Bangladesh Election Results : बांग्लादेश की राजनीति में आए बदलाव ने लंबे अस्थिर दौर के अंत का संकेत दिया है. बीएनपी की प्रचंड जीत बांग्लादेश की जनता की शांति, संतुलन और विकास की आकांक्षा को दर्शाता है. सत्रह साल के निर्वासन से उबर कर नेतृत्व की बागडोर संभालने वाले बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सामने अब चुनौती विरासत से आगे बढ़ कर पारदर्शी, संस्थागत और नीति आधारित शासन देने की है.

बंगलादेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है. लंबे समय तक सत्ता संघर्ष, वैचारिक ध्रुवीकरण और अस्थिरता के दौर से गुजरने के बाद अब बंगलादेश में सत्ता की बागडोर अंततः खालिदा जिया और जियाउर्रहमान के बेटे तारिक रहमान के हाथों में आ गई है. 17 फरवरी को बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान ने निर्वासित जीवन से नेतृत्व की ओर कदम बढ़ाते हुए देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. 12 फरवरी को हुए चुनाव में तारिक की पार्टी ने 299 सीटों में से 212 सीटों पर विजय हासिल की. यह इस बात का प्रमाण है कि बंगलादेश के लोग लंबे समय से चली आ रही अस्थिरता, हिंसा, घृणा, डर और वैचारिक ध्रुवीकरण से बाहर निकलना चाहते हैं.

चुनाव नतीजों ने यह स्पष्ट किया कि जनता निरंतर टकराव, हिंसा और अनिश्चितता से उकता चुकी थी. बीएनपी की विजय केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि शासन में संतुलन और संवाद की अपेक्षा का भी प्रतीक है. कई विश्लेषकों के अनुसार, तारिक रहमान ने चुनाव प्रचार में जनसंपर्क के अपेक्षाकृत आधुनिक और सहभागी तरीकों को अपनाया – अधिक रैलियां, सीधा संवाद, और पारिवारिक छवि का प्रस्तुतीकरण, जिस से उन्हें व्यापक सामाजिक वर्गों से समर्थन मिला.

विरासत और नेतृत्व की परीक्षा

तारिक रहमान ऐसे राजनीतिक परिवार से आते हैं जिस की बंगलादेश के इतिहास में गहरी छाप रही है. उन के पिता जियाउर रहमान और मां खालिदा जिया देश की प्रमुख राजनीतिक हस्तियां रहे हैं. इस विरासत ने उन्हें पहचान तो दी है, पर साथ ही अपेक्षाओं का भार भी बढ़ाया है. अब उन के सामने चुनौती है कि वे व्यक्तिगत करिश्मे से आगे बढ़ कर संस्थागत मजबूती, पारदर्शिता और नीति आधारित शासन को प्राथमिकता दें.

अब जबकि नेतृत्व की बागडोर तारिक रहमान के हाथों में आ गई है, देखना दिलचस्प होगा कि तारिक इस विरासत को किस तरह आगे बढ़ाते हैं. 17 फरवरी को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. 12 फरवरी को हुए आम चुनाव में उन की पार्टी, बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी), ने 299 में से 212 सीटों पर जीत दर्ज की. यह परिणाम संकेत देता है कि मतदाता स्थिरता, शांति और विकास की नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं.

जमात ए इस्लामी और शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन करने वाली नैशनल सिटीजन पार्टी को लग रहा था कि सत्ता की बंदरबांट में वही मुख्य किरदार रहेंगे. वे यह मान कर चल रहे थे कि बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी के लिए चुनाव आसान नहीं होगा क्योंकि खालिदा जिया अब जीवित नहीं है और 17 साल तक देश से बाहर रहने वाले तारिक रहमान इतनी जल्दी देश से कनैक्ट नहीं हो पाएंगे. मगर तारिक ने ऐसा कनैक्ट किया कि बाकी सब की नैया डुबो दी.

जनता से संवाद की रणनीति

तारिक रहमान ने मरने की कगार पर पहुंच चुकी अपनी मां की पार्टी बीएनपी में नई जान फूंकने के लिए जनता से संवाद का बिलकुल नया तरीका अपनाया. चुनाव प्रचार के लिए 19 दिनों में 64 रैलियां कर डालीं और इन रैलियों में उन्होंने अपनी पत्नी डा. जुबैदा रहमान और बेटी जाइमा रहमान को भी अपने साथ रखा. इस ने बंगलादेश की नारी शक्ति को जागृत किया. तारिक ने खुद को एक पारिवारिक व्यक्ति के रूप में जनता के सामने रखा जिस से जनता उन से तुरंत कनैक्ट हो गई. उन्होंने चुनावी मंच पर आम लोगों को आमंत्रित किया. उन से सीधे बात की, सवाल पूछे, समस्याएं जानीं और निदान का आश्वासन दिया. इन नीतियों ने मतदाताओं को उन के करीब ला दिया. वे हर मंच से देश में शांति, सद्भाव और लोकतंत्र की बात करते रहे. नतीजा यह हुआ कि शेख हसीना की अवामी लीग के समर्थकों को भी तारिक रहमान ही उम्मीद की एकमात्र किरण नजर आए और और आवामी लीग के मतदाताओं के वोट भी तारिक की झोली में गए.

जोर मारती इस्लामी ताकतें

यह बंगलादेश का दुर्भाग्य रहा कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद अंतरिम सरकार चलाने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता मौहम्मद यूनुस के चरित्र में उदारवादी लक्षणों की जगह इस्लामिक परस्ती और पाकिस्तान के प्रति झुकाव ज्यादा दिखाई दिया. उन्होंने बंगलादेश में एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र स्थापित करने की बजाय देश को कट्टरपंथी जिहादी दौर में ले जाने की पूरी कोशिश की. यूनुस ने बंगलादेश में हिंदू नागरिकों की हत्या पर चुप्पी साधे रखी और भारत विरोधी घृणा का चित्रण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यूनुस के लिए पाकिस्तान आइकौन बन गया जबकि पाकिस्तान से बंगलादेश को न कभी कोई फायदा हुआ और न होने वाला है.

शेख हसीना के तख्तापलट के बाद मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में जिस तरह पाकिस्तान और चीन का दबाव और दखल बढ़ा और जिस तरह बंगलादेश को एक इस्लामिक देश घोषित करने की तरफ पाकिस्तान बढ़ रहा था, तारिक रहमान की जीत ने उस मंशा पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है. यह पाकिस्तान की नीतिगत इस्लामिक हार है, जो बंगलादेश का भला कतई नहीं चाहता था, बस उसे एक आतंकी अड्डा बनाने की फिराक में था. तारिक के हाथ सत्ता सौंप कर बंगलादेश की जनता ने पाकिस्तान की हिंसा और घृणा का संहार किया है, इस में दोराय नहीं है.

गौरतलब है कि तारिक रहमान बीते 17 सालों से ब्रिटेन में रह रहे थे. उन पर वहां की बहुलतावादी संस्कृति का प्रभाव है, यह उन की बोलचाल, पहनावे और संपर्कों से पता चलता है. इसलिए यह माना जा रहा है कि वे कमाल पाशा की नीति पर चल कर बंगलादेश को सभी धर्मों के लोगों के लिए एक सुरक्षित जगह बनाएंगे.

कमाल पाशा की नीतियां और तारिक

बताते चलें कि तुर्की के पूर्व राष्ट्रपति, मार्शल, क्रांतिकारी राजनेता, लेखक और तुर्की गणराज्य के संस्थापक कमाल पाशा उर्फ कमाल अतातुर्क ने तुर्की में न सिर्फ प्रगतिशील सुधारों की पहल की थी, बल्कि तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष और औद्योगिक राष्ट्र के रूप में बदल दिया था. वैचारिक रूप से एक धर्मनिरपेक्षतावादी और राष्ट्रवादी कमाल पाशा की नीतियों और सिद्धांतों को कमालवाद के रूप में जाना जाता है. तारिक रहमान यदि उन के सिद्धांतों और नीतियों पर आगे बढ़ते हैं तो बंगलादेश को एक संप्रभु राष्ट्र बनाने में जरूर सफल होंगे, हालांकि कठमुल्लेपन के खतरे से वे अनजान नहीं हैं और चीन और पकिस्तान के दबाव से बाहर निकलने के लिए उन्हें खासी मेहनत करनी पड़ेगी.

पाकिस्तान तारिक रहमान पर आंतरिक दबाव बनाएगा. इस्लामिक दुनिया में भी तारिक पर दबाव रहेगा. आर्थिक मदद के बदले बंगलादेश को इस्लामिक देश घोषित करने की शर्त रखी जाएगी. ऐसे समय में भारत का यह दायित्व बनता है कि जिस तरह पहले एक दोस्त की तरह वह कठिन वक्त में बंगलादेश के साथ मजबूती से खड़ा रहा, इस वक्त भी उस का भरपूर साथ दे.

पश्चिमी सहयोग की आवश्यकता

पश्चिमी देशों और भारत का सहयोग तारिक को चीन, पाकिस्तान और इस्लामिक देशों के दबाव और खतरे को कम करने में मददगार साबित होगा. वैसे भी तारिक के बंगलादेश वापस लौटने और चुनाव लड़ने के पीछे अमेरिका और ब्रिटेन का बड़ा हाथ है. जानकारों की मानें तो तारिक को ब्रिटेन में शरण देने और बंगलादेश में शेख हसीना का तख्तापलट के लिए धन और अन्य साधन मुहैया कराने में भी ब्रिटेन और अमेरिका ने मदद की है. दुनिया की अन्य शक्तियों ने भी तारिक रहमान की जीत का अनुमान लगाया था. यहां तक कि तारिक रहमान की पार्टी बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के शेयर बाजार का खर्च भी अमेरिका ने वहन किया है.

भारत से संबंध सुधारने की जरूरत

बंगलादेश का इतिहास संघर्ष, त्याग और पहचान की जिजीविषा से निर्मित हुआ है. भारत ने बंगलादेश के निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाई थी. 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की निर्णायक भूमिका केवल सैन्य सहायता तक सीमित नहीं थी, वह सांस्कृतिक और मानवीय सहयोग का भी प्रतीक थी. बंगलादेश और भारत के पश्चिमी हिस्से खासकर पश्चिम बंगाल की बोली, खानपान और पहनावा आपस में मिलताजुलता है. हमारी संस्कृति आपस में मेल खाती है. जबकि पाकिस्तान की बोली, पहनावा और संस्कृति का बंगलादेश से कोई मेल नहीं है. बंगलादेश के विकास में भारत की भूमिका अनिवार्य रूप से अग्रणी है. मुश्किल दौर में भारत बंगलादेश की मदद करने में कभी पीछे नहीं हटा. ऐसे में अब तारिक रहमान को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह पाकिस्तान के दबाव और डर से बाहर निकल कर भारत से अपने रिश्तों को पुनः व्यवस्थित करें और एक धर्मनिरपेक्ष उदारवादी राष्ट्र का निर्माण करें.

पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक ध्रुवीकरण, कट्टरवादी विमर्श और बाहरी प्रभावों ने भारत और बंगलादेश की ऐतिहासिक आत्मीयता को एक गहरी धुंध में धकेल दिया था. इस के लिए भारत की मोदी सरकार भी जिम्मेदार रही, जिस ने सत्ता की हवस में भारतीय समाज में ध्रुवीकरण का कोई मौका नहीं छोड़ा और अल्पसंख्यकों पर जुल्म ढाए. घुसपैठियों के नाम पर बांग्लादेशियों को गरियाया, उन को उठाउठा कर जेल में ठूंसा और उन के प्रति बहुसंख्यकों के दिलों में नफरत का जहर भरा. बिलकुल वैसा ही मोहम्मद यूनुस की आतंरिम सरकार के दौरान बंगलादेश में भी होता रहा. वहां भी आए दिन हिंदुओं को मारे जाने की खबरें आईं. दोनों ही देशों के शीर्ष नेतृत्व को लगा कि ऐसा कर के वे सत्ता में लंबे समय तक बने रहेंगे, मगर बंगलादेश की जनता ने यूनुस सरकार को आइना दिखा दिया है.

ध्रुवीकरण से उधड़े समाज के तानेबाने

डेढ़ साल पहले जब कट्टरपंथी आंदोलन ने शेख हसीना का तख्तापलट किया और यूनुस की अंतरिम सरकार बनी तो ऐसा मालूम हुआ जैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को पसंद करने वाला देश कट्टरपंथ के रास्ते पर चल निकला है. फिर पाकिस्तानी कठमुल्लाओं और नेताओं का लगातार दौरा, चीन से बढ़ती नजदीकी, आएदिन अल्पसंख्यकों की हत्याएं और यूनुस सरकार द्वारा भारत विरोधी भावना को उकसाना और बढ़ाना बंगलादेश को पाकिस्तान के रास्ते चल पड़ने का संदेश दे रहा था. यूनुस की अंतरिम सरकार में जिस प्रकार वैचारिक कठोरता और प्रशासनिक असमंजस दिखा, उसने वहां की अर्थव्यवस्था और सामाजिक तानेबाने दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया.

यूनुस को भले ही नोबेल से सम्मानित किया गया मगर एक भोलेभाले दिखने वाले चेहरे के पीछे बेहद क्रूर शैतानी सोच काम कर रही थी, जो सत्ता में जमे रहने के लिए बंगलादेश की नसों में धर्मांधता का जहर घोलने में जुटी थी. अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान और चीन की गोद में खेलने लगा और अन्य राजनीतिक पार्टियों के दबाव के बावजूद चुनाव को बारबार टालने लगा. मोहम्मद यूनुस को जब लगा कि अब ध्रुवीकरण अपनी चरम पर है और चुनाव में कट्टरपंथी ताकतें ही जीतेंगे और उन का वजूद बना रहेगा, तब उन्होंने चुनाव की घोषणा की.

मगर जनता शांति चाहती है. वह भले किसी भी देश की हो. चाहे भारत की हो, पाकिस्तान की हो, अमेरिका या बंगलादेश की. आम जनता को दो वक्त की रोटी शांति और सुकून से चाहिए. लिहाजा यूनुस की शैतानी चालें धरी की धरी रह गईं. तारिक रहमान को चुनाव में एक स्पष्ट जनादेश मिलना यह बताता है कि बंगलादेश का जनता अब स्थिरता, भाईचारे और सौहार्द की कामना कर रही है.

रोजगार और विकास पर नजर

गौरतलब है कि बंगलादेश ने शेख हसीना सरकार में आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय प्रगति की थी. वस्त्र उद्योग, निर्यात वृद्धि और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में उस ने मिसाल कायम की. उन के समय में भारत के साथ सुखसहयोग में खासी वृद्धि हुई. वहां के गारमेंट बाजार में भारतीय कामगारों की बहुतायत थी. भारत सहित अनेक देशों ने बंगलादेश में भारीभरकम निवेश किया था. लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और अनिश्चितता ने निवेशकों का विश्वास तोड़ा, जिस के चलते बंगलादेश आर्थिक परेशानियों में फंस गया. अब तारिक सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह आर्थिक सुधारों को गति दे, रोजगार सृजन पर ध्यान दे, पड़ोसी देशों से रिश्ते मजबूत करे ताकि विदेशी निवेश को ज्यादा से ज्यादा आमंत्रित किया जा सके. अगर तारिक रहमान ऐसा न कर सके तो चीन और पाकिस्तान सहित इस्लामिक देशों का दबाव उन पर हावी हो जाएगा.

तारिक रहमान के सामने कई चुनौतियां हैं. सवाल कई हैं. क्या वे बंगलादेश को आर्थिक रूप से उसी मुकाम पर ले जा पाएंगे जहां शेख हसीना ने पहुंचाया था? बीते 18 महीने में मोहमद यूनुस ने देश की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल कर दी है. आर्थिक स्थिति में प्रगति के लिए तारिक को निश्चित ही अमेरिका की मदद चाहिए होगी, मगर चीन की नजर उन पर बनी हुई है. वह भी तारिक सरकार को साधने की कोशिश करेगा. उधर अमेरिका बंगलादेश में अपना एक सैन्य अड्डा बनाना चाहता है, क्या इस के लिए तारिक राजी होंगे? पाकिस्तान और चीन का डर और दबाव उन के काम को कितना प्रभावित करेगा?

भारत की पहल

बड़ा सवाल यह है कि भारत के साथ उन के रिश्ते कितने सहज हो पाएंगे? बंगलादेश भारत का सब से करीबी पड़ोसी है. बंगलादेश की 94 प्रतिशत सीमा भारत से लगती है. भारत के साथ बेहतर रिश्तों के बगैर आर्थिक रूप से समृद्ध बंगलादेश की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. हालांकि खालिदा जिया ने जब भी कुर्सी संभाली तो भारत के साथ उन के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे, लेकिन तारिक के पास एक बेहतर अवसर है कि वे भारत के साथ दोस्ती की राह पर आगे बढ़ें. शुरुआत भारत ने कर दी है. खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में विदेश मंत्री एस. जयशंकर को भेजा गया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन के हाथों शोक संदेश पत्र भी भेजा था. अब तारिक के शपथ ग्रहण में स्पीकर ओम बिरला ने शिरकत की है. मोदी ने तारिक को जीत की बधाइयां भेजी हैं.

तारिक रहमान के नेतृत्व में बंगलादेश एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ा है. जनादेश ने अवसर प्रदान किया है, परंतु सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी प्रभावी ढंग से संस्थाओं को मजबूत करती है, सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करती है और विदेश नीति में संतुलन साधती है. जनता की मूल आकांक्षाएं सार्वभौमिक हैं – शांति, स्थिरता, सम्मानजनक जीवन और विकास. यदि नई सरकार इन प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहती है, तो बंगलादेश न केवल आंतरिक रूप से सुदृढ़ हो सकता है, बल्कि क्षेत्रीय सहयोग और संतुलन में भी रचनात्मक भूमिका निभा सकता है. Bangladesh Election Results

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