सरिता विशेष

यह शर्मनाक हादसा छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के पालनार कसबे के आदिवासी गर्ल्स होस्टल का है. बीती 31 जुलाई को पालनार होस्टल की आदिवासी लड़कियां चहक रही थीं. एक नाचगाने के जलसे की तैयारियां कर रही वे लड़कियां बारिश का लुत्फ उठाते हुए घर न जा पाने का अफसोस भी कर  रही थीं कि राखी के दिन अपने भाइयों की कलाई पर राखी नहीं बांध पाएंगी.

होस्टल में खासी चहलपहल थी. जलसे की तैयारियां कर रही लड़कियां उस वक्त और खुश हो उठीं, जब उन्हें यह पता चला कि नजदीक के कैंप से कई जवान उन से राखी बंधवाने आ रहे हैं.

गौरतलब है कि नक्सली इलाके छत्तीसगढ़ में जगहजगह सीआरपीएफ के कैंप लगे हुए हैं, जिन में सेना के जवान डेरा डाले हुए हैं. जिस वक्त वरदी पहने कई जवान होस्टल आए, तब कुछ लड़कियां बाथरूम गई हुई थीं.

उन में से जब कुछ लड़कियां अपने कमरों की तरफ लौट रही थीं, तब उन्हें देख कर राखी बंधवाने की मंशा लिए आए जवानों ने एक बार फिर अपना असली रंग दिखा दिया. उन्होंने बाथरूम से आती लड़कियों को रास्ते में रोक कर उन की तलाशी की बात कही, तो वे लड़कियां घबरा उठीं.

सीआरपीएफ के जवानों की इस इलाके में पुलिस वालों और नक्सलियों से भी ज्यादा दहशत रहती है, इसलिए लड़कियां डर के मारे तलाशी से इनकार नहीं कर पाईं.

तलाशी के नाम पर जवानों ने जो घटिया हरकत की, उस ने सेना के जवानों की बदनीयती की पोल खोल दी.

तलाशी के बहाने उन्होंने लड़कियों के अंगों से छेड़छाड़ शुरू की तो वे और घबरा उठीं, पर हट्टेकट्टे और वरदी के नशे में चूर जवानों का विरोध नहीं

कर पाईं. तलाशी के नाम पर उन्होंने भोलीभाली लड़कियों की कैसी तलाशी ली होगी, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं है.

जब तलाशी के बहाने छेड़छाड़ पर पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा, तो लड़कियों की हिम्मत वापस आई और उन्होंने शोर मचाते हुए विरोध शुरू कर दिया. इस पर और भी लड़कियां इकट्ठा होने लगीं, तो जवान भाग खड़े हुए, पर तब तक तकरीबन 14 लड़कियों के नाजुक अंगों से खिलवाड़ कर अपनी हवस और बुरी मंशा को अंजाम दे चुके थे.

बात जब होस्टल की वार्डन द्रौपदी सिन्हा तक पहुंची, तो इस शर्मनाक हादसे पर वे गुस्सा हो उठीं और सीधे  नजदीकी थाने कोंडाकोआ जा कर अज्ञात जवानों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

कुछ ही देर में पूरे राज्य में जवानों की इस बेजा हरकत पर खासा हल्ला मच गया और आदिवासी गुस्से से भर उठे कि हमारी लड़कियों को तो सीआरपीएफ के जवानों ने भेड़बकरी समझ रखा है, जो कभी भी कहीं भी नक्सली होने के शक में पकड़ कर तलाशी के नाम पर छेड़छाड़ शुरू कर देते हैं और मौका मिले तो बलात्कार तक कर डालते हैं.

माहौल गरमाते देख पुलिस और प्रशासन भी हरकत में आ गए और मामले की जांच के लिए तुरंत एक कमेटी बना डाली. इस कमेटी ने

13 छात्राओं के बयान दर्ज किए, तो एक हैरतअंगेज बात यह भी सामने आई कि उन जवानों के नाम और पहचान किसी को नहीं मालूम थे.

आदिवासी लड़कियों के बयानों से यह जाहिर हुआ कि एक जवान बारीबारी से उन्हें टटोलता रहा और दूसरा होस्टल की निगरानी करता रहा.

दंतेवाड़ा के कलक्टर सौरभ कुमार और पुलिस के आला अफसर भी पालनार गर्ल्स होस्टल पहुंचे, पर तब तक वे जवान फरार हो चुके थे.

बहरहाल, छात्राओं द्वारा बताए गए हुलिए के आधार पर उन की पहचान शुरू हुई और पुलिस ने अज्ञात वरदीधारियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 354 और 354 (क) के तहत मामला दर्ज कर उन जवानों की खोजबीन शुरू कर दी.

जवान या शैतान

मामले ने तूल पकड़ा, तो आदिवासी संगठनों के लोगों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया. 8 अगस्त को पीडि़त छात्राओं को 231वीं बटालियन के 254 जवानों के फोटो और वीडियो दिखाए गए, तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया.

पहला जवान 9 अगस्त को ही गिरफ्तार कर लिया गया, जिस का नाम शमीम अहमद है और वह जम्मूकश्मीर का रहने वाला है.

दूसरा जवान नीरज खंडेलवाल घटना के दूसरे दिन ही छुट्टी ले कर अपने घर देहरादून भाग गया था, जिसे 12 दिन बाद गिरफ्तार कर लिया गया.

शमीम और नीरज तो इसलिए जल्दी पकड़े गए, क्योंकि उन्होंने आदिवासी गर्ल्स होस्टल में घुस कर इन लड़कियों पर बुरी निगाह डाली थी और उन के साथ बेहूदा हरकतें भी की थीं.

कहने को तो इन जवानों की ड्यूटी नक्सलियों से निबटने और आदिवासियों की हिफाजत करने की है, पर होता उलटा है. ये जवान खुद आदिवासी लड़कियों और औरतों पर मौका पाते ही भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़ते हैं और देखते ही देखते उन की इज्जत तारतार कर देते हैं.

दरअसल, 31 जुलाई को पालनार में हुआ यह था कि जवानों की इमेज चमकाने के लिए प्रशासन ने खुद रक्षाबंधन का जलसा रखा था, जिसे नाम दिया गया था ‘सुरक्षा बलों के साथ बस्तर की औरतों का अनोखा रिश्ता’. दंतेवाड़ा के कलक्टर सौरभ कुमार और एसपी कमललोचन कश्यप की इजाजत से ही इसे किया गया था.

देर से ही सही, पर सच जब उजागर हुआ, तो कई सवाल भी साथ लाया कि अगर आदिवासी छात्राओं से जवानों को राखी बंधवानी ही थी, तो इस के लिए रक्षाबंधन वाले दिन के बजाय प्रोग्राम हफ्ताभर पहले क्यों रखा गया और खुले में रखने के बजाय बंद में क्यों रखा गया.

इस होस्टल में तकरीबन 5 सौ आदिवासी लड़कियां रहती हैं, जिन्हें कहा गया था कि वे नाचगाने की प्रैक्टिस करें.

कई और सवाल भी हैं. मसलन, क्या रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों के सामने नाचतीगाती हैं? जवाब साफ है कि नहीं. इस दिन भाई भले ही वे फिर धर्म के क्यों न हों, अपनी बहनों को तोहफे देते हैं और उन की हिफाजत की जिम्मेदारी लेते हैं.

पर यहां तो उलटी गंगा बह रही थी. जवानों ने आते ही लड़कियों को छेड़ना शुरू कर दिया, जिस से लड़कियां अपने बचाव के लिए टायलेट की तरफ भागीं, पर वहां भी हैवान बने जवानों ने उन को बख्शा नहीं और मामले पर लीपापोती करते हुए यह जताने की कोशिश की गई कि केवल 2 जवान ही गए थे, जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है.

एक महीने तक तो सच को छिपा कर रखा गया, लेकिन पर जब यह पूरी तरह उजागर हुआ तो साफ यह हुआ कि बस्तर में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज है ही नहीं. आएदिन सीआरपीएफ के जवान आदिवासी औरतों की इज्जत से खिलवाड़ किया करते हैं.

अब से तकरीबन 6 महीने पहले भी आधा दर्जन आदिवासी लड़कियों के नक्सली होने के शक में उन के स्तन तक निचोड़ कर देखे गए थे.

इन से अच्छे हैं नक्सली

सेना के जवानों के सामने आदिवासी लड़कियों को नाचने पर क्यों मजबूर किया गया, इस की जांच हो तो कई चौंका देने वाली बातें उजागर होंगी. पर अफसोस, इन भोलेभाले आदिवासियों से किसी को कोई सरोकार नहीं है. सभ्य समाज की नजर में ये गंवार हैं और मीडिया तभी यहां पहुंचता है, जब नक्सली कोई जोरदार धमाका कर जवानों को उड़ा देते हैं.

हर कोई जानता है कि नक्सली आदिवासियों के हिमायती हैं. उन का मानना है कि पहले पूंजीपति और जमींदार आदिवासियों का शोषण करते थे, अब वही काम बस्तर में तैनात सेना के जवानों के जरीए कराया जा रहा है और इस की जिम्मेदार सरकार है, जो नहीं चाहती कि आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन का उन का बुनियादी हक मिले.

नक्सली चूंकि सेना के जवानों से आदिवासियों की हिफाजत करते हैं, इसलिए उन्हें देशद्रोही करार देते हुए बदनाम कर दिया जाता है. पूरे देश में हवा ऐसी बनाई जाती है, जैसे नक्सली कोई आतंकी या समाज के दुश्मन हों. सेना के जवानों से परेशान इन आदिवासियों की हिफाजत नक्सली करते हैं, तो इस की एवज में आदिवासी भी उन का साथ और माली इमदाद देते हैं.

अरबों रुपए सरकार इन जवानों की तैनाती और खानेपीने पर खर्च कर रही है, पर वे आदिवासियों को तंग करते हैं, तो नक्सलियों की इस दलील को एकदम खारिज नहीं किया जा सकता कि सरकार की मंशा सेना के जवानों से आदिवासियों को इतना परेशान करा देने की है कि वे खुद जंगल छोड़ कर भागने लगें और कुदरती तोहफों से भरपूर बस्तर उद्योगपतियों को दिया जा सके.

मुमकिन है कि यह पूरा सच न हो, पर पालनार की घटना से यह तो उजागर होता है कि जवानों की मंशा और इरादे ठीक नहीं थे, जो घर और बीवी छोड़ कर सालों से बस्तर के कैंपों में रह रहे हैं और अपनी सैक्स की भूख मिटाने के लिए आदिवासी औरतों को निशाना बनाते हैं. ऐसे में कोई उन्हें बचाने नहीं आता. आते हैं तो नक्सली और वे भी सीधे बारूदी सुरंगें लगा कर जवानों को थोक में मारते हैं.

इन दोनों के बीच पिस रहा है तो बेचारा आदिवासी समाज, जिसे यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्यों हजारों जवानों को सरकार ने इस दुर्गम इलाके में रख छोड़ा है, जो करने के नाम पर आदिवासियों को आएदिन परेशान करते हैं और अब तो होस्टलों में घुस कर लड़कियों को भी नहीं बख्श रहे हैं.

आदिवासियों को जवानों से भले और हमदर्द नक्सली लगते हैं, तो इस में हैरत की बात क्या?

दूसरी कई मांगों और पालनार गर्ल्स होस्टल मामले के विरोध में कई आदिवासी संगठनों ने 5 सितंबर, 2017 को बस्तर बंद का ऐलान किया था, जो कामयाब रहा था.

पहली दफा कुछ गैरआदिवासियों ने भी उन का साथ दिया था. शायद ये लोग भी सेना के जवानों से आजिज आने लगे हैं. पर सरकार जवानों को यहां से हटाएगी, ऐसा लग नहीं रहा.