ज्ञात इतिहास में कांग्रेस पहली दफा रोजा अफ़्तारी की पार्टियां आयोजित नहीं करेगी और श्रुति व स्मृति के आधार पर कहा जा सकता है कि आरएसएस पहली बार रोजा अफ़्तारी का जलसा कर रहा है. दूसरी बात ज्यादा दिलचस्प अहम और चिंताजनक है. कल तक मुसलमानो और इस्लाम के नाम से बिदकने वाले संघ की सेहत या तो गड़बड़ है या फिर दशकों पुराना मर्ज ठीक हो रहा है, यह कहना थोड़ा मुश्किल है पर इतना जरूर तय है कि राजनीति नई करवट ले रही है. यह करवट दो टूक कहा जाए तो शुद्ध धार्मिक है, इसके पीछे कोई उदारता, उपकार या भाईचारे की भावना नहीं है, बल्कि स्वार्थ है जिसका मकसद यह है कि पंडे मौलवी सब मिलबांट कर खाएं अपने अपने अनुयायियों को लूटें.

देश का माहौल दान दक्षिणा और धार्मिक बना रहे इसके लिए सब एकजुट होने तैयार हैं. भाजपा सत्ता में है और आगे भी बने रहने जरूरी हो गया है कि वह मुस्लिम वोटों का बटवांरा करे. उदाहरण उत्तर प्रदेश का लें तो भाजपा को मुस्लिम वोट नहीं चाहिए, वह चाहती है कि ये वोट सपा, बसपा और कांग्रेस में बंट जाएं तभी उसे फायदा है. बिहार में कांग्रेस लालू और नीतीश के साथ थी इसलिए मुस्लिम वोटो का बंटवारा नहीं हुआ. पश्चिम बंगाल मे ममता मुस्लिम वोट वटोर ले गईं, तो तमिलनाडु में जयललिता के खाते में ये वोट गए.

रोजा अफ़्तारी इन्हीं समीकरणों का आविष्कार है कि अब भाईचारे का दिखावा किया जाए, ठीक वैसे ही जैसे पंडित नेहरू और उनके वारिसान करते थे, लेकिन अब सोनिया हिम्मत हारते अफ़्तारी सियासत से किनारा करते उनके खजूर और राशन गरीबों में बांटने की बात कर रही हैं, तो कांग्रेस की गिरती माली हालत देख लोग मज़ाक में कह भी रहे हैं कि बेहतर होगा कि ये खजूर (काजू तो बचे नहीं) और राशन वह जकात और खैरात समझ खुद रख ले, अल्ला ताला ने चाहा तो फिर अच्छे दिन आएंगे, जो हाल फिलहाल नागपुर में ठहर गए हैं.

संघ का सच और मंशा अभी हर कोई नहीं समझ रहा कि भारत माता की जय बुलवाने वह साम, दाम, दंड, भेद सब हथकंडे अपनाएगा. अभी तो अफ़्तारी की आड़ में मुसलमानो को पुचकारा जा रहा है. अब कट्टर मुस्लिमों और संगठनों की रणनीति और प्रतिकिया आना बाकी है, मुमकिन है जवाब में वे भी नवरात्रि के दिनो में लंगर और भंडारे आयोजित करने लगें, यानि गंगा जमनी तहजीब को शबाब पर लाकर ही छोड़ें, ताकि दुकान चलती रहे. इसके लिए दोनों धर्मों के दुकानदार गले मिलने भी तैयार हैं और जरूरत पड़े तो काटने भी.