन यह दोचार दिन ही चला था.

तभी गुरु महाराज के विशेष आग्रह पर मंजरी भागवत कथा में व्यस्त हो गईं. आखिर उन्हें अपना अगला जनम सुधारने के लिए कुछ करना था.

पति ने गुरु महाराज के यहां जाने से मना किया तो वे नाराज हो कर उन को ही अंटशंट बोलने लगीं.

‘‘तुम्हें बेटी की कोई फिक्र नहीं है? वह मु?ा से सीधे मुंह बात भी नहीं करती. मुझे उस से कोई मतलब नहीं. ऐसी बेटी तो मर ही जाए तो मेरी जान छूट जाए. मैं तो तंग आ गई हूं. मर भी तो नहीं जाती.’’

दरवाजे की आड़ से उष्मा ने मम्मी की बात सुन ली थी.

केशवजी बेटी को ले कर अपने मनोवैज्ञानिक मित्र के पास गए. उन्होंने कहा, ‘‘आप की बेटी डिप्रैशन की शिकार बन रही है. इस को रचनात्मक कार्यों में व्यस्त करें. कुछ दवाइयां खिलाने के लिए लिख दी थीं. तुम्हारी बेटी को खास देखभाल की जरूरत है.’’

उन्होंने पत्नी से बताया तो वे बोलीं, ‘‘अरे कुछ नहीं, खाखा कर मोटी हो रही है.’’ यह कह कर उन्होंने बात हंसी में उड़ा दी थी.

केशवजी बेटी को ध्यान से दवाई खिलाते. घर के कामों के लिए बबीता को रख लिया. सबकुछ ठीक सा दिखने लगा था.

मांबेटी में बोलचाल बंद सी हो गई थी क्योंकि मंजरी को तो पूजापाठ और गुरु महाराज के सत्संग के चक्कर में फुरसत ही नहीं रहती.

केशव बेटी से बात करते, उसे दवा खिलाते और उस का पूरा ध्यान रखते.

एक दिन वह रोते हुई बोली, ‘‘पापा, मैं स्कूल नहीं जाऊंगी, वहां सब मु?ो मोटीमोटी चिढ़ाते हैं.’’

‘‘उन्हें चिढ़ाने दो,’’ पापा बोले थे, ‘‘तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.’’ पढ़ने में उस का मन लगता ही नहीं था क्योंकि वह काफी दिनों से स्कूल से गायब रही थी.

केशव बेटी की ओर से लापरवाह हो गए थे. उन्हें महसूस हो रहा था कि अब वह ठीक हो गई है.

उष्मा स्कूल जाने लगी थी. वह खुश भी रहने लगी थी. वह पापा से बोली, ‘‘स्कूल का ऐनुअल फंक्शन होने वाला है, एक डांस के लिए उस का सेलैक्शन हो गया है.’’

कुछ दिनों के बाद उसे डांस ग्रुप से निकाल दिया गया जिस की वजह से उस का मन निराशा से भर उठा था.

वह टैस्ट में फेल हो गई थी. क्लास में टीचर ने नंबर बताए तो पूरी क्लास जोरजोर से हंस पड़ी थी. वह शर्म से पानीपानी हो गई थी. वह निराशा में डूब गई थी. उस पर आत्महत्या का विचार हावी होता जा रहा था.

लेकिन वह अपनी पीड़ा किस से कहती. मां ने तो उस से बोलचाल ही बंद कर रखी थी.

लगभग 15 दिनों से वह गुमसुम रहने लगी थी. ज्यादा समय अपने कमरे में ही रहती. वह केशव से भी बात न करती.

मंजरी अपने पूजापाठ या सत्संग में व्यस्त रहती थीं.

एक शाम जब केशव औफिस से जल्दी आ गए थे तो मंजरी बोलीं, ‘‘महारानी दरवाजा बंद कर के कमरे में बैठी है. मैं आवाज दे रही हूं तो बोल ही नहीं रही है. मु?ो तो कुछ सम?ाती ही नहीं. जाने क्या हो गया है, कमरे में घुसी रहती है, बाहर ही नहीं निकलती. कुछ भी कहो तो काट खाने को दौड़ती है. मैं ने तो इसीलिए उस से बात करना ही बंद कर दिया है. अपनी इज्जत अपने हाथ. मु?ो तो अपनी इज्जत प्यारी है, गाली नहीं खानी है.’’

केशव के मन में बेटी के लिए चिंता हुई. उन्होंने प्यार से बेटी को पुकारा लेकिन वह बोली ही नहीं तो उन्होंने किनारे बने हुए रोशनदान पर चढ़ कर देखा. वह पंखे से साड़ी बांध कर लटकने की तैयारी कर रही थी. केशव का कलेजा मुंह को आ गया. उन्होंने तेजी से कई बार  दरवाजे पर धक्का मारा तो दरवाजा खुल गया. वे बेटी को कलेजे से लगा कर फूटफूट कर रोने लगे.

‘‘पापा, मेरा इस दुनिया में कोई नहीं, मैं मर जाना चाहती हूं. आप की बीवी की अपनी दुनिया है. वे मु?ा से बात तक नहीं करतीं. मैं काली हूं. मैं मोटी हूं. मैं बहुत बुरी हूं. मुझे मर जाने दो, पापा.

‘‘मुझे क्लास में कुछ समझ नहीं आता. मैं एग्जाम में फेल हो गई हूं. आज टीचर ने क्लास में मेरी बहुत बेइज्जती की. मु?ो मर जाने दो,’’ कह कर वह फूटफूट कर रोने लगी.

केशव चिल्ला कर पत्नी से बोले, ‘‘देख लो अपनी बेवकूफी का नतीजा. तुम्हारे पूजापाठ के दिखावे और गुरु महाराज के कथाभागवत का परिणाम यह निकलता कि तुम आज अपनी बेटी को खो देतीं.

‘‘खबरदार इस घर से गुरु महाराज और कथा भागवत के लिए अब पैर निकाला. इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे.’’

बेटी की हालत देख कर मंजरी के होश ही गुम हो गए थे. वे मन ही मन पछता रही थीं. वे प्यार से उसे चिपटा कर आंसुओं से रोने लगी थीं, ‘‘न मेरी लाडो, मु?ो माफ कर दो. आज से न गुरुजी, न ही सत्संग. बस, मेरी लाडो और मैं.’’

दोनों पतिपत्नी ने सम?ा लिया कि समस्या स्कूल में है, इसलिए कुछ दिनों तक इसे स्कूल न भेज कर घर में ही पढ़ाया जाए. केशव ने पत्नी से पढ़ाने को कहा तो वे बोलीं कि इस समय वह मु?ा पर विश्वास नहीं करती, इसलिए इसे आप ही पढ़ाना शुरू करो.

केशव ने सुबह एक घंटा तक प्यार से बेटी को मैथ्स पढ़ाना शुरू किया.

मंजरी दिन में बेटी के साथ कभी कैरमबोर्ड खेलतीं, कभी स्क्रैबिल पर वर्ड्स बनातीं, कभी म्यूजिक सुनतीं और प्यार से उस का माथा चूम लेतीं. एक दिन मंजरी बोलीं, ‘‘मेरी बिटिया कितनी प्यारी है.’’

‘‘झूठ मत बोलो, मैं काली हूं, मोटी भी हूं.’’

‘‘इस से क्या, कितना सुंदर गाती है, डांस करती है.’’

‘‘सचमुच, फिर मुझे डांस से क्यों निकाल दिया गया था.’’

‘‘कोई तुम से अच्छा कर रही होगी.’’

वह चुप रह गई थी. मांबेटी की दूरियां समाप्त हो गई थीं. वह किताबें ले कर मां के सामने पढ़ने को बैठ जाती और जहां सम?ा न आता, वह उन से सम?ा लेती.

लगभग एक महीना बीत गया था. उस की परीक्षाएं आने वाली थीं. उस ने खुद ही फोन से मानी से परीक्षा के कोर्स का पता कर लिया था.

एक दिन स्क्रैबिल पर वर्ड बनातेबनाते रानी और रौकी बना कर बोली, ‘‘मां, आप को मालूम है, मैं ने यह पिक्चर उदयन के साथ देखी थी. स्कूल बंक कर के उस के साथ पिक्चर देखी, पौपकौर्न खाया और कौफी पी थी. वह मुझे समोसा भी खिलाता था.

‘‘मां, आप नाराज तो नहीं हो?’’

‘‘नहीं बेटा, तभी तो तुम पढ़ाई में पिछड़ती चली गईं.’’

‘‘मां, वह मु?ो रोज अपने साथ कहीं चलने को कहने लगा था. वह मेरे साथ बदतमीजी करने लगा था. मैं ने मना किया तो वह नाराज हो कर मु?ो गालियां देने लगा था.’’ वह सब याद कर के वह सिसक पड़ी थी.

मंजरी की आंखें भीग उठीं. उन्होंने प्यार से बेटी को गले से लगा लिया.

‘‘बेटी, मुझे माफ कर दो, तुम मु?ो सजा दे सकती हो.’’ यह सुन कर उष्मा ने मां के मुंह पर हथेली रख दी.

‘‘मुझे बहुत पछतावा है कि गुरु महाराज के चक्कर में मेरी बेटी को कुछ हो जाता तो वे अपने को कभी भी माफ नहीं कर पातीं.’’

‘‘मां, मैं कल से स्कूल जाऊंगी.’’

वह सुबह स्कूल जाने के लिए तैयार होने से पहले मां से बोली, ‘‘मां, उठो, मेरा टिफिन बना दो.’’ Family Story

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