Thiruparankundram Deepam Controversy : ब्राह्मणिक समावेशन शब्द अब बहुत ज्यादा चलन में नहीं है जिसे समझने के लिए ब्राह्मण और समावेश का मतलब समझ आना ही काफी है. इस शब्द का पिछले दिनों मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद ऐतिहासिक, राजनीतिक, न्यायिक और धार्मिक लिहाज से गहरा ताल्लुक पैदा हो गया है. उत्तर भारत में सोशल मीडिया पोस्टों के जरिए यह विवाद और फसाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है कि दरअसल शिव का बेटा कार्तिकेय ही मुरुगन है और तमिलनाडु सरकार का हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी उस के सामने दीया न जलाने का फैसला शिव और सनातन का अपमान है जिसे विपक्षी दल कर रहे हैं.
इस से पहले इस विवाद और आरएसएस की भगवा मंडली, जिस के मुखिया मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी हैं, की तमिलनाडु के बारे में चिंता का कारण समझने की कोशिश करते हैं. यह कारण कोरा आर्थिक है. 1950-51 में मद्रास राज्य, जो ब्रिटिश सरकार का हिस्सा था, में कहींकहीं प्रिंसली स्टेट्स थीं, वहां की प्रतिव्यक्ति आय 229 से 234 रुपए थी जबकि उस समय राष्ट्रीय प्रतिव्यक्ति आय 265 रुपए थी.
उस समय हिंदू धर्म के गढ़ उत्तर प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय 240 से 265 रुपए थी. उत्तर प्रदेश मद्रास प्रोविंस से अमीर था. अब 1980 की राममंदिर की लहर के बाद जहां उत्तर प्रदेश की प्रगति रुकने लगी, वहीं तमिलनाडु की छलांगें मारने लगी.
2025 का अनुमान है कि देश की प्रतिव्यक्ति आय 2,12,000 रुपए है जबकि तमिलनाडु इस से कहीं ज्यादा 3,30,000 से 3,50,000 रुपए है. इस के मुकाबले 2025 में उत्तर प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय मात्र 83,000 से 1,08,000 रुपए है.
यह भेदभाव है. तमिलनाडु के लोगों को सुख व वैभव मिल रहा है जबकि मंदिरों, घाटों, गंगा, यमुना वाले राज्य उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ अन्याय किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश में दरअसल जंगलराज है. अब आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी इस पर लग गए हैं कि तमिलनाडु केरल को भी रास्ते पर ला कर गरीबी में उत्तर प्रदेश के बराबर किया जाए. वहां अब जम कर धार्मिक धंधे खड़े किए जा रहे हैं. दीया विवाद पर सामग्री पढ़ने से पहले ऊपर के आंकड़े जान लेना बहुत जरूरी है कि जंगलराज, राष्ट्रीयता, हिंदुत्व आदि के अर्थ क्या हैं?
क्या है विवाद ?
पहले विवाद पर नजर डालें तो वह कुछ यों है. तमिलनाडु के मदुरै शहर से महज 10 किलोमीटर दूर थिरुपरनकुंद्रम नाम की एक पहाड़ी है जहां भगवान मुरुगन अर्थात तथाकथित कार्तिकेय का एक मंदिर है. इसे तिरुपरंकरुनम मुरुगन कोयिल या सुब्रमण्यास्वामी मंदिर कहा जाता है. यह मंदिर 8वीं सदी में पल्लव राजवंश के समय का है. यही वह जगह भी है जहां कथित तौर पर देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ था. मंदिर की पहाड़ी के शिखर पर 16 फुट का एक खंभा है जिसे हिंदू कोडिमरम और दीपाथून स्तंभ या धर्मस्तंभ भी कहा जाता है.
इसी स्तंभ के नीचे कार्तिकई दीपम नाम का सालाना उत्सव होता था. हिंदू दावों के मुताबिक यह खंभा मुरुगन मंदिर का हिस्सा है जहां भक्त लोग एक किंग साइज दीपक जलाते थे. इसी पहाड़ी के एक हिस्से पर एक मुसलिम योद्धा अलाउद्दीन सिकंदर शाह की दरगाह भी है जो सूफी परंपरा को मानता था. 13वीं सदी में 1377-78 में विजयनगर के हिंदू राजा कुमारा कैंपन्ना से युद्ध के दौरान सिकंदर शाह की मौत हो गई थी. माना यह भी जाता है कि विजेता हिंदू राजा ने सिकंदर शाह के अनुयायियों को पहाड़ी पर उस की दरगाह बनाने की इजाजत दे दी थी जो सिकंदर बादुशा दरगाह के नाम से जानी जाने लगी.
बस, आग लगनेलगाने के लिए इतना ही काफी था. लगभग सौ सवा सौ साल पहले दरगाह की देखभाल करने वालों ने इस पर एतराज जताना शुरू कर दिया कि हिंदू क्यों शिखर पर दीपक जलाते हैं. उन्होंने कार्तिकई दीपम पर आपत्ति की तो यह परंपरा बंद हो गई. देश में ऐसे कई धर्मस्थल हैं जिन्हें हिंदूमुसलिम दोनों मानते हैं. यह पहाड़ी, यह मंदिर और यह दरगाह भी कुछकुछ वैसा ही है क्योंकि यहां की दरगाह पर हिंदू भी मन्नत का धागा बांधते हैं और जाहिर है मांगते हैं, सो माथा भी टेकते हैं.
नए विवाद से परे यह लाभ आस्था या स्वार्थ या डर, कुछ भी कह लें, का सिद्धांत है कि जो भला करे, मन्नत पूरी करे सो वही असली देवता, फिर चाहे वह मजार में हो या मंदिर में हो या चर्च में हो या जमीन के ऊपर विराजमान हो या नीचे आराम फरमा रहा हो, हमें इस से कोई फर्क नहीं पड़ता.
हम तो कुछ हजार सौ रुपयों की दानदक्षिणा, पूजापाठ, नमाजइबादत, प्रसाद वगैरह के एवज में औलाद चाहते हैं, बीमारियों से नजात चाहते हैं, संतानों की शिक्षादीक्षा और उन का बेहतर कैरियर भी चाहते हैं और जो हमारा बुरा करे या बुरा सोचे उस का नाश और अनिष्ट चाहते हैं वगैरहवगैरह. यह नेक काम मुरुगन करे, कार्तिकेय करे या सिकंदर शाह करे हमें इस से कोई लेनादेना नहीं. यह सरकारी दफ्तरों में दी जाने वाली घूस की तरह है जिस में बाबू या साहब शर्मा-वर्माजी हों, पिल्लई-अय्यर हों या मोहम्मद-खान साहब हों उस से कोई फर्क नहीं पड़ता.
इसी तरह इस काम के लिए तरहतरह के धार्मिक ढोंगपाखंड भी इफरात से किए जाते हैं जिन का कोई सिरपैर नहीं होता, मसलन सड़कों पर झंकियां लगाना, जुलुस, शोभा यात्राएं निकालना वगैरह. कांवड़ यात्राओं का तांडव तो हर साल श्रावण के महीने में लोग देखते ही हैं. उसी तर्ज पर सड़कों पर नमाज पढ़ी जाती है या छाती पीटपीट कर या अली या हुसैन किया जाता है. सड़कों पर ही चौका लगा कर नमोकार मंत्र पढ़ा जाता है और अब तो हाथ में कैंडल ले कर मार्च सा भी किया जाने लगा है.
खाली पड़ी किसी भी सरकारी या प्राइवेट जमीन पर मंदिर या मजार बना ली जाती है. जहां पूजापाठ, इबादत आदि होने लगते हैं. चढ़ावा आने लगता है, लोग मन्नतें मांगने लगते हैं और देखतेदेखते वहां एक सेल्समैन यानी पुजारी या फकीर मौलवी संदूक यानी दानपात्र ले कर बैठ जाता है.
इन लाखों में से कुछ दुकानें बहुत बड़ी हो जाती हैं तो फसादविवाद शुरू हो जाते हैं जिन का निबटारा या फैसला कराने के लिए लोग उस ऊपर वाले की अदालत में नहीं जाते जिस का डर दिखा कर भक्तों से पैसे ऐंठे जाते हैं बल्कि नीचे की अदालतों को ही यह जहमत उठानी पड़ती है. जो मारे संवैधानिक लिहाज और व्यक्तिगत आस्था के चलते यह भी नहीं पूछ पातीं कि ऐसे मुकदमों का देश की उत्पादकता या रचनात्मकता या फिर टैक्नोलौजी से क्या वास्ता है. हमारे इजलास में पहले से ही मुकदमों का अंबार लगा है और हमारी जिम्मेदारी और फर्ज नीचे वालों को इंसाफ देना है जिन्हें संविधान ‘हम भारत के लोग’ संबोधित करता है. सब का हिसाब रखने वाले ऊपर वाले को न्याय देने की हमारी बिसात क्या.
किस ने दी दीये को हवा ?
ऐसे ही विकसित हुए थिरुपरम्कुन्द्रम पहाड़ी के स्तंभ पर दीया न जलने के विवाद को तूल दिया एक रिट पिटीशन से उपजे फैसले ने जो मुरुगन के एक भक्त रामा रविकुमार ने नवंबर के आखिर में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बैंच में दायर की थी. इस में मांग की गई थी कि दीपाथून स्तंभ पर दीया जलाने की व्यवस्था की जाए, इस से दरगाह के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
1 दिसंबर को मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बैंच के जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने याचिका स्वीकार करते मंदिर प्रबंधन को निर्देश दिया कि वह 3 दिसंबर को होने वाले कार्तिकई दीपम जलसे में दीया जलाए. इस से दरगाह की संरचना पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि दरगाह कम से कम 50 मीटर की दूरी पर स्थित है. गौरतलब है कि इस मंदिर का प्रबंधन तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग द्वारा किया जाता है.
हाईकोर्ट ने मदुरै के पुलिस कमिश्नर को भी निर्देश दिया कि कोई भी न्यायालय के आदेश में बाधा न डाले. दीया जलवाने का यह आदेश बड़ा दिक्कत पैदा करने वाला साबित हुआ जिस का पालन किया जाता तो भी झंझट थी और नहीं किया गया तो भी फसाद होना तय था. हाईकोर्ट के आदेश का न तो पुलिस पालन कर पाई और न ही मंदिर प्रबंधन कुछ कर सका.
लेकिन उन्मादी श्रद्धालुओं पर तो इस देश में ही क्या, दुनियाभर में किसी का, यहां तक कि ऊपर वाले का, भी बस नहीं चलता. चूंकि अदालत उन के हक में थी इसलिए कुछ भक्त जत्थे की शक्ल में पहाड़ी पर चढ़ने लगे. उन की सुरक्षा कह लें या सहूलियत के लिए सीआईएसएफ तैनात थी. भक्तों के मनसूबे जाहिर थे कि नेक तो कतई नहीं थे. लिहाजा, सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस बल ने उन्हें रोकने का अपना धर्म निभाया जिस के चलते झड़प हुई जिस में एक पुलिसकर्मी घायल हुआ.
यह ठीक है कि जस्टिस स्वामीनाथन को कानूनन जो उचित लगा वह उन्होंने किया लेकिन फैसले की भाषा और भाव दोनों कहींकहीं उकसाने वाले भी थे, मसलन यह कि, भले ही यह परंपरा का मामला न हो लेकिन दीप जला कर शिखर पर मंदिर का अधिकार जताना जरूरी है, मसजिद ट्रस्टी यथास्थिति को भंग कर रहे हैं, मंदिर प्रबंधन को अपनी संपत्ति पर अतिक्रमण के प्रयास को रोकने के लिए चौकस रहना चाहिए.
साथ ही, उन का अपने आदेश में यह कहना कि अगर शाम 6 बजे तक दीपक नहीं जला तो अदालती अवहेलना यानी कंटैम्प्ट औफ कोर्ट की कार्रवाई 6 बज कर 5 मिनट से शुरू कर दी जाएगी, सरासर बेतुकी और गैरजरूरी बात थी क्योंकि एक मंदिर या दरगाह में दीया न जलने से कोई पहाड़ नहीं टूटा पड़ रहा था और न ही देश की आंतरिक या बाहरी सुरक्षा को कोई खतरा पैदा हो रहा था.
हां, एक रिवाज या परंपरा पर जरूर अस्थायी रोक लगी थी लेकिन वह इतनी गंभीर किसी भी एंगल से नहीं थी जो अदालत को उस की इतनी चिंता करनी पड़ती जितनी कि उस ने अपने फैसले में जताई. जस्टिस स्वामीनाथन के इस मंदिर और दीया-प्रेम ने थिरुपरम्कुन्द्रम पहाड़ी पर बेवजह का तनाव पैदा कर दिया. अपने आदेश में उन्होंने यह भी कहा कि दीये पूरे मंदिर में जलाए जाते हैं, केवल पूजा कक्ष में नहीं (जाहिर है यह बात कानून की तो किसी किताब में नहीं लिखी). यह संबंधित पुलिस का कर्तव्य है कि वह न्यायालय के निर्देश का अनुपालन सुनिश्चित करे.
इस से पहले मंदिर प्रबंधन ने दीपक जलाने के आयोजन के कुछ घंटे पहले अदालत में अपील दायर कर दावा किया था कि इस कदम से यानी दीया जलाने की जिद से सांप्रदायिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है. इस से नाराज रामा रविकुमार ने अदालत से अवमानना की कार्रवाई शुरू करने का अनुरोध किया. जस्टिस स्वामीनाथन ने मदुरै पुलिस कमिश्नर और मंदिर के कार्यकारी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का आदेश दिया था.
इस से भी पहले मदुरै कलैक्टर ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए बीएनएस यानी भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा जारी कर दी थी. 4 दिसंबर को हाईकोर्ट ने फैसले के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं को खारिज कर दिया तो तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने भी आदेश के पालन करने से मना कर दिया क्योंकि इस से तनाव पैदा होने का खतरा उसे लग रहा था.
मामला अभी आयागया नहीं हुआ है. अब डबल बैंच इस की सुनवाई कर रही है तो दूसरी तरफ तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची है. उलझते जा रहे इस विवाद में एक दिलचस्प बात जो और विवाद व फसाद पैदा कर सकती है वह यह है कि दीपाथून स्तंभ दरअसल जैन संतों द्वारा निर्मित हो सकता है. इस फैसले पर जस्टिस स्वामीनाथन के हिंदुत्वप्रेम या पूर्वाग्रह पर इंडिया गठबंधन भी सक्रिय हो गया.
स्वामीनाथन से जुड़े विवाद
यह कोई पहली बार नहीं है जो जस्टिस स्वामीनाथन अपने दक्षिणपंथ को ले कर घिरे हों. इस से पहले भी वे इस तरह की बयानबाजी सार्वजनिक रूप से भी करते रहे हैं. जुलाई 2025 में ही उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि अगर आप वेदों की रक्षा करते हैं तो वेद आप की रक्षा करते हैं. अच्छा तो उन का यह बताना नहीं रहा कि वेदों को खतरा किस से है और क्यों है जो कोई उन की रक्षा करे.
जजों के निर्णयों को निष्पक्ष माना जाता है और आमतौर पर उन की व्यक्तिगत निष्ठा न्याय में आड़े नहीं आती पर भारत या किसी भी देश में ऐसा होता हो, यह मुश्किल ही है, जज भी समाज के विभिन्न घटकों से जुड़े होते हैं और उन की व्यक्तिगत, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक आस्थाएं होती ही हैं जो उन के फैसलों में झलकती भी हैं.
दरअसल उन्होंने अपने एक पुजारी दोस्त को सड़क दुर्घटना के मामले में बरी कराया था और उसी संदर्भ में वेदों की शान में कसीदे गढ़ता यह प्रसंग जोड़ दिया था. इस बयान पर उन पर कंटैंप्ट औफ कोर्ट का नोटिस जारी हुआ था जिस का 8 रिटायर्ड जजों ने समर्थन किया था.
यह मामला अभी पूरी तरह चर्चाओं से बाहर भी नहीं हुआ था कि अक्तूबर 2025 में उन्होंने संविधान पर ही उंगली उठाते कहा था कि भारतीय संविधान 1935 के गवर्नमैंट औफ इंडिया एक्ट की नकल है. इस में मौलिकता नहीं है. इस पर बहसें भी हुई थीं, बुद्धिजीवियों में बवाल भी मचा था. चूंकि यह बयान हरियाणा में आरएसएस के एक आयोजन में दिया गया था इसलिए मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस के चंद्रू ने उन्हें आरएसएस का प्रचार सचिव कहते उन पर संविधान की शपथ के उल्लंघन का आरोप भी लगाया था.
लावण्या सुसाइड मामला साल 2022 में सुर्खियों और चर्चाओं में रहा था जिस में तमिलनाडु के थंजावुर की 17 साल की छात्रा लावण्या मुरुगनान्थम ने जहर खा कर 19 जनवरी, 2022 को आत्महत्या कर ली थी. इस मामले में लावण्या के पेरैंट्स ने आरोप लगाया था कि जिस मिशनरी स्कूल में वह पढ़ती थी वहां उस पर ईसाई बनने के लिए दबाव बनाया जा रहा था.
इस की सुनवाई करते स्वामीनाथन ने माना था कि हां लावण्या पर ईसाई बनने के लिए दबाव बनाया गया था. उन्होंने इस की जांच सीबीआई को सौंप दी थी जिस की रिपोर्ट उन की टिप्पणी या अनुमान से परे यह थी कि मृतका का धर्म परिवर्तन नहीं कराया गया था, उस पर पढ़ाई का दबाव था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा था कि जजों को अपने कमैंट्स में एहतियात बरतनी चाहिए.
आम भक्तों और दक्षिणपंथियों की तरह संविधान पर खार खाए बैठे इन जज साहब ने साल 2023 में कहा था कि भारत का संविधान उस की डैमोग्राफिक प्रोफाइल यानी जनसांख्यकीय संरचना पर निर्भर है, अगर यह सरंचना बदली तो संविधान खत्म हो जाएगा. इस बयान पर कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर कमैंट किया था कि अगर जजों का ऐसा माइंडसेट हो तो संविधान नहीं बचेगा.
खुद को हिंदू या सनातनी परंपराओं की खुशफहमी पाले बैठे जस्टिस स्वामीनाथन ने एक बार तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि का मजाक बनाते हुए कहा था कि करुणानिधि कांची के शंकराचार्य को नहीं जानते थे. द्रविडि़यन नेता हिंदू परंपराओं को नहीं समझते. इस पर मद्रास हाईकोर्ट के वकील एस वांचिनाथन ने सीजेआई को चिट्ठी लिखते उन की शिकायत की थी.
क्यों लामबंद हुआ इंडिया गठबंधन ?
2 दिसंबर से ही इस फैसले को ले कर इंडिया गठबंधन के कान खड़े हो गए थे जिस की अपनी वजहें भी थीं. गठबंधन ने यह महसूस किया कि जस्टिस स्वामीनाथन ने कानूनी दायरे से बाहर जाते फैसला सुनाया है जिस का अगर विरोध नहीं किया गया तो कल को न्याय और कानून व्यवस्था कहनेसुनने की बातें ही रह जाएंगी. यह ऐसा कोई मामूली कानूनी विवाद नहीं है जिस की अनदेखी की जाए क्योंकि अपने निर्देश में अदालत ने धार्मिक आचरण को प्राथमिकता दी है जोकि धर्मनिरपेक्ष राज्य की भावना से मेल नहीं खाती.
हफ्ताभर विपक्ष ने चिंतनमंथन किया, फिर महाभियोग का प्रस्ताव लाते उन्हें पद से हटाने की मांग कर डाली. 107 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को नोटिस भेजा जिस की एक प्रति राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और एक प्रति भारत के चीफ जस्टिस सूर्य कांत को भी भेजी गई. इस नोटिस पर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी सहित डीएमके की कनिमोझ और सपा सांसद अखिलेश यादव के भी दस्तखत थे. इंडिया गठबंधन ने जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग लाने की तीन वजहें भी गिनाईं जिन में से पहली थी कि-
जस्टिस स्वामीनाथन का आचरण न्यायपालिका की निष्पक्षता, पारदर्शिता और धर्मनिरपेक्ष कार्यप्रणाली के खिलाफ है.
जस्टिस स्वामीनाथन एक वरिष्ठ अधिवक्ता एम श्रीचरण रंगनाथन और एक खास समुदाय के वकीलों को फायदा पहुंचाने के लिए पक्षपात करते हैं.
वे एक खास विचारधारा के आधार पर भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ जा कर कोर्ट में फैसले सुनाते हैं.
प्रस्ताव पारित कराना टेढ़ी खीर
विपक्ष एकजुट हो कर महाभियोग का प्रस्ताव तो ले आया है लेकिन इसे पारित करा पाना उस के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि आज तक किसी जज को महाभियोग के जरिए हटाया नहीं जा सका है. यह बात उसे भी मालूम है लेकिन ऐसा करने का उस का मकसद धार्मिक टाइप के जजों को हड़काना ज्यादा लग रहा है. संविधान की धारा 124 के तहत हाईकोर्ट जज को केवल राष्ट्रपति ही हटा सकता है.
महाभियोग के लिए लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सांसदों को अध्यक्ष को प्रस्ताव सौंपना पड़ता है जो इंडिया गठबंधन ने लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दिया है. संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही इसे लोकसभा स्पीकर अगर स्वीकार करता है तो एक तीन सदस्यीय कमेटी वह गठित करता है जिस में सुप्रीम कोर्ट के जज, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक ज्यूरी मैंबर होता है.
यह कमेटी आरोपी जज के खिलाफ आरोप तय करती है जिस की एक प्रति जज को भी भेजी जाती है जिस से वह चाहे तो अपना पक्ष प्रस्तुत कर सके. जांच पूरी होने के बाद कमेटी द्वारा पेश की गई रिपोर्ट पर संसद में चर्चा होती है. नियम यह भी है कि प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में पेश होना चाहिए. सब से पहले उस सदन में जहां इसे पेश किया गया है. यानी, मौजूदा मामले में लोकसभा में जिस की कुल संख्या से उसे बहुमत मिलना चाहिए, साथ ही, वोटिंग के वक्त कम से कम दोतिहाई वोट प्रस्ताव के पक्ष में होने चाहिए.
अगर प्रस्ताव एक सदन से पारित हो जाता है तो उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है वहां भी यही प्रक्रिया दोहराई जाती है. इस लिहाज से लोकसभा में इंडिया गठबंधन को 573 में से कम से कम 272 सांसदों का समर्थन चाहिए जबकि उस के पास कुल 234 सांसद ही हैं. यानी, महाभियोग प्रस्ताव का लोकसभा में ही औंधेमुंह गिर जाना तय है.
सियासी लिहाज से यह फायदे का सौदा इंडिया गठबंधन के लिए नहीं है लेकिन अपने वोटरों का भरोसा जीतने और अपनी धर्मनिरपेक्षता दिखाने का उस के पास और कोई रास्ता है भी नहीं. अहम सवाल अदालतों के धर्मप्रेम का भी है जो चिंता की बात तो है.
सियासी लिहाज से ही इस का नुकसान हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस और सपा को खासतौर से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हो सकता है लेकिन तमिलनाडु में उस के सहयोगी और सत्तारूढ़ दल डीएमके को फायदा होगा क्योंकि थिरुपरम्कुंद्रम पहाड़ी की लड़ाई अब सनातन धर्म बनाम तमिल संस्कृति और कार्तिकेय बनाम मुरुगन हो गई है.
यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि तमिलनाडु में जीतता वही है जो तमिल भाषा और संस्कृति की बात करता है. सनातन या हिंदू धर्म और उस के उत्तर भारत में प्रचलित देवीदेवता वहां नहीं चलते, इसलिए भाजपा बहुत छोटे दायरे में सिमट कर रह जाती है लेकिन तय यह भी है कि वह इस लड़ाई का फायदा उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और अहम राज्य के चुनाव में यह कहते उठाने से चूकेगी नहीं कि देख लो भाइयो और बहनो, ये वही सपा और कांग्रेस हैं जो दक्षिण में कार्तिकेय के मंदिर में दीया जलाने पर बवाल मचाती हैं और यहां शिव और विष्णु को पूजती हैं. इन का धर्मप्रेम दिखावा और छलावा है, हमारा सच्चा है.
कार्तिकेय और मुरुगन एक नहीं
भक्तों ने देर न करते तुरंत कमान संभाल ली और सोशल मीडिया पर कहना शुरू कर दिया कि नास्तिक और वामपंथी नेता और पार्टियां सनातन और उस के देवीदेवताओं का अपमान करते रहने वाले इन नेताओं और दलों को उखाड़ फेंकना चाहिए. एक पोस्ट में कार्तिकेय का परिचय देते इसे शिव परिवार का अपमान बताया गया कि जज साहब ने तो अन्याय किया, इसलिए ये लोग उन के खिलाफ महाभियोग ला रहे हैं.
लेकिन इस बात के अपने अलग माने और प्रमाण हैं कि कार्तिकेय और मुरुगन एक ही देवता के नाम नहीं हैं वे अलगअलग पात्र हैं लेकिन उत्तर का कार्तिकेय दक्षिण का मुरुगन कब और कैसे हो गया, इस का उल्लेख कहीं नहीं मिलता ठीक उसी तरह कि बुद्ध कैसे विष्णु के अवतार हो गए थे. जाहिर है, यह भी एक धार्मिक षड्यंत्र था जिस का परदाफाश कुछ इतिहासकारों ने किया है. इसे समझने के लिए कार्तिकेय की जन्मकुंडली देखें तो वह शिव-पार्वती का पुत्र था जिस का उल्लेख महाभारत, ऋग्वेद, यजुर्वेद और स्कंद पुराण में मिलता है. इसी पुराण के मुताबिक, उस का एक नाम स्कंद भी है.
इन किस्सेकहानियों के मुताबिक कार्तिकेय का जन्म एक खास मकसद दैत्यों के संहार और उन में भी एक राक्षस तारकासुर के वध के लिए हुआ था, इसलिए उसे देवताओं का सेनापति नियुक्त किया गया था.
कार्तिकेय का वाहन मोर है और वह हाथ में भाला लिए रहता है. उत्तर भारत में कार्तिकेय की एक ही पत्नी है जो दक्षिण पहुंचतेपहुंचते दो हो जाती हैं. पहली देवसेना और दूसरी वल्ली देवसेना इंद्र की बेटी है. जबकि वल्ली किषकिन्धा के राजा की बेटी है. कार्तिकेय की परवरिश कृतिकाओं यानी सप्त ऋषियों की पत्नियों ने की थी.
अब उत्तर भारत में प्रचलित किस्सेकहानियों के मुताबिक कार्तिकेय के दक्षिण के मुरुगन बनने की दास्तां, जिस में गणेश परिक्रमा का भी जिक्र है कि सुस्त गणेश ने तो मां पार्वती की परिक्रमा कर कंपीटिशन जीत लिया था, अपने वाहन मोर पर सवार हो कर परिक्रमा के लिए निकल पड़ा और हैरतंगेज तरीके से वहां हो रहे देवदानव युद्ध का हिस्सा बन गया और इतने ही हैरतअंगेज तरीके से उस का नाम मुरुगन पड़ गया. अगर तब आधार कार्ड और एसआईआर वगैरह का चलन होता तो कार्तिकेय को घुसपैठिया ही करार दिया जाता. बहरहाल, यहीं उस की शादी वल्ली नाम की युवती से हुई.
यह गप या साजिश सब से पहले पकड़ में आती है संस्कृत ग्रंथ अमरकोष से जिस में कार्तिकेय के 37 नाम गिनाए गए हैं जिन में मुरुगन नहीं है. मुरुगन का उल्लेख तमिल संगम साहित्य में मिलता है जिस में उसे आदिवासी लोकदेवता बताया गया है. वह मूलतया आदिवासियों का रक्षक है. उस के मातापिता की जानकारी तमिल संगम साहित्य में नहीं मिलती. उस के हाथ में भाला और साथ में मोर बाद में जोड़े गए हैं जिस से उसे कार्तिकेय कह कर पुजवाया जा सके.
मुरुगन के प्रमुख तीर्थस्थल हालिया विवादों में आए थिरुपरनकुंद्रम के अलावा पलनी, तिरुचेंदुर और स्वामिमलाई हैं जबकि कार्तिकेय के नाम कोई तीर्थ उत्तर भारत में नहीं है, उस के मंदिर भी न के बराबर हैं. यह बड़ी हास्यास्पद बात है कि अगर मुरुगन ही कार्तिकेय या कार्तिकेय ही मुरुगन है तो उस के तीर्थ और मंदिर उत्तर भारत में क्यों नहीं? दरअसल, इसे ही ब्राह्मणिक समावेशन कहा जाता है जिस में ऐसे घालमेल आम हैं लेकिन इस के बाद भी आम तमिलियन मुरुगन को कार्तिकेय नहीं मानता.
इतिहासकारों के नजरिए से
अब कुछ नामी इतिहासकारों की बात, जो एक सुर में कहते हैं कि मुरुगन मूलतया तमिल लोकदेवता था जिसे बाद में स्कंद या कार्तिकेय से जोड़ा गया. ये लोग मानते हैं कि इन दोनों के ग्रंथीय उल्लेख अलगअलग हैं. दोनों की मूल उत्पत्ति भी अलग हैं. दोनों की उपासना के तरीके भिन्न हैं और असल में यह राजनीतिक व सांस्कृतिक समन्वय का परिणाम हो सकता है.
संगम साहित्य के इरावतम महादेवन के मुताबिक, संगम साहित्य का मुरुगन आर्य पूर्व देवता है जिसे बाद में आर्य देवमंडल में स्कंद या सुब्रमण्यम के रूप में समाहित किया गया. बहुत बारीक बात उन्होंने यह कही कि समावेश की गई. मुरुगन के जन्म की बात उन्होंने नहीं की.
ए के नीलकंठ शास्त्री अपनी किताब ‘अ हिस्ट्री औफ साउथ इंडिया’ में लिखते हैं, मुरुगन मूलतया तमिल पहाड़ी जनजातियों का देवता था, संस्कृत परंपरा के स्कंद से उस की पहचान बहुत बाद में जोड़ी गई. तमिल परंपरा के जानकार ए के रामानुजम ‘स्पीकिंग औफ शिवा’ में लिखते हैं- मुरुगन तमिल भूदृश्य और प्रकृति से जुदा देवता है, उस की कथाएं बाद में संस्कृत ढांचे में दोबारा लिखी गईं.
इन और दूसरे जानकारों का निचोड़ दिया प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर ने अपनी कृति ‘अर्ली इंडिया फ्रौम द ओरिजिन टू एडी 1300’ में यह कहते हुए कि कई स्थानीय और जनजातीय देवताओं को ब्राह्मणवादी धर्म में पौराणिक देवताओं से जोड़ कर समाहित किया गया है, लिखा है कि स्कंद का मुरुगन से जोड़ा जाना एक ऐसा ही उदाहरण है.
इस विवाद को हवा देने का असली उद्देश्य यह है कि तेजी से उन्नति कर रहे थोड़े कम अंधविश्वासी दक्षिणी राज्यों की आर्थिक उन्नति को रोक कर वहां पूजापाठ को बढ़ावा देने वाली सरकारें बैठाई जाएं जो मंदिरों के चक्करों में ज्यादा रहें, जनता के स्वास्थ्य, रोजगार, भूख, शिक्षा पर कम ध्यान दें.
ऐसा ही कृत्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं जो यूनाइटेड स्टेट्स औफ अमेरिका के दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील, पेरू, एक्वाडोर को गिनती में ले आना चाहते हैं ताकि यूएसए से सारे गैरगोरे वापस दक्षिण अमेरिका चले जाएं.
बहुत से भारतीय व्यापारी दक्षिणी राज्यों में अच्छा काम कर रहे हैं. उन्हें वहां से ला कर उतरी राज्यों की गंदगी, बदबू, बिखराव में जीने की उन में आदत डालना जरूरी है, तभी उन का धार्मिक ‘कल्याण’ होगा. Thiruparankundram Deepam Controversy :





