Baramulla Movie Review : यह एक सुपरनैचुरल क्राइम फिल्म है. ‘सुपर नैचुरल’ शब्द उन व्यक्तियों, वस्तुओं या घटनाओं के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें कुछ लोग वास्तविक मानते हैं हालांकि वे प्रकृति से परे होते हैं जैसे कि दिव्य, जादुई प्राणी आदि. इस फिल्म में कोई भूत प्रेत या डराने वाली चीजें नहीं हैं. आप को इस में थ्रिल मिलेगा. फिल्म देखते वक्त आप उत्सुक रहेंगे कि आगे क्या होने वाला है.
बारामूला कश्मीर घाटी का एक जिला है. यह कश्मीर घाटी के लिए एक प्रवेशद्वार रहा है. यहां जब-तब पाकिस्तानी आतंकवादियों की घुसपैठ होती रही है. यह शहर झेलम नदी के किनारे बसा है. निर्देशक आदित्य सुहास जांबले ने इस से पहले ‘आर्टिकल 370’, ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी उम्दा फिल्में बनाई हैं.
‘बारामूला’ कश्मीर की बर्फ से ढकी घाटियों में बनी एक रहस्यमय फिल्म है, जिस में डर भी है और इमोशंस भी. फिल्म में पुरानी यादें, कश्मीरी पंडितों का दर्द और अलौकिक घटनाएं एक साथ जोड़ते हैं.
कश्मीर की हसीन वादियां अपने दामन में कई जख्म समेटे हुए हैं. कश्मीरी बच्चों का पत्थरबाज बनना हो या कश्मीरी पंडितों का वहां से पलायन, ‘बारामूला’ इन्हीं जख्मों पर मरहम लगाती नजर आती है. घाटी में बच्चों का ब्रेनवाश कर के उन्हें आतंकवादी बनाने से ले कर इस फिल्म की कहानी 90 के दशक में पंडितों के कत्लेआम से जुड़ती है.
‘बारामूला’ की कहानी एक भूतपूर्व एमएलए के मासूम बेटे के गायब होने से शुरू होती है. इस केस को सुलझाने के लिए डीएसपी रिदवान शफी (मानव कौल) अपनी पत्नी गुलनार (भाषा सुम्बली), बेटी नूरी (अरिस्ता मेहता) और अयान (रोहन सिंह) के साथ बारामूला पहुंचता है. रिदवान के पड़ताल करते करते वहां कई और बच्चे गायब हो जाते हैं. वहीं जिस घर में रिदवान का परिवार रहता है वहां गुलनार और उस के बच्चों को अजीबोगरीब साए दिखते हैं. उन्हें उन सायों की परछाइयां भी दिखती है. अजीब आवाजें सुनाई पड़ती हैं, बच्चों का व्यवहार बदल जाता है मगर रिदवान इन सब पर विश्वास नहीं करता.
रिदवान और उस की बेटी के रिश्ते एक हादसे की वजह से सामान्य नहीं हैं. दिखाई देने वाले ये साए कौन हैं, बच्चों के गायब होने से उन का क्या कनेक्शन है, निर्देशक ने इस सब पर रहस्य का परदा डाला हुआ है. क्लाइमैक्स में जाकर रहस्य का पर्दाफाश होता है. क्लाइमैक्स का आधा घंटा असरदार है और झकझोरता है. अंत में रिदवान न सिर्फ अपनी खोई बेटी को ढूंढ़ निकालता है बल्कि बाकी बच्चों का पता भी लगा लेता है.
मध्यांतर से पहले फिल्म रोचक है, मध्यांतर के बाद यह भटकाने का काम करती है. कश्मीर पर अब तक बनी बाकी फिल्मों से यह काफी अलग है.
मानव कौल का किरदार इस माहौल में दर्शकों को उलझाए रखता है. कहानी में कश्मीर की दंतकथाओं में से निकले शैतानी किरदार पासिकदार को उठाया है. इस किरदार को कश्मीर की रियलिटी की कहानियों से बुना गया है. इस कहानी में पुलिस वालों के दर्द को भी बयां किया गया है. फिल्म का संपादन चुस्त है. सिनेमेटोग्राफी एक किरदार की तरह है. कश्मीर की वादियों और अंधेरे को कहानी से जोड़ा गया है. घर का इंटीरियर सिहरन पैदा करता है.
आदित्य सुहास जांबले का निर्देशन अच्छा है. निर्देशक ने अंत तक सस्पेंस बनाए रखा है. मानव कौल अपने किरदार में पूरी तरह फिट है. वह खुद बारामूला का निवासी है. भाषा सुम्बली ने गुलनार के किरदार में एक ऐसी औरत का किरदार निभाया है जो डरी हुई भी है और मजबूत भी. कहीं-कहीं कहानी धीमी हो जाती है. Baramulla Movie Review :





