Happy Patel : Khatarnak Jasoos Movie Review : अभिनेता आमिर खान द्वारा निर्मित यह एक जासूसी कौमेडी फिल्म है. इस फिल्म को स्टैंडअप कौमेडियन वीरदास ने निर्देशित किया है. उस की यह फिल्म जासूसी ऐक्शन कौमेडी ‘जौनी इंगलिश’ और हिंदी फिल्म ‘तीस मार खां’ का मिलाजुला रूप है.
कहने को यह एक जासूसी फिल्म है मगर इस में तरहतरह की बेवकूफियां, डबल मीनिंग वाले संवाद, टूटीफूटी कौमेडी और ऊलजलूल गानों का इस्तेमाल किया गया है. फिल्म में हैप्पी को एक खतरनाक जासूस दिखाया गया है, सिर्फ हैप्पी की जासूसी ही नहीं, हिंदी भी खतरनाक है. वीरदास की औडियंस एक खास वर्ग की है, जिन्हें डबल मीनिंग वाले संवाद अच्छे लगते हैं और वे इस तरह के संवादों पर ठहाके लगाते हैं.
फिल्म में आमिर खान के साथसाथ इमरान खान ने भी कैमियो रोल किया है. ये दोनों कहींकहीं अच्छे लगते हैं. अगर आप बेतुका हास्य पसंद करते हैं और आप को पागलपंती पसंद है तो यह फिल्म आप को अच्छी लग सकती है.
फिल्म की कहानी 90 के दशक में गोवा से शुरू होती है, जहां गैंगस्टर जिम्मी (आमिर खान) और 2 इंटरनैशनल एजेंट्स के बीच लड़ाई होती है. जिम्मी तो मारा जाता है पर इन एजेंट्स के हाथ एक अनाथ बच्चा लग जाता है. कहानी 30 साल बाद वर्तमान में पहुंचती है, जहां वह बच्चा हैप्पी (वीर दास) अपने एजेंट पिता की राह पर चलने की कोशिश करता है.
वह यूके में रहता है और वहां की एजेंसी के एक एग्जाम में 7 बार फेल हो चुका है. उसे कुकिंग और डांस बढ़िया आते हैं. एजेंसी उसे गोरी साइंटिस्ट को ढूंढ़ निकालने का काम सौंपती है. उसे हिंदी की ट्रेनिंग दे कर गोवा भेजा जाता है. गोवा में उस की मुलाकात लोकल कोऔर्डिनेटर गीत (शारिब हाशमी), उस की साथी रौवसी (सृष्टि तावड़े), डांसर रूपा (मिथिला पालकर) और मामा (मोना सिंह) से होती है.
मामा इलाके की डौन है और जिम्मी की बेटी है. वह अंगरेजों की फेयरनैस क्रीम के मुकाबले अपनी देसी फेयरनैस क्रीम मार्केट में बेचना चाहती है. इसीलिए उन अंगरेज साइंटिस्ट को कैद कर रखा है. हैप्पी मामा की दबंगई का सामना करता है और अपने मिशन में कामयाब होता है. वह गोरी साइंटिस्ट को ढूंढ़ कर एजेंसी के हवाले करता है.
फिल्म की यह कहानी अंगरेजी में शुरू हो कर टूटीफूटी हिंदी में तबदील हो जाती है. कहानी टुकड़ों में बेवजह दर्शकों को हंसाने का प्रयास करती है. हैप्पी बनावीर दास खुद को हिंदी में कमजोर बता कर बारबार डबल मीनिंग वाली बातें करता है और गालियां देता है. बीचबीच में कोकणी भाषा का प्रयोग भी किया है. फिल्म में ड्रामा तो बहुत है मगर सस्पैंस थोड़ा ही है. रोमांस भी फुल है, मगर जो है सब बेतुका ही है. मोना सिंह का किरदार अटपटा लगता है. मिथिला पालकर अच्छी लगी है.
सभी कलाकार ओवरऐक्टिंग करते नजर आते हैं. हैप्पी का किरदार दर्शकों को हैप्पी करने के बजाय दुखी ही करता है. शारिब हाशमी ने ठीकठाक कौमेडी की है. वीरदास ने पहली बार किसी फिल्म का निर्देशन किया है, मगर निर्देशन करते वक्त उसे यह पता नहीं चला कि कहानी दर्शकों के दिमाग को कुंद कर रही है. उस ने कुछ तंज अच्छे कसे हैं. वह अपनी पिछली फिल्में ‘देली बेली’ और ‘गोवा गौन’ जैसी इस फिल्म को नहीं बना पाया है.
आमिर खान के भांजे इमरान खान ने अपनी छोटी सी भूमिका में अच्छी ऐक्टिंग की है. तकनीकी रूप से फिल्म ठीकठाक है. ‘आज बंदा तेरे लिए नाचेगा…’ गाना कुछ अच्छा बन पड़ा है. क्लाइमैक्स निराश करता है. कुछ संवाद अच्छे हैं. फिल्म चाहे जैसी भी है, मगर यह खतरनाक जासूस दर्शकों के दिमाग के लिए खतरनाक है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Happy Patel : Khatarnak Jasoos Movie Review





