Social Story in Hindi : मिस्टर थौमस ने अपने पिताजी से जो सीख ली थी, उस के बाद संकल्प ले लिया था ज्ञान का दीपक जलाने का. उन के ज्ञान की रोशनी ने कितने ही घरों में उजाला कर दिया था.

मिस्टर थौमस की नींद रोज सुबह 5 बजे खुल जाती थी. बिस्तर में करवटें बदलतेबदलते साढ़े 5 बज जाते थे. साइड की टेबल पर रखे मोबाइल पर मैसेज की आवाजें उन को आकर्षित नहीं कर पाती थीं. वे सोचते थे न जाने लोग सुबहसुबह मोबाइल ले कर कैसे बैठते हैं घंटोंघंटों.

वे साढ़े 5 बजे बिस्तर छोड़ देते. हलके गरम पानी में नीबू निचोड़ कर पीते. फिर अपने बंगले के लौन में टहलने लगते. वे जानते थे गार्डन में अभी हैल्दी जूस वाला नहीं आया होगा, सुबह लगभग 7 बजे वह अपनी शौप खोलता है. ढेरों पौष्टिक जूस होते हैं- एलोवेरा, आंवला, नीम, लौकी वगैरहवगैरह, वे साढ़े 6 बजे गार्डन की तरफ निकल गए.

गार्डन में रोज की तरह चहलपहल थी. जूस पीने वालों की कतार थी. स्वास्थ्य के प्रति सजग है पब्लिक, सुखद है. चिडि़यों की आवाजें हवाओं में संगीत घोल रही थीं. ठंडीठंडी हवाएं शरीर को भली लग रही थीं. मिस्टर थौमस ने भी अपना पसंदीदा जूस पिया और गार्डन की एक बैंच पर बैठ गए.

महीनेभर पहले गार्डन में एक डौगी ने बच्चे दिए थे. छोटेछोटे पिल्ले घूम रहे थे. वाक करने वालों के पैरों से टकरातेटकराते बच रहे थे. कुछ लोग दूधबिस्कुट दे जाते थे. डौगी खुश थी अपने बच्चों के साथ. किसी बैंच के नीचे बैठ जाती तो बच्चे उस के ऊपर चढ़ जाते, उस को यहांवहां काटने लगते. डौगी शांति से बैठी बच्चों के प्यार को महसूस कर रही थी. मि. थौमस ने बैंच से उठ कर गार्डन में वाक करना शुरू किया.

वाक करतेकरते वे सोच रहे थे, कुतिया के बच्चे जब बड़े होंगे तो गार्डन के बाहर निकल जाएंगे. कुछ बच्चे तेज गाडि़यों, बाइक, कार के नीचे आ कर मर जाएंगे. कुछ जिंदा बचे रहेंगे. तभी उन की नजर गार्डन में बने कमरे में गई. वे जानते थे इस कमरे में वाचमैन रहता है जो गार्डन की चौकीदारी के साथ गार्डन का रखरखाव भी करता है. कमरे से बाहर चौकीदार के बच्चे खेल रहे थे. उस के 2 बच्चे थे, एक 9 वर्षीया लड़की और 12 वर्ष का लड़का.

लड़के के हाथ में मोबाइल था, जिसे ले कर पेड़ के नीचे बैठा था. लड़की खेलतीखेलती उस के पास मोबाइल देखने पहुंच जाती थी. मि. थौमस यह दृश्य लगभग रोज ही देखते थे. 12 वर्ष की नन्ही उम्र में मोबाइल की लत उन को बुरी लगती थी लेकिन वे चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाते थे. मन मसोस कर रह जाते थे. गार्डन में टहलने के बाद उन्होंने स्प्राउट लिया और टहलतेटहलते घर आ गए. कालोनी में कूड़े वाली गाड़ी दौड़ रही थी. चिरपरिचित धुन बजाती हुई. कुछ लोगों ने डस्टबिन घर के बाहर रखा था. गाड़ी से उतर कर सहायक कूड़ा उठा कर गाड़ी में डाल देता. गाड़ी आगे बढ़ जाती. मि. थौमस ने भी अपना डस्टबिन बाहर ही रखा था जिस में वे खुद ही कूड़ा डाल आए थे.

घर का दरवाजा राजेश खोल चुका था. घर की साफसफाई में लगा था. पूरे घर का झाड़ूपोंछा करने के बाद राजेश पौधों में पानी देगा, फिर लंच की तैयारी शुरू कर देगा. वह जानता था मि. थौमस नाश्ते में स्प्राउट लेते हैं. कभीकभी ब्रैडआमलेट, साथ में एक गिलास दूध.

जब तक राजेश साफसफाई करता मि. थौमस सुबह एकदो अखबार पढ़ लेते. जब तक अखबार न पढ़ लेते तब तक उन को चैन नहीं मिलता था. अधूरापन महसूस करते थे.

राजेश मि. थौमस के यहां 10 वर्षों से काम कर रहा था. वह घर के कोनेकोने से परिचित था. मिसेज थौमस की मौत इसी घर में हुई थी.

मि. थौमस को अपने घर से, अपनी पत्नी की यादों से लगाव था, इसलिए जब मि. थौमस का एकमात्र बेटा उन को साथ रखने की जिद कर रहा था तो उन्होंने दृढ़ता से मना कर दिया था. वे जीवन में सक्रिय रहना चाहते हैं. खाना, पीना, सोना और यों चले जाना उन को पसंद नहीं. जीवन की कुछ सार्थकता तो हो.

बेटा विलियम पापा के तर्क सुन कर चुप रह जाता लेकिन भोपाल से इंदौर की दूरी अधिक नहीं थी, इसलिए बेटा विलियम पत्नी मार्था, बच्चे मौरिस के साथ आता रहता. मि. थौमस भी भोपाल बेटे से मिलने जाते रहते, कुछ दिन रुकते, फिर वापस आ जाते.

मि. थौमस इंदौर के पास ही एक गांव में सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल थे. उन्होंने वीआरएस ले लिया था. घर में कालोनी के बच्चों को फ्री ट्यूशन पढ़ाते थे. रोज शाम 5 बजे से देररात तक. उन की ट्यूशन और गाइडलाइन से बच्चे खुश थे, दूर कहीं ट्यूशन के लिए नहीं जाना पड़ता था. सुरक्षित भी थे वे सब.

‘‘साबजी, लंच में क्या बनेगा?’’

मि. थौमस लगभग चारों अखबार पढ़ चुके थे. उन्होंने राजेश की आवाज पर नजर उठाई, बोले, ‘‘देखो, जो तुम को ठीक लगे, फ्रिज में देख लो, कोई सब्जी हो तो वही बना लो.’’

‘‘फ्रिज में कोई सब्जी नहीं बची है, लानी होगी, साबजी,’’ राजेश बोला.

‘‘तो ठीक है, ये लो रुपए और सब्जी वगैरह खरीद लाओ,’’ कहते हुए 500 रुपए का नोट राजेश की तरफ बढ़ा दिया.

राजेश पैसे ले कर जाने लगा तो मि. थौमस ने आवाज दी, ‘रुको.’ राजेश रुक गया.

‘‘तुम्हारी बेटी की पढ़ाई कैसी चल रही है?’’ राजेश की बेटी 7वीं क्लास में थी.

‘‘साब, ठीक पढ़ रही है. किताबें और फीस तो आप दे ही देते हैं, मेहनत तो उसे ही करनी है,’’ कह कर राजेश जाने को तैयार हुआ.

‘‘तुम उस के खानेपीने का ध्यान रख रहे हो?’’ मि. थौमस ने सवाल किया.

‘‘जी साब, रोज सोने से पहले एक गिलास दूध भी देता हूं.’’

‘‘गुड,’’ मि. थौमस बोले, ‘‘बच्चा स्वस्थ होगा तो स्वस्थ मस्तिष्क से पढ़ाई करेगा. हमारे देश के बच्चे स्वस्थ रहेंगे तो शिक्षा अच्छे से ग्रहण करेंगे.’’

‘‘जी साब,’’ कहता हुआ राजेश बाहर चला गया.

तब तक मि. थौमस फ्रैश होने और नहाने चले गए थे.

राजेश ने बाजार से आ कर लंच की तैयारी शुरू कर दी थी. दोपहर बाद राजेश उन को शाम की चाय दे कर चला जाता है. मि. थौमस रात में डिनर हलकाफुलका करते थे, दलिया या खिचड़ी वगैरह. इसे वे बनाते थे बच्चों के ट्यूशन से जाने के बाद. मि. थौमस अपने इस रूटीन में बहुत खुश थे, संतुष्ट थे. लंच में पालकपनीर देख कर वे खुश हो गए थे. राजेश उन की पसंद का पूरा ध्यान रखता था. खाने से पहले ढेर सारा सलाद रख जाता था. गरमगरम चपाती उन को भाती थी.

लंच के समय वे सोचने लगे, बेटेबहू रोज केसरोल में रखा ठंडा खाना खाते हैं जबकि जौब करने की बहू को कोई जरूरत नहीं थी लेकिन आज की पीढ़ी यह सोचती है कि पढ़ाईलिखाई का उपयोग होना चाहिए, इसलिए जौब जरूरी है. अब क्या किया जा सकता है. सब बातें मनमुताबिक नहीं होतीं. मि. थौमस ने लंच खत्म किया. स्टडीरूम में आ गए किताबों पर नजर दौड़ाने. अब थोड़ा रैस्ट करेंगे, फिर बच्चे आ जाएंगे.

बिस्तर पर लेटते ही वे सोचने लगे, कल वाक करने जाएंगे, तब गार्डन में चौकीदार के बच्चों की पढ़ाई की जानकारी लेंगे. वे बच्चे स्कूल जाते भी हैं या नहीं. न जाने क्यों उन्हें नन्हे बच्चों को यों मोबाइल में लगे रहना अच्छा नहीं लगता लेकिन घर में भी यही माहौल हो तो बच्चे सीख ही जाते हैं. हर बच्चे के हाथ में मोबाइल है, किताब होनी चाहिए थी. लेकिन मोबाइल है. ये सब सोचतेसोचते उन की आंख लग गई.

आंख तब खुली जब बच्चे ड्राइंगरूम में जम गए थे. उन्होंने देखा दोपहर के सवा 4 बज रहे थे. वे फ्रैश महसूस कर रहे थे दोपहर की झापकी के बाद.

मि. थौमस 12वीं तक के बच्चों की ट्यूशन लेते थे. सभी बच्चे पढ़ाई की कठिनाइयों को हल करते ही थे, साथ ही, अपनी छोटीछोटी समस्याओं को मि. थौमस से शेयर कर उन का हल पूछते थे.

मि. थौमस हिंदी और गणित पढ़ाते थे. प्रसिद्ध लेखकों की पुस्तकें उन के पास रहती थीं. ढेरों रंगबिरंगी कौमिक्स भी उन के संग्रह में थीं.

औनलाइन पुस्तकें पढ़ने के साथ वे बच्चों को पुस्तकें खरीदने पर भी जोर देते थे. जो बच्चे नहीं खरीद सकते उन को खरीद कर भी देते थे. उन को लेखकों से जुड़ी बातें भी बताया करते थे. इस सब से बच्चे उन से खुश रहते थे.

बच्चों के साथ दोपहर कब शाम में ढलने लगी, पता नहीं चला. राजेश सभी बच्चों के लिए ठंडाठंडा शरबत ले आया था, साथ में, मठरी और मि. थौमस के लिए चाय. बच्चों के जाने के बाद राजेश ने जाने की इजाजत मांगी.

‘‘ठीक है राजेश, जाओ, मैं बाहर लौन में बैठता हूं,’’ कह कर मि. थौमस उठ कर लौन में आ गए.

पौधों की हरियाली खामोश थी. हवाएं चल रही थीं. हवाओं में हलकी गरमी थी लेकिन भली लग रही थी, सुकून दे रही थी.

आसमान में तारों की लुकाछिपी शुरू हो गई थी.

मि. थौमस को कुछ याद आने लगा, उन के पिता सरकारी नौकरी में थे. तब की एक बात वे बेटे थौमस को बताया करते थे. थौमस के पिता भी शिक्षा पर जोर देते थे. वे बताया करते थे कि उन को सरकारी मकान मिला हुआ था. सरकारी क्वार्टर में बगीचे के लिए जगह अच्छीखासी थी. उस क्वार्टर में सभी सुविधाएं तो थीं लेकिन शौचालय पुराने ढंग के थे. बाद में बनने वाले मकानों में शौचालय नए ढंग के बनने शुरू हुए, फ्लश सिस्टम वाले.

पुराने ढंग के शौचालय में सफाईवाला मल इकट्ठा कर के ले जाता था छोटी गाड़ी में. फिर डब्बा धो कर वापस अपनी जगह पर रख देता. अंदर से शौचालय में परिवार का कोई सदस्य पानी डालता जिस से वह डब्बा धो कर वापस रख देता. यह रोज का काम था. वहां 25 मकान थे.

थौमस को सुन कर आश्चर्य होता, कैसे एक वर्ग हमारी गंदगी उठाता होगा. रोज की तरह आज भी वह मल इकट्ठा करने के लिए अपनी गाड़ी ले कर आया.  रोज की तरह पानी की बालटी से शौचालय धुलवाने के बाद थौमस के पिता ने उस से कहा, ‘तुम इस काम से फ्री हो जाओ, तब दोपहर में मुझा से मिलने आना.’

दोपहर में लगभग 2 बजे सफाईवाला घर के बाहर इंतजार कर रहा था.

‘आओ, अंदर आओ,’ थौमस के पिता ने कहा लेकिन वह अंदर नहीं आया, बाहर ही खड़ा रहा. तब उन्होंने उस के कंधे पर हाथ रखा, उसे अंदर बैठक में ले आए. उसे अपने सामने सोफे पर बिठाया. उस के मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी, संकोच में था.

‘आराम से बैठो, तुम्हारा नाम क्या है?’ उन्होंने पूछा

‘‘अजय, साबजी.’’

‘तुम पढ़ेलिखे हो, कहां तक पढ़ाई की है?’ थौमस के पिता ने सवाल किया.

‘8वीं क्लास तक पढ़ा हूं. उस के बाद स्कूल छुड़वा दिया था घरवालों ने.’

‘क्यों?’ थौमस के पिता ने सवाल किया.

‘बाबूजी की मौत हो गई थी. 2 छोटी बहनें थीं, उन की जिम्मेदारी भी आ गई थी.’

‘8वीं क्लास की मार्कशीट संभाल कर रखी है तुम ने?’

‘जी साब, वो संभाल कर रखी है,’ अजय बोला.

‘आगे पढ़ना चाहोगे?’

‘मैं क्या करूंगा पढ़ कर, घर कैसे चलेगा, कौन पढ़ाएगा?’

‘छोटी बहनें क्या करती हैं?’

‘पास के सरकारी स्कूल में पढ़ने जाती हैं. मैं बड़ा हूं उन से. मेरी जवाबदारी है उन का ध्यान रखूं,’ अजय हिम्मत कर के बोल गया.

‘ठीक है, ध्यान रखो लेकिन तुम पढ़ना चाहो तो मैं तुम्हें इसी फ्री टाइम में पढ़ा सकता हूं. दोपहर में रोज पढ़ाई करो.’

‘इस उम्र में?’ अजय बोला.

‘क्यों, क्या हुआ उम्र को, कितनी उम्र है तुम्हारी? छोटे हो तुम, इतने भी बड़े नहीं हो.’

‘19 साल का,’ अजय बोला, ‘6 साल पहले 8वीं की थी.’

‘तुम अपना काम भी जारी रखो, 11वीं की तैयारी करो. तुम प्राइवेट परीक्षा दोगे, फौर्म मै भरवा दूंगा, पढ़ाई भी करवा दूंगा.’

‘मैं फेल हो गया तो?’ अजय डर रहा था.

‘तो क्या, फेल हो गए तो दूसरी बार देना परीक्षा.’

‘ऐसा हो जाएगा,’ अजय की आंखों में खुशी की चमक थी.

‘बिलकुल होगा,’ थौमस के पिता हैरिस ने कहा था.

उसी साल उन्होंने 11वीं का फौर्म प्राइवेट भरवा दिया. रोज दोपहर को, कभी शाम को अपनी नौकरी के बाद अजय को पढ़ाने लगे थे वे.

अजय ने मेहनत की और दूसरे प्रयास में 11वीं की परीक्षा उर्त्तीण कर ली थी.

परिणाम निकलते ही अजय की मां अपनी 2 बच्चियों के साथ आ कर हैरिस के पैरों पर गिर गई थी. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे.

‘तुम्हारा बेटा 11वीं पास हो गया है. चिंता मत करो. भविष्य उज्ज्वल है.’

इस के बाद उन्होंने अजय को सरकारी योजना के तहत रोजगार के लिए ऋण दिलवाया आटाचक्की के लिए. अजय जिस गांव का रहने वाला था, वहां उस ने आटाचक्की डाली. इस काम में उन्होंने उस की पूरी मदद की. वे संतुष्ट थे. शिक्षा ने एक व्यक्ति का भविष्य संवारा. वह मिलने को आता रहता था.

मि. थौमस को यह बात याद आई तो उन्होंने भी मन में संकल्प लिया. घर पर तो शिक्षा देते ही हैं, कल सुबह गार्डन जा कर चौकीदार के बच्चों की शिक्षा की जानकारी लेंगे. उन्होंने टाइम देखा, रात के 9 बज रहे थे. वे घर के अंदर आ गए. एक गिलास दूध पी कर वे सो गए.

सुबह जब गार्डन पहुंचे तो रोज की तरह गार्डन में चहलपहल थी. ठंडी हवाएं शरीर को सुकून दे रही थीं. मि. थौमस ने रोज की तरह जूस पिया और गार्डन में बने चौकीदार के कमरे की तरफ बढ़ चले.

रोज की तरह आज भी उस के बच्चे बाहर खेल रहे थे. कमरे का दरवाजा खुला था. फिर भी उन्होंने दस्तक दी. चौकीदार ने दरवाजे से बाहर झांका, ‘‘जी, नमस्ते साब, क्या हुआ?’’ चौकीदार ने थौमस से सवाल किया.

‘‘हुआ कुछ नहीं, तुम बाहर आओ, बात करनी है,’’ मि. थौमस बोले.

‘‘कौन सी बात साबजी, कोई गलती हुई क्या?’’ चौकीदार ने हाथ जोड़ दिए.

‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं है. कोई गलती नहीं है. तुम बाहर आओ या मैं ही भीतर आ जाता हूं,’’ थौमस बोले. आप ठहरे बड़े लोग, गरीब के घर में कहां बैठेंगे, मैं आ जाता हूं.’’

‘‘ऐसा करते हैं मैं ही तुम्हारे कमरे में आ जाता हूं,’’ कहते हुए थौमस कमरे में अंदर चले गए.

छोटा सा कमरा था. एक पलंग, थोड़ा सामान था. कमरे के एक कोने को किचन का रूप दिया गया था. थोड़ेबहुत बरतन थे. गैसचूल्हा नीचे रखा था. छोटा सा टीवी पलंग के पीछे टेबल पर रखा था. 2 कुरसियां थीं पलंग के सामने. मि. थौमस उसी कुरसी पर बैठ गए. कमरे में चौकीदार के अलावा कोई नहीं दिख रहा था. बच्चे बाहर गार्डन में खेल रहे थे.

‘‘जी साब,’’ चौकीदार हाथ जोड़े खड़ा था.

मि. थौमस ने उसे पास वाली कुरसी पर बिठाया.

चौकीदार डरतेडरते कुरसी पर बैठ गया.

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ मि. थौमस ने पूछा.

‘‘सामू नाम है मेरा,’’ वह बोला.

‘‘सामू, एक बात बताओ तुम्हारे बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं या नहीं? घर में और कौनकौन है?’’

‘‘क्या गलती हो गई, साबजी,’’ सामू बोला.

‘‘भाई, कोई गलती नहीं हुई, तुम बताओगे तो आगे बोलूं,’’ मि. थौमस बोले.

‘‘साबजी, मैं और 2 बच्चे, बच्चों की मां. मेरे पिताजी गांव में रहते हैं,’’ सामू बोला.

‘‘बच्चों की मां नहीं दिख रही, वह कहां है?’’ मि. थौमस ने सवाल किया.

‘‘साबजी, वह गांव गई है. गांव में खेत थे, कोरोना के दौरान उन्हें बेचना पड़ा था गांव के सरपंच को. छोटा सा मकान है गांव में. पिताजी गांव में दूसरे किसानों के खेत में काम करते हैं. अनाज, सब्जी, फल मिल जाते हैं. वही लेने गई है.’’

‘‘कितने दिन से वहां है?’’ मि. थौमस ने पूछा.

‘‘साब, 2 दिन हुए हैं, शाम तक आ जाएगी,’’ सामू बोला.

‘‘बच्चे कहां पढ़ते हैं?’’ मि. थौमस ने पूछा.

‘‘साब, पास ही के सरकारी स्कूल में, बेटी चौथी कक्षा में, बेटा 7वीं में.’’

‘‘तुम ने बच्चे को मोबाइल क्यों दिया हुआ है, जब देखो गार्डन में मोबाइल ले कर बैठा रहता है,’’ मि. थौमस बोले.

‘‘साब, मैं ने जैसेतैसे रुपए इकट्ठे कर मोबाइल लिया था किस्तों में. जरूरी है मोबाइल.’’ सामू बोला.

मि. थौमस को हंसी आ गई. उन को हंसता देख सामू ने पूछा, ‘‘क्या हुआ साबजी?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ कहते हुए थौमस बोले, ‘‘बच्चों को बुलाओ.’’

‘‘जी साबजी,’ कहते हुए सामू कमरे से बाहर गया और बच्चों को अंदर ले आया और बच्चों से बोला, ‘‘चलो, साबजी के पैर छुओ.’’

बच्चे झाके ही थे, मि. थौमस ने बच्चों को उठा कर अपने पास बिठाया. उन्होंने बच्चों से कुछ हलकेफुलके सवाल किए. वे उन की पढाई से संतुष्ट नहीं थे. वे जानते थे प्राइमरी तक के बच्चों को अनुतीर्ण नहीं किया जाता है. लड़की का नाम मीरा और लड़के का नाम मयंक था.

‘‘देखो मयंक बेटा, मोबाइल इतना नहीं चलाना चाहिए, पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए.’’

मयंक कुछ नहीं बोला.

‘‘देखो सामू, दोनों बच्चों को मेरे पास पढ़ने के लिए भेजा करो.’’

‘‘साबजी, हम लोग महंगी फीस नहीं दे पाएंगे,’’ सामू बोला.

‘‘सामू, मैं कोई फीस नहीं लूंगा, फ्री में पढ़ेंगे तुम्हारे बच्चे.’’

‘‘साबजी, आप तो धन्य हैं,’’ कह कर सामू खुशी से रो पड़ा.

‘‘शिक्षा पर सब का अधिकार है. सब को पढ़ना चाहिए. शिक्षा जरूरी है. बच्चो, आज से तुम खाली समय में भी मोबाइल नहीं चलाओगे, ये किताब पढ़ोगे तुम,’’ कहते हुए अपने बैग में से कई रंगबिरंगी किताबें निकालीं और बच्चों के हाथ में पकड़ा दीं.

‘‘अरे वाह,’’ मयंक लगभग उछल पड़ा.

दोनों बच्चे रंगबिरंगी किताबों में उलझा गए.

मि. थौमस मुसकरा दिए.

‘‘साबजी, कब से भेजना शुरू करूं बच्चों को पढ़ने?’’ सामू की आवाज में खुशी थी.

‘‘आज से ही भेजना शुरू कर दो.’’

उसी दिन शाम को दोनों बच्चे मि. थौमस के घर पहुंच गए. दूसरे बच्चों को देख कर वे थोड़ा घबराए, फिर जल्दी ही घुलमिल गए.

ऐसे ही बरसोंबरस गुजरते रहे. मि. थौमस कभीकभी बच्चों को जीवन के अनुभव सिखाने के लिए बाहर भी ले जाते. कुल मिला कर मि. थौमस ने पढ़ाई को खूब रुचिकर बना दिया था. बच्चे बेहद खुश रहते थे.

मि. थौमस ने ज्ञान का जो प्रकाश फैलाया था उस से दूरदूर तक सुनहरी किरणें जगमगा रही थीं. मि. थौमस जब भी किसी गरीब बच्चे को देखते, उसे पढ़ने के लिए कहते. साथ ही, यह भी कहते कि बच्चों को स्कूल भेजना शुरू तो करो, बाकी जिम्मेदारी हमारी भी और सरकार की भी. तुम लोग सिर्फ एक दीपक जलाओ, धीरेधीरे हजारों दीपक जल उठेंगे.

आज मयंक कालेज पहुंच चुका था. सामू मिठाई लिए मि. थौमस के पास खड़ा था, ‘‘साब, आप ने हमारा जीवन बदल दिया,’’ कह कर सामू रो पड़ा था.

‘‘नहीं सामू, मेहनत तुम्हारे बच्चों ने की थी, मैं तो प्रतिनिधि हूं. रास्ता दिखाया है मैं ने बस,’’ मि. थौमस बोले.

मि. थौमस ने देखा- दूरदूर तक उजाला है, अंधकार मिटने लगा है. अब कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा. मि. थौमस अपने जीवन की सार्थकता देख सुकून महसूस कर रहे थे. Social Story in Hindi

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