Ritualistic Scientists : धर्म और विज्ञान एकदूसरे के विरोधाभासी हैं, बावजूद इस के धार्मिक कर्मकांडी वैज्ञानिक उपलब्धियों को धार्मिक चोला ओढ़ाने की कोशिश में रहते हैं. कुछ ऐसी ही स्थिति सुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष स्टेशन की हालिया यात्रा के दौरान सामने आई.

मजहब या धर्म ऐसा ब्रेकर है जो व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की गति को धीमा करता है. दुनिया के सभी धर्म इतिहास में बने हैं. कोई 1400 साल पुराना है तो कोई धर्म 2 हजार साल पुराना है और कोई धर्म तो सनातन होने का दावा करता है.

धार्मिक गिरोह अपने पुरातन होने का ढिंढोरा पीटते हैं लेकिन सच यही है कि धर्मों का पुराना होना ही इंसानियत के लिए घातक स्थिति है क्योंकि जो धर्म जितना पुराना है वह इंसानी बुद्धि को उतना ही पीछे ले जाने की जद्दोजेहद करता है.

जब हम दुनिया के इतिहास को देखते हैं तो हमें मालूम चलता है कि इंसान की बुद्धि ने धर्मों के खिलाफ बगावत की, तब जा कर विज्ञान का उदय हुआ. आज की हरेक तकनीक, जिस के बल पर यह दुनिया चल रही है व आप और हम जी रहे हैं, में किसी भी धर्म का कोई योगदान नहीं है. यह सब विज्ञान की ही देन है. कोई भी समाज तब तक आजाद नहीं होता जब तक उस समाज के विचार गुलाम हों. खयालात की गुलामी को पश्चिमी दुनिया ने तोड़ा और विज्ञान, तकनीक व डैमोक्रेसी में कहीं आगे निकल गए. लेकिन, हम आज भी अपनी धार्मिक मान्यताओं की झठी दुनिया से बाहर न निकल पाए.

कड़वी सच्चाई तो यही है कि विज्ञान के क्षेत्र में हमारी वास्तविक उपलब्धि शून्य के अलावा कुछ नहीं है. विज्ञान के क्षेत्र में इस महान शून्यता का कारण यह है कि हम वैज्ञानिक चेतना से कोसों दूर हैं. उधार की टैक्नोलौजी पर इतराने से वैज्ञानिक चेतना नहीं आती. विज्ञान का पथ बनाने के लिए कुर्बानियां देनी पड़ती हैं. धर्म की सत्ता से टकराना होता है.

सुभांशु शुक्ला एक्सिओम मिशन-4 के तहत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की यात्रा करने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री हैं. वर्ष 1984 में अंतरिक्ष में कक्षा की यात्रा करने वाले राकेश शर्मा के बाद दूसरे भारतीय बन गए. सुभांशु शुक्ला ने 25 जून, 2025 को स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल के माध्यम से फ्लोरिडा से आईएसएस के लिए उड़ान भरी थी. उन्होंने वहां पर 18 दिन बिताए. 31 देशों के 60 से अधिक प्रयोग किए. उन में इसरो के 7 प्रयोग शामिल थे.

15 जुलाई, 2025 को कैलिफोर्निया के तट पर सुभांशु उतरे तो यह भारत के लिए बहुत गर्व की बात थी. यह मिशन भारत, पोलैंड और हंगरी के लिए भी ऐतिहासिक था, क्योंकि इन देशों के अंतरिक्ष यात्री 4 दशकों बाद किसी मानवयुक्त मिशन में शामिल हुए थे.

सुभांशु शुक्ला की सकुशल वापसी के लिए भारत में यज्ञहवन होने लगे. सुभांशु शुक्ला आसमान में थे और यहां जमीन पर बैठे निठल्ले लोग उन की लैंडिंग के लिए धार्मिक नौटंकी में लगे थे. क्या यह विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की हत्या नहीं है?

वैज्ञानिकों की देन

1530 में कोपरनिकस के प्रयोगों ने यह साबित किया कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है. पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है जिस से दिन और रात होते हैं और एक साल में वह सूर्य का चक्कर पूरा करती है. कोपरनिकस की इतनी सी बात से धर्म की सत्ता हिल गई और निकोलस कोपरनिकस को देश छोड़ना पड़ा.

जियोर्डानो बू्रनो का गुनाह बस इतना सा था कि उन्होंने निकोलस कोपरनिकस के विचारों का समर्थन किया और कहा कि ‘ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी नहीं’. बस, इसी ‘गुनाह’ के लिए उन्हें जिंदा जला दिया गया.

Ritualistic Scientists (1)
वैज्ञानिक सोच का सीधा टकराव धर्म और धार्मिक मान्यताओं से होता है, इसलिए जो वैज्ञानिक धर्मभीरुता नहीं छोड़ पाते, असल में वे वैज्ञानिक हो कर भी विज्ञान के दुश्मन ही साबित होते हैं.

कोपरनिकस के 80 वर्षों बाद और जियोर्डानो की मौत के 15 वर्षों बाद गैलीलियो गैलिली ने अपनी दूरबीन के प्रयोग से कोपरनिकस की बात को प्रमाणित किया और यह नतीजा निकाला कि वास्तव में धरती यूनिवर्स का केंद्र नहीं. धर्म के ठेकेदारों को यह बात पसंद नहीं आई और गैलीलियो गैलिली को जेल की सजा हो गई.

चार्ल्स डार्विन ने अपने जीवन के 50 साल लगा कर यह खोज निकाला कि धरती पर जीवन की विविधताओं का स्रोत ईश्वर नहीं है बल्कि विकासवाद है. उन की यह महान खोज धर्म के विरुद्ध साजिश बताई गई और चर्च ने डार्विन को ईश्वर का कातिल करार दे दिया. 24 नवंबर, 1880 को डार्विन ने फ्रांसिस एमसी डेर्मोट के एक पत्र का जवाब देते हुए अपने खत में साफसाफ लिखा था, ‘मु?ो आप को यह बताने में खेद है कि मैं बाइबिल पर भरोसा नहीं करता. यही कारण है कि मु?ो जीजस क्राइस्ट के ईश्वर की संतान होने पर भी विश्वास नहीं है.’

चर्च को डार्विन के मानव विकास के सिद्धांत बिलकुल मान्य नहीं थे. डार्विन के सिद्धांतों ने परमेश्वर, उन के पुत्र यीशू और ईसाइयों के प्रमुख धर्मग्रंथ बाइबिल के ही अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़े कर दिए थे.

बाइबिल के अनुसार, पृथ्वी की रचना क्राइस्ट के जन्म से 4004 साल पहले हुई थी लेकिन डार्विन के विकासवाद की थ्योरी पृथ्वी की उत्पत्ति को लाखोंकरोड़ों वर्ष पहले का बताती थी. बाइबिल के मुताबिक, ईश्वर ने एक ही सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी लेकिन डार्विन कि थ्योरी बाइबिल की मान्यताओं के बिलकुल उलट थी.

डार्विन ने अपनी किताब, ‘द औरिजिन औफ द स्पीशीज’ में लिखा, ‘‘मैं नहीं मानता कि पौधे और जीवित प्राणियों को ईश्वर ने बनाया था.’’ इन्हीं ईश्वर विरोधी बातों के कारण डार्विन को ईश्वर और धर्म का हत्यारा बताया गया.

धर्म और विज्ञान के बीच कोई समझता हो ही नहीं सकता. जो लोग धर्म और विज्ञान के बीच गठजोड़ बनाने की कोशिश करते हैं वे दरअसल राजनीति का शिकार होते हैं.

Ritualistic Scientists (4)
निकोलस कोपरनिकस (बाएं) ने साबित किया कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है तो उन्हें धर्म का दुश्मन मान लिया गया और देश से निकाल दिया गया. जियोर्डानो ब्रूनो (दाएं) ने कोपरनिकस के सिद्धांतों को सच माना तो उन्हें जिंदा जला दिया गया. धर्म ने हमेशा से विज्ञान और वैज्ञानिकों के विरुद्ध षड्यंत्र किया है.

विज्ञानविरोधी हैं धर्म के सिद्धांत

धर्म के सिद्धांत हमेशा से विज्ञानविरोधी रहे हैं और विज्ञान के सिद्धांतों पर धर्म कभी खरा नहीं उतरता, इसलिए दोनों के रास्ते जुदा हैं. धर्म को पनपने के लिए विज्ञान की जरूरत पड़ती है. विज्ञान की बैसाखी के बिना आज कोई धर्म जिंदा नहीं रह सकता लेकिन विज्ञान को धर्म की रत्तीभर भी जरूरत नहीं पड़ती.

साइंस के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी जिंदगियां कुरबान की हैं. रातों की नींदें उड़ाई हैं तब जा कर आज की दुनिया रहने लायक बनी है. लोग साइंस और टैक्नोलौजी के फर्क को नहीं समझ पाते. टैक्नोलौजी साइंस नहीं है और विज्ञान सिर्फ तकनीक भर नहीं है. साइंस की अलगअलग शाखाएं हैं- कैमिस्ट्री, फिजिक्स, जियोलौजी, एस्ट्रोनोमी और बायोलौजी. विज्ञान के इन सभी क्षेत्रों को समझने के लिए हम टैक्नोलौजी का सहारा लेते हैं और हम टैक्नोलौजी को ही साइंस समझने की भूल करते हैं.

तकनीक, टैक्नोलौजी या प्रौद्योगिकी का मतलब विज्ञान नहीं है बल्कि वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित ऐसे उपकरण जिन से हम समस्याओं को हल कर इंसानियत के लिए जीवन को आसान बना सकें, तकनीक कहलाती है. संक्षेप में कहें तो विज्ञान के सिद्धांतों का इस्तेमाल कर जब हम उस का प्रयोग करते हैं तो वह तकनीक हो जाती है.

Ritualistic Scientists (2)
चार्ल्स डार्विन ने जब दुनिया को एवोल्यूशन यानी विकासवाद का सिद्धांत दिया तो धर्म के ठेकेदारों ने उन्हें भी गालियां दीं और डार्विन की किताब ‘औरिजिन ऑफ स्पीशीज’ को बैन करवा दिया.

हम चंद्रयान के जरिए चांद तक पहुंचे, यह हमारी तकनीक की महान विजय है और इसे सैलिब्रेट जरूर करना चाहिए लेकिन साथ ही, विज्ञान क्या है, हमें यह भी समझना चाहिए.

जहां तकनीक विज्ञान का एक मामूली टूल होता है वहीं विज्ञान का हर प्रयोग धर्म की सत्ता के विरुद्ध इंसानी दिमाग का एक महत्त्वपूर्ण इवैंट होता है. यही फर्क है तकनीक और विज्ञान में. टूल का इस्तेमाल करने के लिए अच्छे टैक्नीशियन और जरूरी बजट की जरूरत होती है लेकिन विज्ञान के सिद्धांतों को गढ़ने के लिए किसी टैक्नीशियन की नहीं बल्कि वैज्ञानिक समझ की जरूरत होती है.

सैकड़ों टैक्नीशियन मिल कर चांद या मंगल पर जाने की टैक्नोलौजी को एसेम्बल कर उसे सफल बना सकते हैं लेकिन बात जब वैज्ञानिक सिद्धांतों या इन वैज्ञानिक सिद्धांतों पर कोई नवीन आविष्कार करने की हो तब ये सैंकड़ों टैकक्नीशियंस भी फेल हो जाते हैं.

महंगे बजट और विज्ञान की किताबों को पढ़ कर इंजीनियर, टैक्नीशियन बने चंद लोगों के जरिए चांद ही क्या, मंगल पर भी पहुंचा जा सकता है लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांतों को गढ़ना और इन सिद्धांतों पर आधारित आविष्कारों से दुनिया की मुश्किलों को आसान बनाना मंगल पर पहुंचने से बिलकुल अलग बात है. जिन वैज्ञानिकों ने चांद पर जाने का रास्ता बनाया, वे कभी चांद पर नहीं पहुंचे.

जहां धर्म हावी वहां विज्ञान फिसड्डी

चांद पर यान भेज कर इतराने से कोई लाभ नहीं. यह सफलता टैक्नोलौजी की जीत जरूर है लेकिन यह विज्ञान की हार है. हम टैक्नोलौजी के सफलतापूर्वक इस्तेमाल से चांद पर पहुंचे हैं लेकिन सही माने में देखें तो इस मिशन में हम ने विज्ञान की हत्या कर दी.

चंद्रयान मिशन को पूरा करने की खातिर भारतीय वैज्ञानिकों को खुद से ज्यादा मंदिरों पर भरोसा था, इसलिए इसरो के वैज्ञानिक मंदिरों के चक्कर लगाते रहे और मंदिरों की बलिवेदी पर साइंस और साइंटिफिक टेम्परामैंट की बलि चढ़ाते रहे.

इसरो के वैज्ञानिक चांद की धरती पर मशीन भेजने में सफल हुए तो इस का असली श्रेय पश्चिम के वैज्ञानिक सोच वाली उन महान हस्तियों को जाता है जिन्होंने विज्ञान के लिए धर्म की सत्ता को चुनौतियां दीं और अपने जीवन को संकट में डाला.

Ritualistic Scientists (3)
गैलीलियो गैलिली ने अपनी दूरबीन के जरिए जब यह साबित किया कि पृथ्वी यूनिवर्स का केंद्र नहीं है, तब गैलीलियो को कैद कर दिया गया.

विज्ञान का सीधा टकराव मजहबों से है. जिस समाज पर मजहब हावी होगा वहां विज्ञान के लिए जगह बचेगी ही नहीं. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिना आप विज्ञान के साथ चल ही नहीं सकते. जहां मजहब मजबूत होता है वहां साइंटिफिक टेम्परामैंट की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है. भारत और पाकिस्तान जैसे देश इस बात का उदाहरण हैं. यहां धर्म हावी है, इसलिए विज्ञान के क्षेत्र में दोनों देश फिसड्डी हैं. यही हाल ईरान का है, जो एक समय ज्ञान का स्रोत था.

वैज्ञानिक होना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना दोनों में बड़ा अंतर है. एक साइंटिस्ट अगर अपने प्रयोग की सफलता के लिए मंदिर में नारियल फोड़ता है या नमाज पढ़ कर अपनी सफलता की दुआ करता है तो असल में वह साइंटिस्ट हो कर साइंस की हत्या कर रहा होता है. जिस साइंटिस्ट के पास साइंटिफिक टेम्परामैंट न हो, वह साइंटिस्ट नहीं बल्कि साइंस का हत्यारा ही होता है.

चांद पर चंद्रयान भेज देना बड़ी बात जरूर है, आप इसे टैक्नोलौजी की जीत कह सकते हैं लेकिन यह विज्ञान की जीत नहीं है.

पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक इसलामी देश यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान की टैक्नोलौजी का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं पर क्या वहां से वैज्ञानिकों की खेप पर खेप निकल रही है. सऊदी अरब में बन रहे जेद्दा टौवर, जो विश्व की सब से ऊंची इमारत होगी, के सृजनकर्ता एड्रीयन स्मिथ और गौर्डन गिल्ल हैं, कोई सऊदी नहीं.

धर्म या मजहब की सत्ता के बीच दम तोड़ते विज्ञान की जीत तब तक संभव नहीं जब तक हमारे वैज्ञानिकों में साइंटिफिक टेम्परामैंट की समझ पैदा न हो. चंद्रयान मिशन चाहे टैक्नोलौजी की जीत हो पर भारतीय विज्ञान की तो हार ही है. Ritualistic Scientists

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...