उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की मोहनलालगंज तहसील दलित और पिछडा बाहुल्य इलाका है. मोहनलालगंज विधानसभा और लोकसभा सीट दलितों की लिये सुरक्षित सीट है. समाजवादी पार्टी से चंदा रावत विधायक और भारतीय जनता पार्टी से कौशल किशोर सांसद है. विधायक चंदा रावत तो मोहनलालगंज कस्बे की ही रहने वाली हैं. इन तमाम बातों के बीच का सच यह है कि यहां पुलिस अभी भी गांव के गरीब और कमजोर लोगों को परेशान करने में किसी दूरदराज के इलाके से पीछे नहीं है.

प्रदेश सरकार गांव के लोगों की परेशानियों को खत्म करने के लिये तहसील दिवस के आयोजन करती है. तहसील दिवस में पुलिस और तहसील के कर्मचारी और अफसर जनता की शिकायते सुनते हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तहसील दिवस का आयोजन इसलिये शुरू किया था, जिससे गांव के लोगों को अपनी शिकायतों के लिये जिला लेवल पर न आना पड़े. सरकार ने जिले के डीएम और एसपी को भी तहसील दिवस में जाने का आदेश दे रखा है. इसके बाद भी तहसील दिवस अपने मकसद में सफल नहीं हो पा रहा है.

लखनऊ के जिलाधिकारी राजशेखर और एसएसपी मंजिल सैनी मोहनलालगंज तहसील में आयोजित तहसील दिवस में जनता की शिकायतें सुनने के लिये गये थे. इस बीच नगराम थाने के भजाखेडा गांव की रहने वाली बुजुर्ग महिला शिवपति अपनी बहू रानी और बच्चों के साथ उनके पैरों पर गिर पड़ी. बड़ी मुश्किल से अधिकारियों ने दोनो को उठाया और उनसे उनकी परेशानी पूछी. शिवपति ने बताया कि नगराम पुलिस ने उसके इकलौते बेटे को लूट के एक मामलें में फर्जी तरह से फंसा दिया है. उसके बेटे ने कोई लूट नहीं की है. इसके पहले भी चुनावी रंजिश में पुलिस ने उसके बेटे का प्रताडित किया था. जिलाधिकारी राजशेखर और एसएसपी मंजिल सैनी से जांच और न्याय का भरोसा पाने के बाद ही शिवपति और उसकी बहू रानी उठे.

दरअसल गांवों में पंचायत चुनावों में रंजिश को बढावा देने का काम किया है. चुनाव लड़ने और लड़ाने वाले लोग वोट पाने के लिये आपसी खेमेबंदी करते हैं. तहसील और थाने के लोग गांव के प्रधान की कही बात को मानकर लोगों के खिलाफ कारवाई करती है, जिसमें कई बार निर्दोष लोग फंस जाते हैं. पुलिस को ऐसे मामलों में सही और गलत का फैसला बहुत सोच समझ कर करना चाहिये. इस तरह की छोटी छोटी घटनायें से केवल पुलिस ही नहीं सरकार की छवि भी खराब होती है.

यह घटना केवल लखनऊ की ही नहीं है. पूरे प्रदेश में यही हाल है. पुलिस अपनी कार्यशैली बदलने को तैयार नहीं है. अगर जनता के बीच सरकार की छवि को सही रखना है तो थाना और तहसील के सरकारी नौकरों को जनता की मदद करनी होगी. ग्रामीण इलाके की जनता की सबसे अधिक परेशानी तहसील और थानों से ही होती है. समाजवादी सरकार पर थानो की राजनीति का ज्यादा ही आरोप लगता है, ऐसे में इस सरकार को कुछ ज्यादा ही सचेत रहने की जरूरत है.