Raja Saheb Movie Review : अभिनेता प्रभास तेलुगू सिनेमा का जानामाना ऐक्टर है. उस का नाम भारतीय सिनेमा के सब से अधिक कमाई करने वाले ऐक्टरों में लिया जाता है. 24 से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुके उसे 7 फिल्मकेयर पुरस्कार, नामांकन 24 से अधिक फिल्मों में और एक एसआईएमए पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं.
प्रभास ने 2015 में आई ब्लौकबस्टर ऐक्शन फिल्म ‘बाहुबलि : द बिगनिंग’ 2017 में आई उस की सीक्वल ‘बाहुबलि 2 : द कंक्लुजन में दोहरी भूमिका निभाई, जिस की सीक्वल उस समय की सब से अधिक कमाई करने वाली भारतीय फिल्म बन गई. अभिनेता प्रभास को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली. इस के बाद उस ने कई फिल्मों में अभिनय किया. ये फिल्में दक्षिणभारतीय फिल्मों के साथसाथ हिंदी में भी रिलीज की गईं.
‘राजा साहब’ शीर्षक से पहले भी कुछ फिल्में आ चुकी हैं. नई ‘राजा साहब’ को तेलुगू के साथसाथ हिंदी में भी बनाया गया है. यह कौमेडी एक फैंटेसी हौरर फिल्म है.
‘राजा साहब’ प्रभास के फैंस के लिए मसाला एंटरटेनर हो सकती है लेकिन यह अपने कमजोर लेखन और वीएफएक्स के कारण दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती. फिल्म बिखरी हुई लगती है. बड़ेबड़े सेट, भारी बजट (400-450 करोड़ रुपए) और तामझाम होते हुए भी समझ नहीं आता कि निर्देशक आखिर बनाना क्या चाह रहा है. फिल्म तंत्रमंत्र के चक्कर में भेजा फ्राई करती है.
फिल्म के निर्देशक मारुति ने इस की कहानी और पटकथा खुद लिखी है. समझ नहीं आता कि निर्देशक से फिल्म की कहानी और पटकथा क्यों लिखवाई जाती है. भई, जो आप का काम है वही ठीक से कर लो तो अच्छा है.
इस फिल्म की कहानी काफी बोझिल है. मध्यांतर तक कहानी इतनी ज्यादा उलझ जाती है कि क्लाइमैक्स तक आप सोचते रह जाते हैं कि क्या बना डाला है. फिल्म को हौरर के नाम पर प्रचारित किया है परंतु फिल्म का हौरर दर्शकों को डरा नहीं पाता. हां, कुछ जगहों पर कौमेडी जरूर हंसाती है. मसालों की डोज ज्यादा हो गई है जिस से फिल्म बेस्वाद होने लगती है.
कहानी थकाऊ और सिरखपाऊ है. राजा (प्रभास) अपनी अल्जाइमर पीड़ित दादी गंगम्मा (जरीना वहाब) की जिद पर कि उस का पति कनक राजू (संजय दत्त) जिंदा है और वह हैदराबाद में है, वह अपने दादा को ढूंढने के लिए निकल पड़ता है. ढूंढ़तेढूंढ़ते वह हैदराबाद की पुरानी रहस्यमयी हवेली तक जा पहुंचता है जहां तंत्रमंत्र के कई राज छिपे हैं. वहां जा कर कनक राजू का सामना इस हकीकत से होता है कि उस की दादी देवनगर साम्राज्य की राजकुमारी है. इस पहेली को सुलझाने के लिए वह अपने अंकल वीटी की गणेश से मदद मांगता है. इसी दौरान उस की मुलाकात भैरवी मालविका मोहननी से होती है. उस के जरिए वह दादा की भूतिया हवेली में पहुंचता है, जहां उस का मुकाबला अब भूत बन चुके अपने दादा से होता है. राजू अपने दोस्तों के साथ मिल कर इस भूत का मुकाबला करता है और हवेली से बाहर निकलने का रास्ता खोजता है. दिमागी खेल में उलझी इस कहानी में राजू हालात का सामना करता है और सुरक्षित बाहर निकल आता है.
एक तो घोर अंधविश्वासों वाली कहानी, दूसरे पटकथा का कोई ओरछोर नहीं, दर्शक बेचारे अपना सिर धुनते रह जाते हैं. आज 21वीं सदी में भूत, भूतिया महल आदि में कौन अपना सिर खपाता है. दर्शक सोचते रह जाते हैं कि यह सब अचानक कैसे हो गया. मालविका का किरदार अचानक प्रभास तक कैसे पहुंचा? कई किरदार तो 1-2 सीन के लिए ही लिए गए हैं, जो न तो कौमेडी क्रिएट करते है, न ही कहानी से उन का कोई लेनादेना है.
बैकग्राउंड में शोरगुल ज्यादा है. संपादन बिखराबिखरा है. फिल्म में 3-3 हीरोइनें हैं, मगर किसी का किरदार जम नहीं पाया. जरीना वहाब का काम अच्छा है. संजय दत्त अपने किरदार में फिट है. प्रभास की डबिंग खराब हुई है. फिल्म की लंबाई ज्यादा है, कम की जा सकती थी. हौरर, कौमेडी, फेंटसी, इमोशंस में कहीं कोई तालमेल नहीं है. सिनेमेटोग्राफी औसत है. वीएफएक्स अधूरे लगते हैं. Raja Saheb Movie Review





