Family Story: सुबह के 7 बजे थे. 51 वर्षीया मंजरी नहाधो चुकी थीं. मुट्ठी में लिए बादाम खाती व दूध पीने के साथसाथ बेटी को जगाने के लिए वे जोरजोर से आवाज लगाती जा रही थीं.

‘‘उष्मा, उठ जा. देख, सूरज सिर पर चढ़ आया है. मैं पार्क जा रही हूं. आज मुझे देर हो गई है. पापा को नाश्ता दे देना और सुनो, स्कूल समय से चली जाना.’’ 16 वर्षीया उष्मा कक्षा 9 में पढ़ती थी.

वह अपनी आंखों में अनगिनत सपने समेटे किशोरावस्था की सीढि़यों पर कदम बढ़ा रही थी. वह किसी मीठे सपने में खोई हुई गहरी नींद में थी, तभी मां की कर्कश आवाज सुन कर वह आंख मलती हई हड़बड़ा कर उठ बैठी थी.

मां एक स्वर में बोलती जा रही थीं, ‘‘पापा के लिए चाय बना दो और 2 टोस्ट दे देना. अपने टिफिन में बिस्कुट या रस्क रख लेना. ब्रैडबटर मैं ने फ्रिज से निकाल कर बाहर रख दिया है.’’

नींद की खुमारी से वह अभी पूरी तरह बाहर आई नहीं थी. उसे मां की बातें कुछ सम?ा आ रही थीं, कुछ नहीं. वह हिम्मत करती हुई बोली, ‘‘मां, प्लीज, आप पापा को नाश्ता दे कर जाइए, मुझे स्कूल के लिए देर हो जाएगी.’’

‘‘अभी कोई देर नहीं हुई है. अपना दूध बनाएगी न, उतनी देर में पापा के लिए चाय बन जाएगी,’’ कहती हुई वे दरवाजा जोर से बंद कर के बाहर जा चुकी थीं.

मजबूरीवश उसे उठना ही पड़ा क्योंकि पापा के जोरजोर से कविता पढ़ने की आवाज उस के कानों में पड़ी थी.

‘‘उष्मा बेटा, तुम स्कूल के लिए तैयार हो जाओ, मैं अपने लिए चाय बना लूंगा.’’

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