Bikaner Cinema Culture : डाक्टर कुमार गणेश रंगमंच से जुड़े कलाकार हैं. उन्होंने कई नाटकों को न सिर्फ लिखा है बल्कि उन का निर्देशन भी किया है. वे बीकानेर से खास जुड़े रहे हैं जहां सिनेमाई संस्कृति को लगातार कमजोर होते देख रहे हैं.
राजस्थान में बीकानेर ऐसा शहर है जहां हजारों हवेलियां व कोठियां हैं. बीकानेर शहर ने बौलीवुड को कई मशहूर गीतकार, गायक, अभिनेता आदि दिए हैं. बीकानेर शहर में ‘रजिया सुल्तान’, ‘लैला मजनूं’ व ‘क्षत्रिय’ सहित सैकड़ों फिल्मों की शूटिंग की गई है. बीकानेर के सिनेमा के साथ जुड़ाव को ले कर पूर्व प्रोफैसर व रंगकर्मी डाक्टर कुमार गणेश से खास बातचीत की गई, पेश हैं उस के अंश :
आप प्रोफैसर व रंगकर्मी हैं. आप को सिनेमा का शौक कब महसूस हुआ. इस सवाल के जवाब में प्रोफैसर व रंगकर्मी डाक्टर कुमार गणेश बताते हैं, ‘‘सच तो यह है कि मुझे सिनेमा का शौक नहीं, बल्कि सिनेमा का जनून है. यह जनून आज का नहीं बल्कि अबोध उम्र से है. जब मैं अबोध था, तब के और आज के मेरे पैतृक शहर बीकानेर की सिनेमाई तसवीर में जबरदस्त अंतर है. पिछले 4-5 वर्षों के अंतराल में मेरा बीकानेर शहर वहीं पहुंच चुका है जब मैं महज 4-5 वर्ष का था.
‘‘बीकानेर में उस वक्त सब से पुराना थिएटर ‘गंगा थिएटर’ था, जिस का निर्माण रजवाड़ों ने किया था. इस थिएटर का निर्माण उस वक्त के नामचीन सम्राट व शासक गंगा सिंह के नाम पर करवाया गया था. गंगा सिंह ने लंदन के एक मशहूर पार्क की थीम पर बीकानेर शहर में एक पार्क बनवाया था, जिस का नाम रखा था- पब्लिक पार्क और वहीं पर ‘गंगा थिएटर’ बना था.
‘‘गंगा थिएटर अपनेआप में एक विरासत समेटे हुए है. पृथ्वीराज कपूर ने गंगा थिएटर में अपने नाटक के शो किए हैं. उन नाटकों में पृथ्वीराज कपूर ने स्वयं अभिनय किया था. मेरे घर से मेरे परिवार की पुश्तैनी दुकान के डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में सभी थिएटर आ जाते थे. सब से पहले प्रकाश चित्र आता था. प्रकाश चित्र से 150 मीटर की दूरी पर ‘विश्व ज्योति’ थिएटर हुआ करता था. अब तो इस का ढांचा भी नहीं बचा. दो दशक पहले इसे ढहा दिया गया था. अब तो यहां पर शौपिंग मौल है. विश्वज्योति से आगे बढ़ने पर मिनर्वा थिएटर. इन सभी थिएटरों में रिलीज होने वाली फिल्मों के पोस्टर इन के आसपास की चाय की गुमटी या दुकान पर फिल्म के प्रचार के मकसद से ही लगते थे.’’
बचपन से सिनेमाई जनून
आप की परवरिश रूढि़वादी परिवार में हुई तो फिर सिनेमा का जनून कहां से आया? यह पूछने पर वे बताते हैं, ‘‘जी हां, हमारे घर में सिनेमा देखना दंडनीय अपराध हुआ करता था. दूसरी बात उन दिनों तांगों में फिल्म का प्रचार हुआ करता था. मैं बात कर रहा हूं 1975 के आसपास की. तब तांगे की पिछली सीट पर एक आदमी माइक ले कर बैठा रहता था और आगे व पीछे दोनों तरफ लाउडस्पीकर लगे रहते थे. तांगे पर फिल्म के गाने बजते थे. हम तांगे पर पोस्टर देखते, तांगे पर जो गाने बजते, वे सुनते थे.
‘‘इस ने मेरे अंदर सिनेमा के प्रति जनून पैदा किया. इस के अलावा उन दिनों फिल्म्स डिवीजन की गाडि़यां महल्लों में जा कर कुछ खास तरह की फिल्में दिखाया करती थीं. तब परदे के बजाय सफेद रंग में रंगीन दीवारों का सहारा लिया जाता था.

‘‘1994 में मैं एक कोचिंग क्लास में पढ़ाने लगा था. तब अपने सहशिक्षक के साथ 24 जुलाई, 1994 में पहली बार फिल्म सिनेमाघर में जा कर देखी थी. दोस्तों के कहने पर प्रकाश चित्र में ‘बैंडिट क्वीन’ देखने पहुंचा तो पता चला कि फिल्म शुरू हो चुकी है. हम वहां से निकल कर गंगा थिएटर गए, जहां पर फिल्म ‘बौंबे’ देखी. ‘सूरज टौकीज’ में मैं ने ‘हम आप के हैं कौन’ देखी थी. टौकीज में ही मैं ने सुनील दर्शन की फिल्म ‘ये रिश्ता द लव औफ बौंड’ देखी.
‘‘गंगा थिएटर में एक बार जादूगर ओ पी शर्मा आए थे तो उन का शो देखने ‘गंगा थिएटर’ गया था. मुझे गंगा थिएटर का आनंद लेने जाना अच्छा लगता था. सिंगल थिएटर में फिल्म देखने का मजा ही अलग होता है. मल्टीप्लैक्स में तो ऐसा लगता है जैसे हम शौपिंग मौल में आए हैं. मल्टीप्लैक्स में पौपकौर्न संस्कृति में ऐसा लगता है कि हम दुकान में आ गए हैं, खापी रहे हैं और फिल्म तो ऐसे ही देखने को मिल गई. मतलब हम खापी रहे हैं और आंखों के सामने से फिल्म जा रही है. अब चारों सिंगल थिएटर ध्वस्त किए जा चुके हैं. एक तरह से बीकानेर में सिनेमा संस्कृति मर गई.
‘‘मैं पूरी जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि सिनेमाघरों के हिसाब से बीकानेर शहर वीरान हो चुका है. सिर्फ बीकानेर शहर ही नहीं बल्कि पूरे बीकानेर संभाग में ये चारों थिएटर अपना मुकाम रखते थे. मानगढ़, गंगानगर, चुरू में भी इन थिएटरों की तूती बोलती थी. मुझे सिरहाने पर रेडियो या टेप रिकौर्डर रख कर गाने सुनने की आदत तब से रही है जब मैं 8वीं कक्षा में पढ़ता था.
‘‘मेरे बीकानेर शहर के ही गीतकार पंडित भरत व्यास थे. उन का फिल्म ‘रानी रूपमती’ में गाना था, ‘लौट के आ जा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं…’ उस की तर्ज पर मैं ने तीसरी कक्षा में गाना सुनाया था, ‘आ लौट के आजा मेरे राम, तुझे भाई भरत बुलाते हैं…’ मुझे आज भी याद है कि कई वर्षों तक मेरे साथ पढ़ने वाले बच्चे मुझे चिढ़ाते थे.’’
बीकानेर ने दी कई सिनेमाई हस्तियां
बीकानेर शहर ने बौलीवुड को क्या गीतकार, अभिनेता व संगीतकार भी दिए हैं? इस के जवाब में वे कहते हैं, ‘‘आप ने एकदम सही कहा. बीकानेर शहर के सब से बड़े नाम गीतकार पंडित भरत व्यास थे, जिन्हें खोज कर शांताराम अपने साथ ले गए थे. पंडित भरत व्यास ने ‘मालिक तेरे बंदे…’ गीत लिखा था. भरत व्यास ने बौलीवुड में सैकड़ों गीत लिखे, राजस्थानी में भी गीत लिखे, फिल्म भी बनाई. उन के छोटे भाई बी एम व्यास ने ‘दो आंखें बारह हाथ’ सहित कई फिल्मों में अभिनय किया. वे अकसर खलनायक की भूमिकाएं किया करते थे. वे ऐतिहासिक फिल्मों में जोधपुर वाले अभिनेता महिपाल भंडारी और अनीता गुहा के साथ खलनायक के किरदार निभाते थे. दिलीप कुमार की भाभी और नासिर खान की पत्नी बेगम पारा का संबंध बीकानेर से था.

‘‘बीकानेर तो बेगम पारा का मायका था. उन के पिता बीकानेर की अदालत में जज थे. पाकिस्तान की मशहूर गायिका रेशमा की पैदाइश का ताल्लुक बीकानेर से है. ‘मिर्जा गालिब’ व ‘पाकीजा’ जैसी फिल्मों के संगीतकार गुलाम मोहम्मद भी बीकानेर से ही थे.
‘‘राज कपूर की फिल्म ‘बरसात’ के शीर्ष गीत ‘बरसात में मिले हम सजन, हम से मिले…’ इस के संगीतकार शंकर जयकिशन थे लेकिन इस गाने के लिए शंकर जयकिशन को ढोलक व तबलावादक गुलाम मोहम्मद की मदद लेनी पड़ी जोकि बाद में ‘पाकीजा’ के संगीतकार बने.
‘‘हम याद दिला दें कि गुलाम मोहम्मद और रामलाल, संगीतकार शंकर जयकिशन से सीनियर थे. चांद परदेसी का भी संबंध बीकानेर से ही है. चांद परदेसी ने परदेसी नाम से फिल्म ‘बंजारन’ में संगीत दिया था. इस फिल्म का लोकप्रिय गाना है, ‘चंदा रे मेरी पतियां ले जा, संजना को पहुंचाना है…’ यह राजस्थानी लोकगीत पर ही आधारित था. इस के गीतकार पंडित मधुर थे. इस गाने की रिकौर्डिंग के वक्त लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, परदेसी के सहायक थे. फिल्म ‘एक बार चले आओ’ का संगीत दिया था गीतकार समीर ने. कमल राजस्थानी भी बीकानेर से थे, जिन्होंने सब से पहले अनवर को गाने का अवसर दिया था.
‘‘अनवर, अरशद वारसी के सौतेले बड़े भाई थे. मैं ने पंडित रामकृष्ण महेंद्र से 3 साल तक 1992 में शास्त्रीय संगीत सीखा था. कमल राजस्थानी ने जीतेंद्र व ऋषि कपूर की फिल्म ‘गैरतमंद’ में संगीत दिया था और इस के एक गीत ‘मेरे महबूब ढूंढ़ा तुझे गली गली, डगरडगर तेरे बिना उदास…’ को पंडित रामकृष्ण महेंद्र ने अपनी आवाज में रिकौर्ड किया था. पंडित रामकृष्ण महेंद्र ने ही मुझे इस गीत की रिकौर्डिंग के वक्त कमल राजस्थानी से मिलवाया था. इकबाल के लिए मैं ने एक फिल्म की पटकथा व गीत लिखे थे. पर यह फिल्म रिलीज नहीं हुई थी.
‘‘मैं ने राजस्थानी फिल्म के लिए भी गीत लिखे हैं. नीरज राजपुरोहित भी बौलीवुड में अच्छा काम कर रहे हैं. नवल व्यास ने अमिताभ बच्चन के साथ कुछ एड फिल्में भी की हैं. राजा हसन का संबंध भी बीकानेर से ही है. राजा हसन के पिता रफीक सागर ने फिल्म ‘क्षत्रिय’ का गीत ‘सपने में सखी मोरे नंद गोपाल…’ को संगीत दिया था. इसे कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था.’’

मरणासन स्थिति में रंगमंच
बीकानेर में रंगमंच की क्या स्थिति रही है? यह पूछने पर वे बोले, ‘‘मैं ने खुद कई नाटक लिखे. कई नाटकों का निर्देशन किया और अभिनय भी किया. हिंदी में सब से अधिक एकपात्रीय नाटक मेरे हैं. राजस्थानी भाषा में पहला एकपात्रीय नाटक मैं ने 1997 में लिखा. बीकानेर का रंगमंच काफी समृद्ध रहा है. पृथ्वीराज कपूर तो अपनी नाटक कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर’ को ले कर पूरे देश में भ्रमण किया करते थे. बीकानेर में रंगमंच की जड़ें मोहन सिंह मधुप से पहले की मानता हूं. वे सरदार पटेल मैडिकल कालेज में आर्टिस्ट थे.
‘‘अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ में धर्मेंद्र को अभिनय करने का अवसर मिला था. उस वक्त मोहन सिंह, धर्मेंद्र के संघर्ष के दिनों के साथी थे. उन्होंने रंगमंच पर काफी काम किया. लक्ष्मी नारायण माथुर बहुत बड़े रंगकर्मी थे. लेखन परंपरा में निर्माही व्यास बहुत बड़ा नाम हुआ करता था. निर्देशक के तौर पर एस डी चौहाण, जगदीश सिंह चौहाण, प्रदीप भटनागर, इकबाल बड़े नाम हैं. उस के बाद मेरा नाम आता है. आजादी से पहले भी बीकानेर का रंगमंच समृद्ध था. अशोक जोशी, रमेश शर्मा, राम सहाय हर्ष, सुदेश व्यास, हरीश पी शर्मा भी रंगमंच पर बेहतरीन काम करते आए हैं. मनोरंजक नाटक जगत में सूरज सिंह पंवार बहुत बड़ा नाम है.’’
आप ने 1994 में पहली बार सिनेमाघर में फिल्म देखी थी. तब से अब तक आप ने सिनेमा को किस तरह से बनते या बिगड़ते देखा? इस पर वे कहते हैं, ‘‘उस वक्त हिंदी सिनेमा संगीत पर ही टिका हुआ था. 50 से 70 का तो स्वर्णिम काल था. 70 से 80 ठीकठाक रहा. मगर 80 से 90 का दौर तो मारधाड़ व हिंसा वाली फिल्मों का ही रहा. 1991 से 1999 के दौर में गाने बहुत मीठे बने लेकिन जिन कलाकारों पर फिल्माए गए और जिस तरह की ये फिल्में थीं, लगता था कि इन फिल्मों के निर्देशकों को संगीत की समझ ही नहीं है.

‘‘वास्तव में 1987 से 1989 आतेआते हिंदी सिनेमा के निर्देशक फिल्में बनाना भूल गए थे. अच्छी फिल्में तो तब भी नहीं बनती थीं. तकनीकी रूप से उस दौर की फिल्में समृद्ध होना शुरू हुई थीं. 2000 से फिल्म की तकनीक समृद्ध हुई, पर फिल्ममेकिंग मर गई. पिछले 25 वर्षों में हमारी फिल्में रोबोटिक हो गई हैं. ऐसा लगता है कि ये फिल्में असैंबल की जा रही हैं.
‘‘90 के दशक में ‘अपहरण’ व ‘राजनीति’ वाले प्रकाश झा की जगह ‘दिल क्या करे’ वाले प्रकाश झा ही नजर आते हैं. आप उन पर या सुभाष घई या अशोक ठाकरिया पर दांव खेल सकते थे. उन दिनों यशराज फिल्म्स और धर्मा प्रोडक्शन भी अच्छा काम कर रहे थे. अब तो फिल्म का संगीत मरता जा रहा है. पिछले 25 वर्षों से सिनेमा में मरणासन्न स्थिति है.’’
सिनेमा को फिर से उठाने की जरूरत
ऐसी स्थिति में सिनेमा फिर से पल्लवित कैसे हो सकता है? इस पर वे अपनी राय यों बयां करते हैं, ‘‘पहली बात तो हिंदी सिनेमा के संगीत पक्ष को मजबूत किया जाए. हिंदी संगीत का प्रतिनिधि संगीत तो लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत है. फिर वे लोग सिनेमा बनाएं जिन्हें स्टोरीटैलिंग की समझ हो. इतना होगा तो हिंदी सिनेमा एक बार फिर से उठ खड़ा होगा.’’
बीकानेर शहर में फिल्मों की शूटिंग भी बहुत हुईं, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे? इस पर वे बोले, ‘‘बीकानेर को हजार हवेलियों का शहर कहा जाता है. लोकेशन के हिसाब से काफी बेहतरीन. बीकानेर में बेशुमार रेत के टीले हुआ करते थे. ‘लैला मंजनूं’, ‘रजिया सुलतान’, ‘अलीबाबा चालीस चोर’, ‘मुगल ए आजम’ को यहीं पर फिल्माया गया. फिल्म ‘क्षत्रिय’ को बीकानेर के किलों में फिल्माया गया. गरमी में जब लू चलती थी तो हर दूसरे दिन टीले की जगह बदल जाती थी. इंदीवर साहब लिखा गीत, ‘एक तारा बोले…’ देश के हालात पर कटाक्ष था. 5 या 6 अंतरे वाला यह गाना है. इस गाने के आखिरी बंद को बीकानेर की हृदयस्थली दम्माणी चौक पाटा पर फिल्माया गया. चौक के बीचोंबीच लंबेलंबे लकड़ी के पाटा बने हुए हैं जिस पर छतरी है.
‘‘उस वक्त के रजवाड़े के अनुसार, राजा की तरफ से पाटे पर छतरी लगाने की अनुमति नहीं थी पर दम्माणी चौक को यह विशेष छूट दी गई थी.’’ Bikaner Cinema Culture





