डाक्टर के हाथ से परचा लेते ही जूही की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. बेचारी आज बहुत परेशान थी. होती भी क्यों न, मां को कैंसर की बीमारी जो थी. इधर 6 महीने से तो उन की सेहत गिरती ही जा रही थी. वे बेहद कमजोर हो गई थीं.

पिछले महीने मां को अस्पताल में भरती कराना पड़ा. ऐसे में पूरा खर्चा जूही के ऊपर आ गया था. मां का उस के अलावा और कौन था. पिता तो बहुत पहले ही चल बसे थे. तब से मां ने ही जूही और उस के दोनों भाइयों को पालापोसा था.

तभी जूही के कानों में मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘बेटी जूही, जरा पानी तो पिला दे. होंठ सूखे जा रहे हैं मेरे.’’

अपने हाथों से पानी पिला कर जूही मां के पैर दबाने लगी. परचा पकड़ते ही वह परेशान हो गई, ‘अब क्या करूं?’

रिश्तेदारों ने भी धीरेधीरे उन से कन्नी काट ली थी. जैसेजैसे वक्त बीतता जा रहा था, खर्चे तो बढ़ते ही जा रहे थे. सबकुछ तो बिक गया था. अब क्या था जूही के पास?

तभी जूही को सुभाष का ध्यान आया. उस की परचून की दुकान थी. वह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. जूही उस की दुकान की तरफ चल दी.

सुभाष जूही को देख कर चौंका और उस के अचानक इस तरह से आने की वजह पूछी, ‘‘आज मेरी याद कैसे आ गई?’’ कह कर सुभाष उस की कमर पर हाथ फेरने लगा.

जूही ने कहा, ‘‘वह… लालाजी… मां की तबीयत काफी खराब है. मैं आप से मदद मांगने आई हूं. दवा तक के पैसे नहीं हैं मेरे पास,’’ कहते हुए वह हिचकियां ले कर रोने लगी.

जूही की मजबूरी में सुभाष को अपनी जीत नजर आई, ‘‘बोल न क्या चाहती है? मैं तो हर वक्त तैयार हूं. बस, तू मेरी इच्छा पूरी कर दे,’’ बोलते हुए सुभाष ने उस की तरफ ललचाई नजरों से ऐसे देखा, जैसे कोई गिद्ध अपने शिकार को देखता है.

जूही सुभाष की आंखों में तैर रही हवस को पढ़ चुकी थी. वह तो खुद ही समर्पण के लिए आई थी. हालात से हार मान कर वह उस के सामने जमीन पर बैठ गई. आखिर चारा भी क्या था, उस के पास समझौते के सिवा. जीत की खुशबू पा कर सुभाष की हवस दोगुनी हो गई थी. उस ने अपने मन की कर डाली.

थोड़ी देर बाद सुभाष ने जूही को रुपए देते हुए कुटिल मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘कभी भी, कैसी भी जरूरत हो, मैं तुम्हारी मदद के लिए तैयार हूं. बस, एक रात के लिए तू मेरे पास आ जाना.’’

खुद को ठगा हुआ महसूस करते हुए जूही वापस अस्पताल आ गई. उस ने दवा और अस्पताल के बिल चुकाए. वह मन ही मन सोच रही थी, ‘आज तो मैं ने समझौता कर के मां की दवाओं का इंतजाम कर दिया, लेकिन अब आगे क्या होगा?’

यही नहीं, जूही को अपने दोनों भाइयों की पढ़ाई और खानेपीने के खर्च की भी चिंता सताने लगी थी.

अब जब भी पैसों की जरूरत होती, जूही सुभाष के पास चली जाती और कुछ दिन के लिए परेशानी आगे टल जाती. वह अकसर अपने को दलदल में फंसा हुआ महसूस करती, लेकिन जानती थी कि रुपएपैसे के बिना गुजारा नहीं है.

धीरेधीरे मां की सेहत में सुधार होने लगा. भाइयों की पढ़ाई भी पूरी हो गई. नौकरी मिलते ही दोनों भाइयों ने अपनीअपनी पसंद की लड़कियों से शादी कर ली.

मां ने जब भाइयों से घर की जिम्मेदारी लेने को कहा, तो उन्होंने खर्चा देने से मना कर दिया. अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर वे अलग हो गए.

घर का खर्च, मां की बीमारी, डाक्टर की फीस व दवाओं का खर्च… इन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए जूही को बस एक सहारा दिखता था सुभाष.

लेकिन, जूही अब थक कर टूट चुकी थी. एक दिन मां ने उसे उदास देखा तो वे पूछे बिना न रह सकीं, ‘‘क्या हुआ आज तुझे? तू इतनी चुप क्यों हैं?’’ और उस की पीठ पर प्यार भरा हाथ फेरा.

जूही सिसकसिसक कर रोने लगी. वह मां से लिपट कर बहुत रोई. मां हैरान भी हुईं और परेशान भी, क्योंकि सिर्फ वे ही जानती थीं कि जूही ने इस घर के लिए क्याक्या कुरबानियां दी हैं.

कुछ दिन बाद जूही की मां हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं. उन के जाने के बाद जूही बहुत अकेली रह गई. इधर सुभाष को भी उस में कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गई थी. जिस मकान में जूही रहती थी, वह भी बिक गया. सब सहारे साथ छोड़ कर जा चुके थे.

जूही ने एक कच्ची बस्ती में एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया और लोगों के घरों में रोटी बनाने लगी. रोज सपने बुनती, जो सुबह उठने तक टूट जाते थे, फिर भी उस ने हिम्मत नहीं हारी. पर शरीर भी कब तक साथ देता.

अब जूही बीमार रहने लगी थी. तेज बुखार होने की वजह से एक दिन सांसें थमीं तो दोबारा चालू ही नहीं हो पाईं. आज उस ने फिर एक नया समझौता किया था मौत के साथ. वह मौत के आगोश में हमेशाहमेशा के लिए चली गई थी…