चुनावी मौसम आते ही सभी राजनीतिक दल नामी चेहरों की तलाश में खेल के मैदान का रुख करने लगते हैं. लिहाजा खिलाडि़यों को टिकट मिल जाता है. लेकिन सत्ता की पिच पर इन का खेल कितना फ्लौप हो रहा है, बता रहे हैं भारत भूषण श्रीवास्तव.
मौजूदा चुनावी होहल्ले में एक अहम खबर सिमट कर रह गई थी कि फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर धावक मिल्खा सिंह को चंडीगढ़ सीट से लड़ने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी तृणमूल कांग्रेस से टिकट देने की पेशकश की थी जिसे मिल्खा सिंह ने विनम्रता से नकारते हुए जवाब दिया था कि अगर उन्हें राजनीति में आना ही होता तो वे जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते ही आ गए होते. इस बाबत नेहरू ने भी उन्हें प्रस्ताव दिया था.
मिल्खा सिंह के जमाने यानी 60 के दशक से ले कर अब तक की राजनीति काफी बदल गई है पर खिलाडि़यों का राजनीति में आने का सिलसिला थम नहीं रहा है. सभी खिलाड़ी आमतौर पर मिल्खा सिंह की तरह और बड़ी पेशकश ठुकराते नहीं हैं उलटे उस का इंतजार और कभीकभी खुद भी पहल करते हैं. मिल्खा की मानें तो नेताओं की छवि ठीक नहीं है और जो मानसम्मान आज मुझे मिल रहा है वह राजनीति में आ कर नहीं मिलता.
इस का यह मतलब कतई नहीं कि राजनीति में दाखिले पर खिलाड़ी जगत में दो फाड़ हैं. राजनेताओं के बारे में मिल्खा सिंह की राय बेहद व्यक्तिगत ही कही जाएगी लेकिन यह जताने में वे कामयाब रहे कि खेल और राजनीति व खिलाडि़यों और नेताओं के गठजोड़ की बुनियाद खुदगर्जी पर टिकी है. उन के बहाने ममता बनर्जी की मंशा उत्तर भारत में अपनी पार्टी का खाता खोलने और एक ऐसा सांसद हथियाने की थी जिस की छवि आम सांसदों से हट कर है. यही नेहरू चाहते थे. खिलाडि़यों की लोकप्रियता का फायदा उठाने के कांग्रेसी संस्कार छूत की बीमारी की तरह सभी राजनीतिक दलों को लग गए हैं.
अब किसी खिलाड़ी को मानसम्मान, पूछपरख या स्वाभिमान की चिंता नहीं है. राजनीति और खिलाडि़यों से ताल्लुक रखता यह समीकरण भी दिलचस्प है और अहम भूमिका निभाता है कि क्रिकेट को छोड़ दूसरे खेलों में खिलाड़ी आमतौर पर 30 की उम्र के बाद रिटायर होना शुरू हो जाते हैं और उलट इस के अधिकांश नेता इस उम्र में आ कर पहचान बना पाते हैं.
करार या सौदा एकदम साफ है कि राजनीतिक दलों को खिलाड़ी के रूप में ऐसा उम्मीदवार मिल जाता है जिस की जीत की गारंटी हो न हो पर शोहरत की बिना पर संभावना ज्यादा रहती है.
दूसरी तरफ खाली बैठे खिलाडि़यों की खुदगर्जी यह रहती है कि उसे नाम के अलावा और भी बहुत कुछ मिलता रहता है जिस में सुर्खियों में बने रहना प्रमुख है. खेल संगठनों में पांव जमाने में भी राजनीति उन की मदद करती है.
भारत रत्न के खिताब से नवाजने से पहले क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को सरकार ने राज्यसभा के लिए नामांकित किया था पर सचिन 2 दफा ही संसद तक गए और सांसदों से घिरे रहे. कई सांसद तो आम लोगों की तरह उन के औटोग्राफ लेने टूट पड़े.
अगर महज घूमनेफिरने या दर्शन देने ही सचिन जैसे खिलाड़ी संसद जाते हैं तो उन्हें सांसद बनाने का क्या लाभ? बात समझ से परे है कि यह सरकारों की खुदगर्जी और चालाकी है जो भारत रत्न जैसे खिताब भी खैरात की तरह बांटती है. सचिन के पहले एनडीए सरकार ने भी मशहूर पहलवान दारासिंह को राज्यसभा में लिया था दारासिंह भी न के बराबर गए.
इस दफा के महारथी
कलाकारों, फिल्मकारों और पत्रकारों को थोक में संसद तक पहुंचाने वाली ममता बनर्जी को भले ही मिल्खा सिंह ने निराश किया हो पर मशहूर फुटबौलर बाईचुंग भूटिया को घेरने में वे कामयाब रहीं, जो इस चुनाव में पश्चिम बंगाल की दार्जिलिंग सीट से टीएमसी के उम्मीदवार हैं.
बाईचुंग भूटिया भी राजनीति में आए दूसरे खिलाडि़यों की तरह सियासी दांवपेंच में बहुत ज्यादा माहिर नहीं हैं लेकिन सीख रहे हैं इसलिए टिकट के ऐलान के तुरंत बाद उन्होंने गोरखा जनमुक्ति मोरचा (जीजेएम) के मुखिया बिमल गुरुंग से मिल कर समर्थन मांगा पर बिमल गुरुंग ने उन्हें टरका दिया.
दरअसल, दार्जिलिंग के समीकरण क्षेत्रीय और जातिगत हैं. जीजेएम का दबदबा यहां है जो भारतीय जनता पार्टी से गठजोड़ कर टीएमटी को पांव नहीं जमाने देना चाहती.
पहली बार में ही बाईचुंग भूटिया को कड़ी टक्कर भाजपा के एसएस अहलूवालिया, कांग्रेस के सुजाय घटक और सीपीएम के समन पाठक से मिलना तय है. उन के लिए इकलौती सुकून देने वाली बात सत्तारूढ़ सीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी का सहारा और कांग्रेस का खत्म होता दबदबा है. वैसे भाजपा ने मशहूर गायक बप्पी लाहिड़ी को भी पश्चिम बंगाल की श्रीरामपुर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया है.
कांग्रेस ने इलाहाबाद की फूलपुर सीट से क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को मैदान में उतार कर मुकाबला न केवल दिलचस्प बल्कि कड़ा बनाने में भी कामयाबी पा ली है. फूलपुर सीट जानी इसलिए जाती है कि यहां से जवाहरलाल नेहरू ने अपना पहला चुनाव लड़ा था और 1961 में राम मनोहर लोहिया को लगभग 66 हजार वोटों से हराया था, लेकिन 1984 के बाद से कांग्रेस यहां से जीत के लिए तरस भी रही है. कैफ स्थानीय प्रत्याशी हैं और कांग्रेस को अल्पसंख्यक वोट मिलने की उम्मीद उन के नाम पर है. सपा और बसपा का भी खासा प्रभाव इस सीट पर है और भाजपा भी बराबरी से दौड़ में है.
भूटिया की तरह कैफ भी चतुष्कोणीय कड़े मुकाबले में हैं. उन्हें भी इकलौता फायदा खिलाड़ी और उस में भी खासतौर से क्रिकेटर होने का मिल रहा है. देखना दिलचस्प होगा कि भीड़ को वे वोटों में तब्दील कर पाते हैं या नहीं.
इन दोनों की तरह हौकी के मशहूर खिलाड़ी आदिवासी समुदाय के दिलीप तिर्की की राह भी आसान नहीं है जिन्हें बीजू जनता दल के मुखिया और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने सुंदरगढ़ सीट से उम्मीदवार बनाया है. इस के पहले उन्हें बीजद ने मार्च 2011 में राज्यसभा में लिया था. मूलरूप से आदिवासी दिलीप तिर्की इस इलाके के 60 फीसदी आदिवासियों की तरह धर्म बदल कर ईसाई बन गए थे. भारतीय हौकी टीम के 7 साल तक कप्तान रहे दिलीप की प्रतिबद्धता हमेशा ही आदिवासी समुदाय के साथ रही है.
ममता बनर्जी और राहुल गांधी की तरह नवीन पटनायक की मंशा भी एक खिलाड़ी को खड़ा कर सीट हथियाने की है. पद्म, एकलव्य और अर्जुन पुरस्कार विजेता दिलीप तिर्की त्रिकोणीय मुकाबले में लोकसभा चुनाव फतह कर पाएंगे या नहीं यह 16 मई को पता चलेगा.
दिलीप तिर्की को सुकून देने वाली बात झारखंड मुक्ति मोरचा और बीजद का गठजोड़ है. इस सीट से बीजद पहली दफा चुनाव लड़ रही है. इस का और अपनी लोकप्रियता का फायदा भी उन्हें मिल सकता है.
बिहार की दरभंगा सीट से तीसरी बार अपने जमाने के क्रिकेटर कीर्ति आजाद मुकाबले में हैं. इस सीट से 2 बार जीते और एक बार हारे कीर्ति आजाद एक पेशेवर नेता के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं. 2009 के चुनाव में उन्होंने आरजेडी के मोहम्मद अली अशरफ फातमी को तकरीबन 60 हजार वोटों से शिकस्त दे कर 2004 में उन्हीं के हाथों हुई डेढ़ लाख वोटों से शिकस्त दे कर हिसाब चुका कर लिया था. कीर्ति आजाद को दिक्कत देने वाली इकलौती बात यह है कि इस बार कांग्रेस और आरजेडी के बीच वोटों का बंटवारा नहीं होगा.
2009 के चुनाव में कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश की मुरादाबाद सीट दिलाने वाले पूर्व क्रिकेट कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन इस दफा राजस्थान की सवाई माधोपुर टोंक लोकसभा से उतारे गए हैं.
इस दफा मुरादाबाद में उन का विरोध था-मतदाता में भी और कार्यकर्ताओं में भी, जिस ने सवाई माधोपुर में उन का पीछा नहीं छोड़ा. नाम का ऐलान होते ही वहां के कार्यकर्ता और मतदाता ने दोटूक कहा कि अजहरुद्दीन अगर जीत भी गए तो यहां कभी मुंह नहीं दिखाएंगे.
राजस्थान की ही जयपुर ग्रामीण सीट से भाजपा ने मशहूर निशानेबाज, परिवार में चिली के नाम से पुकारे जाने वाले राज्यवर्धन सिंह राठौर को उम्मीदवार बना कर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. जागीरदार परिवार से ताल्लुक रखते राज्यवर्धन को सितंबर 2012 से ही उम्मीदवार माना जा रहा था जब उन्होंने भाजपा की सदस्यता लेते नरेंद्र मोदी का नाम जपना शुरू कर दिया था. मोदी के अलावा उन्हें मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का भी आशीर्वाद मिला हुआ है जो कांग्रेस के धाकड़ नेता सीपी जोशी से निपटने में उन की मदद करेगा.
भाजपा के सांसद के रूप में अमृतसर के मतदाता ने नवजोत सिंह सिद्धू  पर
2 दफा भरोसा जताया था. तीसरी बार भी नवजोत सिंह सिद्धू अमृतसर से भाजपा के उम्मीदवार होते पर इस बार अकाली दल ने टंगड़ी अड़ा दी.
चेतन चौहान का जादू क्रिकेट की तरह राजनीति में भी शुरुआती दौर में चमक कर रह गया. अपने टैस्ट जीवन में शतक लगाने को तरस गए चेतन चौहान अब राजनीति से भी रिटायर कर दिए गए हैं. जाहिर है वे एक असफल नेता साबित हुए हैं.
साल 2004 में पश्चिम बंगाल की कृष्णपुर सीट से भाजपा के सत्यव्रत मुखर्जी से 20 हजार वोटों से जीती मशहूर एथलीट ज्योतिर्मयी सिकदर को भी इस बार टिकट नहीं मिला है.

जो नहीं चल पाए
ऐसे खिलाडि़यों और उन में भी ज्यादातर क्रिकेटरों की फेहरिस्त काफी लंबी है जो सियासी ग्लैमर के चलते चुनाव तो लड़े लेकिन पहली बार ही औंधेमुंह लुढ़क गए.
इन में एक अहम नाम महाराष्ट्र के पूर्व क्रिकेटर विनोद कांबली का है. कांबली ने 2009 का विधानसभा चुनाव मुंबई की विक्रोली सीट से गुमनाम से राजनीतिक दल लोक भारती पार्टी से लड़ा था लेकिन उन्हें पहली बार में ही हार का मुंह देखना पड़ा था.
इस कड़ी में दूसरा नाम तेज गेंदबाज चेतन शर्मा का है. उन्होंने 2009 का लोकसभा चुनाव हरियाणा की फरीदाबाद सीट से बसपा के टिकट पर लड़ा था तो इस क्षेत्र में खासा रोमांच क्रिकेट की ही तरह पैदा हो गया था. अपने पहले ही भाषण में चेतन शर्मा ने मायावती को भरोसा दिलाया था कि वे इस सीट को बसपा के खाते में गिन लें. लेकिन जब नतीजा आया तो चेतन गिनती में ही नहीं थे. भाजपा के रामचंद बैसा और कांग्रेस प्रत्याशी अवतार सिंह भड़ाना के बीच वे ऐसे पिसे कि फिर राजनीति का नाम नहीं लिया.
अपने जमाने के मशहूर औलराउंडर मनोज प्रभाकर ने भी राजनीति में दांव आजमाया पर दिल्ली के मतदाताओं ने उन्हें आउट करार दे दिया.
एक और क्रिकेटर योगराज सिंह, जो कि आज के कामयाब क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता हैं, ने हालांकि एक ही टैस्ट खेला था पर जातिगत समीकरणों के चलते उन्हें चुनाव लड़ने का मौका मिला था. योगराज ने 2009 का विधानसभा चुनाव पंचकुला सीट से आईएनएलडी के टिकट पर लड़ा लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवार देवेंद्र कुमार बंसल से 12 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए थे. दिलचस्प बात रही कि युवराज ने अपने पिता के पक्ष में चुनाव प्रचार नहीं किया था.
इन हारों से एक बात यह साबित हुई कि एक दफा राष्ट्रीय दलों से खिलाड़ी शायद जीत पाएं पर क्षेत्रीय या छोटे दलों से जीतना उन के लिए मुश्किल है.
खिलाडि़यों का रुझान कब से राजनीति की तरफ हुआ इस सवाल का जवाब हैं नवाब मंसूर अली खान पटौदी, जिन्होंने पहला चुनाव 1971 में विशाल हरियाणा पार्टी के टिकट पर गुड़गांव सीट से लड़ा था पर हार गए थे.
भोपाल से पटौदी की हार शोध का विषय नहीं कही जा सकती क्योंकि ‘नवाबी’ को छोड़ कर सबकुछ उन के हक में था. पटौदी सुबह 11 बजे सो कर उठते थे और 1 बजे दोपहर तक चुनाव प्रचार के लिए निकलते थे. तब तक उन के दरबार में कार्यकर्ता उन का इंतजार करते चायनाश्ता करते रहते थे.
मशहूर हौकी खिलाड़ी कांग्रेस के असलम शेर खां का नाम अब बुजुर्गों की जमात में शुमार होने लगा है, जो 1984 और 1991 में मध्य प्रदेश की बैतूल सीट से जीते पर 1996 में भाजपा के विजय खंडेलवाल से हार गए थे.
कितने खरे कितने खोटे
राजनीति में खिलाड़ी उतने कामयाब हुए नहीं जितने होने चाहिए थे. इस की वजह नौसिखियापन के अलावा उन का नुमाइश की चीज होना भी है.
सांसद बने खिलाडि़यों ने कभी झांक कर अपने क्षेत्र में नहीं देखा. साल में एकाध बार पार्टी के कहने पर अपने होने और जाने की रस्म उन्होंने निभाई तो इस का खमियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा. पेशेवर नेताओं की तरह खिलाड़ी नेताओं ने कभी जनता से भावनात्मक संबंध या संपर्क नहीं रखा. शायद इस की वजह उन्हें यह समझ आना था कि वे नेता नहीं खिलाड़ी होने की वजह से चुने गए हैं.
संसद में अधिकतर खिलाड़ी नदारद रहे. हां, कीर्ति आजाद इस का अपवाद कहे जा सकते हैं क्योंकि बचपन से ही राजनीति देखने और समझने के कारण उन्हें अहसास था कि अगर जमे रहना है तो रहना आम नेताओं की तरह ही पड़ेगा.
खिलाडि़यों की जीत की एक अहम वजह पार्टियों के जमीनी कार्यकर्ता भी रहते हैं. यह बात खिलाड़ी भी समझते  हैं इसलिए वे निर्दलीय लड़ने का जोखिम नहीं उठाते. अभी तक के खिलाड़ी मतदाता की उम्मीदों पर कतई खरे नहीं उतरे हैं लेकिन उन का संसद में पहुंचना महत्त्वपूर्ण और जरूरी भी है जिस की अहमियत वे खुद नहीं समझ पाते.
2009 का लोकसभा चुनाव राजनीति के खिलाडि़यों की बिदाई के लिए ज्यादा जाना गया था स्वागत के लिए कम. लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है. मतदाताओं की एक मानसिकता खिलाडि़यों को वोट देने के पीछे यह भी रहती है कि पेशेवर नेता हमारे लिए वादों के मुताबिक कौन से चांदतारे तोड़ लाते हैं. खिलाड़ी जीतता है तो उन की सीट चर्चा में तो आ जाती है. पहले खिलाडि़यों को इसलिए वोट दिया जाता था कि उन्हें रूबरू देखने का मौका मिलेगा, लेकिन मीडिया के बढ़ते दायरे ने खिलाडि़यों को भी आम बना दिया है. ऐसे में तय है कि जिस खिलाड़ी को जीतना है उसे पसीना बहाना पड़ेगा और मतदाताओं को क्षेत्र की तरक्की का भरोसा भी दिलाना पड़ेगा नहीं तो 2009 के नतीजों का रीप्ले होने में देर नहीं लगने वाली.