Throat Cancer : भारत में गले का कैंसर पैर पसार रहा है. लोग हलकी सी खराश या दर्द समझ कर इसे नजरअंदाज करते जाते हैं, जो बाद में कैंसर की शक्ल ले लेता है. पर समय रहते यदि इस पर ध्यान दिया जाए तो इस का इलाज भी संभव है.
गले का कैंसर सिर और गले के कैंसर (एचएनसी) समूह में आता है. यह भारत में स्वास्थ्य की एक बड़ी समस्या है, जो तेजी से बढ़ती जा रही है. नैशनल लाइब्रेरी औफ मैडिसिन के अनुसार सिर और गले के कैंसर पुरुषों की प्रति 1 लाख आबादी में 25.9 लोगों में तथा महिलाओं की प्रति 1 लाख आबादी में 8 लोगों में पाए गए, यानी पुरुषों के कैंसर के लगभग 26 प्रतिशत मामलों तथा महिलाओं के कैंसर के लगभग 8 प्रतिशत मामलों में ये कैंसर पाए गए. भारत में लगभग 33 पुरुषों में से 1 पुरुष को तथा 107 महिलाओं में से लगभग 1 महिला को यह कैंसर होने का जोखिम पाया गया.
भारत में सिर और गले के कैंसर के हर साल लगभग 2 लाख मामले सामने आते हैं. यह कैंसर सब से आम रूप से पाए जाने वाले कैंसरों में से एक है, जिस की वजह से कैंसर के कुल मामलों में लगभग 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाती है.
पश्चिमी देशों के मुकाबले यह आंकड़ा काफी बड़ा है. बीते सालों के साथ इन मामलों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है, इसलिए लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाया जाना बहुत जरूरी हो गया है, ताकि इस कैंसर की समय पर पहचान कर के लोगों की जान बचाने में मदद मिले.
गले के कैंसर के बारे में जानिए
गले का कैंसर आमतौर से एपिथीलियल लाइनिंग में शुरू होता है. इस स्थिति को स्क्वैमस सैल कार्सिनोमा कहा जाता है. यह ओरोफैरिंक्स (टौंसिल्स), हाइपोफैरिंक्स (गले का निचला हिस्सा) और लैरिंक्स में फैलता है. शुरुआत में इस के कोई लक्षण प्रकट नहीं होते हैं, जिस के कारण निदान में अकसर देर हो जाती है. हालांकि इस के लक्षण गले की आम समस्याओं की तरह ही होते हैं, पर यह जानना बहुत जरूरी है कि गले में दर्द होने पर डाक्टर को कब दिखाना जरूरी हो जाता है. तुरंत निदान होने पर इलाज के नतीजे बेहतर मिलते हैं और मरीजों की जान बच जाती है.
गले की समस्याओं पर नजर रखें
अगर सामान्य इलाज करने के बाद भी खराब गला 2 से 3 हफ्ते तक ठीक न हो तो इस की तुरंत जांच करानी चाहिए. गले में दर्द आमतौर से संक्रमण या सूजन के कारण हो सकता है लेकिन अगर समय के साथ लक्षणों में सुधार न हो रहा हो तो यह किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है. गले का कैंसर शुरुआती चरण में धीरेधीरे बढ़ता है.
शुरुआत में न तो गले में ज्यादा दर्द होता है और न ही कोई अन्य स्पष्ट लक्षण दिखाई देता है. इस के लक्षण मामूली होते हैं और बहुत धीरेधीरे बढ़ते हैं, जिस के कारण ये आसानी से नजरंदाज हो जाते हैं.
गले के कैंसर का अगर समय पर निदान हो जाए तो इलाज कम आक्रमणशील होता है. पर यह कैंसर चुपचाप बढ़ते हुए गंभीर स्थिति में पहुंच जाता है. अगर यह आसपास के टिश्यू या लिम्फ नोड्स तक फैल जाए तो इलाज और अधिक मुश्किल हो जाता है.
शुरुआती चरण में गले के कैंसर का इलाज बिना किसी अधिक चीरफाड़ के सामान्य विधि द्वारा किया जा सकता है. पर अगर कैंसर एडवांस्ड स्टेज में पहुंच चुका है तो बड़ी चीरफाड़ करने की जरूरत पड़ती है.
लक्षण, जो दिखने पर सावधान हो जाएं
अगर इन के कोई भी लक्षण 2 से 3 हफ्ते से अधिक समय तक बने रहें तो तुरंत डाक्टर के पास जाएं :
लगातार खांसी या गले में दर्द.
आवाज में बदलाव या भारीपन.
निगलने में कठिनाई या दर्द.
गले में कुछ फंसा हुआ महसूस होना.
गरदन में सूजन या गांठ जिस में दर्द न हो रहा हो.
बिना वजह वजन घटना.
कान में संक्रमण हुए बिना एक तरफ के कान में दर्द.
थूकने पर या लार में खून आना.
सांस लेने में तकलीफ या सांस लेते समय आवाज आना.
संभावित जोखिम और कारण
गले का कैंसर कई कारणों से बढ़ रहा है.
तंबाकू सेवन : सिगरेट, बीड़ी जैसे धूम्रपान या किसी भी तरह की स्मोकलैस तंबाकू के सेवन से गले के कैंसर का जोखिम बढ़ता है. तंबाकू धीरेधीरे गले की अंदरूनी परत को खराब कर देता है और सैल्स में जैनेटिक म्यूटेशन पैदा करता है.
मदिरा सेवन : शराब का सेवन तंबाकू के साथ किया जाए तो यह उस के हानिकारक प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है.
ह्यूमन पैपिलोमा वायरस एचपीवी के कारण होने वाले कैंसर: खासकर ओरोफैरिंक्स कैंसर लगातार बढ़ रहे हैं. यह कैंसर आमतौर से युवा आबादी को होता है. इस कैंसर का अगर तुरंत निदान हो जाए तो इलाज बहुत कारगर होता है.
लंबे समय तक जलन : खराब ओरल हाइजीन, खराब फिटिंग के डैंचर, क्रोनिक रिफ्लक्स, और हानिकारक कैमिकल्स के संपर्क में लंबे समय तक रहने पर म्यूकोसल डैमेज की समस्या हो सकती है.
आहार और ओरल हैल्थ : खराब डाइट, फल और सब्जियों के कम सेवन और खराब ओरल हाइजीन से गले के कैंसर का जोखिम बढ़ता है.
क्यों जरूरी है समय पर निदान
गले के कैंसर का निदान शुरुआती स्टेज में हो जाए तो उस का इलाज ज्यादा कारगर होता है. इलाज में चीरफाड़ कम होती है, जिस से बोलने, निगलने और जीवन पर असर भी कम होता है. शुरुआती स्टेज के कैंसर का इलाज अकसर कम सर्जरी या फोकस्ड रेडिएशन से हो जाता है, जिस से मरीज अपनी दिनचर्या जल्दी शुरू कर पाते हैं और लंबे समय तक कम दिक्कत के स्वस्थ जीवन से जीते हैं लेकिन अगर कैंसर का निदान तब हो, जब वह एडवांस्ड स्टेज में पहुंच चुका हो तो उस के इलाज के लिए कीमोथैरेपी और रेडिएशन के साथ बड़ी सर्जरी करनी पड़ती है. रिहैबिलिटेशन में लंबा समय लगता है.

इलाज जितना एडवांस्ड स्टेज में होगा, स्थायी विकलांगता, जीवन में दिक्कतों और मृत्यु होने का खतरा भी उतना ही अधिक होगा.
गले के कैंसर के इलाज में हुई प्रगति
गले के कैंसर का इलाज बीमारी के स्टेज, ट्यूमर की जगह, मरीज की सेहत और बोलने एवं निगलने में होने वाली दिक्कतों पर निर्भर होता है. आज, मैडिकल टैक्नोलौजी में हुई प्रगति ने गले के कैंसर का ज्यादा सटीक इलाज संभव बना दिया है, जिस से मरीज को एक बेहतर जीवन प्राप्त होता है.

ट्रांसओरल रोबोटिक सर्जरी (टीओआरएस) : टीओआरएस में सर्जन रोबोटिक भुजाओं और हाईडेफिनिशन 3डी विजन की मदद से गले का ट्यूमर काट कर मुंह से बाहर निकालते हैं.
यह प्रक्रिया अत्यधिक सटीक होती है, स्वस्थ टिश्यूज को कम से कम क्षति पहुंचती है, बोलने और निगलने की बेहतर क्षमता प्राप्त होती है, बाहरी चीरे कम लगते हैं और मरीज को अस्पताल में कम रुकना पड़ता है. इस प्रक्रिया में बहुत तेज रिकवरी होती है.
ट्रांसओरल लेजर माइक्रो सर्जरी (टीएलएम) : यह एक न्यूनतम इन्वेसिव तकनीक है. इस में एक माइक्रोस्कोप की मदद से हाईपावर्ड लेजर बीम कैंसर ट्यूमर पर डाली जाती है. यह काफी सटीक होती है और आसपास के टिश्यू को नुकसान पहुंचाए बिना ही कैंसर के ट्यूमर को काट कर बाहर निकाल देती है.
यह लैरिंक्स और फैरिंक्स के शुरुआती कैंसर के लिए बहुत प्रभावशाली सर्जरी है, जो बेहतरीन नतीजे प्रदान करती है.
इमेज गाइडेड और नैविगेशन असिस्टेड सर्जरी : आधुनिक सर्जिकल नैविगेशन सिस्टम रियलटाइम इमेजिंग की मदद से सर्जन को ट्यूमर और महत्त्वपूर्ण संरचनाओं का सही पता लगाने में मदद करते हैं, जिस से सर्जरी ज्यादा सटीक होती है और जटिलताओं का जोखिम कम होता है.
टारगेटेड थेरैपी : टारगेटेड थैरेपी में कैंसर को बढ़ाने और फैलाने वाले मौलिक्यूल्स को ब्लौक कर दिया जाता है. इस से कुछ मरीजों को अधिक फोकस्ड इलाज मिलता है, जिस के साइड इफैक्ट पारंपरिक कीमोथैरेपी के मुकाबले कम होते हैं.
रेडिएशन थेरैपी : रेडिएशन थैरेपी में कैंसर सैल्स को खत्म करने के लिए हाई एनर्जी बीम का इस्तेमाल किया जाता है. इस में आईएमआरटी (इंटैंसिटी- मौड्यूलेटेड रेडिएशन थेरैपी) और आईजीआरटी (इमेज गाइडेड रेडिएशन थैरेपी) जैसी आधुनिक तकनीकों से ट्यूमर को सटीक निशाना बनाया जाता है, ताकि आसपास के स्वस्थ टिश्यू को नुकसान न पहुंचे और इस के साइड इफैक्ट्स कम हों.
रोबोटिक सर्जरी के साथ शुरू हुआ सटीकता का एक नया युग रोबोटिक सर्जरी ने सिर और गले के कैंसर के इलाज को बहुत कारगर बना दिया है. ये कैंसर शरीर के अंदर बहुत जटिल और संकरी जगहों पर पनपते हैं, जो बोलने, निगलने और सांस लेने के लिए जरूरी अंगों से घिरी होती हैं.
रोबोट असिस्टेड तकनीकों ने सर्जन को बाहरी चीरा लगाए बिना मुंह से होते हुए गले के अंदर स्थित ट्यूमर तक पहुंचने में समर्थ बना दिया है. रोबोटिक भुजाएं अधिक फ्लैक्सिबिलिटी और हाई डेफिनिशन 3डी विज्युअलाइजेशन के साथ महत्त्वपूर्ण नसों और मांसपेशियों को बचाते हुए ट्यूमर को काट कर बाहर निकाल देती हैं.
भारत में रोबोटिक सर्जरी का उपयोग बढ़ रहा है, जिस से सर्जरी में मरीजों को खून का नुकसान कम हुआ है, जटिलताओं में कमी आई है, रिकवरी में तेजी आई है, तथा सर्जरी के बाद मरीजों की बोलने और निगलने की क्षमता बचाने में मदद मिली है. इस प्रक्रिया ने गले के कैंसर के मरीजों को एक बेहतर जीवन प्रदान किया है.
गला खराब होने का मतलब यह नहीं कि यह कोई गंभीर समस्या है, पर अगर यह समय के साथ ठीक न हो तो सावधान हो जाना चाहिए. आवाज हमेशा बैठे रहने, निगलने में परेशानी होने, बिना वजह वजन घटने और गले की ग्रंथियों में सूजन होने पर तुरंत डाक्टर को दिखाएं और ऐसी गंभीर बीमारी से बचें.
अगर इलाज शुरुआती स्टेज में शुरू हो जाए तो दिक्कतें कम आती हैं और मरीज जल्दी ठीक होते हैं. उन की बोलने और निगलने की क्षमता भी बनी रहती है. शुरुआती लक्षणों को पहचान कर मामूली बीमारी को गंभीर और जानलेवा होने से रोका जा सकता है.
(लेखक मणिपाल अस्पताल, दिल्ली में वरिष्ठ कैंसर रोग विशेषज्ञ हैं.)
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