Hindi Story: अब तक आप ने पढ़ा कि जिलाधिकारी निशा के पास एक केस आता है एक विधुर और उस की विधवा मां का जिन्हें विधुर के बेटे दीपक ने कोरे कागज पर साइन करा कर घर से निकाल दिया था. निशा दोनों बुजुर्गों को न्याय दिलाना चाहती थी लेकिन जांच के दौरान पता चलता है कि 30 साल पहले इन बुजुर्गों ने घिनौना गुनाह किया था.
उधर दीपक ने पटवारी द्वारा जमीन के करोड़ रुपए मिलने की बात अपनी पत्नी निर्मला से की तो यह बात सुन कर वह अपने होशोहवास खो बैठती है. अब आगे…
निशा दुविधा में पड़ गई थी. एक ओर उसे गुनहगारों के साथ न्याय भी करना था और दूसरी ओर उन्हें उन के बरसों पुराने कसूर की सजा भी देनी थी. फैसला करना मुशकिल था लेकिन करना तो था. कुछ क्षण उन दोनों को अपने होशोहवास काबू में लाने में पड़े. दीपक ने अपने कंधे पर पड़े अंगौछे में अपने होंठों के दोनों ओर से बह रही तंबाकू की पीक को समेटा तो इसी बीच निर्मला ने अपने होशोहवास को काबू में किया.
‘‘पटवारी साहब की बात सुनते ही मेरे तो होश उड़ गए,’’ दीपक ने आगे बताना शुरू किया, ‘‘जमीन बापू के नाम है, यह बात पटवारी को मालूम थी लेकिन हम बापू को रात में ही घर से निकाल चुके हैं, यह बात पटवारी को नहीं मालूम थी और इसीलिए वह बापू से मिलने घर पर आ रहा था. मैं ने भी तुरंत अपना दिमाग भिड़ाया और पटवारी साहब से कह दिया कि बापू तो अम्मा को तीर्थ करवाने ले गया है और 2-3 महीने से पहले नहीं लौटेगा. मेरी बात सुनते ही पटवारी साहब बोले, ‘फिर तो बहुत बड़ी समस्या हो गई दीपू, कंपनी वाले साहब को तो जमीन का जो भी करना है 3-4 दिनों में ही करना है.’ पटवारी साहब की बात सुनते ही मैं ने एक बार फिर से अपना दिमाग चलाया और उन्हें बताया कि अगर वह चाहे तो काम बन सकता है. उन्होंने पूछा, ‘कैसे?’ तो मैं ने उन से कहा कि जाने से पहले बापू कुछ कोरे कागजों पर साइन कर गए थे. अगर आप चाहें तो उन कागजों से बात बन सकती है.
‘‘मेरी बात सुनते ही पटवारी साहब खुशी से बोले, ‘बस, बन गया काम. अब तुम किसी को भी उन कागजों के बारे में कुछ मत बताना. मैं जा कर कंपनी वाले साहब से बात करता हूं और जैसे ही वे तुम्हें बुलाने को बोलेंगे, हम तुम्हें लेने आ जाएंगे.’ उधर पटवारी साहब वापस गए और इधर मैं प्रधान से बिना मिले वापस चला आया. अब तू ही बता कि अब मैं घर पर ही न बैठूं तो और क्या करूं?’’
‘‘तो यह बात तुम मु?ो पहले नहीं बता सकते थे?’’ दीपक की बात सुन कर निर्मला ने अदा से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अगर तुम ने मु?ो पहले ही यह बात बता दी होती तो मैं काहे तुम्हें इतना बुराभला कहती?’’
‘‘अरे पगली, यह कोई ऐसी बात नहीं है जिस का ढिंढोरा पीटा जाए,’’ दीपक ने सम?ाने वाले लहजे में कहा, ‘‘ऐसी बातों के ज्यादा जिक्र करने से बात बिगड़ने का खतरा रहता है.’’
‘‘लेकिन…’’
निर्मला कुछ कहना चाहती थी लेकिन उसे अपनी बात बीच में ही रोकनी पड़ी क्योंकि घर का मुख्यद्वार खटखटाए जाने के साथ ही बाहर से किसी ने दीपक को पुकार लगा दी.
‘‘अरे, लगता है पटवारी साहब आ गए,’’ आवाज सुनते ही एक ?ाटके में चारपाई से उठते हुए दीपक ने कहा और उठते ही तुरंत ही बाहर की ओर लपक लिया.
दीपक ने मुख्यद्वार खोला. उस का अंदाजा बिलकुल ठीक था, आगंतुक गांव का पटवारी ही था.
‘‘आइएआइए पटवारी साहब,’’ दीपक ने एक तरह से उन के सामने मानो बिछते हुए कहा, ‘‘तनिक भी संकोच मत कीजिए. इसे अपना ही घर सम?िए.’’
‘‘और, आराम हो रहा है,’’ पटवारी ने हंसते हुए मुख्यद्वार से भीतर कदम रखते हुए कहा, ‘‘और हो भी क्यों न, आखिर, करोड़पति जो ठहरे. अब अगर करोड़पति लोगों को भी काम करना पड़ गया तो लानत है हम जैसे लोगों पर.’’
‘‘अरे, क्या बात कर रहे हो साहबजी,’’ पटवारी की बात सुन कर नतमस्तक सा होते हुए कहा दीपक ने, ‘‘हम तो आप के नौकर हैं. चलिए भीतर कमरे में चल कर बैठते हैं, कुछ ठंडागरम?’’
‘‘नहीं दीपक, बैठने या ठंडागरम लेने का समय नहीं है,’’ पटवारी ने अपार व्यस्तता दर्शाते हुए कहा, ‘‘साइन किए हुए पेपर लो और चलो. शाम को जब लौटोगे तो करोड़पति होगे.’’
दीपक के लिए तो खुद एकएक पल रुकना भारी हो रहा था. पटवारी की बात खत्म होने के साथ ही वह भीतर की ओर लपक लिया और 5 मिनट्स में वह वापस पटवारी के पास था. पेपर उस ने एक फोल्डर में डाले हुए थे जो उस के एक हाथ में था और साथ ही, दूसरे हाथ में था एक ब्रीफकेस.
‘‘यह क्या है भई?’’ सबकुछ सम?ाते हुए भी पटवारी ने दीपक के हाथ में लटक रहे ब्रीफकेस को देख कर पूछा.
‘‘वो रकम बड़ी है न, इसलिए,’’ ?ोंपते हुए कहा दीपक ने.
‘‘अरे, इसे यहीं छोड़ो भई,’’ हंसते हुए सम?ाया पटवारी ने, ‘‘इत्ती बड़ी रकम क्या कोई हाथ में ले कर घूमता है. जो भी लेनदेन होगा, बैंक के माध्यम से होगा और जो थोड़ीबहुत रकम नकद में मिलेगी वह तो तुम्हारे कुरतेरपायजामे की जेबों में ही आ जाएगी, सम?ो.’’
‘‘अच्छा.’’ बड़ा ही अनमना सा स्वर था दीपक का. उस ने निर्मला को आवाज दी. निर्मला जो पास ही ओट में खड़ी सारी बातें सुन रही थी, दीपक के आवाज देने के साथ ही वहां पहुंच गई.
दीपक ने ब्रीफकेस निर्मला को सौंपने के साथ ही पटवारी से कहा, ‘‘चलें?’’
‘‘चलो,’’ पटवारी ने बाहर की ओर कदम बढ़ाते हुए कहा.
‘‘चलेंगे कैसे?’’ चलतेचलते पूछा दीपक ने.
‘‘गांव के बाहर तक मेरी मोटरसाइकिल पर,’’ पटवारी ने घर की चौखट को लांघते हुए जवाब दिया, ‘‘गांव के बाहर साहब अपनी गाड़ी में तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. वहां से साहब तुम्हें अपने साथ तहसील कार्यालय ले जाएंगे. पीछेपीछे अपनी मोटरसाइकिल पर मैं भी वहीं आता हूं. वहीं तहसीलदार साहब के दफ्तर में बैठ कर सारे कागजपत्र तैयार किए जाएंगे और बस फिर काम खत्म.’’
‘‘अच्छा होता अगर साहब गांव के भीतर आ जाते,’’ पटवारी की मोटरसाइकिल पर पटवारी के पीछे बैठते हुए कहा दीपक ने, ‘‘इसी बहाने उन के पैरों की धूल हमारी ?ांपड़ी में भी पड़ जाती.’’
‘‘और सारे गांव को पता भी चल जाता कि तुम क्या कर रहे हो,’’ पटवारी ने मोटरसाइकिल को किक मार कर स्टार्ट करते हुए कहा, ‘‘तुम्हें पहले भी सम?ाया था कि ये सारे काम बड़े ही गोपनीय होते हैं, इसलिए जब तक काम अपने सिरे तक न पहुंच जाए तब तक किसी को इस की भनक तक नहीं लगने देनी चाहिए, सम?ो.’’
‘‘ठीक है,’’ दीपक के मुंह से निकले ये 2 शब्द, मोटरसाइकिल के इंजन के शोरगुल में दब कर रह गए.
गांव के बाहर से गुजर रही जीटी रोड पर गांव से तकरीबन आधा किलोमीटर की दूरी पर काले रंग की एक बड़ी कार खड़ी थी.
भले ही पटवारी ने दीपक को कंपनी के साहब की गाड़ी के बारे में कुछ नहीं बताया था लेकिन गांव से बाहर निकलते ही जैसे ही दीपक की नजर उस कार पर पड़ी तो उस के दिल ने कहा कि ‘हो न हो, यही वह गाड़ी है.’ और दिल में यह विचार आते ही न जाने क्यों उस का दिल तेजी से धड़क उठा.
पटवारी ने अपनी मोटरसाइकिल उस गाड़ी के एकदम पीछे ले जा कर रोकी.
मोटरसाइकिल के रुकते ही गाड़ी का ड्राइवर साइड का दरवाजा खुला और उस में से एक सूटेडबूटेड आदमी यानी बनवारी ने बाहर कदम रखा. बनवारी के चेहरे पर एक खास किस्म का रोआब था और उस ने काले गौगल्स लगा रखे थे. उस का रोआब और चमकदमक देख कर ही दीपक की तो सिट्टीपिटटी गुम हो गई.
‘‘यही है वह साहबजी,’’ पटवारी ने बहुत धीरे से मोटरसाइकिल पर अपने पीछे बैठे हुए दीपक को बताया.
अभी पटवारी ने मोटरसाइकिल का इंजन औफ ही किया था कि बनवारी तेज कदमों से चलता हुआ उन की मोटरसाइकिल के नजदीक पहुंच गया.
‘‘हैलो पटवारी साहब, कैसे हैं आप?’’ बनवारी ने अपना दाहिना हाथ पटवारी की ओर बढ़ाते हुए कहा.
‘‘बस, सरजी, कृपा है आप की,’’ मोटरसाइकिल पर बैठेबैठे ही अपने दोनों हाथों से बनवारी का हाथ थाम कर खीसें निपोर कर कहने के साथ ही पटवारी ने अपनी गरदन और आंखों के इशारे से पीछे बैठे हुए दीपक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘आप की आसामी आ गई है, सरजी.’’
‘‘ओह, तो ये हैं दीपकजी,’’ यह कहने के साथ ही बनवारी ने अपना हाथ पटवारी के हाथों से छुड़ा कर दीपक की ओर बढ़ा दिया.
दीपक जो पहले ही बनवारी के स्टाइल से बुरी तरह से थर्राया हुआ था, बनवारी के अपनी ओर बढ़े हाथ को देख कर और सकपका गया. उस की सम?ा में नहीं आया कि वह क्या करे और क्या न? और फिर थोड़ी सी हिचकिचाहट के बाद उस ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.
‘‘सरजी, मुझे पास ही के 2 और गांवों में फसलों का मुआयना करने जाना है, इसलिए अगर आप बुरा न मानें तो…’’ अर्थपूर्ण लहजे में कहा पटवारी ने.
‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ पटवारी का इशारा सम?ाते ही बनवारी ने तत्परता से कहा, ‘‘मैं दीपकजी को ले कर तहसील पहुंचता हूं. जब तक आप अपना काम निबटा कर आएंगे तब तक हम तहसीलदार साहब के पास बैठ कर जमीन के रिकौर्ड्स वगैरह चैक कर लेते हैं.’’
‘‘दीपक भाई, आप साहब के साथ तहसील पहुंचो, आधेपौने घंटे में मैं भी वहीं पहुंचता हूं,’’ पटवारी ने दीपक से कहा.
बहुतकुछ कहने की इच्छा होने के वावजूद मोटरसाइकिल से उतरते हुए दीपक के मुंह से केवल एक ही शब्द निकला, ‘‘लेकिन.’’
‘‘चिंता मत करो, भाईजी,’’ आश्वासनपूर्ण स्वर में कहा पटवारी ने, ‘‘साहब तो आप के साथ ही हैं; और फिर, मैं तो आ ही रहा हूं न आधेपौने घंटे में.’’
और फिर दीपक के उतरतेउतरते ही उस ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और अभी दीपक मोटरसाइकिल से उतर कर सही ढंग से खड़ा भी नहीं हो पाया था कि पटवारी ने मोटरसाइकिल वापस मोड़ी और फिर दीपक के कुछ सम?ाने से पहले ही मोटरसाइकिल यह जा और वह जा हो गई.
‘‘आइए दीपकजी, हम लोग तहसील चलते हैं,’’ पटवारी के रवाना होते ही बनवारी ने अपनी गाड़ी की ओर चलते हुए कहा.
किंर्तव्यविमूढ़ सा दीपक उस के पीछेपीछे चल पड़ा.
गाड़ी के पास पहुंचने पर बनवारी ने बड़ी शिष्टता से आगे का पैसेंजर साइड का दरवाजा खोल कर दीपक को भीतर बैठने का इशारा किया.
दीपक अपने जीवन में पहली बार इतनी आलीशान गाड़ी में बैठने जा रहा था, लिहाजा, उसे बड़ी ?ि?ाक महसूस हो रही थी और उस के कदम नहीं उठ रहे थे.
दीपक की इस ?ि?ाक को बनवारी बखूबी सम?ा रहा था. उस ने दीपक का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अरे घबराओ मत, आराम से बैठो और फिर थोड़ी देर बाद तो तुम खुद ऐसी गाड़ी के मालिक बनने वाले हो.’’
बनवारी की बात सुन कर दीपक के चेहरे पर झोपती सी मुसकान फिसल गई और फिर वह हिम्मत जुटा कर गाड़ी में बैठ गया.
दीपक के बैठते ही बनवारी ने तत्परता से दरवाजा बंद किया और घूम कर ड्राइविंग साइड में पहुंच कर गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर जम गया.
और अगले ही पल गाड़ी शहर की ओर दौड़ पड़ी.
अभी गाड़ी बड़ी मुश्किल से एक किलोमीटर ही चली होगी कि सड़क से थोड़ा हट कर बने हुए एक ढाबे को देख कर बनवारी ने गाड़ी रोक दी.
‘‘काम के चक्कर में सुबह से नाश्ता करने तक की फुरसत नहीं मिली,’’ व्यस्ततापूर्ण स्वर में कहने के साथ ही बनवारी ने अपनी पैंट की पिछली जेब से पर्स निकाल कर उस में से 500 रुपए का एक नोट निकाल कर दीपक की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘दोस्त, अगर बुरा न मानो तो सामने ढाबे से एक लिटर वाली कोई भी ठंडी कोल्डड्रिंक, 2 गिलास और खाने के लिए कुछ नमकीन, चिप्स वगैरह ले आओगे?’’
दीपक तो इसी बात से फूला नहीं समा रहा था कि इतने ‘बड़े’ आदमी ने उसे दोस्त कहा है.
‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ उस ने नोट लेते हुए तत्परता से कहा और पेपर के फोल्डर को वहीं अपनी सीट पर छोड़ कर गाड़ी से उतर कर ढाबे की तरफ चल दिया.
‘पैसा आने के बाद मैं भी एक बढि़या सी गाड़ी खरीदूंगा और ऐसे ही बनठन कर रहा करूंगा’ के ख्वाबों में डूबा दीपक उधर ढाबे से सामान खरीद रहा था और इधर बनवारी ने पहले से ही स्टार्ट गाड़ी को गेयर में डाला और शहर की ओर दौड़ा दिया.
बनवारी उन पेपर्स को निशा को सौंप चुका था.
निशा दीपक को अपने औफिस में बुला कर उन पेपर्स के दम पर उसे यह डराना और धमकाना चाहती थी कि अब पेपर्स उस के कब्जे में हैं और अगर आइंदा उस ने या उस की पत्नी ने रामगोपाल या शांति देवी के साथ किसी भी किस्म की कोई बदतमीजी की तो वह इन पेपर्स के बलबूते पर उसे पत्नी समेत रामगोपाल की तमाम संपत्ति से बेदखल कर देगी. दीपक और उस की पत्नी का पिता और दादी के साथ व्यवहार कैसा है, इस की जांच समयसमय पर गांव का पटवारी करता रहेगा और उसे रिपोर्ट देता रहेगा.
अपने अनुभव के आधार पर निशा यह जानती थी कि दीपक जैसी औलादें, जो अपने मातापिता का सम्मान उन के द्वारा कमाई और अर्जित की गई संपत्ति के लिए ही करते हैं, कभी भी अपने हाथ उस संपत्ति को निकलने नहीं देना चाहती है. इसलिए वह अच्छे से जानती थी कि उस की यह धमकी कारगर रहेगी और भले ही बेमन से क्यों न करे लेकिन उस के बाद से दीपक और उस की पत्नी, रामगोपाल और शांतिदेवी की न सिर्फ इज्जत करेंगे बल्कि उन्हें किसी किस्म की कोई तकलीफ पहुंचाने की चेष्टा भी न करेंगे.
उस समय शाम के साढ़े 6, पौने 7 का वक्त रहा होगा जब निशा और संजय जिलाधिकारी निवास पर पहुंचे. चूंकि रामगोपाल को सारी बात सम?ानी थी इसलिए निशा, संजय को अपने साथ ले आई थी, ताकि बुजुर्गवार को सम?ाने में आसानी रहे.
जिलाधिकारी निवास एक बहुत बड़े भूभाग पर स्थित था. मुख्य भवन, आउट्हाउस और सर्वेंट क्वार्टर्स, मेनगेट से काफी हट कर पीछे की ओर बने हुए थे और मेनगेट से मुख्य भवन तक और मुख्य भवन के चारों ओर भी एक विशाल बगीचा था जिस में आम, अमरूद, शीशम, नीम, अशोक इत्यादि के अनेक विशाल पेड़ों के साथसाथ तरहतरह के सुगंथित फूलों के असंख्य पौधे लगे हुए थे.
चूंकि अंधेरा छा चुका था इसलिए जिलाधिकारी निवास की तमाम लाइटस औन की जा चुकी थीं लेकिन शायद बगीचे की लाइट्स खराब थीं, इसलिए बगीचे में नीमअंधेरा छाया हुआ था.
निशा और संजय को पोर्च में उतारने के बाद ड्राइवर गाड़ी को पार्क करने के लिए गैराज की ओर ले गया था जो मुख्य भवन के पीछे की ओर बना हुआ था. चूंकि ड्राइवर गैराज के पास बने सर्वेंट क्वार्टर्स में रहता था इसलिए गाड़ी को पार्क कर के वह वहीं से अपने घर चला जाने वाला था. यह इलाका शहर का सब से पौश इलाका था. यहां ज्यादातर बड़े सरकारी अधिकारियों के निवास स्थान थे जो बड़ेबड़े और दूरदूर थे और जो कोई थोड़ेबहुत प्राइवेट लोग यहां रहते थे उन की भी बड़ीबड़ी कोठियां थीं. लिहाजा, पूरे इलाके में सन्नाटा छाया हुआ था.
निशा और संजय ने अभी पोर्च से बरामदे की ओर बढ़ना शुरू ही किया था कि उन दोनों की नजर पोर्च से दूर चारदीवारी के नजदीक मौजूद 2 सायों पर पड़ी जो बड़ी तेजी से अपने को छिपतेछिपाते मेनगेट की ओर बढ़े चले जा रहे थे. बगीचे में छाए नीम अंधकार की वजह से भले ही निशा और संजय उन दोनों को साफसाफ न पहचान सके हों लेकिन उन दोनों की चालढाल और शारीरिक बनावट को देख कर उन दोनों को इस बात में कोई संदेह नहीं रहा था कि वे दोनों और कोई नहीं बल्कि रामगोपाल और उन की माताजी शांतिदेवी हैं.
निशा और संजय दोनों ने एकदूसरे की ओर देखा, मानो एकदूसरे से पूछ रहे हों कि आखिर ये मांबेटा हैं किस फिराक में? निशा और संजय अभी हालात को सम?ाने की कोशिश ही कर रहे थे कि उन के कानों में निशा की माताजी की चीखती सी आवाज पड़ी, ‘‘चौकीदार, इन दोनों को रोको, ये दोनों यहां से बाहर न जाने पाएं.’’
मां की आवाज कानों से टकराते ही निशा बुलंद आवाज में गरजी, ‘‘खबरदार, दोनों जहां हो वहीं रुक जाओ. अगर एक कदम भी आगे बढ़ाया तो गनर गोली चला देगा.’’ और इतना कहने के साथ ही निशा और निशा के पीछेपीछे संजय दोनों, उन मांबेटे की ओर दौड़ पड़े.
शोरगुल सुन कर मेनगेट पर सिक्योरिटी के लिए तैनात पुलिस वालों में से भी 2 सिपाही भी उन दोनों की ओर दौड़ पड़े. दोनों मांबेटे को अच्छी तरह से सम?ा में आ चुका था कि अगर उन्होंने कोई भी हरकत की तो जान के लाले भी पड़ सकते हैं, लिहाजा, दोनों मांबेटे जहां थे, वहीं ठिठक कर रुक गए.
निशा और संजय दोनों भागते हुए उन के पास पहुंचे. उन के पहुंचने के कुछ सैकंड बाद दोनों सिपाही भी वहां पहुंच गए. मांबेटे दोनों के सिर ?ाके हुए थे और चेहरों पर ऐसी बदहवासी छाई हुई थी मानो चोरी करते रंगेहाथों पकड़े गए हों.
‘‘इस तरह चोरों की तरह क्यों भाग रहे थे?’’ कड़क स्वर में पूछा निशा ने, ‘‘क्या किया है आप दोनों ने?’’
जवाब में दोनों के पहले से ?ाके सिर थोड़ा और ?ाक गए, लेकिन मुंह से एक शब्द न निकला. तभी निशा की मां सविता देवी भी वहां हांफती सी पहुंच गईं.
सविता देवी के वहां पहुंचते ही उन दोनों के रहेसहे हौसले भी पस्त हो गए और शांति देवी गिड़गिड़ाते हुए कहने लगी, ‘‘ह…ह…हमें माफ कर दो बेटी, ह…ह…हम ने कुछ नहीं किया, हमें जाने दो.’’
‘‘चिंता मत करिए, हम आप को जाने देंगे लेकिन पहले आप यह बताइए कि आप चोरों की तरह क्यों भाग रहे थे?’’ निशा ने शांत स्वर में पूछा.
दोनों ने फिर अपने मुंह सी लिए.
‘‘बेटी ने कुछ पूछा है, जवाब दो?’’ सविता देवी ने आग्नेय नेत्रों से दोनों को घूरते हुए कहा.
‘‘ह…ह…हम ने कुछ नहीं किया, हमें माफ कर दो, हमें जाने दो,’’ हाथ जोड़ कर फफकफफक कर रोते हुए कहने के साथ ही रामगोपाल शायद निशा के पैरों में ही लोट जाता अगर उस के पीछे खड़े सिपाही ने उसे पकड़ कर रोक न लिया होता.
शांति देवी न सिर्फ लगातार सिसक रही थी बल्कि बारबार ‘माफ कर दो, जाने दो’ की गुहार लगाए जा रही थी.
‘‘लगता है मैडम कि ये लोग इस तरह अपना गुनाह नहीं मानेंगे,’’ संजय ने उन दोनों को कठोर नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘इन्हें इन सिपाहियों के हवाले कर देते हैं, 10 मिनट के अंदर ये लोग अपने सारे गुनाह कुबूल कर लेंगे.’’
संजय की बात सुनते ही उन दोनों के शरीरों में कंपकंपी दौड़ गई और दोनों पहले से ज्यादा आर्तनाद करने लगे.
‘‘कमाल है आप लोग भी,’’ निशा परेशान से स्वर में कह उठी, ‘‘आप दोनों लगातार माफियां मांगे जा रहे हो, छोड़ देने की गुहार लगा रहे हो लेकिन यह बताने को तैयार नहीं हो कि आखिर किया क्या है? कमाल है.’’
‘‘आखिर आप लोग बता क्यों नहीं देते अपना गुनाह,’’ सविता देवी ने दोनों को कठोर नजरों से घूरते हुए फटकारभरी आवाज में कहा, ‘‘जब गुनाह करते समय नहीं ?ि?ाके थे तो अब कैसी ?ि?ाक?’’
सविता देवी की फटकार सुन कर दोनों बुरी तरह से सहम गए.
‘‘छोड़ो मां, ये लोग इस तरह कुछ नहीं बताएंगे, आप ही बताइए कि मामला क्या है?’’ निशा ने सविता देवी से कहा, ‘‘जिस तरह से आप लोग आगेपीछे भाग रहे थे, उस से साफ जाहिर है कि ये दोनों आप से बच कर भाग रहे थे और आप इन का पीछा कर रहे थे, इसलिए इतना तो क्लियर है कि आप को भी पता है कि आखिर बात क्या है. इसलिए इन दोनों को छोड़ो और आप ही बता दो कि मामला क्या है?’’
‘‘मामला तो मु?ो पूरा पता है, लेकिन अच्छा होगा कि ये दोनों अपना गुनाह अपने मुंह से खुद कुबूल करें.’’ उन दोनों को सख्त नजरों से घूरते हुए लेकिन सम?ाने वाले लहजे में कहा सविता देवी ने, ‘‘मेरा यह मानना है कि गलती करने वाला इंसान जब अपनी जबानी अपनी गलती या गुनाह को कुबूल करता है तो कहीं न कहीं उस के दिल में अपनी उस गलती या गुनाह के लिए पश्चात्ताप का भाव जाग्रत होता है. इसलिए मैं चाहती थी कि बेहतर होता यदि ये दोनों अपना गुनाह खुद कुबूल करते.’’
लेकिन सविता देवी के सम?ाने का भी उन दोनों पर कोई असर नहीं पड़ा. दोनों पूर्ववत बुत की तरह खड़े रहे.
‘‘अपनी जबानी से खुद कुबूल करते हो या फिर मैं परदाफाश करूं?’’ सविता देवी ने चेतावनी देने के लहजे में कहा.
सविता देवी की चेतावनी सुनते ही न सिर्फ उन दोनों का वजूद बुरी तरह से कांप उठा बल्कि दोनों अपनी आंखों और चेहरे पर याचना के भाव लिए, आंखों और हाथों के इशारों से सविता देवी को ऐसा न करने की गुहार लगाने लगे.
उन की इस हरकत से वहां मौजूद बाकी सभी लोग बुरी तरह से चौंक उठे. सभी के दिमाग में केवल एक ही प्रश्न कौंधा कि ‘आखिर इन दोनों ने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है जो यह उस का राज फाश नहीं होने देना चाहते हैं?’
‘‘ओह मां, कम औन, अब खत्म भी करो न यह सस्पैंस. आखिर, इन्होंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है जो ये इस तरह थरथर कांप रहे हैं?’’
‘‘यह आदमी तेरा बाप और यह औरत तेरी दादी है. निशा.’’ सविता देवी के इन शब्दों ने मानो वहां धमाका सा कर दिया.
एकबारगी तो किसी की सम?ा में नहीं आया कि सविता देवी ने यह क्या कह दिया है? और जब सम?ा में आया तो सब आश्चर्य से कभी सविता देवी तो कभी उन दोनों को देखने लगे. दोनों सिपाहियों और संजय की निगाहें रहरह कर निशा पर भी घूम जाती थीं.
और दोनों मांबेटे की हालत तो ऐसी हो गई मानो जैसे दोनों को भरी महफिल में नग्न कर दिया गया हो.
सविता देवी द्वारा किए गए इस रहस्योद्घाटन ने निशा को बुरी तरह से आंदोलित कर दिया था. उस ने तो ख्वाब में भी कल्पना नहीं की थी कि जिन अनजान लोगों को उस ने बेसहारा और मजलूम सम?ा कर अपने आधिकारिक निवास में मानवता के नाते आश्रय दिया था, वे उस के पिता और दादी निकलेंगे, वह पिता और दादी, जिन्होंने उस की मां को छोटीछोटी 3 बच्चियों समेत महज इसलिए मारपीट कर घर से निकाल दिया था क्योंकि उस ने एक के बाद एक लगातार 3 लड़कियों को जन्म दिया था.
इस रहस्योद्घाटन के साथ ही निशा की सम?ा में यह भी आ चुका था कि क्यों ये दोनों मुंह छिपा कर उस के निवास से भाग रहे थे. वह सम?ा गई कि चूंकि मां को शाम के समय बाग में घूमने की आदत है और उन के इस घूमने के दौरान ही इन लोगों का आमनासामना हुआ होगा. मां से सामना होते ही ये लोग सम?ा गए होंगे कि अपने
30 साल पुराने गुनाह की सजा से बचने का यही सब से आसान तरीका है कि चुपचाप यहां से निकल लिया जाए और इधर चूंकि मां ने भी इन को देख और पहचान लिया होगा, इसीलिए मां भी उन का पीछा कर रही थीं.
एकाएक उस की आंखों के सामने अपनी अल्पशिक्षित मां का अपनी 3 छोटी बच्चियों को पालपोस कर स्वावलंबी बनाने हेतु किया गया संघर्ष किसी चलचित्र की भांति घूम गया. मां को घर से निकाले जाते वक्त भले ही वह 2 महीने की थी लेकिन सब से बड़ी बहन उषा, जो घर से निकाले जाने के वक्त 5 साल की थी, ने उसे और उस से बड़ी बहन संध्या जो उस वक्त महज 3 साल की थी, को घर से निकाले जाने के बाद से मां के एकएक दिन के संघर्ष के बारे में इतनी बार बताया था कि दोनों बहनों को लगता था कि जैसे वह एकएक पल उन्होंने खुद मां और उषा के साथ जिया है और जब वह 5-6 साल की हुई तब से तो उस ने भी देखा था कि कैसे मां दिन में लोगों के घरों में मेड का काम करने के बाद रात में 2-3 बजे तक जाग कर सिलाईकढ़ाई का काम करती थी ताकि उस की बच्चियां पढ़लिख कर कुछ बन सकें. बच्चियों ने भी मां के संघर्ष को जाया नहीं जाने दिया था. जहां निशा आज एक जिलाधिकारी है वहीं सब से बड़ी उषा एक उच्चतर माध्यमिक स्कूल में प्रिंसिपल थी तो म?ाली संध्या एम्स में डाक्टर.
मां के संघर्ष की यादों और मां को उस संघर्ष के लिए मजबूर करने वाले लोगों को सामने देख कर वह एक अजीब से ट्रौमा में पहुंच गई थी. जहां मां के संघर्ष को याद कर वह भावुक हो उठी थी तो वहीं मां को उस संघर्ष के लिए मजबूर करने वाले लोगों को सामने देख कर उस के जिस्म में मौजूद खून का कतराकतरा सुलग उठा था.
भावुकता की वजह से जहां उस की आंखें डबडबा आई थीं तो वहीं अपने पिता और दादी के लिए वर्षों से दिल में जमा बेइंतहा नफरत से उत्पन्न गुस्से की वजह से उस का पूरा का पूरा वजूद कांप रहा था. उस का मन कर रहा था कि वह आगे बढ़े और एक ?ान्नाटेदार थप्पड़ अपने पिता और दादी के गाल पर जड़ दे, लेकिन किसी तरह वह अपने को नियंत्रण में रखे हुए थी. अपनेआप को काबू में रखने के लिए वह गहरीगहरी सांसें ले रही थी और रहरह कर अपने हाथों की मुट्ठियां खोलबंद कर रही थी.
सविता देवी जिन की निगाहें लगातार निशा पर जमी हुई थीं, बखूबी बेटी के जज्बातों को सम?ा रही थी. उन्होंने आगे बढ़ कर निशा का एक हाथ अपने दोनों हाथों में ले कर बड़े प्यार से थपथपाते हुए बहुत ही हौले शब्दों में कहा, ‘‘मैं तुम्हारी मनोदशा को बखूबी सम?ा सकती हूं बेटी, लेकिन मत भूलना कि तुम जिलाधिकारी हो और तुम्हारे सामने खड़े लोग भले ही व्यक्तिगत कारणों से तुम्हारे मुजरिम क्यों न हों लेकिन वे तुम से अपने ऊपर हुए अत्याचार का इंसाफ मांगने आए हैं. इसलिए जो भी करना सोचसम?ा कर करना और अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को अपने फर्ज पर हावी मत होने देना.’’
निशा ने मां के हाथों के ऊपर अपना दूसरा हाथ रखते हुए उतने ही हौले स्वर में कहा, ‘‘इस कठिन समय में मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद, मां. यकीन मानो, आप की बेटी अन्याय नहीं करेगी.’’
उसे अपनेआप को संयत करने में 2 मिनट लगे और फिर वह उन दोनों से मुखातिब होते हुए बोली, ‘‘आप ने इसी बेटे, जिस ने आप को इस उम्र में मारपीट कर घर से निकाल दिया है, की चाहत में इस औरत को उस की 3 छोटीचोटी बच्चियों समेत घर से निकाल दिया था?’’
दोनों मांबेटे चुपचाप सिर ?ाकाए खड़े रहे.
‘‘क्यों किया था आप ने यह सब?’’ उस ने फिर से कहना शुरू किया, ‘‘महज इसलिए न, क्योंकि आप जैसे मूर्ख लोगों को लगता है कि केवल बेटा ही बुढ़ापे का सहारा बन सकता है. बन गया आप लोगों का बेटा आप का सहारा? अगर आप ने इस औरत को घर से न निकाला होता तो आज आप लोग भी एक प्रिंसिपल, एक डाक्टर और एक जिलाधिकारी के पिता और दादी होते.’’
‘‘हमें माफ कर दो, बेटी, हम से बहुत बड़ी भूल हो गई,’’ शांति देवी हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ा उठी, ‘‘इस से ज्यादा बेटे की चाहत मु?ो थी. मैं ही इसे उकसाती और भड़काती रहती थी.’’ और फिर वह सविता देवी की ओर देखती हुई बोली, ‘‘तुम तो सब जानती हो बेटी, तुम्हीं कुछ बोलो?’’
‘‘माफ कीजिएगा माताजी, बड़ी मुश्किल से मेरे जेहन से उस नर्क की यादें मिटी हैं,’’ सविता देवी ने कठोर स्वर में कहा, ‘‘न तो मु?ो कुछ याद है और न ही मैं कुछ याद करना चाहती हूं.’’
‘‘हम से वाकई बहुत बड़ी भूल हो गई जो बेटे की चाहत में मैं ने अपनी पत्नी और फूल जैसी बच्चियों को घर से निकाल दिया था,’’ अब की बार रामगोपाल हाथ जोड़ कर विनीत स्वर में कह उठे, ‘‘काश, हम ने यह गुनाह न किया होता.’’
‘‘माफी आप दोनों को मु?ा से नहीं, इन से मांगनी चाहिए,’’ निशा ने सविता देवी की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘और जहां तक मेरी बात है तो मैं एकबारगी को शायद आप लोगों को माफ कर भी देती अगर आप लोगों ने अपना गुनाह अब से कुछ देर पहले तक स्वीकार कर लिया होता,’’ कठोर स्वर में कहती चली गई निशा, ‘‘सचसच बताना कि मां से सामना होने से पहले क्या कभी भी आप के मन में
यह खयाल तक आया था कि आप लोगों ने 30 साल पहले एक बड़ा गुनाह
कर दिया था? अगर अब से पहले तक आप लोगों को कभी यह खयाल नहीं
आया था तो आप लोग खुद सोचो कि अब आप लोगों का यह माफी मांगना कितना बेमानी है.’’
मांबेटे दोनों की जबान तालू से जा चिपकी. उन के ?ाके हुए सिर साफसाफ गवाही दे रहे थे कि सविता देवी से सामना होने से पहले तक वाकई वे लोग सबकुछ भुलाए बैठे थे.
‘‘आप लोग मेरे पास, आप लोगों को अपने बेटे द्वारा प्रताडि़त किए जाने की शिकायत ले कर आए थे,’’ निशा ने अपने आधिकारिक लहजे में अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘आप लोगों का यह भी कहना था कि आप के बेटे ने जबरदस्ती आप लोगों से कोरे कागजों पर साइन करवा लिए हैं. ये लीजिए आप लोग अपने द्वारा साइन किए गए कोरे कागज.’’ उस के इतना कहते ही संजय ने हाथ में थमा फोल्डर उन दोनों की ओर बढ़ा दिया.
आंखों में बाजी हार जाने जैसे भाव लिए उन्होंने फोल्डर थाम लिया.
‘‘और जहां तक बात है आप लोगों को, आप के बेटे द्वारा प्रताडि़त किए जाने की, तो आप लोग सुबह 11 बजे औफिस आ जाइए. हम आप के बेटे को बुला कर रखेंगे और वहीं उसे सम?ा दिया जाएगा और जहां तक बात है आप के माफी मांगने की तो मैं पहले ही स्पष्ट कर चुकी हूं कि आप को यह माफी देने का अधिकार मेरा नहीं…’’ कहते हुए उस ने सविता देवी की ओर इशारा किया ‘‘…बल्कि इन का है. ये जो फैसला करेंगी वह हमें मंजूर होगा. चलिए, संजयजी.’’
अपनी बात खत्म करने के साथ निशा ने अपने कदम कोठी की ओर बढ़ा दिए. संजय उस के पीछेपीछे था.
अभी वह बमुश्किल एक या दो कदम ही चल पाई थी कि सविता देवी उस के पीछेपीछे चलती हुई कह उठी, ‘‘वाह बेटी, कमाल है तुम्हारा भी. मु?ो इन अजनबियों के बीच अकेला छोड़ कर घर जा रही है और मुझे से यह भी कह रही हो कि इन अजनबियों को माफ कर दूं. अरे भई, जिन्हें मैं जानती नहीं, पहचानती नहीं, उन्हें मैं क्यों माफ करूं? मैं तो कतई माफ नहीं करूंगी. चलो, घर चलो.’’ Hindi story
अंतिम भाग





