Paro Pinaki Ki Kahani (2026) – Movie Review : यह एक लवस्टोरी है, जिसे वैलेंटाइन डे के मौके पर रिलीज किया गया है. इन दिनों लवस्टोरीज पर धड़ाधड़ फिल्में बन रही हैं, ‘सैयारा’ फिल्म के बाद कई लव स्टोरीज आईं जिन्होंने प्रेम का असली मतलब दर्शकों को समझया, ‘पारो पिताकी की कहानी एक गटर साफ करने वाले युवक और एक सब्जी बेचने वाली युवती की प्रेम कहानी है. फिल्मकार अब तक फिल्मों की प्रेम कहानियों में अमीरीगरीबी, नायकनायिका की चुहुलबाजी, उन दोनों के परिवारों में टकराव ही दिखाते आए हैं. इस प्रेम कहानी का विषय सचमुच अद्भुत है. यह प्रेम कहानी दर्शकों को काफी हद तक बांधे रखती है. यह लव स्टोरी दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है.

फिल्म की कहानी मरियम (इशिता सिंह) और पिनाकी (संजय बिश्नोई) के इर्दगिर्द है. लोकल ट्रेन में आतेजाते वे रोज मिलते है. रेल के डब्बों में ही उन में आपस में मोहब्बत हो जाती है. मरियम अपने पिता के साथ सब्जी की दुकान चलाती है तो पिनाकी नालियों और सीवर की सफाई का काम करता है. रोजाना 2 लोग मरियम को छेड़ते हैं तो वह यह बात पिनाकी को जताती है.

एक दिन मरियम बिना कुछ बताए गायब हो जाती है. उस के गायब होने से पिनाकी दुखी हो जाता है. उसे पता चलता है कि उस के पिता ने उसे एक शख्स को सिर्फ 15 हजार रुपए में बेच दिया है. पिनाकी मरियम को वहां से भगाने की कोशिश करता है लेकिन पकड़ा जाता है. वह उन लोगों से वादा करता है कि जितने में मरियम को उस के पिता ने बेचा है वह उस से डबल पैसे उस शख्स को देगा. पिनाकी अपनी चालाकी से पुलिस को मरियम को ढूंढ़ने में मदद करने के लिए मना लेता है और मरियम को उन लोगों के कब्जे से छुड़वा लेता है. वह मरियम का हाथ थाम लेता है. इस तरह सच्चे प्यार की जीत होती है.

इसे कहते हैं लवस्टोरी. एक अच्छीभली युवती द्वारा एक गटर व नालियां साफ करने वाले से प्यार करना दिखा कर निर्देशक ने गहरी जड़ें जमा चुकी जाति व्यवस्था और मुश्किल से गुजारा करने वाले लोगों की क्रूरता को दिखाया है जबकि बदबूदार नाले में उतरना बहादुरी नहीं, आजीविका है, जहां गंदगी इतनी गहराई से समा जाती है कि उस का एहसास नहीं होता. फिल्म की यह कहानी जमीनी हकीकत से जुड़ी लगती है. फिल्म चंद रुपयों के बदले अपनी बेटियों को बेच देने के साथ ह्यूमन ट्रैफिकिंग गिरोह की बात भी करती है. मगर फिल्म में ह्यूमन टै्रफिकिंग गिरोह का खौफ प्रभावी नहीं बन पड़ा है. निर्देशक ने फिल्म में सामाजिक मुद्दों को तो उठाया है परंतु उन का सौल्यूशन नहीं दिया है.

इस लवस्टोरी में कोई किसिंग सीन, दिखावा या फिल्मी ड्रामा नहीं है. बस, फिल्म यही सिखाती है कि प्यार किया है तो उसे निभाया कैसे जाए. फिल्म की पटकथा कमजोर है और उलझ हुई है. निर्देशन भी सधा हुआ नहीं लगता. फिल्म में अधिकांश कलाकार नए हैं. पिनाकी की भूमिका में संजय बिश्नोई ने बढि़या ऐक्टिंग की है. इशिता सिंह भी प्रभावित करती है. फिल्म उन मजदूरों को डैडिकेट की गई है जो बिना थके इस तरह के छोटेमोटे काम करते हैं और लोग उन्हें नफरत से देखते हैं.

निर्देशक द्वारा कहानी कहने की कला की तारीफ करनी होगी. फिल्म बहुतकुछ सोचने पर मजबूर कर देती है, खासकर क्लाइमैक्स. फिल्म का मुख्य गाना ‘चरखा…’ वडाली ब्रदर्स का है. फिल्म के संवाद बढि़या हैं, ‘मेरे बाप ने मुझे रखा ही इसलिए है कि मैं सब्जी बेचने में उस की मदद कर सकूं,’ ‘सीवर साफ करने वालों का 40 की उम्र के बाद शरीर खराब हो जाता है.’ इन संवादों से दर्शक खुद को रिलेट करते हैं.

भले ही यह फिल्म श्याम बेनेगल जितनी भावनात्मक गहराई हासिल न कर पाए फिर भी यह नेक इरादे से बनाई गई लगती है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Paro Pinaki Ki Kahani (2026) – Movie Review

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