New IT Rules 2026 : प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक्स मीडिया पर तो भाजपा और उस की सरकार की आलोचना करने की हिम्मत कोई करता नहीं और जो थोड़ेबहुत करते भी हैं तो उन की पहुंच या तो कम है या फिर वे कम असरदार हैं. लेकिन कमजोर और असुरक्षित सरकार के लिए यह भी हजम नहीं होता कि ये कम भी आखिर हैं तो क्यों हैं, सभी भक्त क्यों नहीं हो जाते.

क्यों पढ़ें – मोदी सरकार कानून बना कर नएनए तरीकों से सच बोलने और अन्याय पर उठने वाली आवाजों का गला घोंट रही है, यह नागरिक के लिए चिंता का विषय होना चाहिए . डिजिटल कानूनों के बदलावों के जरिए कैसे जनता से बेईमानी के तथ्य छिपाने का काम किया जा रहा है, लेख से जानें.

सोशल मीडिया पर ऐसे कंटैंट्स की भरमार रहती है जो भाजपा और उस की सरकार की तीखी, तार्किक और धारदार आलोचना करते हैं. इन अभक्तों पर किसी का खास जोर नहीं चलता.

हर विरोध को खतरा समझने वाली बैसाखियों के सहारे चल रही सरकार ने डिजिटल सैंसरशिप की तरफ एक कदम और बढ़ा दिया है. केंद्र सरकार ने अब अपने आईटी मंत्रालय के जरिए एआई जनरेटेड और डीपफेक कंटैंट्स पर और शिंकजा कसने की गरज से आईटी कानूनों में बदलाव करने का एलान किया है जो 20 फरवरी से लागू होंगे. कहने को ये बदलाव भले ही गलत सूचनाओं, खबरों और कंटैंट्स को रोकने के लिए हों लेकिन भगवाई सरकार की असल मंशा अपने खिलाफ उठने वाली बचीखुची आवाजों को भी दबा देने की है. अलावा इस के, ये बदलाव बहुत अव्यावहारिक और फ्री स्पीच यानी अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने वाले भी हैं.

क्या हैं नए बदलाव?

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 87 के तहत आईटी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम 2021 में किए गए नए बदलाव या नियम किसी मकड़जाल से कम नहीं हैं. उन का सार यह है कि अब सोशल मीडिया यूजर और प्लेटफौर्म दोनों पर बंदिशें और बढ़ गईं हैं. इन्हें कानून से ही समझने की कोशिश करें तो पूरी तसवीर कुछ यों बनती है-

– नियम2 (1) (डब्लू ए) एसजीआई यानी सिंथेटिकली जनरेटेड इन्फौर्मेशन को परिभाषित करता है. इस के तहत वे औडियो, वीडियो, इमेज या आभासी सामग्री जो कंप्यूटर या एआई से बनाई गई हो या बदली गई हो या कि फिर संपादित की गई हो लेकिन लगती असली हो एसजीआई कहलाएगी. बोलचाल की भाषा में इन्हें ही डीपफेक कहा जाता है. इस से पहले इस तरह के कंटैंट्स या सामग्री की कोई कानूनी परिभाषा नहीं थी. अब चूंकि यह सूचना के तहत आ गई है इसलिए कानून का हिस्सा बन गई है.

– नियम 3 (1) (डी) के तहत सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स को शिकायत मिलने पर किसी भी अवैध कंटैंट या सामग्री को हटाने के लिए पहले 36 घंटे दिए जाते थे, अब वह समयसीमा महज 3 घंटे होगी. कुछ खास मामलों, जैसे गैरसहमति वाले फोटो, इमेज, डीपफेक में तो यह समय सीमा 2 घंटे ही होगी. यानी, कोर्ट या सरकार के आदेश जारी करने के 3 घंटे बाद कंटैंट को हटाना अनिवार्य होगा.

– नियम 3 (1) (सी) के तहत अब प्लेटफौर्म को यूजर को 3 महीने में एक बार ऐसी सूचना देना अनिवार्य है जिस में यह बताया जाए कि नियमों का उल्लंघन करने पर क्या कार्रवाई हो सकती है और किस तरह की सामग्री अवैध और घातक होती है.

– नियम 4 (1ए) यूजर की घोषणा (डिक्लरेशन) के लिए है कि जब कोई सामग्री अपलोड हो जाए और वह सिंथेटिक या एआई जनित हो सकती है तो प्लेटफौर्म को यूजर से यह घोषणा लेनी होगी कि यह कंटैंट वास्तविक है या एआई से बनाया गया है. अब तक ऐसा नहीं था कि खुद यूजर बताए कि सामग्री एआई से बनाई गई या बदली गई है. यह एक तरह से हलफनामा है.

– नियम 2 के तहत एआई या एसजीआई सामग्री पर स्पष्ट और न हटाया जा सकने वाला लेबल और मेटाडाटा यूनिक पहचान लगाना अनिवार्य है जिस से कंटैंट के स्रोत और सत्यता की पहचान आसानी से हो सके. मेटाडाटा वह डाटा होता है जो किसी कंटैंट के बारे में अतिरिक्त विवरण देता है. मसलन, डेटा एक किताब है तो उस का लेखक, प्रकाशक, पृष्ठ संख्या और प्रकाशन वर्ष मेटाडाटा होंगे.

– धारा 79 सेफ हार्बर प्रोटैक्शन से संबंधित है जो सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स को उन के प्लेटफौर्म्स पर मौजूद यूजर द्वारा पोस्ट किए गए कंटैंट्स की जिम्मेदारी से बचाता है. यानी, सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स नियमों का सही पालन करते हैं तो उन्हें अनजाने में कोई कानूनी दायित्व नहीं मिलेगा. यानी, उन पर कार्रवाई नहीं होगी.

– इन सब के अलावा नए नियम सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे एआई या एसजेआई का इस्तेमाल करने से पहले भी टैक्निकल टूल्स, जैसे औटोमेटेड मौनिटरिंग लगाएं ताकि गैरकानूनी कंटैंट्स को कंट्रोल किया जा सके.

तो फिर कानूनी क्या रह गया?

नए नियमों के हिसाबकिताब से देखें तो अब सोशल मीडिया पर लोड किया जाने वाला हर तीसरा कंटैंट या पोस्ट गैरकानूनी होगी. सिर्फ जय रामजी की, जय हनुमान और भोले शंकर वाली पोस्टें ही कानूनी रह जाएंगी या फिर वे जिन में भाजपा और सरकार सहित नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी जैसे देवताओं की आलोचना नहीं होगी. हालांकि थोड़ी राहत राहुल गांधी, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं को भी मिलेगी लेकिन इस से उन्हें कोई फायदा होने वाला नहीं क्योंकि उन की इमेज बिगाड़ने के लिए भक्तों ने कुछ छोड़ा ही नहीं है और यह ‘नेक’ काम करने के लिए न्यूज़ चैनल्स और अखबार हर वक्त उपलब्ध रहते हैं जो सरकार की मुट्ठी में हैं.

असल गाज नेहा सिंह राठौर, कुणाल कामरा और ध्रुव राठी जैसे यूजर्स पर गिरेगी जो सरकार की आलोचना और खिंचाई का कोई मौका नहीं छोड़ते. अभी भी अदालतों में इन के खिलाफ कई मामले चल रहे हैं लेकिन कोई सख्त कानून वजूद में नहीं था जो उन्हें चंद घंटों में कठघरे में खड़ा कर सके इसलिए कई देवताओं की हकीकत और मंशा सामने आ कर तेजी से वायरल हो जाती थी. अब 3 घंटे के प्रावधान से बदनामी कम होगी और सरकार जब चाहेगी, जैसे चाहेगी इन के कंटैंट्स और पोस्ट सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स से हटवा देगी. वजह, उस ने भी अदालत की तरह कार्रवाई करने का हक ले लिया है.

कोई कंटैंट आपत्तिजनक है या नहीं, यह तय होतेहोते गंगा जी का गैलनों पानी बह चुका होगा और तब तक कंटैंट अपनी सार्थकता खो चुका होगा. कैसे फ्री स्पीच का गला घोंटने के लिए सरकार ने अपने पंजे बोलने वालों की गरदन पर रख दिए हैं, यह इस से साफ है कि कंटैंट हटाने का फैसला सरकार ने अपने हाथ में रखा है. यानी, हर वह बात गलत होगी जो सरकार को नागवार गुजरेगी.

इस तरह अब सबकुछ गैरकानूनी सा बना दिया गया है. यह, दरअसल, नियंत्रण की आड़ में सैंसरशिप है. सरकार की असल मंशा औनलाइन डिस्कोर्स यानी औनलाइन चर्चा या संवाद, जिस में सैकड़ोंहजारों लोग अपनी राय रखते हैं, को रोकने की है न कि मिसइन्फौर्मेशन को रोकने की. जाहिर है, डीपफेक की आड़ ले कर राजनीतिक आलोचना और सटायर को दबाया जाएगा जो सरासर संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन होगा.

3 घंटे में क्या ही होगा?

अव्वल तो आम लोगों को इन नए नियमों से कोई लेनादेना नहीं क्योंकि वे यूजर के नाम पर सिर्फ दर्शक होते हैं. वे कुछ कहते नहीं बल्कि दूसरों की सुन कर अपनी राय कायम करते हैं. अब उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स पर भी न्यूज चैनल्स और अखबारों की तरह एकतरफा भगवा सामग्री मिलेगी. वह सामग्री जो सरकार की नीतियों, फैसलों और मंशा के बारे में नए सिरे से सोचने का मौका देती है, उसे महज 3 घंटे में गायब कर दिया जाएगा.

सरकार इन बदलावों को ले कर कितनी हड़बड़ी में थी, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इतने कम वक्त में कंटैंट की जांच भी हो जाएगी, उस की सच्चाई भी परख ली जाएगी और फिर उसे हटा भी लिया जाएगा. यह किसी पौराणिक करिशमे से कम बात नहीं तो और क्या है. इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स पर लाखों पोस्ट रोज लोड होती हैं; उन में से जायजनाजायज को छांटना और हटाना आसान नहीं होगा.

इतने कम समय में कानूनी और गैरकानूनी में फर्क कर पाना भी बच्चों का खेल नहीं. लेकिन सरकार की मंशा साफ है कि उस के खिलाफ जो भी सामग्री हो वह चाहे फिर असल में उस के खिलाफ न हो, उसे जल्द से जल्द हटा दिया जाए तो कोई क्या कर लेगा. यह बुलडोजर चलाने जैसी बात नहीं तो और क्या है जिस में सुनवाई या अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया जाता, इमारतें सीधे जमींदोज कर दी जाती हैं.

मेटाडाटा और डिक्लरेशन यानी इच्छामृत्यु

मेटाडाटा दरअसल डिजिटल सैंसरशिप की पहली सीढ़ी होता है जिस के तहत सरकार को यह पता लगाने में देर नहीं लगनी कि कौन किस के संपर्क में है और कितनी बार और कबकब रहा. फिर भले ही मैसेज एन्क्रिप्टेड हो. इतना ही नहीं, सरकार यह देख सकती है कि आप की डिवाइस किस लोकेशन से लौगइन हुई यानी यह प्राइवेसी पर भी हमला है. यह और बात है कि यह बात अभी किसी की समझ नहीं आ रही है.
किन पोस्टों पर एकाएक ही व्यूज बढ़े, यह भी सरकार से छिपा नहीं रहेगा. इस नैटवर्क मैपिंग से किसी भी मुद्दे पर सक्रिय लोगों के सोचने का तरीका या पैटर्न सरकार समझ लेगी और जो उसे अपने खिलाफ लगेगा उसे लपेटे में ले लेगी. उन मीडियाकर्मियों के लिए तो यह बहुत बड़ा खतरा है जिन के लिए डाटा सुरक्षा बेहद अहम और जरूरी होता है. क्योंकि सरकार और उस की जांच एजेंसियां बिना कंटैंट पढ़े ही कौल डिटेल रिकौर्ड से या लौग्स से संपर्क श्रृंखला समझ सकती हैं.

यही चालाकी डिक्लरेशन के मामले में थोपी गई है जिस में यूजर को अपनी जन्मकुंडली देना पड़ेगी. इसे अगर मेटाडाटा से लिंक कर देखा जाए तो कौन किस के संपर्क में है, किस पोस्ट पर ऐक्टिव है और किस नैटवर्क से जुड़ा है, यह जानने में सरकार को ज्यादा माथाफोड़ी नहीं करनी पड़ेगी. भोपाल के एक कंप्यूटर प्रोफैसर की मानें तो यह सौफ्ट सैंसरशिप है.

`अब होगा यह भी कि मेटाडाटा, सैल्फ डिक्लरेशन और एल्गोरिदमिक विश्लेषण या मिश्रण तीनों मिल कर एक ऐसा चक्रव्यूह रच देंगे जिस में किसी भी अभिमन्यु की हत्या आसानी से की जा सकती है. इस में, बकौल प्रोफैसर साहब, `पोस्ट हटाने की भी खास जरूरत नहीं पड़ेगी, उस की रीच कम कर देना भी एक विकल्प सरकार या एजेंसी के पास होगा. यह गाज छोटेमोटे पत्रकारों पर ज्यादा गिरेगी. उन्हें कानूनी नोटिसों और धौंस के जरिए ही हतोत्साहित करना मुमकिन होगा…

डिजिटल सैंसरशिप का शिलान्यास

डीपफेक बिलाशक एक बड़ी समस्या है लेकिन वह इन या उन कानूनों से हल नहीं होने वाली. यह सड़क हादसों सरीखी होती है जिसे कोई कानून नियंत्रित नहीं कर सकता. बात अगर ट्रैफिक सैंस की हो तो हादसे कम जरूर हो सकते हैं, यही हाल डिजिटल ट्रैफिक का है. इन बदलावों की आड़ में सरकार ने डिजिटल सैंसरशिप का शिलान्यास करते खुद के लिए राजपथ बना लिया है, जिस पर आम आदमी पांव भी रखेगा तो अपराधी मान लिया जाएगा.

इस डिजिटल सैंसरशिप का बड़ा फायदा सरकार चुनावों के वक्त उठाएगी जब विरोधियों के प्रचार को बिना किसी सुनवाई का मौका दिए गैरकानूनी घोषित कर देगी. अदालत तक बात पहुंचतेपहुंचते चिड़िया खेत चुग चुकी होगी. लोकतंत्र की इस से बड़ी दुर्दशा कोई और हो भी नहीं सकती कि विपक्ष से प्रचार और अपनी बात कहने का मौका और हक ही छीन लिया जाए.

20 फरवरी से हर पोस्ट, हर कंटैंट डिजिटल पहरे में होगा. बिना डरे अपनी बात कहने वाले नए नियमों की धमक से ही डरे हुए हैं. सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स भी दिक्कत में हैं क्योंकि उन का खर्च भी बढ़ेगा और बेवजह का काम भी उन के सिर लाद दिया गया है. तिस पर डर यह कि न जाने कब सरकार उन पर प्रतिबंध लगा दे. ये प्लेटफौर्म्स सिर्फ इसलिए लोकप्रिय और लोगों की पसंद नहीं हैं कि ये सहजता से उपलब्ध हैं बल्कि इसलिए भी लोकप्रिय और पसंदीदा बने हुए हैं कि इन पर आप सरकार की गलतियों और ज्यादतियों पर अपनी भड़ास निकाल सकते हैं. सरकार को यही तो अखर रहा था. New IT Rules 2026

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