CBSE Education System : सीबीएसई क्यों वजूद में है, इस पर सोचा जाए तो समझ आता है कि इसे भेदभाव फैलाए रखने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है जिस का पालन वह पूरी ईमानदारी व निष्ठा से कर रहा है. धार्मिक वर्णव्यवस्था की तर्ज पर सीबीएसई ने शैक्षिक वर्णव्यवस्था की जिम्मेदारी उठा रखी है, इसलिए गरीब, दलित, आदिवासी और मुसलमान बच्चे प्रतिभाशाली होते हुए भी सर्वाइव नहीं कर पा रहे. वे सर्वाइव कर सकते हैं बशर्ते सीबीएसई को भंग कर दिया जाए.
सीबीएसई से ताल्लुक रखती एक दिलचस्प और हैरान कर देने वाली बात यह है कि वह संसद द्वारा बनाया गया वैधानिक निकाय नहीं बल्कि सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत एक रजिस्टर्ड सोसाइटी है. यानी, इसे बनाने के लिए संसद में कोई अधिनियम पारित नहीं किया गया था जिस पर संसद में लंबीचौड़ी और तार्किक बहस हुई हो, इस के होने या न होने और इस की उपयोगिता या अनुपयोगिता पर सांसदों द्वारा दोनों सदनों में तर्क और आपत्ति रखे गए हों.
इसे तो बस अपने मुताबिक थोड़ा ढांचा और नाम बदल कर नया नाम और मुकाम दे दिया गया था जिस का सार यह था कि जाओ और पैसे व ऊंची जाति वालों की नई पीढ़ी को नीची जाति वाले गरीबों से अलग रखते देश के भविष्य का कर्णधार बनाओ. सीबीएसई ऐसा कर भी रही है. जो काम ब्रिटिश हुकुमत कर रही थी वह सीबीएसई के हिस्से में आ गया. इस ने 2 वर्गों के बीच शैक्षिक जाति और वर्णव्यवस्था की लक्ष्मणरेखा खींच रखी है.
आर्मी वैलफेयर एजुकेशन सोसाइटी, नई दिल्ली बनाम सुनील कुमार शर्मा 2024 मुकदमे की सुनवाई करते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कम से कम 6ठी बार यह कहा था कि सीबीएसई वैधानिक निकाय नहीं है. कोई भी संस्था तभी वैधानिक होती है जब उस की स्थापना ही सीधे किसी कानून या अधिनियम से होती है. सीबीएसई के बनाए नियम सीधे कानून के जरिए नहीं बने होते और न ही उस के बायलौज यानी नियम संसद द्वारा बनाए गए कानूनों जैसी वैधानिक शक्ति रखते हैं बल्कि एक सोसाइटी के रूप में उन की मौजूदा स्थिति तय होती है.
सीबीएसई वैधानिक या कानूनी नहीं है. इस का यह मतलब भी नहीं कि वह अवैधानिक या गैरकानूनी है. वजह, वह केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली एजेंसी है, इसलिए उस के सर्टिफिकेट वगैरह मान्य होते हैं. उलट इस के, सभी 30 स्टेट बोर्ड्स चूंकि राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पारित अधिनियमों के तहत बने हैं इसलिए वैधानिक तौर पर वे सीबीएसई के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत हैं. यानी, स्टेट बोर्ड्स के नियम संविधान के खिलाफ नहीं हो सकते और उन पर मौलिक अधिकार सीधे लागू होते हैं.
कहने का मतलब यह कि सीबीएसई अपने नियमों की आड़ में मनमानी करता है जिन्हें वक्तवक्त पर अदालतों में चुनौती भी मिलती है. ऐसे कई मामले अदालतों में चल रहे हैं जिन में छात्रों को बहुत मामूली कामों के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ता है, मसलन जन्मतिथि या नाम की स्पेलिंग में सुधार वगैरह हेतु.
मनमानी की मिसाल
बायलौज की आड़ में सीबीएसई की मनमानी के खिलाफ जो सैकड़ों मामले अदालतों में चले हैं उन में से एक अहम दिल्ली हाईकोर्ट में चला ममता शर्मा बनाम सीबीएसई 2020 है. कोविड 19 महामारी के दौरान सीबीएसई ने अपने मूल्यांकन का फार्मूला ही न केवल बदल दिया था बल्कि नतीजा भी घोषित कर दिया था जिस से छात्र दिक्कत में आ गए थे. छात्रों ने अदालत की शरण यह कहते हुए ली कि फार्मूला निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं था. हाईकोर्ट ने छात्रों से सहमत होते उन्हें चाही गई राहत दी.

मनमाने नाम और जन्म की तारीख में बदलाव सरीखे मामलों में भी सीबीएसई नियमों का हवाला देते करता रहता है मानो उस के बायलौज न हों वेदों की ऋचाएं हों.
सीबीएसई बनाम जिज्ञा यादव 2021 मामले में यही हुआ था कि छात्रा को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा था. जिज्ञा 10वीं और 12वीं के अपने प्रमाणपत्रों में अपने पेरैंट्स के नाम में बदलाव चाहती थी. इस बाबत उस ने तमाम दस्तावेज भी सीबीएसई को दिए थे लेकिन सीबीएसई की जिद यह थी कि यह मांग उस के द्वारा तय की गई समयसीमा और नियमों से बाहर है, इसलिए नहीं किया जा सकता.
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सटीक फैसला यह दिया था कि सीबीएसई केवल अपनी प्रशासनिक सहूलियत के चलते आवेदन को खारिज नहीं कर सकता क्योंकि नाम व जन्मतिथि व्यक्ति की पहचान का हिस्सा हैं. चूंकि छात्रा ने प्रामाणिक दस्तावेज सौंपे हैं इसलिए सीबीएसई को बदलाव करना चाहिए. नतीजतन सीबीएसई ने झख मार कर अपने नियम बदले और बदलाव की प्रक्रिया सरल व ट्रांसपेरैंट की, जिस का लाभ लाखों छात्रों को मिल रहा है.
जिज्ञा यादव का मामला बहुत दिलचस्प था. स्कूल रिकौर्ड और सीबीएसई के प्रमाणपत्रों में उस के पिता का नाम हरि सिंह यादव और माता का नाम ममता यादव लिखा था लेकिन असल सरकारी दस्तावेजों में पिता का नाम हरि सिंह और माता का ममता लिखा था. जिज्ञा का कहना था कि यह गलती स्कूल फौर्म भरते वक्त हो गई थी. अब कृपया इसे सुधार दिया जाए पर सीबीएसई को जिज्ञा की परेशानी से ज्यादा अपने बायलौज की फिक्र थी, सो, उस ने अपने बायलौज 69.1 का हवाला देते हुए दोटूक फैसला सुना दिया कि नाम कभी नहीं बदला जा सकता, सिर्फ छोटोमोटी टाइपिंग और क्लैरिकल मिस्टेक सुधारी जा सकती हैं.
बात देखी जाए तो बेहद मामूली थी जिस का बतंगड़ सीबीएसई ने बना दिया था. इस बतंगड़ को सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बैंच ने सीबीएसई को आड़े हाथों लेते फटकार लगाई कि वह छात्रों को नाम की आजादी से वंचित नहीं कर सकता. नतीजतन, सीबीएसई ने अपने बायलौज में सुधार करते उन्हें सरल बनाया. जिज्ञा जैसे 22 मामले सुप्रीम कोर्ट ने एकसाथ सुने थे, यानी, यह तादाद हजारों में होनी तय है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सीबीएसई की हेकड़ी निकली थी लेकिन वक्ती तौर पर ही इस के बाद वह फिर अपने पुराने रवैये पर आ गया था.
अब यह गौर करने वाली बात है कि ऐसी सोसाइटी को क्या भंग नहीं कर देना चाहिए जो छात्रों को ग्राहक या उपभोक्ता समझते ट्रीट करती हो और ऐसे नियम और सख्ती किस काम के जो मामूली बातों और बदलाव के अपने हक के लिए छात्रों को सुप्रीम कोर्ट तक जाने को मजबूर करें. जो छात्र हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने की हैसियत और हिम्मत न रखते हों, क्या उन्हें खामोशी से ज्यादतियां बरदाश्त कर लेना चाहिए.
सीबीएसई की इस तरह की मनमानियों की लिस्ट हरि अनंत हरि कथा अनंता जैसी है, कई बार अदालतों में मुंह की खाने के बाद भी उसे अक्ल नहीं आती. हर दूसरे महीने वह ऐसे फरमान जारी करता है जिस से छात्रों की जान गले में आ जाती है. डिजिटल मार्किंग ताजा उदाहरण है जिस के बारे में परीक्षा में शामिल हो रहे छात्र यह सोचसोच कर हलकान हैं कि कहीं ऐसा न हो कि हमारी कौपी का कोई पेज स्कैन होने से रह जाए.
इन वजहों के अलावा और भी कई वजहें हैं जिन से लगता है कि सीबीएसई को भंग कर देने से किसी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है. उलटे, राहत लाखों को मिलेगी. इस सोसाइटी को एक धार्मिक परंपरा के मानिंद बेवजह ढोया जा रहा है.
केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण
शिक्षा केंद्र और राज्य दोनों का विषय होने के चलते राज्यों के अधिकार सीमित हैं. सीबीएसई के साथ दिक्कत यह है कि विविधताओं वाले हमारे देश में वह एक सा सिलेबस थोपती है जिस से राज्यवार स्थानीय जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं. मसलन यह कि राजस्थान और उत्तर प्रदेश में खेतीकिसानी की और केरल में पर्यटन की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए. अगर शिक्षा को सिर्फ राज्य का विषय घोषित कर दिया जाए तो स्टेट बोर्ड्स का दायरा और अधिकार बढ़ेंगे और वे स्थानीय जरूरतों के मुताबिक सिलेबस बना सकेंगे. इस से न केवल रोजगार के मौके बढ़ेंगे बल्कि भाषाई और क्षेत्रीय प्रोत्साहन भी मिलेगा.
शिक्षा के केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण पर आएदिन बहस और चर्चाएं हर मंच पर होती रहती हैं लेकिन सीबीएसई के वजूद में होने से शिक्षाविद खुल कर राज्यों का पक्ष नहीं रख पाते कि सिर्फ राज्यों वाली यानी विकेंद्रित शिक्षा प्रणाली ज्यादा गुणवत्ता वाली और लचीली साबित होगी.
तमाम लोग यह तो मानते हैं कि सीबीएसई की पढ़ाई खालिस रट्टा मार है जिस से रट्टू तोते ही पैदा होते हैं. इस में रचनात्मकता न के बराबर भी नहीं है. उस का सिलेबस भी जरूरत से ज्यादा बड़ा और बोझिल है जिस के चलते कोचिंग कल्चर और कारोबार फलफूल रहा है. उस की परीक्षाओं में पेपर लीक होना आम बात है. छात्रों पर सीबीएसई के नाम और प्रतिष्ठा को ढोने का भार लाद दिया गया है जिस के चलते वे तनाव और डिप्रैशन का शिकार रहते हैं. 10वीं और 12वीं के कई छात्र अकसर नतीजों के बाद आत्महत्या कर लेते हैं. इन में सीबीएसई के छात्रों की संख्या ज्यादा रहती है.
इंग्लिश मीडियम थोपने के लिए सीबीएसई को फ्रीहैंड मिला तो देशभर में ताबड़तोड़ तरीके से प्राइवेट स्कूल खुलने लगे जो अपने प्रचार में इंग्लिश मीडियम स्कूल जरूर लिखते थे ताकि उन का ग्राहक आसानी से उन तक पहुंच जाए. इस पर सोने पे सुहागा वाली बात यह कि प्राइवेट स्कूल अगर सीबीएसई से संबद्ध हो तो पेरैंट्स की बांछें यह सोचते खिल उठती हैं कि उन का बच्चा यहीं से कुछ बन कर निकलेगा और अगर कुछ न भी बन पाए तो समाज की दरिद्रता से तो दूर रहेगा ही.
पिछड़ने लगे हैं सीबीएसई छात्र
आम धारणा यह है कि सीबीएसई के अधीन पढ़ने वाले छात्र ज्यादा इंटैलिजैंट होते हैं बनिस्बत स्टेट बोर्ड के छात्रों के, पर आंकड़े और उदाहरण अब इसे झठलाने लगे हैं. पहले साफतौर पर यह समझ लेना ज्यादा अहम है कि सीबीएसई के छात्र उतने ही प्रतिभाशाली होते हैं जितने कि स्टेट बोर्ड के होते हैं.
यह फर्क बहुत बड़ा है कि सुविधाभोगी सीबीएसई वालों के पास पैसा, साधन और सुविधाएं ज्यादा होती हैं इसलिए वे चमकतेदमकते दिखते हैं पर इसे ही प्रतिभा मान लेना पूर्वाग्रह भी है और कुंठा भी. सीबीएसई वाले छात्रों के पेरैंट्स अकसर अपरमिडिल क्लास के होते हैं जो महंगे प्राइवेट स्कूलों का खर्च उठा सकते हैं. हकीकत तो यह है कि इन्हीं 10-12 फीसदी पैसे वाले सवर्णों ने सीबीएसई का वजूद बरकरार रखा है नहीं तो इसे तो 60 के दशक में ही भंग हो जाना था.
इस फर्क का हाल तो यह है कि सीबीएसई का छात्र एक मांगता है, उस के पेरैंट्स दर्जनभर पेन और पढ़ाई से ताल्लुक रखती हर चीज ला कर रख देते हैं. किसी भी शहर में देख लें, सीबीएसई के एग्जाम सैंटर पर परीक्षा के वक्त चमचमाती कारों का तांता लग जाता है. 95 फीसदी छात्र कार से परीक्षा देने आते हैं जबकि स्टेट बोर्ड के 15 फीसदी छात्र भी कार से नहीं आते. वे या तो टूव्हीलर वाले होते हैं या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आने वाले होते हैं.

यह फर्क एक बड़ा फैक्टर है जो छात्रों के बीच के आर्थिक भेदभाव या असमानता को उजागर करता है पर आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक कारण भी मायने रखते हैं. स्टेट बोर्ड्स के छात्र जिस बैकग्राउंड से आते हैं उस में आर्थिक अभावों और सामाजिक संघर्षों की भरमार है, जातिगत भेदभाव हैं, अपमान भी है. हर तरह के अभाव तो जगजाहिर हैं ही, ये ही आज के दौर के कर्ण और एकलव्य हैं लेकिन हर दौर की तरह मलाई पर अर्जुन के मुंह का ही हक है. इस के यानी तमाम दुश्वारियों के बाद भी स्टेट बोर्ड्स वाले सीबीएसई छात्रों को हर स्तर पर टक्कर और चुनौती दे रहे हैं. सब्जी बेचने वाले का बेटा आईएएस बना, मजदूर की बेटी ने टौप किया या ड्राइवर के बेटे ने बाजी मारी जैसी खबरें अब अपवाद नहीं रह गई हैं.
नए तरीके की खाई की तैयारी
सीबीएसई बहुत सी वास्तविकताओं से लोग अनजान हैं और सोचते हैं कि यह बेहतर शिक्षा के लिए बनाई गई संस्था है पर गहराई से देखें तो समझ आता है कि यह न केवल एक नए तरीके की खाई खोद रही है बल्कि इस ने नए तरीके की वर्णव्यवस्था को भी जन्म दे रखा है और हकीकत में उस की ही परवरिश कर रही है.
आंकड़ों के आईने में देखें तो तसवीर अब साफ होती जा रही है. साल 2025 में सीबीएसई के बोर्ड इम्तिहान में 30,000 से ज्यादा स्कूलों के 16.93 लाख छात्र शामिल हुए थे जिन में से 3.10 लाख 80 फीसदी से ज्यादा मार्क्स लाए थे. स्टेट बोर्ड्स के बोर्ड इम्तिहान में शामिल हुए 1.95 करोड़ छात्रों में से 19.5 लाख 80 फीसदी से ज्यादा मार्क्स लाए थे जोकि सीबीएसई से 16.4 लाख ज्यादा थे. यानी, कोई खास फर्क नहीं तो किस बिना पर सीबीएसई का ढोल और ढिंढोरा पीटा जाता है, यह शायद ही कोई बता पाए.
यह जरूर सोचा जाना चाहिए कि अगर स्टेट बोर्ड्स के छात्रों को सीबीएसई के छात्रों के बराबर सुविधाएं और साधन मिल जाएं तो गधों और घोड़ों में फर्क स्पष्ट हो जाएगा जिस की मिसाल दे कर स्टेट बोर्ड्स वाले गरीब, दलित, पिछड़े और आदिवासी बच्चों की खिल्ली उड़ाई जाती है.

भेदभाव की यह खाई बहुत गहरी इन मानो में होती जा रही है कि 80 फीसदी से कम मार्क्स लाने वाले 80 फीसदी छात्र वर्णव्यवस्था के मुताबिक ही काम कर रहे हैं. सीबीएसई वाले कम मार्क्स वाले भी हों तो महंगे मैडिकल, मैनेजमैंट और इंजीनियरिंग कालेजों के दरवाजे पैसों की चाबी से उन के लिए खुल जाते हैं. इन कालेजों से डिग्री ले कर वे नैशनल व मल्टीनैशनल कंपनियों में जौब पा जाते हैं. ऐसे छात्रों की तादाद लगभग 70 फीसदी होती है. 10 फीसदी या तो केंद्र या राज्य सरकार की नौकरियों में घुस जाते हैं या खुद के स्टार्टअप के जरिए कारोबार शुरू कर देते हैं. बचे 10 फीसदी को कुछ नहीं करना पड़ता. उन के पास अपना पुश्तैनी व्यापार होता है जिसे संभालने की गरज से ही उन्हें इंग्लिश माध्यम में पढ़ाया जाता है.
जाति और भाषा की सजा
कहने का मतलब यह नहीं कि सीबीएसई वाले गएगुजरे होते हैं बल्कि यह है कि उन के आगे रहने की एक बड़ी वजह उन के फैमिली और सोशल बैकग्राउंड के अलावा पैसा और सुविधाएं हैं जिस का श्रेय बिना वजह ही सीबीएसई के खाते में चला जाता है और स्टेट बोर्ड्स के हिस्से में महज आलोचनाएं आती हैं.
अब स्टेट बोर्ड्स के 80 फीसदी छात्रों पर गौर करें तो उन में से 5 फीसदी ही छोटीमोटी सरकारी नौकरी हासिल कर पाते हैं. बचेखुचे वही गुलामी ढोते नजर आते हैं जो उन के पूर्वज ढोते रहे थे. फर्क इतनाभर आया है कि वे बिलकुल अनपढ़ थे, ये लोग जैसेतैसे 8वीं और 12वीं तक पढ़ गए हैं. इस बदरंग तसवीर को 2 तरह से देखा जा सकता है- पहला खुद नंगी आंखों से देख कर कि स्टेट बोर्ड्स के अधिकतर छात्र ईकौमर्स कंपनियों में काम कर रहे हैं. इन्हें गिग वर्कर्स कहा जाता है जिन की मौजूदा संख्या इकौनोमिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक 1.2 करोड़ है. सरकारी नीति आयोग की 2020-21 की रिपोर्ट में इन की तादाद 77 लाख बताई गई थी. यानी, यह दिनोंदिन बढ़ रही है.
ये युवा चाहे चायपकौड़े बेचें या नौकरी करें, हाड़तोड़ मेहनत के बाद 500 से 800 रुपए प्रतिदिन कमा पाते हैं और न भूतो न भविष्यति वाली कहावत की तर्ज पर जिंदगी गुजर कर रहे हैं. इन में से 95 फीसदी दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुसलमान हैं. ईकौमर्स कंपनियों ने इन्हें बड़े लुभावने इंग्लिश नाम दे रखे हैं, मसलन डिलीवरी पार्टनर, राइड हेलिंग ड्राइवर और फ्रीलांसर वगैरह. इस से न तो इन की जाति ढक पाती और न ही बदहाली छिप पाती.
इन का गुनाह इतनाभर है कि ये छोटी जाति के हैं और स्टेट बोर्ड्स वाले सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं और इस से भी ज्यादा अहम बात यह कि ये बेचारे इंग्लिश नहीं बोल पाते. सीबीएसई वाले जो इंग्लिश बोलना सीख गए हैं, वे कोई वैज्ञानिक या विषय विशेषज्ञ नहीं बन जाते बल्कि वे भी हैं क्लर्क ही लेकिन ज्यादा सैलरी के चलते कहलाते साहब हैं. देसी और मल्टीनैशनल कंपनियों में इन की भरमार है.
सीबीएसई ने कैसे इंग्लिश थोप कर युवाओं के 2 वर्ग बना दिए हैं, यह गौर से देखा और महसूसा जाए तो डिलीवरी बौय, ओला, उबर और रैपिडो का ड्राइवर किसी खोमचे या छोटे ढाबे पर 50 रुपए से भी कम में पेट की आग बुझता नजर आ जाएगा जबकि कंपनियों वाला युवा कैंटीन में एक दिन के लंच या डिनर पर उस से भी ज्यादा पैसे खर्चता है जितना गिग वर्कर एक दिन में कमाता है.
भेदभाव और असमानता की यह खाई जो सदियों से तरहतरह से थोपी जाती रही है, अगर अभी नहीं पाटी गई तो हालात का और भी भयावह होना तय है. नीति आयोग की ही एक और रिपोर्ट के मुताबिक साल 2029-30 तक गिग वर्कर्स की संख्या बढ़ कर 2.35 करोड़ तक हो जाने का अंदाजा है. गिग इकोनौमी, गिग वर्कफोर्स जैसे शब्दों का जिक्र नीति आयोग जैसी सरकारी एजेंसियां बड़े गर्व से करती हैं जो हकीकत में नए दौर की वर्णव्यवस्था है और इस में बड़ा हाथ सीबीएसई जैसी सोसाइटी का है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित उन के कुछ मंत्री मानसिक गुलामी का जिक्र करते हैं तो लगता है कि दरअसल वे इसी वर्ग के युवाओं की तरफ इशारा कर रहे हैं.
अगर वाकई में मानसिक गुलामी से मुक्ति चाहिए तो सब से पहले सीबीएसई को भंग कर देना चाहिए, जिस की कार्यशैली ही सामंती है और जो प्राइवेट स्कूल नाम के गुरुकुलों की आड़ में मुख्यधारा वाले बच्चों की पढ़ाई के जरिए उन्हें साहब बनने को तैयार करती है. इस का सीधा सा मतलब है कि दलित, पिछड़े, आदिवासी युवाओं को पैसे वाले सवर्णों की गुलामी ढोने के लिए मजबूर और तैयार किया जा रहा है. सीबीएसई के वजूद में रहने मात्र से स्टेट बोर्ड्स को अधिकार और काम करने की छूट नहीं मिल पा रही है. मुकाबला बराबरी का हो, इस के लिए जरूरी है कि सभी छात्र एक सिलेबस पढ़ें, राज्य अपनी जरूरतों और प्राथमिकता के मुताबिक युवाओं को गढ़ें और सभी एक सा इम्तिहान दे कर अपनी मेहनत व प्रतिभा के मुताबिक कैरियर बनाएं.
यह ठीक है कि अधिकतर स्टेट बोर्ड्स, कहीं कम तो कहीं ज्यादा, भ्रष्टाचार की गिरफ्त में हैं लेकिन सीबीएसई के दामन में भी दाग कम नहीं, जिस का भ्रष्टाचार सीधेसीधे छात्रों का नुकसान करता है जबकि स्टेट बोर्ड्स के भ्रष्टाचार सरकारी फंड के गोलमाल और घालमेल के ज्यादा होते हैं. यानी, छात्रों का प्रत्यक्ष नुकसान कम होता है.
लेकिन किसी भी छात्र का किसी भी तरह का नुकसान न हो बच्चों के दिलोदिमाग में जाति भाषा और आमदनी की बिना पर ऊंचे और नीचे होने का खयाल ही न आए इस के लिए जरूरी है कि सीबीएसई जैसी संस्था को भंग कर शिक्षा पूरी तरह राज्यों के जिम्मे छोड़ दी जाए. CBSE Education System





